NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
कानून
कृषि
कोविड-19
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
सरकार कोरोना से लड़े, किसानों से नहीं: संयुक्त किसान मोर्चा
संगठन ने एक बयान में कहा कि ऐसे समय में जब महामारी एक बार फिर पैर पसार चुकी है तब केंद्र सरकार को उन किसानों और मजदूरों की फिक्र करते हुए तत्काल प्रभाव से इस स्थिति से निपटना चाहिए, जिन्हें उसने नजरअंदाज कर दिया है।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
19 Apr 2021
Farmers

नयी दिल्ली : कोरोना माहमारी की दूसरी लहर के बीच ऐसी चर्चा शुरू हुई कि जैसे सरकार इसकी आड़ में किसान आंदोलन को ख़त्म करा देगी।  लेकिन संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने रविवार को साफ तौर पर कहा कि सरकार को कोरोना वायरस से लड़ना चाहिए, किसानों से नहीं। उन्होंने दोहराया कि मांगें पूरी होने के बाद ही किसान अपना आंदोलन खत्म करेंगे।

एसकेएम ने सरकार से किसानों के प्रदर्शन स्थलों पर भी टीकाकरण केन्द्र स्थापित करने और वायरस से बचाव के लिए उन्हें जरूरी उपकरण मुहैया कराने तथा निर्देश देने का अनुरोध किया।

संगठन ने एक बयान में कहा कि ऐसे समय में जब महामारी एक बार फिर पैर पसार चुकी है तब केन्द्र सरकार को उन किसानों और मजदूरों की फिक्र करते हुए तत्काल प्रभाव से इस स्थिति से निपटना चाहिए, जिन्हें उसने नजरअंदाज कर दिया है।

बयान में कहा गया, 'दिल्ली की सीमाओं से लेकर देश के अन्य हिस्सों में किसानों के विरोध प्रदर्शन तभी समाप्त होंगे जब किसानों की मांगें पूरी की जाएंगी। सरकार को प्रवासी मजदूरों के स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा के लिए भी हर संभव प्रयास करना चाहिए ताकि उन्हें किसी भी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े। यदि सरकार वास्तव में किसानों तथा मजदूरों और आम जनता के बारे में चिंतित है, तो उसे किसानों की मांगों को स्वीकार करना चाहिए।'

मोर्चा ने मोदी सरकार रवैये पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि कोरोना के साये मे लाये गए तीन खेती कानून पर केंद्र सरकार व भाजपा को बड़े पैमाने पर विरोध का सामना करना पड़ा है। सरकार यह बताने से हमेशा भागती रही है कि कोरोना महामारी में जब लोग अपने घरों में बंद थे, उस समय ही ऑर्डिनेंस के माध्यम से ये कानून क्यों लाये गए? सरकार यह भी बताने में असफल है कि किसानों व विपक्ष के भारी विरोध के बीच ससंद में इन कानूनों को जबर्दस्ती पास क्यों किया गया? अब जब सरकार मान रही है कि यह कानून गलत है व इनमें कोई भी संशोधन करवाया जा सकता है पर बताने में असक्षम है कि क़ानून रद्द क्यों नहीँ करना चाहती?

किसान नेताओं ने कहा कोरोना महामारी के कारण देश-दुनिया में लॉकडाउन लगाया गया था। उस स्थिति के बाद आये आकंड़ों से साफ स्पष्ट हुआ था कि सभी सेक्टर में जीडीपी का खराब प्रदर्शन रहा था पर कृषि सेक्टर में सकारात्मक वृद्धि थी। भोजन, किसान व खेती जीवन की न्यूनतम एवं अधिकतम जरूरत है। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि भारत जैसे देश में, जहां पर आज भी जनसंख्या का बहुत बड़ा तबका खेती पर निर्भर करता है, किसानों पर जबर्दस्ती शोषणकारी नीति थोपी जा रही है।

संयुक्त मोर्चे के नेताओं ने एक बार फिर जोर देकर कहा वर्तमान समय में जब कोरोना महामारी एक बार फिर से उठ रही है, केंद्र सरकार को किसानों-मजदूरों की फिक्र करते हुए तुरंत प्रभाव से मांगें मान लेनी चाहिए। दिल्ली की सीमाओं से लेकर देश के अन्य हिस्सों से किसानों के धरने तभी खत्म होंगे जब किसानों की मांगे मानी जाएंगी। सरकार साथ ही प्रवासी मजदूरों के स्वास्थ्य व उनकी सामाजिक सुरक्षा के लिए हर प्रयास करें जिससे उन्हें कोई समस्या का सामना न करना पड़े। अगर सरकार को किसानों-मजदूरों व आम जनता की इतनी ही फिक्र है तो किसानों की मांगें मान लें। किसान पहले भी सरकार की नीतियों से तंग आकर आत्महत्या कर रहे है। इस आंदोलन में भी 375 से ज्यादा किसानों की मौत हो गयी है। मानवता के आधार पर सरकार किसानों के धरनास्थलों पर वेक्सीनेशन सेंटर बनाये, कोरोना से बचाव के लिए जरूरी सामान व निर्देश मुहैया करवाये।

मोर्चे ने कहा यह बहुत निंदनीय है कि कोरोना के पिछले अनुभव से सरकार ने कुछ नहीं सीखा व देश में स्वास्थ्य सेवाओं व सामाजिक सुरक्षा की आज भी हालात वही है जो पिछले साल थी। प्रवासी मजदूरों को पैदल चलना पड़ सकता है व किसानों की फसलें भी बर्बाद हो सकती है परंतु इस बार किसान मजदूर सरकार के दमन व शोषणकारी निर्देश सहन करने की बजाय संघर्ष करेंगे। किसानों मजदूरों ने सरकार को एक मौका दिया था परंतु भाजपा अपने ही प्रोपगेंडा फैलाने में व्यस्त रही है। अभी सरकार को किसानों की मांगें माननी चाहिए व किसानों-मजदूरों से लड़ने की बजाय कोरोना महामारी से लड़ना चाहिए।

रविवार को सिंघु बॉर्डर पर संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा मंच के माध्यम से आसपास के लोगों का सम्मान किया गया था। पिछले करीब 5 महीनों से आसपास के लोगों ने निस्वार्थ भाव से किसानों के आंदोलन का समर्थन किया है। आसपास के किसानों, मजदूरों समेत आम लोगों ने प्यार सत्कार के साथ हमदर्दी दिखाई। संयुक्त किसान मोर्चा ने आज 18 अप्रैल को सिंघु के आसपास के गांवों, फैक्ट्रियों, बस्तियों व बाजारों के लोगों का मंच पर स्वागत व सम्मान किया। स्थानीय लोगों ने भविष्य में भी किसानों का समर्थन करने का वादा किया। मुख्य रूप से जयभगवान अंतिल, शमशेर दहिया, रणधीर अंतिल, अमित तुषिर एवम बलवान (नांगल गाँव), संजय खरेटा (रसोई गाँव), दीप खत्री (नरेला) आदि मौजूद रहे।

(समाचार एजेंसी भाषा इनपुट के साथ)

COVID-19
Famers Protest
farmers crises

Related Stories

दिल्लीः एलएचएमसी अस्पताल पहुंचे केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मंडाविया का ‘कोविड योद्धाओं’ ने किया विरोध

दिल्ली : नौकरी से निकाले गए कोरोना योद्धाओं ने किया प्रदर्शन, सरकार से कहा अपने बरसाये फूल वापस ले और उनकी नौकरी वापस दे

दिल्ली: कोविड वॉरियर्स कर्मचारियों को लेडी हार्डिंग अस्पताल ने निकाला, विरोध किया तो पुलिस ने किया गिरफ़्तार

किसान आंदोलन@378 : कब, क्या और कैसे… पूरे 13 महीने का ब्योरा

नीट-पीजी 2021 की काउंसलिंग की मांग को लेकर रेजीडेंट डॉक्टरों की हड़ताल को देश भर से मिल रहा समर्थन

यूपी: शाहजहांपुर में प्रदर्शनकारी आशा कार्यकर्ताओं को पुलिस ने पीटा, यूनियन ने दी टीकाकरण अभियान के बहिष्कार की धमकी

दिल्ली: महंगाई के ख़िलाफ़ मज़दूरों, महिलाओं, छात्र-नौजवानों व कलाकारों ने एक साथ खोला मोर्चा

दिल्ली: बढ़ती महंगाई के ख़िलाफ़ मज़दूर, महिला, छात्र, नौजवान, शिक्षक, रंगकर्मी एंव प्रोफेशनल ने निकाली साईकिल रैली

पश्चिम बंगाल: ईंट-भट्ठा उद्योग के बंद होने से संकट का सामना कर रहे एक लाख से ज़्यादा श्रमिक

बाहरी साज़िशों और अंदरूनी चुनौतियों से जूझता किसान आंदोलन अपनी शोकांतिका (obituary) लिखने वालों को फिर निराश करेगा


बाकी खबरें

  • kandyadan
    रवि शंकर दुबे
    ''मैं दान की चीज़ नहीं आपकी बेटी हूं'’ कहकर IAS ने नकारी कन्यादान की रस्म
    18 Dec 2021
    समाज में समानता और सुधार के लिए एक IAS तपस्या ने अपनी शादी में कन्यादान की रस्म नहीं निभाकर एक सोशल मैसेज देने की कोशिश की है।
  • SP and PSP alliance
    असद रिज़वी
    यूपी चुनाव 2022 : सपा और प्रसपा गठबंधन के मायने
    18 Dec 2021
    आज के हालत में अखिलेश और शिवपाल दोनों के पास साथ आने के सिवा कोई विकल्प नहीं था। जिसके के लिए दो रस्ते थे, या तो शिवपाल की पार्टी का सपा में विलय हो जाये या दोनों का चुनाव पूर्व गठबंधन हो, ताकि कम से…
  • KR-Ramesh
    सोनिया यादव
    कर्नाटक: रेप जैसे गंभीर मामले को लेकर भद्दे मज़ाक के लिए क्या छह मिनट का माफ़ीनामा काफ़ी है?
    18 Dec 2021
    महिला सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे करने वाले ये नेता आए दिन अपनी अपनी फूहड़ बातों से महिलाओं की अस्मिता, मान-सम्मान को ठेस पहुंचा रहे हैं और दुख इस बात का है कि सब चुप-चाप तमाशा देख रहे हैं, हंस रहे हैं।
  • gig workers
    बी. सिवरामन
    गिग वर्कर्स के क़ानूनी सशक्तिकरण का वक़्त आ गया है
    18 Dec 2021
    गिग वर्कर ओला (OLA) या उबर (Uber) जैसी एग्रीगेटर फर्मों के लिए काम करने वाले टैक्सी ड्राइवर हैं। ज़ोमैटो (Zomato) या स्विगी (Swiggy) जैसी फूड होम डिलीवरी चेन के डिलीवरी वर्कर हैं।
  • army
    भाषा
    बुमला : हिमाचल के ऊंचे इलाकों में भारत-चीन आमने-सामने
    18 Dec 2021
    भारत और चीन के बीच बर्फ से ढकी सीमा, दो विशाल एशियाई पड़ोसियों के बीच बेहद कम प्रचलित सीमाओं में से एक, बुमला दर्रा सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License