NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
कटाक्ष: ये बेच दिया, वो बेच दिया का शोर क्यों है, भाई!
और कुछ नहीं मिला तो विपक्षी बेचारे मुद्रीकरण के पीछे पड़ गए। कह रहे हैं कि यह कोई मुद्रीकरण-वुद्रीकरण नहीं है। बस मोदी जी ने सेल का नाम बदल दिया।
राजेंद्र शर्मा
28 Aug 2021
कटाक्ष: ये बेच दिया, वो बेच दिया का शोर क्यों है, भाई!

अब ये क्या बात हुई। और कुछ नहीं मिला तो विपक्षी बेचारे मुद्रीकरण के पीछे पड़ गए। कह रहे हैं कि यह कोई मुद्रीकरण-वुद्रीकरण नहीं है। बस मोदी जी ने सेल का नाम बदल दिया। जैसे मोदी जी के राज में बाकी सब चीजों के नाम बदले जा रहे हैं। जिसे भी देखो नाम बदलने में लगा है। लेटेस्ट मोदी जी ने ही राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार का नाम बदला था। उससे पहले, अहमदाबाद के सरदार पटेल स्टेडियम का नाम। उससे भी पहले मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम। उससे पहले, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ डिफेन्स स्टडीज का नाम। उससे भी पहले...अरे छोडि़ए, कहां तक गिनिएगा और कब तक गिनिएगा। गणेश परिक्रमा का फार्मूला अपनाइए और बस यह याद रख लीजिए कि मोदी जी के घर को जाने वाली सडक़ तक का नाम बदल गया--लोक कल्याण मार्ग! वैसे मोदी जी का महल भी अटैच्ड संसद के साथ बदलने वाला है यानी उनके घर को जाने वाली सडक़ का नाम फिर बदलकर रहेगा, पर उसकी बात फिर कभी।

अब अगर मोदी जी नाम बदल सकते हैं और चुनाव अभी कहीं आस-पास भी नहीं हैं फिर भी नाम बदल सकते हैं, तो योगी जी नाम क्यों नहीं बदल सकते। बदल सकते नहीं हैं बल्कि जोर-शोर से बदल रहे हैं। और क्यों न बदलें? आखिर, इलाहाबाद को ही प्रयागराज का नया नाम क्यों मिले? बाकी शहर पुराने-धुराने, नामों से ही काम क्यों और कब तक चलाएं और वह भी ऐसे नामों से जिन्हें रखने वाले तक का किसी को ठीक-ठीक पता नहीं है। ऐसे-ऐसे नाम हैं कि बाकी की छोडि़ए, अंगरेजों तक ने ये सोचकर जस के तस रहने दिए कि ये नाम न जाने किस ने रखे हैं! सो योगी जी की यूपी में इस समय शहरों-कस्बों-गांवों के पुराने नाम हटाने और नये नाम लाने की बहार आयी हुई है। अलीगढ़ के नाम का कल्याण तो अब होने से कोई नहीं बचा सकता है। सुना है कि मुरादाबाद, फिरोजाबाद, शिकोहाबाद, फैजाबाद, नजीबाबाद, खलीलाबाद, मलीहाबाद वगैरह, वगैरह एक-एक कर सब बदले जाएंगे। याद रहे कि यह लिस्ट बिल्कुल अधूरी है। बात निकलेगी तो फिर दूर तक जाएगी। बादों की ही लिस्ट में सिकंदराबाद भी आ सकता है, हालांकि सिकंदर का मामला जरा डाउटफुल है। विदेश नीति का पंगा पड़ सकता है। सुना है कि सिकंदर यूरोप से था। खैर सिकंदराबाद न भी आए तब भी बुलंदशहर समेत बहुतेरे शहर और मुजफ्फरनगर समेत बहुतेरे नगर और जाहिर है कि अलीगढ़ समेत बहुतेरे गढ़ और हां गाजियाबाद समेत कई आबाद भी, नये नामों से तो नवाजे ही जाएंगे।

और ये तो सिर्फ बड़े शहर हुए। कस्बे और गांव भी क्यों नये नाम से वंचित रहें। योगी जी और कुछ भले न दे सकें, बाबा-आदम के जमाने के नामों की जगह, उन्हें संस्कृत और संस्कृति वाले नाम तो दे ही सकते हैं। जिन आदित्यनाथ को अपना पुराना नाम मंजूर नहीं हुआ और तो और पिता का पुराना नाम भी मंजूर नहीं हुआ, अपने राज में जगहों के पुराने-धुराने नाम क्यों बर्दाश्त करने लगे। वह तो बंगालियों की नाम बदलने की डिमांड का अड़ंगा पड़ा हुआ है, वर्ना योगी जी ने तो यूपी का ही नाम बदलवा दिया होता। माना कि उत्तर प्रदेश भी उतना पुराना नहीं है और उसमें से उर्दू वाली बू भी नहीं आती है, फिर लखनऊ की तर्ज पर रामऊ न सही, राजस्थान की तर्ज पर रामस्थान तो करा ही सकते थे। राम मंदिर 2024 के आम चुनाव के टैम पर सही, यूपी के चुनाव के टैम पर कम से कम एक नया नाम तो बनता ही है।

खैर! मोदी, योगी और बाकी जी लोग अगर पुकारने वाले नाम बदल भी रहे हैं और सारे के सारे बदल डालेंगे के तेवर के साथ बदल रहे हैं, तब भी इससे यह कहां साबित होता है कि मुद्रीकरण भी नाम बदलने का मामला है। कि और कुछ नहीं है बस मोदी जी ने सेल का नाम बदल दिया! ऐसा बिल्कुल नहीं है। ऐसा होता तो क्या अखबारों में, दीवारों पर, सेल की जगह मुद्रीकरण के इश्तहार नहीं आने लगते! फिर निम्मो ताई ने बार-बार कहा है, राहुल को डांट-फटकार कर भी कहा है कि यह सस्ते दाम में सेल की छोड़ो, पूरे दाम पर बिक्री का भी मामला नहीं है। फिर क्यों बेच दिया, बेच दिया का शोर मचाया जा रहा है? संस्कृत के मुद्रीकरण की न सही, कम से कम अंगरेजी के मॉनीटाइजेशन की तो खुद को पढ़े-लिखे मानने वालों को इज्जत करनी ही चाहिए। मॉनीटाइजेशन अगर सेल से अलग नहीं होता, तो अंगरेजी में उसके लिए नया शब्द आता ही क्यों? शब्द नया है, सिर्फ नाम नहीं क्योंकि काम नया है। बेचना वह था जो थोड़ा-थोड़ा कर के वाजपेयी जी के टैम से हो रहा था। मॉनीटाइजेशन वह है जो सत्तर तो क्या चौहत्तर साल में भी नहीं हुआ, स्वतंत्रता के पचहत्तरवें साल में जस्ट शुरू ही हुआ है। माना कि पैसा लेकर दे रहे हैं, पर यह बिक्री नहीं है, किरायेदारी भी नहीं, उधारी तो हर्गिज नहीं है। यह नयी चीज है। मोदी लोग की हर चीज की तरह, इट इज डिफरेंट! कब्जा किसी का भी रहे, कब्जा चाहे हमेशा उसी का रहे, कागज पर नाम सरकार का ही रहेगा!

एक बात और, मोदी जी और उनके भक्तों ने अब तक जो भी नाम बदले हैं, सिर्फ इतिहास या संस्कृति दुरुस्त करने के लिए बदले हैं। और हां, थोड़ा-बहुत नये महापुरुषों को एकोमोडेट करने के लिए भी। इसलिए, अगर यह नाम बदलना ही है तो पब्लिक को और भी मुबारक। अमृत काल में सेल के साथ नाम बदलकर समस्याएं मिटाने का लग्गा लग गया है। अब गरीबी का नाम अमीरी, बेरोजगारी का नौकरी, भुखमरी का खुशहाली, बीमारी का तंदुरस्ती, अशिक्षा का सहज ज्ञान, जातिवाद का समरसता, स्त्री-दमन का नारी पूजा, सांप्रदायिकता का धर्मनिरपेक्षता और तानाशाही का दुनिया की सबसे बड़ी डैमोक्रेसी होने से, कोई नहीं रोक सकता है। हम तो कहेंगे कि मोदी जी को नाम बदलो समस्या गायब के इस फार्मूले को पेटेंट ही करा लेना चाहिए। एक्सपोर्ट का काफी स्कोप है। और हां, क्या कहा--संघ परिवार का नाम, तालिबाने हिंदुस्तान! सब काम मोदी जी से ही कराएंगे या कुछ विपक्ष वाले भी करेंगे! 

(इस व्यंग्य आलेख के लेखक वरिष्ठ पत्रकार और लोकलहर के संपादक हैं।) 

sarcasm
privatization
Monetization Scheme
Monetization
Narendra modi
Modi Govt
Nirmala Sitharaman

Related Stories

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

क्या जानबूझकर महंगाई पर चर्चा से आम आदमी से जुड़े मुद्दे बाहर रखे जाते हैं?

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

सरकारी एजेंसियाँ सिर्फ विपक्ष पर हमलावर क्यों, मोदी जी?


बाकी खबरें

  • भाषा
    दलित किशोर की पिटाई व पैर चटवाने का वीडियो आया सामने, आठ आरोपी गिरफ्तार
    19 Apr 2022
    पुलिस के अनुसार मामले में अनुसूचित जाति जनजाति अत्यातार निवारण अधिनियम (एससी-एसटी एक्ट), 147 (उपद्रव के दोष में दो वर्ष कारावास) 149 (विधिविरुद्ध जनसमूह के किसी सदस्य द्वारा किये गये अपराध में जनसमूह…
  • एम. के. भद्रकुमार
    मारियुपोल की जंग आख़िरी पड़ाव पर
    19 Apr 2022
    शनिवार को दोनेतस्क प्रशासन के प्रमुख डेनिस पुशिलिन ने खुले तौर पर अज़ोवस्तल में छिपे हुए नव-नाज़ी उग्रवादियों के "ख़ात्मे" का आह्वान किया।
  • भाषा
    अदालत ने ईसाई महिला, डीवाईएफआई के मुस्लिम नेता के अंतरधार्मिक विवाह में हस्तक्षेप से किया इनकार
    19 Apr 2022
    न्यायमूर्ति वी जी अरुण और न्यायमूर्ति सी एस सुधा की पीठ ने महिला, ज्योत्सना मैरी जोसेफ से बातचीत करने के बाद कहा, ‘‘उसने साफ-साफ कहा कि उसने (डीवाईएफआई नेता) शेजिन से अपनी मर्जी से विवाह करने का…
  • सत्यम् तिवारी
    रुड़की से ग्राउंड रिपोर्ट : डाडा जलालपुर में अभी भी तनाव, कई मुस्लिम परिवारों ने किया पलायन
    19 Apr 2022
    न्यूज़क्लिक ने डाडा जलालपुर गांव का दौरा किया, दोनों पक्षों से बात की और उनसे जानने की कोशिश की कि हनुमान जयंती की उस रात क्या हुआ था? और अब क्या हालात हैं?
  • मुकुंद झा, तारिक अनवर
    प्रत्यक्षदर्शियों की ज़ुबानी कैसे जहांगीरपुरी हनुमान जयंती जुलूस ने सांप्रदायिक रंग लिया
    19 Apr 2022
    प्राथमिकी में तलवार, बेसबॉल बैट और रिवॉल्‍वर, भड़काऊ गाने बजाने और नारे लगाने का ज़िक्र नहीं है। सूत्रों के अनुसार यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि तय मार्ग का पालन क्यों नहीं किया गया। और अब जब पुलिस…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License