NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
ख़तो-किताबत: आंदोलनजीवी बापू की चिट्ठी आई है
पेशे से चिकित्सक, व्यंग्यकार डॉ. द्रोण कुमार शर्मा ने दो अक्टूबर को महात्मा गांधी की जयंती पर उनके नाम एक चिट्ठी लिखकर उन्हें देश के हालात से अवगत कराया था। अब उन्होंने इसका जवाब लिखा है। यानी लेखक के शब्दों में बापू ने उनके पत्र का जवाब दिया है। क्या जवाब है बापू का आइए पढ़ते हैं-
डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
25 Nov 2021
Gandhi ji

मेरे प्यारे भारतवासी,

तुम्हारा पत्र मिला। पत्र पढ़ कर अच्छा लगा। पत्र मिलने में ही थोड़ी देर हो गई अन्यथा मैं तो उत्तर पहले ही दे देता। तुम्हारे से गलती यह हुई कि पत्र स्वर्ग के पते पर भेजा था पर मैं यहां नरक में कार्य कर रहा हूं। वैसे गलती तुम्हारी नहीं, मेरी ही है कि मैं स्वर्ग से नरक में आ गया।

जब मैं यहां ऊपर पहुंचा, मेरे कार्यों का लेखा जोखा देख मुझे स्वर्ग में भेज दिया गया। पर यह क्या, मैंने देखा कि यहां स्वर्ग में कोई काम तो था ही नहीं, स्वर्ग में तो सिर्फ आराम ही आराम था। भोगना ही भोगना था। करने के लिए कुछ भी नहीं था। इसकी मुझे आदत ही नहीं थी। मैंने पता किया तो पता चला कि स्वर्ग में कोई भी काम नहीं है, सिर्फ खाना, पीना और सोना ही है। जबकि नरक में काम है, दुख है, दर्द है, कष्ट है। तो मुझे तो स्वर्ग में नहीं, नरक में ही रहना था। अब नरक में रहकर मैं नरक वासियों का जीवन सुधारने के का प्रयास कर रहा हूं, उनके लिए आंदोलन कर रहा हूं। तुम्हारे सरकार जी की भाषा में कहूं तो मैं तो आंदोलन जीवी हूं, परजीवी हूं।

जैसे-जैसे धरती पर नई नई चीजें आ रही हैं, यहां पर भी नई तकनीक आ रही है। अब यहां भी टेलीविजन है, इंटरनेट है, और सोशल मीडिया भी मौजूद है। भले ही मैं अपने सिद्धांतों की वजह से इन सब पर मौजूद नहीं हूं क्योंकि मेरा मानना है कि मैं तब तक इन चीजों से दूर ही रहुंगा जब तक नरक में सबसे नीचे के पायदान पर स्थित व्यक्ति को ये चीजें मुहैया नहीं हो जाती हैं। पर फिर भी मुझे नरक के अपने साथियों से धरती का हाल पता चलता ही रहता है। बहुत दुख होता है, जब पता चलता है कि नीचे दुख, कष्ट, वैमनस्य सब कुछ बढ़ रहा है। आपस की खाई और भी अधिक बढ़ती जा रही है। जब अपने हिन्दुस्तान के बारे में भी ऐसा ही पता चलता है तो और अधिक दुख होता है। कभी-कभी तो लगता है कि वहां, हिन्दुस्तान में अंग्रेजों की सरकार से भी ज्यादा संवेदनहीन, निष्ठुर सरकार है।

तुम्हें डर है कि अगर मैं दोबारा पैदा हुआ, मैंने दोबारा जन्म लिया तो निष्ठुर शासन मेरे पैदा होने की भनक होते ही सभी नवजात शिशुओं को मरवा देगा। हां, उस राजा की कथा मैंने भी सुनी है जिसने अपने मारने वाले की भविष्यवाणी सुन न जाने कितने अबोध नवजातों को पैदा होते ही मरवा दिया था। पर चिंता मत करो। बापू पैदा नहीं होते, बापू तो बनते हैं।

बापू पैदा नहीं होते हैं। बापू तो बनते हैं। पैदा तो मोहन दास होता है, मोहनदास करमचंद। न बापू पैदा होते हैं और न ही मार्टिन लूथर। न मंडेला पैदा होते हैं और न ही डेसमंड टूटू। ये सब तो बनते हैं। बापू भी बनता है, पैदा नहीं होता है। बापू बनने के लिए मोहनदास करमचंद होना जरूरी नहीं है। बापू कोई भी बन सकता है, कोई भी। तुम भी, वह भी और कोई और भी।

बापू बनने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है संवेदनशील होना। अपने नहीं, दूसरों के दुख-दर्द के प्रति संवेदनशील होना। संवेदनशीलता आपको दूसरे का दुख-दर्द महसूस करना सिखाती है। एक संवेदनशील व्यक्ति ही किसी के हक़ में खड़ा हो सकता है, किसी के लिए लड़ सकता है। संवेदनशीलता ही अहिंसक बनाती है और संवेदनहीनता हिंसक। और बापू बनने के लिए अहिंसा सबसे अधिक जरूरी है।

मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है कि मैं शुरू से ही इतना संवेदनशील नहीं था। दक्षिण अफ्रीका तो मैं सिर्फ रोजगार के लिए गया था न कि कोई आंदोलन या सत्याग्रह करने। दक्षिण अफ्रीका जाते हुए मुझे वहां के लोगों के दुख दर्द के बारे में कुछ अधिक पता भी नहीं था और न ही मेरे मन में उनके लिए कोई खास संवेदना थी। दक्षिण अफ्रीका जाते हुए मेरे मन में सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाने की लालसा थी। मैं वहां जाकर बस अच्छा सा पैसा कमाना चाहता था। और कुछ नहीं।

मैं तो बापू थोड़ा देर में बना। पर मैं देख रहा हूं कि आज तो छोटी उम्र के बच्चे ही बापू बन रहे हैं। वह उन्नीस साल की बच्ची, क्या नाम है उसका..., ग्रेटा, वह जो पर्यावरण के लिए आंदोलन कर रही है, क्या वह आंदोलन बापू के आंदोलन से कमतर है? वह तीस साल का छात्र, जिसे सरकार ने उल्टे सीधे इल्जाम लगाकर जेल में बंद कर रखा है, क्या उसमें बापू बनने की संभावना नहीं है? वह भी अपनी पीएचडी खत्म कर सुविधा संपन्न जीवन बिता सकता था। पर उसने अलग ही रास्ता चुना है। और वे सब लोग जो 'ब्लैक लाइव्स मैटरस्' के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उनका संघर्ष क्या बापू के संघर्ष से कम हैं? 'पिंजरा तोड़' की लड़कियां, जो लड़कियों की स्वतंत्रता के लिए लड़ रही हैं, वह भी तो बापू का विस्तार ही है। और किसानों का आंदोलन, वह तो मेरे आंदोलनों जैसा ही है। यह आंदोलन तो बिल्कुल ठीक मेरी ही लाइन पर ही चल रहा है।

अभी मुझे नरक में सफाई कर्मचारियों के लिए भूख हड़ताल के लिए जाना है। कल ही दो सफाई कर्मचारी गटर में घुस कर सफाई करते हुए दम घुटने के कारण मर गये। स्वर्ग में तो सफाई कर्मचारियों के लिए सुविधाएं हैं पर यहां नहीं। अब मैं भूख हड़ताल पर बैठने के लिए निकल रहा हूं अतः बाकी बातें अगले खत में।

पत्र लिखते रहना। अपना हाल-चाल बताते रहना।

तुम्हरा अपना,

बापू

इसे पढ़ें : एक चिट्ठी बापू के नाम

Mahatma Gandhi
Satire
Political satire

Related Stories

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

कटाक्ष:  …गोडसे जी का नंबर कब आएगा!

तिरछी नज़र: ये कहां आ गए हम! यूं ही सिर फिराते फिराते

तिरछी नज़र: 2047 की बात है

कटाक्ष: महंगाई, बेकारी भुलाओ, मस्जिद से मंदिर निकलवाओ! 

ताजमहल किसे चाहिए— ऐ नफ़रत तू ज़िंदाबाद!

वैष्णव जन: गांधी जी के मनपसंद भजन के मायने

तिरछी नज़र: ...ओह माई गॉड!

कांग्रेस चिंता शिविर में सोनिया गांधी ने कहा : गांधीजी के हत्यारों का महिमामंडन हो रहा है!


बाकी खबरें

  • विपक्षियों में सहमति, योगी की राजनीति और गडकरी का नेहरू-प्रेम
    न्यूज़क्लिक टीम
    विपक्षियों में सहमति, योगी की राजनीति और गडकरी का नेहरू-प्रेम
    21 Aug 2021
    सत्ताधारी भाजपा यूपी के चुनावों की तैयारी में अभी से जुट गयी है. वह इन दिनों तालिबान पर सियासी-खेल 'खेलने' में लगी है. जहां किसी खास व्यक्ति के किसी बयान में वह तनिक गुंजायश देखती है, फौरन ही समूचे…
  • ‘ईश्वर के नाम पर’ शपथ संविधान की भावना के विरुद्ध
    वसंत आदित्य जे
    ‘ईश्वर के नाम पर’ शपथ संविधान की भावना के विरुद्ध
    21 Aug 2021
    संविधान कहता है कि राज्य को विचार और कर्म में धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए और यही बात राजनीतिक पार्टियों के लिए भी लागू होती है।
  • मोदी सरकार ने दिखाया है कि हमें विभाजन के दर्द को किस तरह याद नहीं करना चाहिए
    स्मृति कोप्पिकर
    मोदी सरकार ने दिखाया है कि हमें विभाजन के दर्द को किस तरह याद नहीं करना चाहिए
    21 Aug 2021
    भारत को विभाजन को याद करने की जरूरत है, लेकिन मोदी सरकार ने इसके लिए ऐसी तारीख़ चुनी, जिसका मक़सद ध्रुवीकरण को बढ़ावा देना और उनकी पार्टी को चुनावी फायदा दिलाना है। ना कि इसके ज़रिए शांति और…
  • भारत अमेरिका की अफ़गान नीति का पिछलग्गू न बन कर, स्थानीय ताकतों के साथ मिलकर काम करे
    अमिताभ रॉय चौधरी
    भारत अमेरिका की अफ़गान नीति का पिछलग्गू न बन कर, स्थानीय ताकतों के साथ मिलकर काम करे
    21 Aug 2021
    ‘किसी भी सूरत में, तालिबान शासित अफगानिस्तान भारत के लिए एक बेहद चिंताजनक विषय बना रहने वाला है, जिसका वहां करोड़ों डॉलर मूल्य का निवेश लगा हुआ है...’
  • दो, तीन नहीं, कई साइगॉन बनाओ। यही आज का नारा है
    ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
    दो, तीन नहीं, कई साइगॉन बनाओ। यही आज का नारा है
    21 Aug 2021
    आशाहीनता का आरोप केवल तालिबान पर नहीं लगाना चाहिए बल्कि अमेरिका, सऊदी अरब, जर्मनी और पाकिस्तान जैसे देशों पर भी लगाना चाहिए,जिन्होंने तालिबान जैसे फासीवादियों और कट्टर लोगों का समर्थन किया और इनकी…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License