NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
पर्यावरण
विज्ञान
भारत
तेज़ी से पिघल रहे हैं सतोपंथ और ऋषि गंगा ग्लेशियर
हिमालय में दिखने लगा है अब ग्लोबल वार्मिंग का व्यापक असर। सतोपंथ झील का दायरा हुआ कम, ऋषि गंगा ग्लेशियर भी दस फीसद से ज्यादा पिघला।
मनमीत
29 Sep 2020
सतोपंथ झील और ग्लेशियर
सतोपंथ झील और ग्लेशियर

ग्लोबल वार्मिंग का व्यापक असर हिमालय में दिखने लगा है। वैज्ञानिकों के शोध के अनुसार न केवल ग्लेशियर के पानी से बनी सतोपंथ झील का दायरा कम हो गया है, वहीं  ऋषिगंगा कैचमेंट एरिया के ग्लेशियर भी तेजी से पिघल रहे हैं। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की ओर से कराए गए अध्ययन में यह खुलासा हुआ है। बीस सालों के अध्ययन में सामने आया है कि ग्लेशियरों में तकरीबन 10 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

1_33.jpg

सतोपंथ झील और रूप कुंड का दायरा पिछले दस सालों में पांच मीटर हुआ कम

1980 में नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व के ऋषिगंगा कैचमेंट का कुल 243 वर्ग किमी एरिया बर्फ से ढका था, लेकिन 2020 में यह एरिया 217 वर्ग किमी ही रह गया। वहीं अब इसमें दस प्रतिशत की और गिरावट दर्ज की गई है। उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (यूसेक) ने सेटेलाइट डेटा के आधार पर निष्कर्ष निकाला गया है कि 37 सालों में हिमाच्छादित क्षेत्रफल में 26 वर्ग किलोमीटर की कमी आई है। शोध में ये भी सामने आया है कि इस क्षेत्र में पहले स्थायी स्नो लाइन 5200 मीटर पर थी, जो अब 5700 मीटर तक घट बढ़ रही है। उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र के निदेशक प्रो. एमपीएस बिष्ट के निर्देशन में हुए इस अध्ययन में शोध छात्र डॉ. मनीष मेहता और श्रीकृष्ण नौटियाल भी शामिल थे। 

3_11.jpg

ऋषि गंगा के साउथ डाउनफॉल सबसे ज़्यादा प्रभावित

यूसेक के निदेशक और वरिष्ठ भू गर्भीय वैज्ञानिक प्रो. डॉ एमपीएस बिष्ट ने बताया कि ऋषि गंगा कैचमेंट एरिया की उत्तरी ढलान के ग्लेशियर ज्यादा प्रभावित नहीं हुए हैं, लेकिन दक्षिणी ढलान के ग्लेशियर में बदलाव देखा गया है। इस ओर के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व के ग्लेशियर यदि इसी तरह से पिघलते रहे तो आने वाले समय में इस क्षेत्र के वन्य जीव जंतुओं और वनस्पतियों पर भी बुरा प्रभाव पड़ेगा।

2_20.jpg

ग्लेशियर 25 किमी तक हुए कम

वेस्टर्न डिस्टर्बेंस है मुख्य कारण

असल में, यूरोप के विभिन्न देशों से निकलने वाला प्रदूषण हजारों किलोमीटर दूर हिमालय श्रंखलाओं की सेहत बिगाड़ रहा है। ये प्रदूषण हिमालयी ग्लेशियरों में ब्लेक कार्बन के तौर पर चिपक रहा है। जिस कारण ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार पहले से ज्यादा तेज हो गई है। 

वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के ताजा शोध में ये बात निकल कर सामने आई कि ग्लेशियरों में स्थित ब्लैक कार्बन का एक बड़ा कारण, यूरोप से तत्व आधारित गैसों के प्रदूषण का वेस्टर्न डिस्टबेंर्स (पश्चिमी विक्षोभ) के साथ यहां तक पहुंचना है। अब तक यह माना जाता रहा था कि हिमलायी जंगलों में लगने वाली आग के चलते ग्लेशियरों में ब्लैक कार्बन जमता है।

वैज्ञानिक इस बात का पता तो काफी पहले कर चुके थे कि, हिमालयी श्रंखलाओं के लगभग 15 हज़ार ग्लेशियरों के तेज़ रफ़्तार से पिघलने का कारण ब्लैक कार्बन है। लेकिन, उसके बाद भी ये शोध का विषय बना हुआ था कि, मई माह के बाद जनवरी माह में कैसे ग्लेशियरों में ब्लैक कार्बन का स्तर सबसे ज्यादा बढ़ जाता है। वो इसलिये, क्योंकि आरोप था कि, ये ब्लैक कार्बन वहां की स्थानीय सामाज द्वारा खाना बनाने के लिये लकड़ियां जलाने और बड़े पैमाने पर जंगलों में आग लगने के कारण निकलनी वाली कार्बन-डाइआक्साइड से उत्पन्न होती थी, जिस कारण इस गैस के कण ग्लेशियर में स्थित बर्फ में चिपक जाते हैं और ब्लैक कार्बन बन जाते हैं। 

इस ब्लैक कार्बन के कारण बर्फ के पिघलने की रफ्तार बढ़ जाती थी। लेकिन, मई में तो ये बात ठीक थी, तो फिर जनवरी में ग्लेशियरों में ब्लैक कार्बन का स्तर मई माह के बराबर पहुंचने का क्या कारण था? क्योंकि जनवरी में उत्तराखंड में रहने वाला समाज ग्लेशियरों से लगभग सौ किलोमीटर पीछे चले जाता है। लिहाजा, न तो वो उस दौरान ग्लेशियरों के पास आग जलाते हैं और न ही जनवरी में जंगलों में आग लगती है। 

इस शोध के लिये वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के वरिष्ठ भूवैज्ञानिक डॉ पीएस नेगी के नेतृत्व में गौमुख से पहले 3600 मीटर की  ऊंचाई में स्थित चीड़बासा में उपकरण लगाये गये। जिससे कुछ साल बाद जो नतीजे मिले वो चौंकाने वाले थे। वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. पीएस नेगी ने बताया,  "शोध में पता चला कि जनवरी में ब्लैक कार्बन भारत से नहीं, बल्कि यूरोप के देशों से पश्चिमी विक्षोभ के साथ आ रहा है। जनवरी में जब पश्चिमी विक्षोभ बारिश लेकर आता है, उसी के साथ ये गैस भी हवाओं के साथ आती है। इसका मतलब, ग्लेशियरों के पिघलने का कारण जितना लोकल है और राष्ट्रीय है, उतना ही ग्लोबल भी है।"

दो तरह का प्रदूषण पहुंच रहा है हिमालय में

इस समय हिमालय में दो तरह का प्रदूषण पहुंच रहा है। एक है बायो मास प्रदूषण (कार्बन डाइऑक्साइड) और दूसरा है एलिमेंट पोल्यूशन (तत्व आधारित प्रदूषण) जो कार्बन मोनोऑक्साइड उत्पन्न करता है। ये दोनों ही तरह के प्रदूषण ब्लैक कार्बन बनाते हैं जो ग्लेशियर के लिये खतरनाक होते हैं। वरिष्ठ भू वैज्ञानिक डॉ. पीएस नेगी बताते हैं कि, यूरोप से केवल तत्व आधारित प्रदूषण ही हिमालय तक पहुंच रहा है। इसको हम अंतर्राष्ट्रीय फोरम पर रखकर विरोध जतायेंगे।

क्या होंगे दुष्प्रभाव

तेज़ी से पिघलते ग्लेशियर आने वाले वक्त के लिए घातक साबित हो सकते हैं। इससे नदियों में पानी का स्तर कम हो सकता है। जिससे न केवल सिंचाई व्यवस्थाओं पर बल्कि हाइड्रो प्रोजेक्ट्स भी बेकार साबित होंगे। वहीं बागवानी की बात करें तो ‘गोल्डन डिलीसियस’ और ‘रेड डिलीसियस’ खत्म होने के कागार पर पहुंच गई है। वहीं स्नो लाइन के पचास मीटर और नीचे खिसकने से काश्तकारों के सामने बड़ी मुसीबत आ सकती है। सेब की सबसे उम्दा प्रजाति गोल्डन डिलीसियस और रेड डिलीसियस के बगीचे स्नो लाइन के खत्म होने के बाद से ही शुरू होते है। उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में सत्तर फीसदी तक दोनों प्रजाती की क्वालिटी घट गई है। ऐसा, मध्य हिमालय में परमनेंट स्नो लाइन (स्थाई हिम रेखा) के काफी पीछे चले जाने से हुआ है। सेबों की पैदावार की ख़राब क्वालिटी होने से उत्तराखंड, हिमाचल और जम्मू कश्मीर के सीमांत काश्तकारों ने तो सेब के बजाए अन्य विकल्पों पर ध्यान देना शुरू कर दिया है।

सभी फोटो : मनमीत

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार और यायावर हैं।)

Satopanth Lake and Glacier
Rishi Ganga Glacier
himalaya
global warming
Uttrakhand
Environment
pollution

Related Stories

लू का कहर: विशेषज्ञों ने कहा झुलसाती गर्मी से निबटने की योजनाओं पर अमल करे सरकार

जलवायु परिवर्तन : हम मुनाफ़े के लिए ज़िंदगी कुर्बान कर रहे हैं

उत्तराखंड: क्षमता से अधिक पर्यटक, हिमालयी पारिस्थितकीय के लिए ख़तरा!

मध्यप्रदेशः सागर की एग्रो प्रोडक्ट कंपनी से कई गांव प्रभावित, बीमारी और ज़मीन बंजर होने की शिकायत

अंकुश के बावजूद ओजोन-नष्ट करने वाले हाइड्रो क्लोरोफ्लोरोकार्बन की वायुमंडल में वृद्धि

दुनिया भर की: गर्मी व सूखे से मचेगा हाहाकार

बनारस में गंगा के बीचो-बीच अप्रैल में ही दिखने लगा रेत का टीला, सरकार बेख़बर

दिल्ली से देहरादून जल्दी पहुंचने के लिए सैकड़ों वर्ष पुराने साल समेत हज़ारों वृक्षों के काटने का विरोध

जलविद्युत बांध जलवायु संकट का हल नहीं होने के 10 कारण 

संयुक्त राष्ट्र के IPCC ने जलवायु परिवर्तन आपदा को टालने के लिए, अब तक के सबसे कड़े कदमों को उठाने का किया आह्वान 


बाकी खबरें

  • donkey
    शिरीष खरे
    हमारे लिए गधा आज भी 'गधा', जबकि विदेश में बढ़ रही कद्र!
    10 Feb 2022
    आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2012 की पशुधन गणना से वर्ष 2019 की नवीनतम पशुधन गणना तक, गधों की आबादी में सबसे तेज 61.23 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई है।
  • Banaras
    विजय विनीत
    EXCLUSIVE: बनारस में गांजे से बर्बाद हो रही युवा पीढ़ी, धर्म की आड़ में खुलेआम होता है नशा!
    10 Feb 2022
    बनारसियों के आदर्श राम-कृष्ण, गौतम बुद्ध, कणादि, जैमिनि, पाणिनी, पतंजलि से लेकर रविदास, कबीर, नानकदेव, पार्श्वनाथ में से कोई चिलम नहीं पीता था। इस शहर में अब तमाम ढोंगी साधु-संत परंपरा की आड़ में…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में एक दिन में फिर 1200 से ज़्यादा लोगों की मौत 
    10 Feb 2022
    देश में 24 घंटे में कोरोना से 1,241 लोगों की मौत हुई है। इस तरह अब तक कुल 5 लाख 6 हज़ार 520 लोग अपनी जान गँवा चुके है।
  • UP West
    प्रज्ञा सिंह
    यूपी चुनाव: क्यों हो रहा है भाजपा मतदाता का हृदय परिवर्तन
    10 Feb 2022
    उस किसान की कहानी, जो ग्रामीण मध्य वर्ग के बीच हिंदुत्व से प्रेरित आकांक्षाओं से उपजे संघर्षों का प्रतीक है।
  • Health budget
    डॉ. राजू पाण्डेय
    स्वास्थ्य बजट: कोरोना के भयानक दौर को क्या भूल गई सरकार?
    10 Feb 2022
    स्वास्थ्य सेवाओं के लिए वर्ष 2021-22 का वास्तविक स्वास्थ्य बजट जीडीपी का .34 प्रतिशत था जो 2022-23 में .06 प्रतिशत की मामूली वृद्धि के बाद .40 प्रतिशत हो गया है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License