NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
युवा
शिक्षा
भारत
राजनीति
शिक्षा को बचाने की लड़ाई हमारी युवापीढ़ी और लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई का ज़रूरी मोर्चा
इस दिशा में 27 मई को सभी वाम-लोकतांत्रिक छात्र-युवा-शिक्षक संगठनों के संयुक्त मंच AIFRTE की ओर से दिल्ली में राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर आयोजित कन्वेंशन स्वागत योग्य पहल है।
लाल बहादुर सिंह
16 May 2022
save education
फ़ाइल फ़ोटो

2014 के बाद से राष्ट्रीय जीवन के हर क्षेत्र में तबाही का जो सिलसिला जारी है, उसमें जिस सेक्टर का ध्वंस न सिर्फ देश के वर्तमान बल्कि भविष्य के लिए भी खतरे की घण्टी है, वह शिक्षा का क्षेत्र है।

मोदी राज में शिक्षा के क्षेत्र को सभी स्तरों पर जिस तरह systematic ढंग से ध्वस्त किया जा रहा है, उससे देश की युवा पीढी का पूरा भविष्य दांव पर लग गया है।

यह तबाही प्राथमिक से लेकर उच्चतर शिक्षा तक सभी स्तरों पर जारी है तथा इसकी मार quantity और quality दोनों पर है। NEP-2020 के नाम पर एक ओर अधिकाधिक किशोरों और युवाओं को शिक्षा के दायरे से बाहर किया जा रहा है, दूसरी ओर उन्हें मिलने वाली शिक्षा को एक पतनशील विचारधारा के अनुरूप ढाला जा रहा है, फलस्वरूप उसकी गुणवत्ता का खतरनाक अवमूल्यन हो रहा है।

2009 में UPA सरकार के शासन-काल में बाकायदा शिक्षा के अधिकार का कानून बना, जिसके तहत 6-14 आयु वर्ग के सभी बच्चों को मुफ्त, अनिवार्य शिक्षा पड़ोस के स्कूल में देने का कानूनी प्रावधान किया गया, इसमें 1 से 5 तक के स्कूल 1 किमी के दायरे में और 6 से 8 तक की 3 किमी के दायरे में होने की बात थी।

बहरहाल, आज हालत यह है कि UDSIE+ की 20020-21 की रिपोर्ट के अनुसार पिछले 3 साल में सरकारी स्कूलों की संख्या बढ़ने की बजाय पहले से भी 68 हजार कम हो गयी। सबसे अधिक कमी प्राइमरी स्कूलों की संख्या में आई। अकेले UP में 26 हजार सरकारी स्कूल बंद हो गए। स्वयं केंद्रीय शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने स्वीकार किया कि 15 करोड़ बच्चे स्कूल से बाहर हैं।

वहीं पिछले 2 साल में प्राइवेट स्कूल 15 हजार बढ़ गए। ये आंकड़े अपनी कहानी खुद ही कह रहे हैं। सरकार अपने स्कूलों को छात्रों की कम संख्या होने के नाम पर बंद करती जा रही है (क्लोजर एंड मर्जर नीति )। गरीबों के बच्चे RTE Act के बावजूद शिक्षा से बाहर होते जा रहे हैं और सरकारी स्कूलों की कब्र पर निजी स्कूल फलफूल रहे हैं जहां केवल अमीरों के बच्चे ही पढ़ सकते हैं, गरीबों के लिए उनके दरवाजे बंद हैं।

सरकारी शिक्षण संस्थानों को सीमित करके, विभिन्न courses में सीटें कम करके, कथित आत्मनिर्भरता के नाम पर उनका बजट काट कर बड़े पैमाने पर फीस बढ़ाकर, अंधाधुंध निजीकरण को बढ़ावा देकर शिक्षा को आम परिवारों के बच्चों की पहुंच से बाहर किया जा रहा है। 

सबसे खतरनाक development यह हो रहा है कि नीचे से लेकर ऊपर तक पूरी शिक्षा-व्यवस्था को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के नाम पर एक खास विचारधारा के सांचे में ढालने की हर मुमकिन कोशिश की जा रही है, NEP के माध्यम से शिक्षा को एक अतिकेंद्रीकृत ढांचे के नियंत्रण में लाया जा रहा है, विभिन्न स्तर के पाठ्यक्रमों-इतिहास, मानविकी, समाज विज्ञान-हर जगह संघ की विचारधारा के अनुरूप बदलाव किये जा रहे हैं, पुरानी पाठ्यसामग्री में काट-छांट, जोड़-घटाव किया जा रहा है, नई किताबें छापी जा रही हैं, आरएसएस से जुड़े तथा like-minded लोगों को सभी संस्थानों के शीर्ष पर बैठाया जा रहा है तथा फैकल्टी में भरा जा रहा है। भिन्न विचार के शिक्षाविदों, प्राध्यापकों को अलग-थलग किया जा रहा है। 

पाठ्यक्रमों के बदलाव का सबसे बड़ा निशाना एक ओर इतिहास है जिसे हिंदुत्व की पुनरुत्थानवादी, साम्प्रदयिक सोच के अनुरूप ढाला जा रहा है, दूसरी ओर मानविकी और समाज विज्ञान है जिसमें से ढूंढ ढूंढ कर सभी प्रगतिशील, मुक्तिकामी, लोकतान्त्रिक विचारों को बढ़ावा देने वाली पाठ्यवस्तु को छांट कर बाहर किया जा रहा है।

हाल ही में CBSE पाठ्यक्रम से बाहर किये गए कुछ विषयों की बानगी से पूरी कहानी खुद ही साफ हो जाती है। पाठ्यक्रम से हटाए गए कुछ अध्याय हैं-"लोकतन्त्र और विविधता",  "लोकतन्त्र के लिये चुनौतियां", "लोकप्रिय संघर्ष और आंदोलन (नेपाल और बोलिविया)", "इस्लाम का उदय", " मुगल साम्राज्य का शासन-प्रशासन", " शीत युद्ध का काल और गुटनिरपेक्ष आंदोलन", "औद्योगिक क्रांति का इतिहास"। पिछले दिनों विभिन्न पाठ्यक्रमों से फ़ैज़ ही नहीं कबीर, मीरा, मुक्तिबोध, निराला, दुष्यंत कुमार, फ़िराक़ की भी तमाम रचनाएं  बाहर की गई हैं। 

खाद्य सुरक्षा के अध्याय से "कृषि पर भूमंडलीकरण का प्रभाव" वाले हिस्से को हटा दिया गया है। सरकार छात्रों पर पढ़ाई का बोझ कम करने का लाख बहाना बनाये, इन बदलावों से यह दिन के उजाले की तरह साफ हो जाता है कि उसका असली मकसद क्या है। ऐतिहासिक किसान आंदोलन से डरी सरकार चाहती है कि किसानों के बेटे और देश की युवा पीढ़ी सरकार की विनाशकारी नीतियों के बारे में, वैश्विक पूँजी और बहुराष्ट्रीय निगमों के आगे मोदी सरकार के समर्पण के बारे में जान ही न पाए।

आज़ादी की लड़ाई के इतिहास को तो पूरा सिर के बल ही खड़ा किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य संघ-भाजपा के इस प्रोपेगंडा को सही साबित करना है कि इस लड़ाई में एकमात्र संघ और सहमना संगठनों ने सही stand लिया और सकारात्मक भूमिका निभाई, कांग्रेस समेत बाकी लोगों की भूमिका नुकसानदेह थी, वे ही देश के बंटवारे के लिए जिम्मेदार हैं!

आज़ादी आंदोलन के इतिहास को उलट-पुलट करते हुए, हरियाणा में हाल ही में पाठ्यक्रम में बदलाव करते हुए यह स्थापित किया गया है कि संघ के संस्थापक हेडगेवार महान देशभक्त थे जिन्होंने अपने जीवन काल में क्रांतिकारी beliefs की वकालत किया। महर्षि अरबिंदो और हेडगेवार ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विचार से स्वतंत्रता आंदोलन को आवेग दिया जबकि कांग्रेस के थके, सत्तालोलुप नेताओं ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर देश का बंटवारा कराया। सावरकर हिंदुत्व के प्रबल पैरोकार थे और उन्होंने भारत-विभाजन का विरोध किया।

कर्नाटक में हाई स्कूल के कन्नड़ पाठ्यक्रम में प्रतिष्ठित कन्नड़ लेखक जी रामकृष्ण के  "भगत सिंह" को हटाकर हेडगेवार के  "आदर्श पुरुष" को शामिल किया गया है। 

उच्च शिक्षण-संस्थान जो वैज्ञानिक विचारों के उत्पादन, उनके शोधन-परिवर्धन का सबसे बड़ा केंद्र हैं और इसीलिए संघ के disinfirmation और misinformation के Goebelsian प्रोपेगंडा के रास्ते में सबसे बड़े बाधक हैं, वे सीधे निशाने पर हैं।

शिक्षा के विकास और गुणवत्ता के लिए जरूरी सार्वभौम मूल्यों-अकादमिक स्वतंत्रता ( Academic Freedom ) और संस्थानों की स्वायत्तता (autonomy ) को कब का अलविदा कह दिया गया है।

विश्वविद्यालय परिसरों के माहौल को लगातार विषाक्त बनाया जा रहा है। हाल ही में लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रो. रविकांत चंदन के साथ जो हुआ वह इसका सबसे ज्वलंत नमूना है। उन्होंने ज्ञानव्यापी मस्जिद में चल रहे सर्वे  को लेकर एक पोर्टल पर बहस में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और कांग्रेस नेता पट्टाभि सीतारमैया की पुस्तक "फेदर्स एंड स्टोन्स" से उद्धरण देते हुए बात रखी थी। उसे लेकर भावनाएं आहत होने का तर्क देते हुए ABVP से जुड़े तत्वों ने जिनमें अनेक विश्वविद्यालय से  बाहर के लोग भी शामिल थे, परिसर में उनके ख़िलाफ़ हल्ला बोल दिया। शासन-प्रशासन की संलिप्तता इसी से स्पष्ट है कि इस हमले के शिकार प्राध्यापक की FIR पर तो कोई कार्रवाई नहीं हुई, उल्टे उन्हीं के खिलाफ FIR दर्ज हो गई।

एक स्वतंत्रता-सेनानी की पुस्तक जो आज़ादी के पहले से public domain में है, जिस पर कोई प्रतिबंध नहीं है, उससे उद्धरण देना कैसे अपराध हो गया?

किसी विचार से अगर कोई असहमत है, तो उसका अपने "उच्चतर"  विचार से वह प्रतिकार क्यों नहीं करता? क्या विचार का जवाब गाली-गलौज, शारीरिक बल और हिंसा है?  विचार से भावनाओं के आहत होने का तर्क चला होता, तो दुनिया आज तर्क-ज्ञान-विज्ञान, समता, सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, लोकतन्त्र सबसे वंचित होती और मध्ययुगीन बर्बरता के अंधेरे में जी रही होती!

क्योंकि जब-जब प्रकृति के वैज्ञानिक नियम या प्रगतिशील सामाजिक विचार अस्तित्व में आये, तमाम लोगों की अंध-आस्था से जुड़े गलत विचार खंडित हुए और उनकी भावनाएं आहत हुईं।

जाहिर है यह भावनाएं आहत होने का खेल समाज में सारी असहमत आवाजों को डरा कर चुप करा देने की रणनीति है।

हाल ही में एक वेबिनार में देश की सबसे प्रतिष्ठित इतिहासकार प्रो. रोमिला थापर ने कहा कि आज़ादी और इंक़लाब ज़िंदाबाद जैसे नारों को सुनते हुए हम बड़े हुए। वे हमारे राष्ट्रीय आंदोलन की विचारधारा की बुनियाद थे। लेकिन आज उन्हें राष्ट्रद्रोह बताया जा रहा है।

परिसरों में लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को पूरी तरह ठप कर दिया गया है। उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रसंघों को शनैः शनैः खत्म या निष्प्रभावी बना दिया गया है। दरअसल, छात्रसंघ परिसरों के democratisation का महत्वपूर्ण मंच होते थे, वे व्यापक छात्र समुदाय के social-political sensitisation का सबसे महत्वपूर्ण औजार होते थे, उन्हें अपने अधिकारों के प्रति सचेत होने और जरूरत पड़ने पर उनके लिए  सामूहिक लोकतान्त्रिक संघर्ष में उतरने की नागरिक चेतना का एक तरह से प्रशिक्षण प्रदान करते थे। वे परिसर के अंदर और बाहर न सिर्फ छात्रहित के प्रश्नों पर बल्कि वृहत्तर सामाजिक-राष्ट्रीय प्रश्नों पर, जब ऐसी जरूरत हो, छात्रों-युवाओं की भागेदारी और भूमिका के वाहक बनते थे। आज़ादी की लड़ाई, आपातकाल विरोधी संघर्ष तथा अनगिनत लोकतान्त्रिक आंदोलनों में छात्रसंघों, संगठनों, छात्र-युवा नेताओं, कार्यकर्ताओं तथा सचेत नौजवानों द्वारा निभाई गयी भूमिका इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है।

छात्रसंघों के ध्वंस ने न सिर्फ शैक्षणिक सवालों पर उनके प्रतिरोध की धार को कुंद किया है, बल्कि समाज भी जनविरोधी सरकारों के खिलाफ आंदोलन के सबसे ऊर्जावान मंच से वंचित हो गया है। 

इसी का नतीजा है कि आज परिसरों में एक तरह का विचारधारात्मक-लोकतान्त्रिक शून्य पैदा हो गया है, जिसमें एक ओर प्रशासन की निरंकुशता फल-फूल रही है, दूसरी ओर सत्ता-संरक्षित संगठन और अराजक तत्वों का बोलबाला है जिन्हें अक्सर प्रशासन की शह प्राप्त रहती है। हाल ही की UP के तीन प्रमुख विश्वविद्यालयों इलाहाबाद व लखनऊ विवि तथा BHU की घटनाएं इसकी गवाह हैं। इलाहाबाद विवि और BHU में लोकतान्त्रिक छात्र- संगठनों के कार्यकर्ताओं और आम छात्र-छात्राओं पर लम्पटों ने हमले किये और विरोध करने पर प्रशासन उल्टे उन्हीं के ख़िलाफ़ कार्रवाई पर उतर आया। लखनऊ में तो एक अध्यापक को निशाना बनाया ही गया।

उच्च शिक्षण-संस्थानों को सत्ताधारी दल की विचारधारा का अभ्यारण्य बनाया जा रहा है, जिसका शिकार शिक्षा और लोकतन्त्र दोनों हो रहे हैं।

शिक्षा-व्यवस्था पर कसते संघी शिकंजे के ख़िलाफ़, परिसरों के जनतांत्रीकरण के लिए छात्रों-शिक्षकों, अकादमिक जगत से जुड़े लोगों, नागरिक समाज तथा राजनैतिक दलों का सशक्त प्रतिरोध आज समय की मांग है। शिक्षा को बचाने की लड़ाई हमारी युवापीढ़ी और लोकतन्त्र को बचाने की लड़ाई का जरूरी मोर्चा है। 

इस दिशा में 27 मई को सभी वाम-लोकतान्त्रिक छात्र-युवा-शिक्षक संगठनों के संयुक्त मंच AIFRTE की ओर से दिल्ली में राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर आयोजित कन्वेंशन स्वागत योग्य पहल है।

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

इन्हें भी देखें—

NEP भारत में सार्वजनिक शिक्षा को नष्ट करने के लिए भाजपा का बुलडोजर: वृंदा करात

राष्ट्रीय युवा नीति या युवाओं से धोखा: मसौदे में एक भी जगह बेरोज़गारी का ज़िक्र नहीं

नई शिक्षा नीति भारत को मध्य युग में ले जाएगी : मनोज झा

education
Save Education
education crisis
AIFRTE
new education policy
NEP

Related Stories

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

राष्ट्रीय युवा नीति या युवाओं से धोखा: मसौदे में एक भी जगह बेरोज़गारी का ज़िक्र नहीं


बाकी खबरें

  • Aap
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे: केजरीवाल मॉडल ऑफ़ गवर्नेंस से लेकर पंजाब के नए राजनीतिक युग तक
    13 Mar 2022
    हर हफ़्ते की महत्वपूर्ण ख़बरों और उनके पीछे की मंशाओं को समझाने के लिए “ख़बरों के आगे पीछे” लेकर आए हैं लेखक अनिल जैन
  • vidhansabha
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव नतीजे: कई सीटों पर 500 वोटों से भी कम रहा जीत-हार का अंतर
    13 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी की अगुवाई वाले गठबंधनों के बीच बेहद कांटे का मुकाबला रहा। 53 सीटें ऐसी रहीं जहां हार-जीत का अंतर 200 से लेकर 5000…
  • डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    तिरछी नज़र: चुनाव सेवक का अश्वमेध यज्ञ
    13 Mar 2022
    बीजेपी सरकार चलाने में जितनी मेहनत करती है उससे अधिक मेहनत सरकार बनाने में करती है। सरकार जब एक बार बन जाए तो चल तो रामभरोसे जाती ही है।
  • न्यूज़क्लिक डेस्क
    इतवार की कविता : 'जीते हुए लश्कर के सिपाही, ऐसे कैसे हो जाते हैं?'
    13 Mar 2022
    बमबारी, हमले और जंग के शोर के बीच इतवार की कविता में पढ़िये स्वप्निल तिवारी की लिखी नज़्म 'शेल-शॉक्ड'...
  • एम. के. भद्रकुमार
    'सख़्त आर्थिक प्रतिबंधों' के साथ तालमेल बिठाता रूस  
    13 Mar 2022
    व्लादिमीर पुतिन की पहली प्राथमिकता यही है कि वह ख़ुद को अपने लोगों के प्रति जवाबदेह बनाये रखें।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License