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तस्वीर का दूसरा रुख़ : महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा और अपराध का भी गढ़ है परिवार
बिना भावुक हुए आज विश्व परिवार दिवस पर परिवार के उस पहलू पर चर्चा करते हैं जिसे आमतौर पर हम अनदेखा करते हैं और सच्चाई से आंख मूंद लेते हैं।
राज कुमार
15 May 2020
विश्व परिवार दिवस
प्रतीकात्मक तस्वीर

हर साल 15 मई को विश्व परिवार दिवस मनाया जाता है। परिवार! जिसका महिमामंडन सर्वव्यापी है। परिवार नाम की संस्था को हमारे यहां सबसे आदर की नज़र की देखा जाता है। परिवार को हर चीज़ से ऊपर माना जाता है। आज विश्व परिवार दिवस पर परिवार के उस पहलू पर चर्चा करते हैं जिसे आमतौर पर हम अनदेखा करते हैं और सच्चाई से आंख मूंद लेते हैं।

परिवार के महिमामंडन में सबसे महत्वपूर्ण होती है भावनात्मक चाशनी। हम इस चाशनी में इतना डूबे रहते हैं कि कभी सिक्के का दूसरा पहलू देख ही नहीं पाते। परिवार से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे और सवाल हैं जिन पर सोचना बहुत ज़रूरी है। जिस घर-परिवार में सबसे ज्यादा महिलाएं खटती हैं उनके नज़रिये से कभी परिवार को देखा ही नहीं जाता। परिवार के वैचारिक पहलूओं पर एक बार के लिए यहां चर्चा नहीं करते है बल्कि इसे स्याह-सफेद तरीके से क़ानून और आंकड़ों के ज़रिये समझते हैं।

महिलाओं के अधिकारों से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण क़ानूनों की बात करते हैं। शुरुआत करते हैं सती क़ानून से जिसे सती प्रिवेंशन एक्ट कहा जाता है जो 1987 में लागू हुआ था। परिवार इस क़ानून के दायरे में आता है। एक समय औरत को पति के साथ ज़िंदा जला देने वाले जघन्य अपराध में परिवार की हिस्सेदारी थी।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम-1961, दहेज के अपराध में सौ फीसदी परिवार शरीक है। वर पक्ष और वधू पक्ष दोनों की भागेदारी रहती है और इनकी भूमिकाएं बदलती रहती हैं। क़ानून बनने के बावजूद दहेज भी चल रहा है और दहेज हत्याएं भी चल रही हैं। वर्ष 2018 की एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार दहेज हत्या के 7277 मामले दर्ज़ हुए हैं। यानी हर रोज़ 20 लड़कियों को दहेज के लिए मार दिया जाता है। ये संख्या वर्ष 2017 में 7166 थी। यानी अपराध की संख्या में बढ़ोतरी हुई है।

लिंग चयन प्रतिषेध अधिनियम-1994, जिसे भ्रूण हत्या को रोकने के अमल में लाया गया। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत का बाल लिंगानुपात 919 है। भ्रूण हत्या जैसे अपराध का कार्यस्थल परिवार ही है और निजी जन इसमें शामिल हैं। अगर हम परिवार को बालिकाओं का वध-स्थल कहें तो क्या गलत कहेंगे। क्या हम इस अपराध के लिये परिवार को बरी कर सकते हैं?

घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम-2005, ये क़ानून भी परिवार और हमारे सबसे क़रीबियों पर लागू होता है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की वर्ष 2018 की रिपोर्ट के अनुसार पति और नज़दीकी रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के एक लाख चार हज़ार एक सौ पैंसठ (104165) मामले दर्ज़ हुये हैं। यानी हर रोज़ 285, यानी हर घंटे 11 महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार हो रही हैं। ये अपराध भी परिवार और घर की चारदिवारी के अंदर अपने क़रीबियो द्वारा अंज़ाम दिया जाता है। नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे के अनुसार 31 प्रतिशत महिलाएं अपने पति से हिंसा शिकार होती हैं।

बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम-2006, जिस क़ानून को सबसे पहले 1929 में पारित किया गया था। यूनिसेफ के अनुसार भारत में हर साल साढ़े दस लाख से ज्यादा लड़कियों का बाल विवाह कर दिया जाता है। यक़ीनन इसमें ग़रीबी की वज़ह से कुछ मज़बूरियां भी होंगी लेकिन ये भयानक है। लड़कियों को बचपन में सेक्स ग़ुलाम बना देना और उस समय में बच्चा पैदा करने के लिये भेज देना जब वो खुद बच्ची है, इसे भयानक नहीं तो और क्या कहेंगे। इस अपराध में परिवार और क़रीबी शामिल हैं।

ऊपर दिये गये आंकड़े उन अपराधों से संबंधित हैं जिनको अपराध की तरह से क़ानूनी मान्यता मिली है। अभी बहुत सारे ऐसे आपराधिक व्यवहार हैं जो परिवारों में प्रचलित हैं और उन्हें अपराध की तरह नहीं देखा जाता। बहुत सारे जघन्य अपराधों के लिए भी अलग से कोई क़नून नहीं है। उदाहरण के लिए इज़्ज़त के नाम पर होने वाली हत्याओं के लिए अलग से कोई क़नून नहीं है। जबकि लंबे समय से महिला आंदोलन और सिविल सोसायटी इसके लिये मांग कर रही है।

वैवाहिक बलात्कार पर कोई क़ानून नहीं है। बड़े पैमाने पर महिलाएं इसकी शिकार हैं। लेकिन इसे अपराध की तरह देखा ही नहीं जाता। शादी के साथ ही औरत के शरीर पर एकमुश्त और क़दीमी अधिकार पुरुष को मिल जाता है। अजीब बात ये है कि इसे हमारा समाज स्वाभाविक और सामान्य मानता है। इसके अलावा अन्य बलात्कार और यौन उत्पीड़न की वारदात में भी बड़ी संख्या में परिजन और परिचितों के शामिल होने के आंकड़े सामने आते हैं।

अब परिवार में महिलाओं के श्रम और संसाधनों पर अधिकार एवं निर्णयों में भागेदारी की स्थिति देखिये। मात्र 38 प्रतिशत महिलाओं के नाम पर ही ज़मीन का पट्टा है। इसमें सिर्फ महिलाओं को ही मिलने वाली योजना और संयुक्त पट्टा भी शामिल है। मात्र 45 प्रतिशत महिलाओं के पास मोबाइल फोन है। अगर बिल्कुल बेसिक हाइजिन की बात करें तो 57 प्रतिशत महिलाओं को आज भी माहवारी के दौरान बेसिक हाइजिन सुविधा उपलब्ध नहीं है।

ये आंकड़ें चीख-चीखकर एक कहानी को बता रहे हैं। महिलाओं से संबंधित जो भी महत्वपूर्ण क़ानून हैं औऱ जो जघन्य अपराध हैं परिवार उसकी कार्यस्थली है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं के खिलाफ अपराध श्रेणी के अंतर्गत दर्ज़ हुये कुल अफराधों में से 31 प्रतिशत अपराध पति और क़रीबियों के द्वारा किये गये हैं। क्या हमें परिवार को अपराध मुक्त करने की सख़्त ज़रूरतत नहीं है? क्या हम ये नहीं देखना चाहते? हमें ये समझना होगा कि परिवार नाम की संस्था में सुधार की सख़्त आवश्यकता है। हमें इसे आलोचनात्मक नज़रिये से देखना होगा और परिवार के जनतांत्रीकरण के लिये और इसे अपराध मुक्त करने के प्रयास तेज़ करने होंगे।

(लेखक राज कुमार स्वतंत्र पत्रकार एवं ट्रेनर हैं। आप सरकारी योजनाओं से संबंधित दावों और वायरल संदेशों की पड़ताल भी करते रहते हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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