NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
समाज
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
तस्वीर का दूसरा रुख़ : महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा और अपराध का भी गढ़ है परिवार
बिना भावुक हुए आज विश्व परिवार दिवस पर परिवार के उस पहलू पर चर्चा करते हैं जिसे आमतौर पर हम अनदेखा करते हैं और सच्चाई से आंख मूंद लेते हैं।
राज कुमार
15 May 2020
विश्व परिवार दिवस
प्रतीकात्मक तस्वीर

हर साल 15 मई को विश्व परिवार दिवस मनाया जाता है। परिवार! जिसका महिमामंडन सर्वव्यापी है। परिवार नाम की संस्था को हमारे यहां सबसे आदर की नज़र की देखा जाता है। परिवार को हर चीज़ से ऊपर माना जाता है। आज विश्व परिवार दिवस पर परिवार के उस पहलू पर चर्चा करते हैं जिसे आमतौर पर हम अनदेखा करते हैं और सच्चाई से आंख मूंद लेते हैं।

परिवार के महिमामंडन में सबसे महत्वपूर्ण होती है भावनात्मक चाशनी। हम इस चाशनी में इतना डूबे रहते हैं कि कभी सिक्के का दूसरा पहलू देख ही नहीं पाते। परिवार से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे और सवाल हैं जिन पर सोचना बहुत ज़रूरी है। जिस घर-परिवार में सबसे ज्यादा महिलाएं खटती हैं उनके नज़रिये से कभी परिवार को देखा ही नहीं जाता। परिवार के वैचारिक पहलूओं पर एक बार के लिए यहां चर्चा नहीं करते है बल्कि इसे स्याह-सफेद तरीके से क़ानून और आंकड़ों के ज़रिये समझते हैं।

महिलाओं के अधिकारों से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण क़ानूनों की बात करते हैं। शुरुआत करते हैं सती क़ानून से जिसे सती प्रिवेंशन एक्ट कहा जाता है जो 1987 में लागू हुआ था। परिवार इस क़ानून के दायरे में आता है। एक समय औरत को पति के साथ ज़िंदा जला देने वाले जघन्य अपराध में परिवार की हिस्सेदारी थी।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम-1961, दहेज के अपराध में सौ फीसदी परिवार शरीक है। वर पक्ष और वधू पक्ष दोनों की भागेदारी रहती है और इनकी भूमिकाएं बदलती रहती हैं। क़ानून बनने के बावजूद दहेज भी चल रहा है और दहेज हत्याएं भी चल रही हैं। वर्ष 2018 की एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार दहेज हत्या के 7277 मामले दर्ज़ हुए हैं। यानी हर रोज़ 20 लड़कियों को दहेज के लिए मार दिया जाता है। ये संख्या वर्ष 2017 में 7166 थी। यानी अपराध की संख्या में बढ़ोतरी हुई है।

लिंग चयन प्रतिषेध अधिनियम-1994, जिसे भ्रूण हत्या को रोकने के अमल में लाया गया। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत का बाल लिंगानुपात 919 है। भ्रूण हत्या जैसे अपराध का कार्यस्थल परिवार ही है और निजी जन इसमें शामिल हैं। अगर हम परिवार को बालिकाओं का वध-स्थल कहें तो क्या गलत कहेंगे। क्या हम इस अपराध के लिये परिवार को बरी कर सकते हैं?

घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम-2005, ये क़ानून भी परिवार और हमारे सबसे क़रीबियों पर लागू होता है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की वर्ष 2018 की रिपोर्ट के अनुसार पति और नज़दीकी रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के एक लाख चार हज़ार एक सौ पैंसठ (104165) मामले दर्ज़ हुये हैं। यानी हर रोज़ 285, यानी हर घंटे 11 महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार हो रही हैं। ये अपराध भी परिवार और घर की चारदिवारी के अंदर अपने क़रीबियो द्वारा अंज़ाम दिया जाता है। नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे के अनुसार 31 प्रतिशत महिलाएं अपने पति से हिंसा शिकार होती हैं।

बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम-2006, जिस क़ानून को सबसे पहले 1929 में पारित किया गया था। यूनिसेफ के अनुसार भारत में हर साल साढ़े दस लाख से ज्यादा लड़कियों का बाल विवाह कर दिया जाता है। यक़ीनन इसमें ग़रीबी की वज़ह से कुछ मज़बूरियां भी होंगी लेकिन ये भयानक है। लड़कियों को बचपन में सेक्स ग़ुलाम बना देना और उस समय में बच्चा पैदा करने के लिये भेज देना जब वो खुद बच्ची है, इसे भयानक नहीं तो और क्या कहेंगे। इस अपराध में परिवार और क़रीबी शामिल हैं।

ऊपर दिये गये आंकड़े उन अपराधों से संबंधित हैं जिनको अपराध की तरह से क़ानूनी मान्यता मिली है। अभी बहुत सारे ऐसे आपराधिक व्यवहार हैं जो परिवारों में प्रचलित हैं और उन्हें अपराध की तरह नहीं देखा जाता। बहुत सारे जघन्य अपराधों के लिए भी अलग से कोई क़नून नहीं है। उदाहरण के लिए इज़्ज़त के नाम पर होने वाली हत्याओं के लिए अलग से कोई क़नून नहीं है। जबकि लंबे समय से महिला आंदोलन और सिविल सोसायटी इसके लिये मांग कर रही है।

वैवाहिक बलात्कार पर कोई क़ानून नहीं है। बड़े पैमाने पर महिलाएं इसकी शिकार हैं। लेकिन इसे अपराध की तरह देखा ही नहीं जाता। शादी के साथ ही औरत के शरीर पर एकमुश्त और क़दीमी अधिकार पुरुष को मिल जाता है। अजीब बात ये है कि इसे हमारा समाज स्वाभाविक और सामान्य मानता है। इसके अलावा अन्य बलात्कार और यौन उत्पीड़न की वारदात में भी बड़ी संख्या में परिजन और परिचितों के शामिल होने के आंकड़े सामने आते हैं।

अब परिवार में महिलाओं के श्रम और संसाधनों पर अधिकार एवं निर्णयों में भागेदारी की स्थिति देखिये। मात्र 38 प्रतिशत महिलाओं के नाम पर ही ज़मीन का पट्टा है। इसमें सिर्फ महिलाओं को ही मिलने वाली योजना और संयुक्त पट्टा भी शामिल है। मात्र 45 प्रतिशत महिलाओं के पास मोबाइल फोन है। अगर बिल्कुल बेसिक हाइजिन की बात करें तो 57 प्रतिशत महिलाओं को आज भी माहवारी के दौरान बेसिक हाइजिन सुविधा उपलब्ध नहीं है।

ये आंकड़ें चीख-चीखकर एक कहानी को बता रहे हैं। महिलाओं से संबंधित जो भी महत्वपूर्ण क़ानून हैं औऱ जो जघन्य अपराध हैं परिवार उसकी कार्यस्थली है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं के खिलाफ अपराध श्रेणी के अंतर्गत दर्ज़ हुये कुल अफराधों में से 31 प्रतिशत अपराध पति और क़रीबियों के द्वारा किये गये हैं। क्या हमें परिवार को अपराध मुक्त करने की सख़्त ज़रूरतत नहीं है? क्या हम ये नहीं देखना चाहते? हमें ये समझना होगा कि परिवार नाम की संस्था में सुधार की सख़्त आवश्यकता है। हमें इसे आलोचनात्मक नज़रिये से देखना होगा और परिवार के जनतांत्रीकरण के लिये और इसे अपराध मुक्त करने के प्रयास तेज़ करने होंगे।

(लेखक राज कुमार स्वतंत्र पत्रकार एवं ट्रेनर हैं। आप सरकारी योजनाओं से संबंधित दावों और वायरल संदेशों की पड़ताल भी करते रहते हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

World family day
violence against women
male dominant society
patriarchal society
feticide
gender discrimination

Related Stories

एमपी ग़ज़ब है: अब दहेज ग़ैर क़ानूनी और वर्जित शब्द नहीं रह गया

सवाल: आख़िर लड़कियां ख़ुद को क्यों मानती हैं कमतर

आख़िर क्यों सिर्फ़ कन्यादान, क्यों नहीं कन्यामान?

ओलंपिक में महिला खिलाड़ी: वर्तमान और भविष्य की चुनौतियां

क्या दहेज प्रथा कभी खत्म हो पाएगी?

बोलती लड़कियां, अपने अधिकारों के लिए लड़ती औरतें पितृसत्ता वाली सोच के लोगों को क्यों चुभती हैं?

दुनिया की हर तीसरी महिला है हिंसा का शिकार : डबल्यूएचओ रिपोर्ट

महिला दिवस विशेष: क्या तुम जानते हो/ पुरुष से भिन्न/ एक स्त्री का एकांत

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस: क़ाफ़िला ये चल पड़ा है, अब न रुकने पाएगा...

विशेष: प्रेम ही तो किया, क्या गुनाह कर दिया


बाकी खबरें

  • govt employee
    अनिल जैन
    निजीकरण की आंच में झुलस रहे सरकारी कर्मचारियों के लिए भी सबक़ है यह किसान आंदोलन
    28 Nov 2021
    किसानों की यह जीत रेलवे, दूरसंचार, बैंक, बीमा आदि तमाम सार्वजनिक और संगठित क्षेत्र के उन कामगार संगठनों के लिए एक शानदार नज़ीर और सबक़ है, जो प्रतिरोध की भाषा तो खूब बोलते हैं लेकिन कॉरपोरेट से लड़ने…
  • poverty
    अजय कुमार
    ग़रीबी के आंकड़ों में उत्तर भारतीय राज्यों का हाल बेहाल, केरल बना मॉडल प्रदेश
    28 Nov 2021
    मल्टीडाइमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स के मुताबिक केरल के अलावा भारत का और कोई दूसरा राज्य नहीं है, जहां की बहुआयामी गरीबी 1% से कम हो। 
  • kisan andolan
    शंभूनाथ शुक्ल
    हड़ताल-आंदोलन की धार कुंद नहीं पड़ी
    28 Nov 2021
    एक ज़माने में मज़दूर-किसान यदि धरने पर बैठ जाते थे तो सत्ता झुकती थी। पर पिछले चार दशकों से लोग यह सब भूल चुके थे।
  • Hafte Ki Baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    संवैधानिक मानववाद या कारपोरेट-हिन्दुत्ववाद और यूपी में 'अपराध-राज'!
    27 Nov 2021
    संविधान दिवस के मौके पर भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोपों-प्रत्यारोपो की खूब बौछार हुई. क्या सच है-संविधानवाद और परिवारवाद का? क्या भारत की सरकारें सचमुच संविधान के विचार और संदेश के हिसाब से…
  • crypto
    न्यूज़क्लिक टीम
    क्या Crypto पर अंकुश ज़रूरी है?
    27 Nov 2021
    मोदी सरकार क्रिप्टोकरेंसी पर अंकुश लगा रही हैI लेकिन आखिर यह क्रिप्टोकरेंसी है क्या? क्या यह देश में मुद्रा की जगह ले सकती है?
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License