NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
LIC बेचने का मतलब है भारत की आर्थिक सम्प्रभुता ख़तरे में डालना
एलआईसी की बैलेंस शीट की स्थिति भी बहुत मज़बूत है। एलआईसी की कुल सम्पति 30 लाख करोड़ पार कर पहली बार वित्त वर्ष साल 2019 में 31.11 लाख करोड़ रुपये हो गयी।
अजय कुमार
04 Feb 2020
LIC

आम आदमी को बीमा का मतलब पता हो या न हो लेकिन उसने जीवन बीमा निगम (एलआईसी) का नाम जरूर सुना होता है। इसलिए जब बीमा करने की बात होती है तो उसकी सबसे पहली पसंद जीवन बीमा निगम होती है। वजह यह कि यह एक सरकारी कम्पनी है और आम लोगों को अपना पैसा सुरक्षित रखने में भरोसा जितना सरकार पर होता है उतना प्राइवेट कंपनियों पर नहीं। बीमा क्षेत्र में 23 प्राइवेट कंपनियों के साथ एक सरकारी कंपनी एलआईसी काम करती है। इन कंपनियों में बाज़ार में सबसे बड़ी हिस्सेदारी एलआईसी की है। कहने का मतलब यह कि एलआईसी के पास भारत के कुल बीमाधारियों में से तकरीबन 76 फीसदी बीमाधारी हैं।

इस बार के बजट में सरकार ने एलान किया कि सरकारी कंपनी जीवन बीमा निगम (एलआईसी) में सरकार अपनी हिस्सेदारी बेचना चाहती है। इसके लिए सीधे आईपीओ लाने की बात कही गई है। इसका मतलब है कि एलआईसी के शेयरों की बिक्री की जाएगी। ऐसे में इस सरकारी बीमा कंपनी में आम शेयरधारकों की भी हिस्सेदारी हो जाएगी। हालांकि सरकार ने खुलासा नहीं किया है कि स्वामित्व का कितना फीसदी हिस्सा बेचा जाएगा।

मौजूदा समय में साठ साल पुरानी कम्पनी एलआईसी के 100 फीसदी शेयरों की मालिक सरकार खुद है। सौ करोड़ की ऑथोराइज्ड कैपिटल वाले एलआईसी के कैपिटल यानी पूंजी की कीमत 8.77 लाख करोड़ रूपये है। यह टाटा कंसल्टेंसी सर्विस और मुकेश अम्बानी के रिलायंस इंडिया लिमिटेड के कुल शेयरों की कीमतों से भी ज्यादा है।

एलआईसी की बैलेंस शीट की स्थिति भी बहुत मज़बूत है। एलआईसी की कुल सम्पति 30 लाख करोड़ पार कर पहली बार वित्त वर्ष साल 2019 में 31.11 लाख करोड़ रूपये हो गयी। यह एक साल में तकरीबन 9.38 फीसदी की बढ़ोतरी थी। एलआईसी का सरप्लस साल 2019 में 50 हज़ार करोड़ से अधिक का है।

इसके साथ एलआईसी सरकार द्वारा चलाई जा रही कंपनियों में सबसे बड़ी निवेशक भी है। पिछले साल एलआईसी ने आईडीबीआई बैंक के उतने शेयर खरीदे थे, जितने से आइडीबीआई बैंक का मालिकाना हक एलआईसी को मिल गया था। सरकार इस समय आइडीबीआई बैंक के बचे हुए शेयरों को भी बेचने की बात कर रही रही है।

एलआईसी के शेयर जब बाज़ार में बिकने के लिए जारी किये जायेंगे, तब यह बाज़ार में लिस्ट हुई सबसे बड़ी कम्पनी होगी। जिसके पास सबसे अधिक सम्पति होगी। इसलिए बहुत मुश्किल होगा कि एलआईसी का दस फीसदी शेयर एक बार में बिक पाए। क्योंकि जितनी कीमत के ये शेयर हैं उतने बड़े खरीदार बाजार में नहीं है।

इस पूरी पृष्ठभूमि में यह बात तो साफ है कि एलआईसी की स्थिति बुरी नहीं है। न एलआईसी की बैलेंस शीट कमज़ोर है। न ही एलआईसी नुकसान हो रहा है। इसलिए सवाल उठता है कि सरकार एलआईसी को बेचने क्यों जा रही है? बेचने के पीछे की वजह क्या है? जब बेचने लायक स्थितियां ही नहीं है।

पहला तर्क तो यह दिया जा रहा है कि सरकार के पास पैसे की कमी है? इसलिए सरकारी कंपनियों को बेचा जा रहा है ताकि सरकार के पास पैसा आ पाए। सरकार अपने विनिवेश के लक्ष्य यानी 2.1 लाख करोड़ के लक्ष्य को पूरा कर पाए। लेकिन इस तर्क में बहुत अधिक दम नहीं लगता। दम इसलिए नहीं लगता क्योंकि यह बात सही है कि सरकार के पास पैसा नहीं है। यह बात भी सही है कि सरकार को पैसे का जुगाड़ करना चाहिए।

लेकिन इसके जवाब में यह बात सही कैसे हो सकती है कि लाभ कमाती सरकरी कंपनियों को बेच दिया जाए। वैसी कंपनियों को बेच दिया जाए जिसकी साख जनता के बीच सबसे अधिक है। अगर सरकार इन सारी बातों को अलग कर केवल बेचने के बारे में सोच रही है तो इसका मतलब है कि सरकार इन कंपनियों को बेचकर बोझ उतारना चाहती है। और वह अपने अकूत बहुमत के दम पर इस तरह के मनमानी फैसले ले रही है।

दूसरा तर्क आर्थिक जानकरों की तरफ से है कि बाज़ार में एलआईसी की लिस्टिंग हो जाने से एलआईसी के कामकाज में पारदर्शिता आएगी। इस तर्क का जवाब देते हुए एलआईसी वर्किंग इम्पलॉई एसोसिएशन के वाईस प्रेसिडेंट अनिल कुमार भटनागर ने कहा कि समझ में नहीं आ रहा है कि किसी तरह की पारदर्शिता की बात की जा रही है। एलआईसी अपने सारे खातों को अपने वेबसाइट पर जारी करती है। सारे खाते वेबसाइट पर उपलब्ध है, कोई भी इन्हें पढ़ सकता है। पारदर्शिता के नाम पर दूसरा सवाल यह उठाया जा रहा है कि एलआईसी में पैसा लगाने वालों को यह पता नहीं चलता कि उनका पैसा कहां लगाया जाता है। इस पर अनिल कुमार भटनागर का कहना है कि एलआईसी का पैसा कहां निवेश होगा, इसका फैसला एलआईसी की बोर्ड करती है।

जो फैसला बोर्ड करती है, उसकी छानबीन करने के लिए इन्सुरेंस रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ़ इण्डिया होती है। उसके बाद पैसा कहां निवेश किया गया है, इसकी जानकरी भी हम पाने वेबसाइट पर मुहैया करवाते हैं। यह पारदर्शिता नहीं तो और क्या है? फिर भी चलिए एक समय के लिए उनके कमजोर तर्क को भी मान लेते हैं कि एलआईसी में पारदर्शिता नहीं है तो पारदर्शिता लाने के नाम पर एक पूरी कम्पनी बेच दी जाए जो बेतुकी बात है। अगर सरकार को लगता है कि पारदर्शिता नहीं है तो सरकार कुछ प्रशासनिक सुधार के लिए क़दम उठा सकती है, बेचने की बात करना बिल्कुल गलत है।

अनिल कुमार भटनागर आगे कहते हैं कि कुछ टीवी वाले तर्क यह भी दे रहे हैं कि अभी डूबी हुई दिवान हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड में एलआईसी के पैसे का निवेश हुआ था और एलआईसी का पैसा डूब गया। पारदर्शिता आने पर इससे छुटकारा मिलेगा। उनके इस इस तर्क का जवाब उनकी बात में ही है। जवाब यह है कि बाज़ार या सरकारी उपक्रम यानी सबका पैसा डूब सकता है। जैसे किंगफिशर डूब गयी, जेटएयरवेज का दिवालिया निकल गया। सरकरी कंपनी को बाज़ार के हवाले कर देने से यह नहीं होता कि बाज़ार के लोग जहां लगाएंगे, वहां वह डूबेगा नहीं। इस लिहाज से यह तर्क भी बहुत कमजोर है।

अनिल भटनागर कहते हैं कि एलआईसी को बाज़ार के हवाले करने के पीछे सरकार के पास कोई मज़हूत तर्क नहीं है। बस सरकार को पैसा चाहिए और इस पैसे की कमी को पूरा करने के लिए सरकार अपने सबसे मज़बूत उपक्रम को बर्बाद कर रही है। उस उपक्रम को बर्बाद कर रही है, जो उसके लिए आपातकालीन समय में कई बार सहारा बन चुकी है और आगे भी बनेगी। लेकिन सरकार अपने तत्काल फायदे के लिए भविष्य में होने वाले फायदे के आधार को तबाह कर रही है। एलआईसी के पास मौजूद पैसे के बारे में आप इससे अनुमान लगा सकते हैं कि एलआईसी की जिन सम्पतियों की कीमत खाताबही में सौ करोड़ है, उसकी इस समय बाज़ार में कीमत 5 हज़ार करोड़ से भी अधिक हो सकती है। हो सकता है कि एलआईसी बेचने पर सरकार को पैसा मिले लेकिन इसे बेचने के बाद सरकार अपनी आर्थिक सम्प्रभुता भी गंवा देगी जो भारत की सम्प्रभुता के लिए उचित कदम नहीं है।

LIC
Selling LIC
economic crises
Economic Recession
Union Budget 2020-21
Nirmala Sitharaman
BJP
modi sarkar

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • Sitaram Yechury
    संदीप चक्रवर्ती
    स्वतंत्रता दिवस को कमज़ोर करने एवं हिंदू राष्ट्र को नए सिरे से आगे बढ़ाने की संघ परिवार की योजना को विफल करें: येचुरी 
    25 Feb 2022
    माकपा महासचिव ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार का “फोकस 5 अगस्त को देश की वास्तविक स्वतंत्रता की तारीख के रूप में बढ़ावा देने पर है।"  
  • russia ukrain
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    यूक्रेन पर रूस के हमले से जुड़ा अहम घटनाक्रम
    25 Feb 2022
    यूरोपीय संघ रूस पर और आर्थिक एवं वित्तीय प्रतिबंध लगाने को सहमत। तो वहीं संयुक्त राष्ट्र ने यूक्रेन में मानवीय सहायता के लिए दो करोड़ डॉलर देने की घोषणा की।
  • ASHA Workers
    अनिल अंशुमन
    बिहार : आशा वर्कर्स 11 मार्च को विधानसभा के बाहर करेंगी प्रदर्शन
    25 Feb 2022
    आशा कार्यकर्ताओं का कहना है कि बिहार सरकार हाई कोर्ट के आदेश का पालन करने में भी टाल मटोल कर रही है। कार्यकर्ताओं ने ‘भूखे रहकर अब और नहीं करेंगी बेगारी’ का ऐलान किया है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 13 हज़ार से ज़्यादा नए मामले, 302 मरीज़ों की मौत
    25 Feb 2022
    देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 4 करोड़ 28 लाख 94 हज़ार 345 हो गयी है।
  • up elections
    तारिक़ अनवर
    यूपी चुनाव : अयोध्या के प्रस्तावित  सौंदर्यीकरण में छोटे व्यापारियों की नहीं है कोई जगह
    25 Feb 2022
    अयोध्या के व्यापारियों ने आरोप लगाया है कि प्रस्तावित लेआउट के परिणामस्वरूप दुकानों और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को बड़े पैमाने पर ध्वस्त या उन दुकानों का ज़्यादातर हिस्सा तोड़ दिया जाएगा।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License