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शाहीनबाग़ : ये तो होना ही था, लेकिन ये क्यों हुआ?
शाहीनबाग़ खाली करा लिया गया है। दूसरे धरने भी हटा दिए गए हैं। ये सब देखते-सोचते खुद से सवाल करता हूं कि क्या वाकई सबको वक़्त की नज़ाकत नहीं समझनी चाहिए! हां, सबको...
मुकुल सरल
24 Mar 2020
shaheen bagh

शाहीन बाग़ वाले मान क्यों नहीं रहे? ऐसे संकट में उन्हें खुद मान जाना चाहिए था। अब पुलिस को तो ये कार्रवाई करनी ही थी।

धरना पहले ही स्थगित कर देना चाहिए था। सबको वक़्त की नज़ाकत समझनी चाहिए। कोरोना वायरस बड़ी तेज़ी से फैल रहा है।

धरने से जुड़े लोग और बाहर से समर्थन दे रहे तमाम लोग भी कई दिनों से यही सलाह दे रहे थे कि कोरोना महामारी के इस काल में समझदारी इसी में है कि धरना-प्रदर्शन स्थगित कर दिया जाए। और अब इससे ज़्यादा इसका कुछ हासिल नहीं। देश-दुनिया को एक संदेश जाना था, चला गया। इस संकट के बाद कुछ नये तरीके अपनाने होंगे आंदोलन के।

शाहीन बाग़ को पुलिस द्वारा खाली कराने की ख़बर सुनकर पहले-पहल यही सोचता हूं। हालांकि जानता हूं कि धरने पर अब कुछ गिने-चुने 10-12 लोगों के अलावा कोई बचा नहीं था। सबने संकट समझते हुए जनहित में पहले ही दूरी बना ली थी। ‘जनता कर्फ़्यू’ के दिन भी एक-दो महिलाओं के अलावा कोई नहीं था। हां, बस हाज़िरी के लिए महिलाएं अपनी चप्पल छोड़ गईं थी।

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रविवार को 'जनता कर्फ्यू' के दौरान शाहीन बाग़ धरना स्थल।

लखनऊ के घंटाघर और उजरियां में भी महिलाओं ने यही किया। सोमवार को धरना स्थगित करते हुए अपने दुपट्टे और चप्पल छोड़ गईं, ताकि सनद रहे...कि धरना ख़त्म नहीं हुआ है, स्थगित हुआ है, कि संघर्ष अभी जारी है।

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लखनऊ घंटाघर पर अब महिलाओं की जगह उनके दुपट्टे धरने पर हैं।

ये सब सोचते-देखते फिर खुद से सवाल करता हूं कि क्या वाकई सबको वक़्त की नज़ाकत नहीं समझनी चाहिए!

क्या बहुसंख्यकों ने अल्पसंख्यकों के नागरिकता के संकट को समझा?

क्या सरकार ने वक़्त की नज़ाकत समझी?

क्या दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने एक मेडिकल टीम भेजकर प्रदर्शनकारी महिलाओं को समझाया कि इस वक़्त आपका इस तरह यहां बैठना कितना ख़तरनाक हो सकता है।

क्या केंद्र की मोदी सरकार ने एक बार भी CAA-NPR-NRC पर पुनर्विचार का आश्वासन दिया। सिर्फ एक बार...एक आश्वासन... कि हां, फिर सोचेंगे। बात करेंगे।

क्या प्रधानमंत्री ने कभी देश के नाम संबोधन या ‘मन की बात’ में इन आंदोलनकारियों और उनकी मांगों या चिंताओं की बात की? उन्होंने तो दंगा पीड़ितों के लिए भी एक शब्द नहीं बोला।

क्या गृहमंत्री ने अपनी पुलिस भेजने से पहले बातचीत करना ज़रूरी समझा। आप तो समय देकर भी मुकर गए।

क्या शाहीन बाग़ इस देश का हिस्सा नहीं है!

क्या देशभर के शाहीनबाग़ देश का हिस्सा नहीं हैं। क्या यहां सर्दी-बारिश-तूफान में धरने पर बैठी महिलाएं हमारी मां-बहनें नहीं हैं।

क्या इस आंदोलन में शामिल अन्य लोग इस देश के लोग नहीं हैं।

क्या नागरिकता का संकट हमारा संकट नहीं है।

क्या सीएए में कुछ ग़लत नहीं। क्या सीएए संविधान की मूल भावना और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के ख़िलाफ़ नहीं। क्या संविधान हमारा नहीं। क्या उसपर हुए हमले के ख़िलाफ़ हम नहीं लड़ेंगे।

क्या एनपीआर के नये नियम हम सबको ख़तरें में नहीं डालेंगे। क्या संभावित एनआरसी हमें अपने देश से बेदख़ल नहीं करेगी। क्या ये देश हमारा नहीं। क्या एनआरसी, कोरोना से कम बड़ा संकट है।

चलो मान लिया कि कोरोना वाकई बड़ा संकट है। वैश्विक संकट। इसमें साफ-सफाई बहुत ज़रूरी है। सोशल डिस्टेंसिंग यानी सामाजिक दूरी बहुत ज़रूरी है। सेल्फ आइसोलेशन ज़रूरी है। बाहर नहीं निकलता हैं। अपनी और दूसरों की सुरक्षा के लिए घरों में सुरक्षित ढंग से रहना ज़रूरी है।

लेकिन क्या अब सरकार इसी ज़रूरत को ध्यान में रखकर शाहीन बाग़ की तर्ज़ पर बेघर, सड़कों पर सोने वाले, दंगा राहत शिविर में रहने वाले गरीब-मजबूर लोगों को भी भगाएगी? और कहां भगाएगी या लेकर जाएगी! कहां हैं उनके घर? उन्हें किस घर, होटल या आश्रम में शरण दी जाएगी। कहां, खाना-पानी, इलाज मिलेगा? कहां? और इनको ही नहीं, उन दिहाड़ी मज़दूरों को भी जो रोज़ कमाकर खाते हैं। जो ठेली लगाते हैं, रेहड़ी लगाते हैं। आपने आनन-फानन में जनता कर्फ्यू और उसके तुरंत बाद लॉकडाउन तो कर दिया। लेकिन इन लोगों के लिए कोई व्यवस्था नहीं की। आपने किस राहत पैकेज का ऐलान किया? कुछ राज्य सरकारों ने किया है, लेकिन इतनी देर से और वो भी बंद की घोषणा के साथ कि लोगों तक अब राहत पहुंचना भी आसान नहीं।

और वो मिडिल क्लास भी क्या कम परेशान है जिसे हेल्पलाइन नंबर पर भी हेल्प नहीं मिल रही। नंबर मिलाने पर मिलता है एक और नया नंबर।

बताइए सरकार अब तो हमने आपके कहने से घरों में बंद रहकर ताली-थाली, घंटे-घड़ियाल सब बजा लिए अब तो आप बताइए आपकी क्या व्यवस्था है? राशन-पानी की, मास्क की, सैनेटाइज़र की, जांच की, इलाज़ की, अस्पताल की? हमारी न सुनो तो सरकारी डॉक्टरों की ही सुन लीजिए।

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इसे भी पढ़िए : क्या स्वास्थ्य कर्मियों की सुरक्षा के बिना कोरोना से लड़ाई जीत पाएंगे?

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