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स्केटर गर्ल : दलित लड़की की अपने सपनों को पूरा करने की कहानी
फिल्म स्केटर लड़की की कहानी किसी मशहूर बैडमिंटन खिलाड़ी या टेनिस खिलाड़ी की बायोपिक न होकर एक छोटी सी बच्ची की मानसिक स्थिति पर है जिसकी समझ में यह नहीं आता कि ऊंची जाति और नीची जाति में क्या फर्क है? और उसे हर उस काम से क्यों रोका जाता है जिसकी उसके भाई को अनुमति है?
रचना अग्रवाल
20 Jun 2021
स्केटर गर्ल

नेटफ्लिक्स पर 11 जून 2021 को रिलीज़ हुई गुज़रे ज़माने के प्रसिद्ध कलाकार मैक मोहन की बेटी मंजरी माकिजानी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘स्केटर गर्ल’ राजस्थान के छोटे से गांव खेमपुर पर आधारित है जिसमें प्रेरणा (राचेल संचिता गुप्ता) अपने मां-बाप और छोटे भाई के संग रहती हैl उसका परिवार अत्यधिक निर्धन होने की वजह से कर्ज के बोझ से दबा हुआ है और उसके पास स्कूल ड्रेस व पुस्तके न होने की वजह से वह स्कूल नहीं जा पाती है जिससे उसकी पढ़ाई छूट जाती है और वह मन मार कर अपने छोटे भाई को स्कूल भेज कर स्वयं घर के कामों में अपनी मां की मदद करती हैl  प्रेरणा, जो अपनी समस्त इच्छाओं को मारकर परंपरा और कर्तव्य से जीवन को जी रही है, की मुलाकात लंदन से आई हुई विज्ञापनकर्ता जेसिका से होती है और उसकी जिंदगी के मायने ही बदल जाते हैंl

जेसिका प्रेरणा को स्केटबोर्ड पर दौड़ना सिखाती हैl स्केटबोर्ड पर प्रैक्टिस करते हुए प्रेरणा को ऐसा महसूस होता है जैसे कि वह अभी तक किसी पिंजरे में बंद थी और मानो अब वो आजाद हो गई हैl आजादी का यह एहसास चाहे कुछ पलों के लिए ही क्यों न हो पर इन चंद मिनटों में वह इतना आनंदित महसूस करती है जो पहले कभी नहीं हुआ थाl 

निर्धन होने की वजह से छोटी उम्र में ही उस पर जो जिम्मेदारियों का बोझ लाद दिया गया था उससे बाहर निकलना उसके लिए लगभग असंभव था। बात बात पर उसे अपने पिता से यह जुमला सुनना पड़ता था "तुम लड़की हो लड़की की तरह रहो, लड़कों वाले काम मत करो" और यह सुनकर वह मन मसोस कर रह जाती थीl पर अपनी व्यथा कहे भी तो किससे?

एक तरफ संघर्षरत प्रेरणा की परिस्थितियों को देखकर दिल भर आता है वहीं दूसरी तरफ कथित रूप से ‘उच्च’ कहलानेवाले जाति वालों का ‘नीची’ जाति वालों को अपमानित करते देखकर काफी घृणास्पद महसूस होता हैl फिल्म में हमारे देश के उन पिछड़े हुए गांवों की वास्तविकता को उजागर किया गया है जहां सवर्ण लोग दलित जातियों को घृणा से देखते हैं और उनसे कोई मेलजोल नहीं रखते हैंl  उत्पीड़ित जाति के लोगों को उत्पीड़क जाति वालों के गली मोहल्लों से निकलने की इजाजत नहीं है और उनका हैंडपंप भी अलग हैl ‘ऊंची’ जाति के बच्चों को ‘नीची’ जाति के बच्चों के साथ खेलने की या उनसे बात करने की सख्त मनाई हैl फिल्म का एक डायलॉग "अरे यह ऊंची जाति वालों का चबूतरा है"  जातिगत भेदभाव की भयावहता का एहसास कराता हैl

फिल्म का निर्देशन और छायांकन काफी प्रभावशाली हैl फिल्म के माध्यम से भारत के गाँवों  की वास्तविक परिस्थितियां दिखाई गई हैं जिससे पता चलता है कि भारत के गांव आजादी मिलने के इतने सालों बाद भी काफी पिछड़े हुए हैं और वहां के लोगों को जागरूक करना अतिआवश्यक है चाहे वह शिक्षा के माध्यम से हो या खेलकूद केl

गांव के बच्चों की स्केटिंग के प्रति लगन देखकर जेसिका काफी भागदौड़ करने के बाद गांव की जमीन पर एक स्केटिंग पार्क का निर्माण करवाती है (जो सच में फिल्म निर्माता द्वारा बनवाया गया है और आज गाँव के बच्चों द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा है)| फिर शुरू हो जाता है राष्ट्रीय स्केटबोर्डिंग चैंपियनशिप में भाग लेने के लिए गांव के बच्चों की प्रैक्टिस का सिलसिला जिसमें सभी जाति के बच्चे हिस्सेदार होते हैंl

प्रेरणा भी किसी तरह वक्त निकालकर स्केटिंग की प्रैक्टिस शुरू कर देती है पर ऐन वक्त पर जिस दिन तमाम देशों के लोग प्रतियोगिता में शामिल होने आते हैं उसी दिन उसके पिता उसके पैरों में बेड़ियां डालने के लिए उसका विवाह निश्चित कर देते हैंl प्रेरणा जो कि अब तक अपनी जिंदगी से समझौता कर रही थी वह इस बात को स्वीकार नहीं करती है और सारी बंदिशों को तोड़कर प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए शादी वाले दिन घर से भाग जाती है और स्केटिंग प्रतियोगिता में जीत हासिल करके यह साबित करती है एक गरीब दलित लड़की को भी घर की चारदीवारी से निकलकर अपने सपनों को पूरा करने का पूरा हक है और वह भी खुली हवा में सांस ले सकती है l

फिल्म के एक दृश्य में प्रेरणा पैसे ना होने की वजह से मात्र 20 रुपये की किताब दुकान पर ही छोड़ देती है। इतनी ही देर में जेसिका वहां पहुंचती है और 20 रुपये की पानी की बोतल खरीदती है जो हमारे पूंजीवादी समाज में व्याप्त वर्ग अंतराल की ओर इशारा करता है जिसमें निर्धन वर्ग के पास आवश्यक सामान खरीदने के लिए पैसे नहीं है और संपन्न वर्ग पानी भी पैसों से खरीद रहा हैl

अभी हाल ही में न्यूज़क्लिक के लिए वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह जी ने जब गरीब बस्तियों में जाकर सर्वे किया और वहां पर रहने वाले बच्चों से पूछने पर कि वो बड़े होकर क्या बनना चाहते हैं,  उन्होंने अति उत्साहित होकर बताया कि वह डॉक्टर,  इंजीनियर आदि बन कर अपने सपनों को पूरा करना चाहते हैंl पर क्या यह वास्तव में संभव है? हमारे देश में आए दिन जो शैक्षणिक संस्थानों का निजीकरण हो रहा है और शिक्षा व्यापार बनती जा रही है, इस स्थिति में यह गरीब बच्चे अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा कर पाएंगे? या फिर इनके सपने सपने ही बन कर रह जाएंगे?

इसे देखें-   ग्राउंड रिपोर्ट - ऑनलाइन पढ़ाईः बस्ती के बच्चों का देखो दुख

फिल्म स्केटर लड़की की कहानी किसी मशहूर बैडमिंटन खिलाड़ी या टेनिस खिलाड़ी की बायोपिक न होकर एक छोटी सी बच्ची की मानसिक स्थिति पर है जिसकी समझ में यह नहीं आता कि ऊंची जाति और नीची जाति में क्या फर्क है? और उसे हर उस काम से क्यों रोका जाता है जिसकी उसके भाई को अनुमति है?

फिल्म स्केटर गर्ल में जिस तरह से लेखक ने स्केटिंग के माध्यम से मुख्य पात्र प्रेरणा की भावनाओं को व्यक्त किया है वह वाकई प्रशंसनीय हैl स्केटिंग प्रतियोगिता में विजय प्राप्त करना ही उसका एकमात्र लक्ष्य ना था बल्कि स्केटिंग करते वक्त उसने जो खुशी अनुभव की उसके लिए अतुल्य थीl कहानी वास्तविक न होते हुए भी वास्तविकता के काफी करीब है और हमारा ध्यान बरबस ही भारतवर्ष के गांव की तरफ ले जाती है जिनको हम शहर में रहकर और यहां की जिंदगी में रम कर लगभग भूल ही चुके हैंl

(रचना अग्रवाल स्वतंत्र लेखक-पत्रकार हैं।)

Skater Girl
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CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License