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Exclusive: ऑस्कर अवार्ड विजेता 'स्माइल पिंकी' की पिंकी अब चराती है बकरियां
ऑस्कर अवार्ड विनर फिल्म “स्माइल पिंकी” की प्रमुख किरदार पिंकी को पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने गोद लेने का ऐलान तो किया, मगर वादे को पूरी तरह भुला दिया। नतीजा, पिंकी और उसका परिवार बेबसी व लाचारी की जिंदगी जीने को मजबूर हैं। स्कूल से लौटने के बाद पिंकी आज भी अपने खेतों और भेड़-बकरियों के बीच खो जाती है।
विजय विनीत
31 Aug 2021
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अपने पिता और चिकित्सक के साथ अमेरिका में पिंकी (फाइल फोटो)

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के रामपुर ढबहीं की खोरिया बस्ती की पिंकी सोनकर गांव के कुएं पर कभी पानी खींचती दिखती है, तो कभी खेतों में कुदाल चलाते। वही पिंकी जो होंठ कटे होने के कारण बाकी बच्चों से अलग दिखती थी और उससे बुरा बर्ताव किया जाता था। जिस लड़की को कभी “होठकटिया” कह कर चिढ़ाया जाता था, उसकी मुस्कान ने 22 फरवरी 2009 को हॉलीवुड की ग्लैमरस दुनिया को चौंका दिया था। साल 2008 में फिल्म निर्माता मेगन माइलन ने कटे होठ और तालू वाले बच्चों के इलाज पर आधारित 39 मिनट की डाक्यूमेंट्री फिल्म “स्माइल पिंकी” बनाई तो उन्होंने नहीं सोचा था कि जिस पिंकी को उन्होंने दुर्गम स्थल से चुना था,  वह आस्कर के रेड कार्पेट पर दुनिया का ध्यान खींचेगी। 

आस्कर जीतने के बाद घर लौटी पिंकी सोनकर (फाइल  फोटो)

हिंदी और भोजपुरी भाषा में बनी “स्माइल पिंकी” को छोटे विषय पर बेस्ट डाक्यूमेंट्री का 81वां ऑस्कर एकेडमी अवार्ड मिला। इस डाक्यूमेंट्री में पिंकी ने असल किरदार निभाया था। वह भारत के उन कई हज़ार बच्चों में से एक रही है जिनके होंठ कटे होने के कारण सामाजिक तिरस्कार का सामना करना पड़ रहा है। 

मिर्जापुर शहर से करीब 55 किमी दूर है रामपुर ढबहीं। इसी गांव में सड़क के किनारे है छोटी खेरिया बस्ती। यहीं है पिंकी सोनकर का घर। रामपुर ढबहीं में एक तरफ सुअरगोड़ और दूसरी ओर सहरसा व झपिहा पहाड़ियां हैं। इन्हीं पहाड़ियों के दरख्तों में पिंकी पहले बकरी चराया करती थी। आज जो पिंकी है, उसे पहले “पिंकिया” के नाम से पुकारा जाता था। आस्कर अवॉर्ड मिलने के बाद यह लड़की रातों-रात स्माइल पिंकी बन गई। फिर रामपुर ढबहीं की तरक्की के लिए सैकड़ों हाथ बढ़े। बड़े-बड़े वादे हुए। घोषणाओं का अंबार लगा। नेताओं और मीडिया वालों का जमघट भी। फिर भी नहीं बदली पिंकी की जिंदगी और उसका गांव रामपुर ढबहीं। सारे के सारे वादे कोरे रह गए। अब पिंकी की जिंदगी पलटकर उसी पुरानी तंगहाली की राह पर लौट आई है। पहले की तरह पिंकी और उनका परिवार बेबसी और लाचारी की जिंदगी जीने को मजबूर है। सिर्फ पिंकी ही नहीं, उसकी तमाम सहेलियां भी अपने सपनों को पंख देने के बजाय सरकारी प्राइमरी स्कूल की चहारदिवारियों के पीछे बकरियां चराने को मजबूर हैं।

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अपने घर के बाहर बर्तन मांजती पिंकी.

दातून करती मिली पिंकी

रामपुर ढबहीं की छोटी खेरिया बस्ती के इकलौते कुएं पर दातून करते हुए मिली पिंकी। कुएं के चबूतरे पर था गांव की महिलाओं और बच्चों का जमघट। कतार में सजे थे सबके प्लास्टिक के डिब्बे। ये डिब्बे कुएं से पानी भरने के लिए रखे गए थे। जिनका डिब्बा आगे होता, वह चरखी चलाकर पानी निकालने में जुट जाता। पिंकी भी पानी भरने वालों की कतार में थी। उसकी बारी आने ही वाली थी, तभी शोर उठा। पारिवारिक कलह में एक महिला ने जहर खा लिया है। दूसरी महिलाओं के साथ पिंकी ने दौड़ लगाई और पहुंच गई महिला के घर। उसे अस्पताल पहुंचाने में मदद की, फिर लौटी कुएं पर। पानी से भरे डिब्बे को साइकिल पर लादा और तब लौटी घर। कुएं से पानी निकलने और खेत-खलिहान में हाड़तोड़ मेहनत अब किशोर पिंकी की जिंदगी का अहम हिस्सा है।

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रामपुर ढबहीं के इकलौते कुएं पर पानी के लिए मारा-मारी, इंतजार में पिंकी

उत्तर प्रदेश की विधानसभा में रामपुर ढबहीं इलाके का प्रतिनिधित्व मौजूदा ऊर्जा राज्यमंत्री रमाशंकर पटेल करते हैं। पानी की जबर्दस्त किल्लत पर हमने पिंकी से सवाल किया तो वह हमारी ओर टुकुर-टुकर ताकने लगी। थोड़ा संयत होने के बाद कहा, “नेताओं की चिकनी-चुपड़ी बातें मुझे आज तक याद हैं। आस्कर अवार्ड के समय तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने हमें गोद लेने और बेटी की तरह परवरिश करने का ऐलान किया था, लेकिन फिर पूछा तक नहीं। लॉकडाउन के समय दो वक्त की रोटी मुहाल हो गयी थी। बहुत मुश्किल से गुजरा महामारी कोरोना का दौर। पहले भी कठिनाई का दौर था और मौजूदा दौर भी वैसा ही है।”

पिंकी से बातचीत के बीच रसोई में खाना बना रही उसकी मां शिमला देवी ने चावल से कंकड़ निकालने के लिए आवाज लगाई तो वह भागकर रसोई में पहुंच गई। जस्ते (एल्युमीनियम) के बटुए में शिमला देवी मिट्टी के चूल्हे पर चावल पकाने की तैयारी में थीं। रसोई में धुआं ही धुआं था। आग जलाने के लिए वह बार-बार फूंक मार रही थीं।

रसोई गैस तक नसीब में नहीं

पिंकी ने सूप में चावल लेकर कंकड़ निकालना शुरू कर दिया। इस बीच शिमला देवी ने अदहन के लिए चूल्हे पर पानी रखा। मिट्टी की चार फीट ऊंची दीवार से सटाकर बनाए गए चूल्हे के बगल में सिल-लोढ़ा, कनस्तर और जस्ते के कुछ खाली बर्तन थे। उज्जवला योजना के बारे में पूछने पर शिमला ने कहा, “हुजूर, हमारे नसीब में कहां है रसोई गैस। सरकारी योजनाएं आती हैं, लेकिन हमारे घर की देहरी तक नहीं पहुंच पातीं। चूल्हे के धुएं में खाना बनाना हमारी नियति है। आंख खराब हो रही हैं। धुएं से दम भी फूलता है, मगर करें क्या? आखिर अपनी लाचारी की गीत किसके आगे गएं? ऑस्कर अवार्ड के समय बहुत सारे सरकारी अफसर और नेता हमारे घर आए, मगर सब के सब झूठे वादे करके चलते बने। रामपुर ढबहीं में अब कोई भूला-भटका भी झांकने नहीं आता। यहां पीने के पानी की जबदस्त किल्लत है। बाग-बगीचे और सब्जियों के खेत न हों तो दो वक्त की रोटी भी मुहाल हो जाएगी।”

बातचीत के बीच पिंकी के पिता राजेंद्र सोनकर पहुंचे। उन्होंने बताया कि उनका परिवार खेतों में मिर्च, बैगन और टमाटर उगाता है। सब्जी लगे खेत को दिखाते हुए कहा, “इन सब्जियों और बाग-बगीचों के सहारे हमारे परिवार की आजिविका टिकी है। रामपुर ढबही में गर्मी के दिनों में जब पहाड़ियां तपती हैं तब आग बरसती है। बारिश के दिनों में रातें डरावनी हो जाती हैं। कई बार जंगली जानवर भी गांव में घुस आते हैं। पहाड़ियों से घिरे इस गांव में हमारी जिंदगी भी पहाड़ जैसी है।”

परिजनों के साथ पिंकी

राजेंद्र के साथ खड़े उनके बड़े भाई मुख्तार सोनकर ने पुराना राग छेड़ा। कहा, “बेटी पिंकी का नाम अचानक सेलिब्रेटी के रूप में चर्चित होने के बाद मिर्जापुर समेत समूचे पूर्वांचल में बैंडबाजे बजे और जुलूस भी निकले। ढोलक की थाप पर आसपास के पहाड़ी इलाके झूम उठे। तत्कालीन कमिश्नर सत्यजीत ठाकुर के अलावा कई संस्थाओं के नुमाइंदे और नेता हमारे गांव आए। प्रशासन ने महामाया आवास योजना से एक कमरा बनवाया, कुएं तक एक सीसी रोड की व्यवस्था कराई। गांव लौटने पर पिंकी के लिए सबने पलक पांवडे़ बिछा दिए। उस समय थोड़ी आर्थिक मदद भी मिली। साथ ही जमीन का पट्टा भी। पिंकी के माता-पिता को काम पर रख लिया गया, लेकिन समय के साथ सभी ने हाथ खींच लिए।”

अब कोई पूछने वाला नहीं

पिंकिया से स्माइल पिंकी बनी ऑस्कर अवार्डी फिल्म की यह अदाकारा इन दिनों बस किसी तरह जिंदगी बसर कर रही है। उसे कोई पूछने वाला नहीं है। हैंडपंप का पानी सूख गया है। आठवीं तक पढ़ाई-लिखाई का जिम्मा मिर्जापुर के चुनार कस्बे के द रेडिएंट इंटरनेशनल स्कूल ने उठाया। आगे की पढ़ाई का इंतजाम न होने के कारण वह घर लौट आई। तीन साल की पढ़ाई के बाद पिंकी आत्मविश्वास से भर गई है। स्कूल की निदेशक रेनू वार्ष्णेय कहती हैं, “जिस वक्त हमारे स्कूल में पिंकी का एडमिशन हुआ था, उसे हिंदी पढ़ना-लिखना नहीं आता था। अब उसमें जबरदस्त बदलाव हुआ है। डांस और सिंगिंग में उसकी गहरी रुचि है। बैडमिंटन में तो स्कूल में पहले नंबर पर रही।” फिलहाल अहरौरा के एक प्राइवेट स्कूल में पिंकी का दाखिला हुआ है, लेकिन प्रबंधन ने लाकडाउन में महंगी फीस के लिए तगादा नहीं छोड़ा है।  

कुएं से पानी खींचने के बाद साइकिल के कैरियर पर लादकर ला रही पिंकी

खत्म हो गया ग्लैमर का दौर

स्कूल से लौटने के बाद पिंकी आज भी अपने खेतों और भेड़-बकरियों के बीच खो जाती है। रामपुर ढबहीं के पूर्व ग्राम प्रधान संजय सिंह बताते हैं, “तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने पिंकी के साथ उनके गांव को भी गोद लेने का ऐलान किया था। तमाम नेताओं और अफसरों ने भी विकास की हामी भरी थी, लेकिन सबके वादे कोरे साबित हुए। पिंकी और उसके घर वालों के साथ जब फोटो खिंचवाना था तो लोगों ने बड़ी-बड़ी बातें कीं, अब कोई पूछने वाला नहीं है।”

पिंकी के ग्लैमर का दौर बीत चुका है। वह कभी खेतों में काम करती दिखती है, तो कभी पानी ढोते हुए। यदा-कदा वह बकरियां के झुंड में भी दिख जाती है। हिंदी पढ़ने में अटकने वाली पिंकी का अब पसंदीदा विषय अंग्रेजी है। वह बताती है, “लंदन जाने से पहले उसे अंग्रेजी के कुछ ही शब्द याद थे। मसलन-हैलो, हाऊ आर यू... आई एम फाइन...। इन शब्दों को पिंकी के होठों का आपरेशन करने वाले सर्जन डा. सुबोध कुमार सिंह ने रटवाया था। यहीं से उसके मन में पढ़ने की इच्छा जगी। चार भाई-बहनों में दूसरे नंबर की पिंकी कहती है, “डॉक्टर बनकर मैं भी परेशान हाल लोगों के चेहरों पर मुस्कान लाना चाहती हूं। आखिर मैं भी स्माइल पिंकी के नाम से ही जानी जाती हूं।”

विंबलडन स्पर्धा का उछाला था टॉस

'स्माइल पिंकी' फेम मिर्जापुर जिले के रामपुर ढबहीं की पिंकी ने विंबलडन स्पर्धा में भी अपनी मुस्कान बिखेरी थी। उसे विंबलडन में 7 जुलाई 2013 को लंदन में आयोजित पुरुष सिंगल्स फाइनल से पहले टॉस कराने के लिए आमंत्रित किया गया था। जीएस मेमोरियल अस्पताल के निदेशक डा.सुबोध कुमार सिंह बताते हैं, “विंबलडन स्पर्धा की चैरटी पार्टनर थी 'स्माइल ट्रेन'। आस्ट्रेलिया के न्यूयार्क स्थित दुनिया की सबसे बड़ी गैर लाभार्थ यह संस्था कटे हुए होंठ (क्लेफ्ट लिप) वाले लोगों के लिए काम करती है। पिंकी ने विंबलडन में खिलाड़ियों से मुलाकात की और पूरा फाइनल मैच भी देखा। लंदन रवानगी से पहले भारत में ब्रिटेन के उच्चायुक्त सर जेम्स बेवन ने दो जुलाई 2013 को अपने घर पर पिंकी के लिए विदाई डिनर का आयोजन किया था। लंदन जाने से पहले पिंकी न्यूयॉर्क गई, जहां उसने मेडिसन पार्क स्क्वायर में पूर्व टेनिस खिलाड़ी मोनिका सेलेस और जिम कूरियर के साथ विंबलडन सेलेब्रेशन में हिस्सा लिया। न्यूयार्क में मौजूद लोगों को भी पिंकी ने अपनी कहानी सुनाई। साथ ही कई अन्य समारोहों में हिस्सा लिया।”

बचपन में पिंकी सोनकर (फाइल फोटो)

डा. सुबोध यह भी बताते हैं, “पिंकी कटे होंठों के साथ पैदा हुई थी। उसके मां-बाप के पास इलाज के पैसे नहीं थे। वह सामाजिक तानों को सहते हुए जीवन बिताने को मजूबर थी। गरीब परिवारों के लोग क्लेफ्ट लिप का आपरेशन नहीं करा पाते, क्योंकि आमतौर पर सर्जरी का खर्च एक लाख से ज्यादा आता है। ऐसे बच्चों का मुफ्त ऑपरेशन कराने के लिए 'स्माइल ट्रेन' प्रोत्साहित करती है और आर्थिक मदद भी देती है। साल 2007 में पिंकी का ऑपरेशन किया गया था। उसकी कहानी पर साल 2009 में ब्राजील के मेगन माइलन ने 'स्माइल पिंकी' डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई, जिसे ऑस्कर पुरस्कार भी मिला। मेगन माइलन न्यूयॉर्क में डॉक्यूमेंट्री फिल्में बनाते हैं। सामाजिक मुद्दों पर आधारित इनकी दूसरी कई डॉक्यूमेंट्री फिल्में आ चुकी हैं। स्माइल पिंकी से पहले उन्होंने 'लॉस्ट ब्यॉज़ ऑफ सूडान' का निर्माण किया था जिसे दो एमी पुरस्कारों के लिए नामांकन मिला था।

बनारस के जाने-माने प्लास्टिक सर्जन डा. सुबोध कुमार सिंह ने “न्यूज क्लिक” के लिए बातचीत में कहा, “स्माइल पिंकी फिल्म को ऑस्कर मिलने के बाद हमारे उस मक़सद को काफी बल मिला है जिसमें वह लोगों को इस विकृति के बारे में बताना चाहते थे। ख़ासकर यह कि इस विकृति को महज एक-दो घंटे की एक सर्जरी से ठीक किया जा सकता है। स्माइल पिंकी की प्रसिद्धि से क्लेफ्ट लिप की विकृति के बारे में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक जागरुकता कायम करने में मदद मिल सकी है। छोटी सी बालिका पिंकी जिस समय मेरे पास आई थी, उस वक्त उसकी उम्र फकत छह साल थी। उसे जन्म से ही होठों की विदीर्णता थी। डॉक्यूमेंट्री में पिंकी के जीवन से जुड़ी हुई समस्याओं की झलक को पेश किया गया है।”

ऑपरेशन से पहले अपनी मां से लिपटी पिंकी सोनकर (फाइल  फोटो)

“स्माइल पिंकी” ने तब लोगों का ध्यान अचानक अपनी तरफ खींचा जब लॉस एंजिल्स में हुए ऑस्कर एकेडमी अवार्ड्स में इस फिल्म को पुरस्कार मिला। होठों की विदीर्णता एक आम सी विकृति है जो कि हर सात सौ लोगों में से एक व्यक्ति को होती है, लेकिन ये विकृति किसी भी इंसान के आत्मविश्वास को हिलाकर रख देती है। साथ ही जीवन को भी बुरी तरह से प्रभावित करती है। बनारस को कोई देश मान लिया जाए तो भारत और चीन के बाद सर्वाधिक क्लेफ्ट सर्जरी यहीं होती हैं। दुनिया भर में क्लेप्ट लिप का सबसे सस्ता इलाज भी बनारस में ही होता है। बनारस का जीएस मेमोरियल ऐसा अस्पताल है जहां अब तक 36 हजार 551 बच्चों को क्लेफ्ट सर्जरी से ठीक कर पूरी दुनिया में कीर्तिमान हासिल कर चुका है।”

जानिए स्माइल पिंकी की कहानी?

मेगन माइलन द्वारा निर्देशित डॉक्यूमेंट्री फिल्म स्माइल पिंकी में ग्रामीण भारत की एक गरीब लड़की की कहानी है। इस लड़की का जीवन तब बदल जाता है, जब वह अपने कटे होंठ को ठीक करने के लिए सर्जरी करवाती है। वृत्तचित्र हिंदी और भोजपुरी में बनाया गया है। पिंकी सोनकर का होठ एकतरफा पूरा फटा हुआ था। अपनी विकृति के कारण वह बहिष्कृत और शांत हताशा का जीवन जी रही थी। संयोग से, पिंकी के माता-पिता सोशल वर्कर पंकज से मिले तो वह उन्हें लेकर प्लास्टिक सर्जन डॉ. सुबोध कुमार सिंह के जीएस मेमोरियल अस्पताल में ले गए, जहां उसकी सफल सर्जरी की गई। उसी दौरान डाक्यूमेंट्री के लिए किरदार की तलाश में फिल्म निर्माता मेगन माइलन बनारस आए थे। तभी गांव की यह छोटी सी लड़की उनसे मिली। पिंकी सोनकर के लिए वह गर्व का क्षण था जब ऑस्कर ने उसकी मुस्कान को पूरा किया।

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अपने बड़े पिता के साथ पिंकी

ऑस्कर एक ऐसा अवार्ड है जिसे फिल्मी जगत का हर सितारा जीतना चाहता है। प्रसिद्ध भारतीय संगीतकार ए आर रहमान और प्रसिद्ध शायर, फ़िल्म निर्देशक, और लेखक गुलजार को ऑस्कर से नवाजा गया था। इससे पहले साल 1983 में भानु अथैया को फिल्म गांधी में कस्टम डिजाइन के लिए ऑस्कर आवार्ड मिला था। कई सुपरहिट फिल्मों का निर्देशन कर चुके सत्यजीत रे और रेसुल पुकुट्टी भी आस्कर अवार्डी रहे हैं।

कोई आम लड़की नहीं पिंकी

एक्टिविस्ट सुश्री प्रज्ञा सिंह कहती हैं, “पिंकी सोनकर रामपुर ढहहीं में एक भाग्यशाली लड़की है, लेकिन एक समय ऐसा था कि उसे भाग्यहीन समझा जाता था।  लोग उसे हिकारत की दृष्टि से देखते थे। उसे कोई अपने साथ खिलाता नहीं था, लेकिन अब उसी गांव में वह किस्मत की धनी मानी जाती है। हर कोई उसकी तरफ़ उम्मीद के साथ देखता है।”

पिंकी किसी फिल्म को ऑस्कर दिलाने वाली उत्तर प्रदेश की पहली लड़की है। रामपुर ढबहीं में एक सरकारी प्राइमरी स्कूल है। आगे की पढ़ाई के लिए यहां से बच्चों को 19 किमी दूर अहरौरा जाना और फिर उतना ही रास्ता नापते हुए लौटना पड़ता है। पिंकी सोनकर भी हर रोज यह मंजिल तय करती है। मिर्जापुर में अहरौरा के ख्यातिलब्ध पत्रकार पवन जायसवाल कहते हैं, “पिंकी बैडमिंटन की बेहतरीन खिलाड़ी है, लेकिन उसके पास गुल्ली-डंडा के अलावा कोई सामान नहीं है। जिस स्कूल में उसका एडमिशन हुआ है उसकी फीस 2100 रुपये महीना है, जिसकी अदायगी गरीब मां-बाप के लिए आसान नहीं है। स्माइल ट्रेन संस्था पढ़ाई के लिए कुछ खर्च देती है, लेकिन वह पर्याप्त नहीं है। रामपुर ढबहीं भी मिर्जापुर के राजगढ़ प्रखंड में है। जहां के ब्लॉक प्रमुख गजेंद्र प्रताप सिंह समेत कई लोगों के नामी स्कूल और इंजीनियरिंग कालेज हैं, लेकिन आस्कर अवार्ड दिलाने वाली फिल्म के इस किरदार को शिक्षित करने और गरीबी के दलदल से हमेशा के लिए निकालने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा है।”

(फाइल फोटो को छोड़कर सभी चित्र वाराणसी के वरिष्ठ पत्रकार विजय विनीत के हैं।)

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