NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
बढ़ती अव्यवस्था के कारण
हम कैसे समय में जी रहे हैं जहाँ हमसे एक ऐसी दुनिया में तर्कसंगत रहने की बात कही जाती है जहाँ केवल अव्यवस्था ही एकमात्र आदर्श है, युद्ध और बाढ़ के कारण अव्यवस्था, किसी-न-किसी महामारी के कारण अव्यवस्था।
ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
14 Sep 2021
केवल बढ़ती अव्यवस्था के कारण
त्शिबुम्बा कांडा-मटुलु (डीआरसी), यूनियन मिनिएरे दु हौट कटांगा के शहीद। पहले इस जगह को 'अल्बर्ट I' स्टेडियम कहा जाता था, अब इसे केनिया टाउनशिप, लुबुम्बाशी के नाम से जाना जाता है। 1975

कुछ दिनों पहले, मैंने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एक वरिष्ठ अधिकारी से बात की थी। मैंने उनसे पूछा कि क्या वो जानती हैं कि हमारी दुनिया में ऐसे कितने लोग हैं जो बिना जूतों के रहते हैं। मैंने उनसे यह सवाल इसलिए पूछा क्योंकि मैं टंगियासिस बीमारी के बारे में सोच रहा था, जो कि मादा रेत पिस्सू (टंगा पेनेट्रांस) के त्वचा में घुस जाने पर होने वाले संक्रमण से होती है। इस बीमारी के अलग-अलग भाषाओं में कई नाम हैं -स्पैनिश में जिगर या चिगो या निगुआ पुर्तगाली में बिचो डो पे से लेकर किस्वाहिली में फुंज़ा या ज़ांडे में तुकुतुकु। यह एक भयानक बीमारी है जो पैरों को विकृत कर देती है और चल पाना मुश्किल बना देती है। जूते इन पिस्सुओं को त्वचा में घुसने से रोकते हैं। वो जानती नहीं थीं कि कितने लोग जूतों के बिना रहते हैं, पर उन्होंने अनुमान से कहा कि ऐसे कम-से-कम एक अरब लोग होंगे। जूते न होने के कारण होने वाली बीमारियों में टंगियासिस के अलावा और भी कई तरह की बीमारियाँ हैं जैसे, पोडोकोनिओसिस, जो मध्य अमेरिका, अफ़्रीकी हाइलैंड्स और भारत में लाल ज्वालामुखी मिट्टी पर नंगे पाँव चलने वाले लोगों के पैरों में होती है।

21वीं सदी में एक अरब लोग जूतों के बिना रहते हैं। उनमें से लाखों लाख बच्चे हैं, जिनमें से कई जूते न होने के कारण स्कूल नहीं जा पाते। हालाँकि ग्लोबल फ़ुटवियर उद्योग प्रति वर्ष 24.3 अरब जोड़ी जूतों का उत्पादन करता है, यानी दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति के लिए तीन जोड़ी जूते। फ़ुटवियर उद्योग में काफ़ी पैसा लगा हुआ है: कोविड-19 संकट के बावजूद, 2020 में जूतों के वैश्विक बाज़ार का अनुमान 384.2 अरब डॉलर था, और 2026 में यह 440 अरब डॉलर तक पहुँच सकता है। जूतों के प्रमुख उपभोक्ता संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान, जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम, फ़्रांस और इटली में रहते हैं; जबकि जूते के प्रमुख उत्पादक चीन, भारत, ब्राज़ील, इटली, वियतनाम, इंडोनेशिया, मैक्सिको, थाईलैंड, तुर्की और स्पेन में रहते हैं। भारत जैसे देश में जूतों का उत्पादन करने वालों में से कई लोग उनके अपने द्वारा बनाए गए जूते ख़रीद नहीं सकते हैं और न ही बाज़ार में उपलब्ध सबसे सस्ती हवाई चप्पलें ही ख़रीद सकते हैं। बाज़ार में ज़रूरत से ज़्यादा जूते उपलब्ध हैं, लेकिन इन जूतों को ख़रीदने के लिए करोड़ों लोगों के हाथ में पर्याप्त पैसा नहीं है। वे काम करते हैं और उत्पादन करते हैं, लेकिन वे एक ठीक ठाक जीवन जीने के लिए पर्याप्त चीज़ों का उपभोग नहीं कर सकते।

बाबक काज़ेमी (ईरान), शिरीन और फ़रहाद बाहर जा रहे हैं, 2012

जून 2021 में, विश्व बैंक ने अपनी वैश्विक आर्थिक संभावनाएँ जारी कीं, जिसमें 'एक पीढ़ी में पहली बार' ग़रीबी बढ़ने की रिपोर्ट शामिल थी। बैंक के विश्लेषकों ने लिखा है कि 'कोविड-19 सबसे कमज़ोर आबादी की जीवन स्थितियों में स्थायी नुक़सान पहुँचा सकता है'। कम आय वाले देशों में 11.2 करोड़ लोग पहले से ही खाद्य असुरक्षा से जूझ रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 'महामारी महिलाओं, बच्चों और अकुशल व अनौपचारिक श्रमिकों पर इसके नकारात्मक प्रभाव और शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन स्तर पर इसके प्रतिकूल प्रभावों के कारण आय की अनियमितताओं और लैंगिक असमानता को और बढ़ाएगी'।

महामारी से पहले, 1.3 अरब लोग बहुआयामी और सख़्त ग़रीबी में रह रहे थे; सरकारों और बड़े उद्योगों ने महामारी को जिस तरह से नियंत्रित किया है, उसके कारण जनता के वंचित तबक़ों की दिक़्क़तें और बढ़ी हैं। विश्व के अत्यंत ग़रीब लोगों में से 85% दक्षिण एशिया और उप-सहारा अफ़्रीका में रहते हैं; दुनिया के आधे अति ग़रीब लोग केवल पाँच देशों, भारत, नाइजीरिया, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, इथियोपिया और बांग्लादेश, में रहते हैं। विश्व बैंक का अनुमान है कि दो अरब लोग सामाजिक ग़रीबी रेखा से नीचे रहते हैं (सामाजिक ग़रीबी रेखा को मापते समय अर्थव्यवस्थाओं की समृद्धि को ध्यान में रखा जाता है)।

रोनाल्ड वेंचुरा (फ़िलीपींस), कहीं न ले जाने वाला चौराहा, 2014

पिछले साल, विश्व बैंक की ऐतिहासिक रिपोर्ट 'पावर्टी एंड शेयर्ड प्रॉस्पेरिटी 2020: रिवर्सल्स ऑफ़ फ़ॉर्च्यून' ने बताया कि 'जो लोग पहले से ही ग़रीब और कमज़ोर हैं वे संकट का ख़ामियाज़ा भुगत रहे हैं'। रिपोर्ट ने बढ़ते ग़रीबी के स्तर के लिए कोविड-19 महामारी को अहम कारण बताया, पर उसमें जलवायु परिवर्तन और संघर्षों के नकारात्मक प्रभाव को भी जोड़ दिया था। विश्व बैंक के आँकड़ों के अनुसार, ग़रीब 'मुख्य रूप से ग्रामीण, युवा और अशिक्षित' हैं, और अंतर्राष्ट्रीय ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले हर पाँच लोगों में से चार लोग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं। ग़रीबी और भुखमरी का सामना कर रहे लोगों में महिलाएँ और लड़कियाँ ज़्यादा हैं। इस विश्लेषण के आधार पर, विश्व बैंक ने सरकारों से बेरोज़गारों और कामकाजी ग़रीबों को राहत प्रदान करने के लिए कल्याणकारी उपायों को बढ़ाने का आग्रह किया था। लेकिन बैंक ने खेत मज़दूरों, छोटे किसानों और असंगठित श्रमिकों के बारे में से कुछ नहीं कहा, जिन्हें अपने उत्पादक श्रम के बदले पर्याप्त वेतन नहीं मिलता। यही कारण है कि ऐसे करोड़ों लोग -भारत जैसे देशों में, जैसा कि हमारे डोजियर संख्या 41 ने दिखाया- बड़े विद्रोह कर रहे हैं।

दावित अबेबे (इथियोपिया), पृष्ठभूमि 2, 2014

विश्व बैंक की कोई भी रिपोर्ट मौजूदा संकट से बाहर निकलने का कोई ठोस रास्ता नहीं दिखाती। इन रिपोर्टों के निष्कर्षों की भाषा में बेपरवाही और चुप्पी शामिल है। विश्व बैंक की रिपोर्ट में कहा गया है, 'हमें एक साथ काम करने और बेहतर काम करने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए'। इसमें कोई शक नहीं कि एकजुटता ज़रूरी है, लेकिन एकजुटता किस बात पर, किसके लिए और कैसे? इंडोनेशिया जैसे देशों में लागू किए गए कुछ पैकेजों को देखते हुए, बैंक ने कई प्रकार के नीति विकल्प पेश किए हैं:


1. स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र को बढ़ावा देना।
2. कम आय वाले परिवारों को नक़द हस्तांतरण, बिजली सब्सिडी, और खाद्य सहायता देने के लिए सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों को बढ़ाना, और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को बेरोज़गारी भत्ते के दायरे में लाना।
3. कर कटौती लागू करना।

ये आकर्षक उपाय हैं, दुनिया भर के सामाजिक आंदोलनों की यही बुनियादी माँगें हैं। इसी तरह के उपाय चीन के ग़रीबी उन्मूलन कार्यक्रम 'तीन गारंटी और दो आश्वासन' का एक हिस्सा हैं -सुरक्षित आवास, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा की गारंटी, व भोजन और कपड़ों का आश्वासन। चीन में पूर्ण ग़रीबी के उन्मूलन पर किए गए हमारे अध्ययन में इन विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई है। यह अध्ययन दिखाता है कि 1949 की चीनी क्रांति के बाद से देश ने 85 करोड़ लोगों को ग़रीबी से कैसे बाहर निकाला और दुनिया की कुल ग़रीबी को 70 प्रतिशत कम किया है। लेकिन चीन की सरकार के विपरीत, विश्व बैंक ग़रीबी उन्मूलन पर लिखते हुए कॉर्पोरेट टैक्स कम करने का आह्वान करता है, और असंगत बन जाता है।

हम कैसे समय में जी रहे हैं जहाँ हमसे एक ऐसी दुनिया में तर्कसंगत रहने की बात कही जाती है जहाँ केवल अव्यवस्था ही एकमात्र आदर्श है, युद्ध और बाढ़ के कारण अव्यवस्था, किसी-न-किसी महामारी के कारण अव्यवस्था। विश्व बैंक भी इस तथ्य को मानता है कि महामारी से पहले भी, हम अव्यवस्था की ओर, और अमानवीयता की ओर बढ़ रहे थे। दुनिया के आधुनिक सर्वनाश के चार बड़े कारण हैं: ग़रीबी, युद्ध, सामाजिक निराशा और जलवायु परिवर्तन। और इस व्यवस्था के पास इसके अपने ही द्वारा खड़ी की गईं समस्याओं का कोई हल नहीं है।

एक अरब लोग बिना जूतों के रहते हैं।

लिली बर्नार्ड (क्यूबा), यूजीन डेलाक्रोइक्स की लिबर्टी के बाद कार्लोटा जनता का नेतृत्व करते हुए, 1830, 2011

बढ़ते अत्याचारों के इस दौर में सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि लोगों को यह लगने लगा है कि इस दुःस्वप्न के अलावा कुछ भी संभव नहीं है। विकल्प की कल्पना नहीं की जा सकती। एक अलग भविष्य की कल्पना पर मज़ाक़ हावी है। और जब हमेशा की तरह कुछ दृढ़ लोग अलग भविष्यों को बनाने के अलग-अलग प्रयास करते हैं तो सत्ताधारी उन्हें कुचल देते हैं। यह व्यवस्था जेलों और घेटोज़ में 'डिस्पोज़ेबल (हटाए जा सकने वाले)' लोगों को बंद करके ऊपर से फ़ासीवाद फैलाती है तथा नस्लवादी, स्त्री द्वेषी, और ज़ेनोफ़ोबिक सामाजिक ताक़तों को बढ़ावा देकर ज़मीनी स्तर पर फ़ासीवाद फैलाती है। शक्तिशाली और धनी लोगों के लिए यही बेहतर है कि किसी तरह के विकल्प का कोई मॉडल पनपने नहीं दिया जाए। क्योंकि वैसा कोई भी मॉडल उनके इस दावे पर सवाल खड़ा करेगा कि दुनिया को चलाने वाली मौजूदा व्यवस्था शाश्वत है, और इतिहास का अंत हो चुका है।

टीबीटी: ब्रेख्त

जर्मनी में नाज़ियों के सत्ता में आने के बाद नाटककार बर्टोल्ट ब्रेख्त ने स्वेन्दबोर्ग (डेनमार्क) में शरण ली। वहाँ पर, 1938 में, ब्रेख्त ने एक कविता लिखी जिसमें वो कहते हैं कि अव्यवस्था पर ध्यान केंद्रित करने और एक अलग भविष्य के लिए रास्ता बनाने का समय आ गया है:

केवल बढ़ती अव्यवस्था के कारण
हमारे वर्ग संघर्ष के शहरों में
हम में से कुछ ने अब ठान लिया है
कि समंदर के किनारे बसे शहरों, छतों पर जमी बर्फ़, औरतों
तहख़ानों में पके सेबों की महक, बदन में होने वाली अनुभूतियों, 
और वो सब कुछ जो आदमी को चहूँमुखी और इंसान बनाता है पर बात नहीं कर 
भविष्य में केवल अव्यवस्था के बारे में बात करेंगे
और इस तरह से बन जाएँगे एकतरफ़ा, छोटे
उलझ जाएँगे राजनीति और शुष्क, अशोभनीय शब्दावली
द्वंद्वात्मक अर्थशास्त्र के व्यापार में
ताकि 
हिमपात (वे केवल ठंडे नहीं होते, हम जानते हैं) और शोषण 
फुसलाए गए शरीरों और वर्ग न्याय का भयानक सह-अस्तित्व
पैदा नहीं कर सके
इतनी बहुपक्षीय दुनिया में अपने लिए स्वीकृति;
रक्तरंजित जीवन के अंतर्विरोधों में ख़ुशी
आप समझ रहे हैं।


हमारा जीवन रक्तरंजित है। हमारी कल्पनाएँ जमी हुई हैं। अव्यवस्था को तोड़ कर बाहर निकलना बेहद ज़रूरी है। जूते पहने या बिना जूतों के पैर, पके फलों की महक और समंदर के किनारे बसे शहरों की ओर कूच करें।

Increasing Disorder
World Health Organisation
WHO
World Bank
COVID-19

Related Stories

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

महामारी के दौर में बंपर कमाई करती रहीं फार्मा, ऑयल और टेक्नोलोजी की कंपनियां

विश्व खाद्य संकट: कारण, इसके नतीजे और समाधान

महामारी में लोग झेल रहे थे दर्द, बंपर कमाई करती रहीं- फार्मा, ऑयल और टेक्नोलोजी की कंपनियां

कोविड मौतों पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट पर मोदी सरकार का रवैया चिंताजनक

महंगाई की मार मजदूरी कर पेट भरने वालों पर सबसे ज्यादा 

जनवादी साहित्य-संस्कृति सम्मेलन: वंचित तबकों की मुक्ति के लिए एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप

कोरोना अपडेट: देश में एक हफ्ते बाद कोरोना के तीन हज़ार से कम मामले दर्ज किए गए

दिल्लीः एलएचएमसी अस्पताल पहुंचे केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मंडाविया का ‘कोविड योद्धाओं’ ने किया विरोध

WHO और भारत सरकार की कोरोना रिपोर्ट में अंतर क्य़ों?


बाकी खबरें

  • Fab and Ceat
    सोनिया यादव
    विज्ञापनों की बदलती दुनिया और सांप्रदायिकता का चश्मा, आख़िर हम कहां जा रहे हैं?
    23 Oct 2021
    विकासवादी, प्रगतिशील सोच वाले इन विज्ञापनों से कंपनियों को कितना फायदा या नुकसान होगा पता नहीं, लेकिन इतना जरूर है कि ये समाज में सालों से चली आ रही दकियानुसी परंपराओं और रीति-रिवाजों के साथ-साथ…
  • Georgia
    एम. के. भद्रकुमार
    बाइडेन को रूस से संबंध का पूर्वानुमान
    23 Oct 2021
    रूसी और चीनी रणनीतियों में समानताएं हैं और संभवतः उनमें परस्पर एक समन्वय भी है। 
  • Baghjan Oilfield Fire
    अयस्कांत दास
    तेल एवं प्राकृतिक गैस की निकासी ‘खनन’ नहीं : वन्यजीव संरक्षण पैनल
    23 Oct 2021
    इस कदम से कुछ बेहद घने जंगलों और उसके आस-पास के क्षेत्रों में अनियंत्रित ढंग से हाइड्रोकार्बन के दोहन का मार्ग प्रशस्त होता है, जो तेल एवं प्राकृतिक गैस क्षेत्र में कॉर्पोरेट दिग्गजों के लिए संभावित…
  • Milton Cycle workers
    न्यूज़क्लिक टीम
    वेतन के बग़ैर मिल्टन साइकिल के कर्मचारी सड़क पर
    23 Oct 2021
    सोनीपत के मिल्टन साइकिल कंपनी के कर्मचारी पिछले छह महीने से अपनी तनख़्वाह का इंतज़ार कर रहे है। संपत्ति को लेकर हुए विवाद के बाद मिल्टन के मालिकों ने फ़ैक्ट्री बंद कर दी लेकिन कर्मचारियों का न वेतन…
  • COVID
    उज्जवल के चौधरी
    100 करोड़ वैक्सीन डोज़ : तस्वीर का दूसरा रुख़
    23 Oct 2021
    एक अरब वैक्सीन की ख़ुराक पूरी करने पर मीडिया का उत्सव मनाना बचकाना तो है साथ ही गलत भी है। अब तक भारत की केवल 30 प्रतिशत आबादी को ही पूरी तरह से टीका लगाया गया है, और इस आबादी में से एक बड़ी संख्या ने…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License