NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
कोरोना समय में शराब पर कुछ होशमंद बातें
क्या ऐसा नहीं लगता कि राज्य को शराब से होने वाली कमाई का नशा लग गया है? और यह नशा एक आम आदमी को लगे शराब के नशे से ज़्यादा है?
अजय कुमार
10 May 2020
 शराब
Image courtesy: Times of India

किराने की दुकान पर चीनी खरीदने गया था। दुकानदार से बात करते हुए एक व्यक्ति ने कहा कि शराब की दुकान खोल दी गयी है लेकिन हम गोलगप्पे वाला का क्या? उसकी यह बात सुनते ही हंसी आयी। इस हंसी के बाद कुछ सोचता, उससे पहले उस व्यक्ति ने कहा कि भलाई का तो जमाना ही नहीं रहा, सरकार तो भलाई के बारे में सोचती ही नहीं है। यह बात खट से लग गयी। सोचने लगा सरकार का बेसिक काम लोक कल्याण होता है। लेकिन जब सरकार केवल उपयोगिया की नजर से नागरिक को देखने लगे तो कैसा हो? कैसा हो जब सरकार केवल फायदे- नुकसान के लिहाज से अपने नागरिकों को देखने लगे? शराब बिक्री से सरकार को मिलने वाले अकूत राजस्व की वजह से शराब की दुकान खोल दी गयी लेकिन गोलगप्पे की नहीं। क्या ऐसा नहीं लगता कि राज्य को शराब से होने वाली कमाई का नशा लग गया है? और यह नशा एक आम आदमी को लगे शराब के नशे से ज्यादा है?

इस लॉकडाउन के दौरान 4 मई को कंटेनमेंट ज़ोन को छोड़कर दूसरे जगहों पर शराब बिक्री का आदेश जारी कर दिया गया। शराब की दुकानों पर लोगों की लम्बी लाइन लगने लगी। सोशल डिस्टेन्सिंग का कोई पालन नहीं किया गया। जैसे कि आसार थे वैसे ही हुआ। तकरीबन 40 दिन के बाद शराब के लिए जो लाइन लगी, उसे भगदड़ में तब्दील होने में तनिक देर न लगी।  

जिस तरह का माहौल शराब की दुकान पर देखने को मिला, उससे कोरोना संक्रमण फैलने का खतरा अधिक दिखने लगा। दिल्ली सरकार ने शराब पर 70 फीसदी अतरिक्त टैक्स लगा दिया। फिर भी भीड़ कम नहीं हुई। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली गयी कि शराब पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाए, नहीं तो शराब बिक्री की वजह से कोरोना फैलने की सम्भावना अधिक है। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर फैसला दिया है कि शराब बिक्री पर प्रतिबन्ध लगाना या न लगाना सरकार की नीति से जुड़ा हुआ मामला है। इस पर फैसला करने की जिम्मेदारी सरकार की है। फिर भी अभी के लिए सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया है कि राज्य सरकार शराब की ऑनलाइन बिक्री की व्यवस्था करें ताकि सोशल डिस्टेन्सिंग बनी रहे और कोरोना के संक्रमण से बचा जाए।  

समझ की दुनिया में कहा जाता है कि हर संकट अवसर भी लेकर आता है। ख़बरों की दुनिया में हम यह काम हर रोज करते है। एक ख़बर के सहारे बड़ी परेशानी पर बात करने की कोशिश करते हैं। तो आइये, तालाबंदी के दौर में शराब को लेकर आ रही खबरों को भी एक उचित पृष्ठभूमि देने की कोशिश करते हैं:  

पहले शराब की वजह से होने वाली परेशानियों को आँकड़ों से समझते हैं। साल 2019 में भारत सरकार के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने देशस्तर के व्यापक सर्वेक्षण के आधार पर मैग्नीट्यूड ऑफ सब्स्टांस यूज़ इन इंडिया नाम से एक बड़ी रिपोर्ट प्रकाशित की। इस रिपोर्ट को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के भारत में बढ़ती शराब की खपत के नये आंकड़ों तथा ग्लोबल स्टेटस् रिपोर्ट ऑन अल्कोहल एंड हेल्थ के साथ मिलाकर पढ़ें तो शराबखोरी की समस्या और उसके स्वभाव के बारे में पता चलता है।

इस सिलसिले की पहली बात यह कि शराब की खपत हमारे सोच से कहीं ज्यादा है: तकरीबन 33 फीसद बालिग पुरुष (लेकिन 2 फीसद से भी कम बालिग महिलाएं) शराब पीते हैं। छत्तीसगढ़, त्रिपुरा, पंजाब, अरुणाचल, गोवा तथा उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में शराब पीने वाले बालिग पुरुषों का अनुपात 50 प्रतिशत से भी ज्यादा है। 10-17 साल के आयुवर्ग के लगभग 25 लाख बच्चे शराब पीते हैं। दूसरी बात, भारत में ‘पीने’ का मतलब होता है वाइन या बीयर जैसी हल्की शराब नहीं बल्कि स्पिरिट वाली शराब (हार्ड ड्रिंक) पीना ( कुल अल्कोहल-उपभोग में हार्ड ड्रिंक्स का वैश्विक औसत 44 प्रतिशत का है जबकि भारत में 92 प्रतिशत)। इससे सेहत से जुड़े जोखिम बढ़ते हैं। तीसरी बात, भारत में शराब पीने वाला हर व्यक्ति सालाना औसतन 18.3 लीटर शराब पी जाता है जबकि वैश्विक औसत इससे कम है। इतनी शराब पीने का मतलब हुआ 50 ग्राम शुद्ध अल्कोहल यानी पांच पेग रोजाना।

भारत में ज्यादा अल्कोहल वाली शराब पीने वालों का अनुपात 55 फीसद है और यह तादाद भी वैश्विक औसत से ज्यादा है। चौथी बात, लगभग 5.7 करोड़ यानी एक तिहाई शरोबखोर या तो इस व्यसन के आदी हो चुके हैं या फिर उन्हें अपनी लत का नुकसान भुगतना पड़ रहा है। ऐसे लोगों को मदद की ज़रूरत है लेकिन इनमें से मात्र 3 फीसद को किसी किस्म की चिकित्सीय या मनोवैज्ञानिक मदद हासिल हो पाती है।

इस सिलसिले की आखिरी बात यह कि शराबखोरी का सेहत पर सीधा असर हो रहा है, आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं। देश में हर साल कम से कम 2.6 लाख की तादाद में लोग शराब पीने के कारण हुए लीवर के रोग, कैंसर या फिर दुर्घटना से मृत्यु के शिकार होते हैं।

इसके अलावा भी तमाम तरह की बीमारियां शराब की लत की वजह से घेर लेती हैं। सेहत का नुकसान तो है ही, आर्थिक और सामाजिक नुकसान भी बहुत भुगतना पड़ता है। ख़ासकर गरीबों को। नशे की लत का शिकार व्यक्ति अपने परिवार की आमदनी का 20 से 50 प्रतिशत तक सिर्फ शराबखोरी पर उड़ा देता है। इन आकंड़ों के बाद आप समझ सकते हैं कि क्यों रोजाना शराब की वजह से मारपीट की खबरें अख़बारों में छपती हैं।

सामाजिक स्तर पर देखें तो नज़र आयेगा कि परिवार के पुरुषों की शराबखोरी की लत के नतीजे महिलाओं को भुगतने होते हैं। पत्नी और बच्चों के साथ मार-पीट, सामाजिक हिंसा, यौन-दुर्व्यवहार, पारिवारिक कलह, रिश्तों में टूटन और बच्चों की उपेक्षा जैसी कई बातें शराबखोरी के मामले में देखने को मिलती हैं। अचरज नहीं कि ज्यादातर महिलाएं शराबखोरी की लत से नफ़रत करती हैं। इन तथ्यों के सहारे आप समझ सकते हैं कि शराब की खपत का हर लीटर सेहत और सामाजिक जीवन के लिहाज से गरीबों पर कहीं ज्यादा भारी पड़ता है।  

भारत के अभिजात्य बुद्धिजीवी वर्ग ने शराब पर सोचना ही बंद कर दिया है। हां, शराब पीकर ज़रूर सोचा जाता है। यह उनके सोशल स्टेट्स का हिस्सा है। यही हाल आज के नौजवानों का है। बहुत से नौजवान शराब को अपनी जिंदगी में किसी मसीहा की तरह देखते हैं। कई नौजवान तो शराब इसलिए पीते हैं कि वह अमुक ग्रुप का हिस्सा होना चाहते हैं यानी शराब पीना किसी ग्रुप में शामिल होने के लिए एक तरह से सदस्यता की तरह भी होता है। हमारे देश में तो पीने-पिलाने को मर्दानगी से भी जोड़ा जाता है। इसलिए नौजवान जल्दी इसकी ओर आकर्षित होते हैं और इसका प्रदर्शन भी करते हैं। और सरूर तो है ही एक सच्चाई।

इसलिए लॉकडाउन में गोलगप्पे की दुकान पर विचार तक नहीं किया गया और शराब की दुकान खोलने के मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया।

इन बातों के अलावा अब शराब पर थोड़ा दूसरे ढंग से सोचते हैं।

सबसे पहला और ज़रूरी सवाल उठता है कि खान-पान पर नियंत्रण क्यों? संविधान हमें आज़ादी से जीने का हक देता है, इस पर नियंत्रण लगाने के बारे में क्यों सोचा जाए। और किसी बालिग व्यक्ति पर तो ये रोक क्यों ही लगाई जाए, जबकि वह अपना अच्छा-बुरा अच्छे से समझता है। यह बहुत मजबूत तर्क है। इसको आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता है। इस सवाल का बहुत ही माकूल जवाब प्रोफेसर प्रताप भानु मेहता इंडियन एक्सप्रेस में लिखते हैं ''उदारवादियों की यह चिंता बहुत जायज है कि राज्य उनके निजी जीवन और निजी नैतिकता में हस्तपेक्ष न करे। राज्य को ऐसा अधिकार देने का मतलब होगा व्यक्ति की व्यक्तिगत गरिमा और आज़ादी को नुकसान पहुँचाना। लेकिन उदरवाद का एक सबसे बड़ा विरोधभास है कि समाज में आज़ादी तभी सुसंगत तरीके से फैलती है, जब एक व्यक्ति खुद को न्याय की तराजू पर तौलते हुए आत्म-नियंत्रित करना जानता हो।

किसी भी तरह की  अभिव्यक्ति की स्वंत्रतता पर राज्य का प्रतिबन्ध नाजायज है। लेकिन किसी भी तरह की स्वंत्रतता तभी अच्छे फल-फूल सकती है जब व्यक्ति में आत्म -अंकुश की आदत हो। जैसे सेक्सुअलिटी एक निजी मसला है, जिस पर राज्य का नियंत्रण नहीं होना चाहिए लेकिन जब ‘बॉयज लॉकर रूम’ जैसी घटनाएं घटती हैं तो समाज की कमियां भी सामने आ जाती है। इसलिए राज्य को कुछ कदम उठाने की जरूरत पड़ती है। ठीक ऐसे ही 'पीने के अधिकार' पर हस्तक्षेप करना बिलकुल गलत है। लेकिन पीने का अधिकार एक सामाजिक बुराई में बदल जाए और राज्य कुछ भी न करे तो इसका भी बहुत अधिक नुकसान है। लेकिन मेरे किसी भी तर्क का यह मतलब नहीं है कि राज्य द्वारा शराब को बैन कर दिया जाए।''

Coronavirus
COVID-19
Lockdown
Liquor shop open
Liquor shops
Social Distancing
Central Government
State Government
Supreme Court

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में 2,745 नए मामले, 6 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,685 नए मामले दर्ज

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,710 नए मामले, 14 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में फिर से बढ़ रहा कोरोना का ख़तरा


बाकी खबरें

  • इज़रायल और क़ब्ज़े वाले फ़िलिस्तीनी क्षेत्रों में मानवाधिकारों के उल्लंघन की जांच के लिए तीन सदस्यीय आयोग गठित
    पीपल्स डिस्पैच
    इज़रायल और क़ब्ज़े वाले फ़िलिस्तीनी क्षेत्रों में मानवाधिकारों के उल्लंघन की जांच के लिए तीन सदस्यीय आयोग गठित
    23 Jul 2021
    तीन सदस्यीय जांच आयोग का नेतृत्व नवी पिल्ले करेंगे जो 2008-2014 के बीच यूएनएचआरसी के प्रमुख थे।
  • 400 से अधिक पूर्व राष्ट्राध्यक्षों, बुद्धिजीवियों की अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन से क्यूबा पर लगा प्रतिबंध हटाने की मांग
    पीपल्स डिस्पैच
    400 से अधिक पूर्व राष्ट्राध्यक्षों, बुद्धिजीवियों की अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन से क्यूबा पर लगा प्रतिबंध हटाने की मांग
    23 Jul 2021
    400 से अधिक हस्तियों द्वारा हस्ताक्षरित एक खुला पत्र अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के दौरान क्यूबा पर लगाए गए 243 एकतरफ़ा प्रतिबंधों को हटाने की मांग करता है जिसने इस द्वीप…
  • अध्ययन के मुताबिक भारत में कोरोनावायरस की दूसरी लहर ‘विभाजन के बाद की सबसे भयावह त्रासदी’, सरकार ने किया आंकड़े से इंकार
    दित्सा भट्टाचार्य
    अध्ययन के मुताबिक भारत में कोविड-19 की दूसरी लहर ‘विभाजन के बाद सबसे बड़ी त्रासदी’, सरकार का आंकड़े से इंकार
    23 Jul 2021
    रिपोर्ट में कहा गया है, “वास्तविक मौतों का आंकड़ा कई लाखों में होने का अनुमान है, न कि कुछ लाख में, जो इसे यकीनन विभाजन और स्वतंत्रता के बाद से भारत की सबसे भयावह मानवीय त्रासदी बना देता है।” 
  • अयोध्या में बीएसपी के कार्यक्रम का पोस्टर। बीएसपी नेता सतीश चंद्र मिश्रा के ट्विटर हैंडल से साभार
    असद रिज़वी
    दलित+ब्राह्मण: क्या 2007 दोहरा पाएगी बीएसपी?
    23 Jul 2021
    पार्टी अपने 2007 के सोशल इंजीनियरिंग के प्रयोग को दोहराने की कोशिश कर रही है, लेकिन ये इस बार इतना आसान नहीं होगा। एक विश्लेषण...
  • ज़मीन और आजीविका बचाने के लिए ग्रामीणों का विरोध, गुजरात सरकार वलसाड में बंदरगाह बनाने पर आमादा
    दमयन्ती धर
    ज़मीन और आजीविका बचाने के लिए ग्रामीणों का विरोध, गुजरात सरकार वलसाड में बंदरगाह बनाने पर आमादा
    23 Jul 2021
    वलसाड में उमरागाम तालुक के स्थानीय लोग प्रस्तावित बंदरगाह के निर्माण का विरोध 1997 से ही करते आ रहे हैं, जब पहली बार इसकी घोषणा की गई थी। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License