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विशेष : ज़माने ने रत्ती को बहुत कम आँका!
सन् 1928 में जब जिन्ना को सर की उपाधि देने की बात चली थी तो रत्ती ने यहाँ तक कहा था कि मेरे पति ने सर का ख़िताब मंज़ूर किया तो मैं उनसे तलाक़ ले लूँगी। रत्ती यानी रतनबाई पेटिट का आज, 20 फरवरी को जन्मदिन और पुण्यतिथि दोनों है। विशेष आलेख...
नाइश हसन
20 Feb 2020
Ruttie
फोटो साभार : गूगल

एक तरफ बम्बई (मुम्बई) में आज़ादी आंदोलन की धड़कने तेज़ होती जा रहीं थी, दूसरी तरफ ईरान के कई पारसी परिवार इस्लाम स्वीकार करने के दबाव से आज़ाद होकर अपने मूल धर्म की रक्षा के लिए ईरान से बम्बई आकर बसते जा रहे थे। मशहूर पारसी उद्योगपति सर मानक जी दिनशा पेटिट का परिवार भी उसी में से एक था। उनके घर 20 फरवरी सन् 1900 को रतनबाई पेटिट का जन्म हुआ। प्यार से सब उन्हें रत्ती बुलाते थे। रत्ती एक बेहद खूबसूरत और तेज दिमाग़ बच्ची थी। शुरू से ही वह अपनी उम्र से कही अधिक मेधावी थी।

बचपन से ही कला, साहित्य, में उनकी गहरी रूचि के संकेत मिलने लगे थे और उन्होंने बहुत छोटी उम्र में ही बहुत अध्ययन कर लिया था। उस वक्त के माहौल में भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन को मजबूती देने के सिलसिले में उनके घर दादाभाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता, मैडम भीकाजी कामा, बदरूद्दीन तैयबजी, गोपाल कृष्ण गोखले, ऐनी बेसेन्ट, सरोजनी नायडू, मुहम्मद अली जिन्ना, अतिया फैज़ी जैसे बड़े लोगों का आना जाना लगा रहता था। उनकी बातचीत बहस मुबाहिसे को रत्ती बहुत ग़ौर से सुनती थी।

किशोरावस्था में राजनीतिक बैठकों में वो अक्सर अपनी बुआ मामा बाई पेटिट के साथ जाया करती थी। इसका असर उनपर ये हुआ कि वह आज़ाद भारत का ख्वाब देखने लगीं। सार्वजनिक स्थलों तक तमाम बहस मुबाहिसों में हिस्सा लेने लगीं। इसी गहमागहमी में उनकी जिन्दगी में कब एक मोहब्बत परवान चढ़ने लगी किसी को पता ही नही चला। 16 साल की रत्ती और 40 साल के जिन्ना जो रत्ती के पिता के हमउम्र दोस्त थे के बीच एक अनकहा मधुर सम्बन्ध आकार लेने लगा।

सामाजिक, राजनीतिक, औद्योगिक क्षेत्र में बम्बई के अनेक दिग्गजों के बीच जिन्ना का व्यक्तित्व एकाधिक कारणों से विशिष्ट था। सुरूचिपूर्ण पाश्चात्य जीवनशैली, सुसंस्कृत व्यवहार, प्रखर राष्ट्रवाद, हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रबल समर्थन, सफल वकील, सुन्दर व्यक्तित्व उन्हें अपने समकालीनों से सर्वथा अलग पहचान प्रदान करता था। जिन्ना की मोहब्बत और आज़ाद हिन्दुस्तान की चाहत में रत्ती अब हर सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल होने लगी थीं।

ruttie and jinnah.jpg

मोहम्मद अली जिन्ना और रत्ती। फोटो साभार : telegraphindia

 20 फरवरी, 1918 को जब पेटिट परिवार में रत्ती के अट्ठारहवें जन्मदिन को धूमधाम से मनाने की तैयारियां चल रही थीं, उसी दिन 18 की होते ही वह पिता का घर छोड कर जिन्ना के पास चली गईं थी।

रत्ती ने 1919-1920 में कांग्रेस के कलकत्ता और नागपुर अधिवेशन में बढ़चढ़ कर भाग लिया था। रौलट कानून का विरोध और उसके कुछ ही अरसे बाद आल इण्डिया ट्रेड यूनियन का पहला अधिवेशन हुआ। अधिवेशन में रत्ती ने बहुत धाराप्रवाह और ओजस्वी भाषण दिया जिसे मुम्बई के हल्कों में अरसे तक याद किया जाता रहा। अंग्रेजों की गुलामी के प्रति अपने गुस्से को कई मौकों पर उन्होंने जाहिर किया था।

रत्ती की हाज़िरजवाबी अंग्रेजों को बहुत चुभती थी। शिमला अधिवेशन में उन्होंने वॉयसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड का अभिवादन हाथ जोड़ कर किया। प्रोग्राम के ख़त्म होने पर चेम्सफोर्ड ने अपनी रौबीली और गुस्सैल आवाज में कहा- मिसेज जिन्ना आप के पति का सियासी मुस्तकबिल बहुत शानदार है, इसलिए आप जहाँ हैं उसी के मुताबिक व्यवहार करें। ‘इन रोम यू मस्ट डू एज़ रोमन डू’। उन्होंने बहुत नरमी और अदब से फौरन ही एक सख्त जवाब दिया, ‘ठीक वही तो किया है मैंने, हिन्दुस्तान में मैंने आपका अभिवादन हिन्दुस्तानी ढंग से ही तो किया।’ इस जवाब ने लॉर्ड चेम्सफोर्ड को खामोश कर दिया।

इसी तरह सन् 1921 में लॉर्ड रीडिंग हिन्दुस्तान के वॉयसराय थे। उन्होंने एक बार रत्ती से कहा कि उनके मन में जर्मनी जाने की बहुत इच्छा है, पर वह वहाँ जा नहीं सकते। रत्ती ने पूछा ऐसा क्यों? उन्होंने जवाब दिया कि जर्मन हम अंग्रेजों को पसन्द नहीं करते। इसलिए मैं वहाँ जा नहीं सकता। इस पर हाजिरजवाब रत्ती ने सहज भाव से लॉर्ड रीडिंग से पूछा- ‘महामहिम फिर आप यहाँ कैसे आ गए?’ रत्ती के इस प्रश्न का व्यंग्यार्थ रीडिंग फौरन समझ गए।

सन् 1928 में जब जिन्ना को सर की उपाधि देने की बात चली थी तो रत्ती ने यहाँ तक कहा था कि मेरे पति ने सर का ख़िताब मंज़ूर किया तो मैं उनसे तलाक़ ले लूँगी।

शेक्सपियर ने बड़े बेहतरीन अंदाज में एक बात कही है ‘मर्द जब प्यार करते हैं तो बसन्त होते हैं और शादी होते ही शीत ऋतु में बदल जाते हैं।’ कुछ ऐसा ही जिन्ना के साथ भी था। रत्ती अपनी शामें जिन्ना के साथ गुज़ारना चाहती थीं। प्रेम की जो रसधार रत्ती के उनकी जिन्दगी में आने से फूट पड़ी थी वो जिन्ना की बेरूखी, कड़कमिजाजी, और रूखेपन से खत्म होने लगी। धीरे-धीरे नतीजा ये हुआ कि उपेक्षित रत्ती 1928 में मुम्बई के ताज होटल में रहने लगीं। उस वक्त देश में साम्प्रदायिक ज़हर अपने उफान पर था। अख़बारों के जरिए रत्ती को जिन्ना के बदलते रातनीतिक तेवर, और उनके साम्प्रदायिक राजनीति के प्रति बढ़ते रुझान का पता चलने लगा था।

रत्ती को इन ख़बरों ने अन्दर तक खोखला कर दिया था। वह व्यथित रहने लगीं थी। वो जिन्ना को इस ओर मुड़ता देख बेचैन हो उठीं थी। जिन्ना में इस अप्रत्याशित बदलाव ने रत्ती का कलेजा तार-तार कर दिया था। फिक्र की इस हद ने उनके फेफड़े  क्षतिग्रस्त कर दिए थे। शायद रत्ती जिन्ना के जीवन में कुछ और वक्त तक बनी रहतीं तो सम्भवतः जिन्ना इतनी तेजी से साम्प्रदायिक राजनीति की ओर उन्मुख न हुए होते। गाँधी जी के साथ रत्ती के पत्र व्यवहार का सिलसिला कभी नहीं टूटा। उन्होंने गाँधी जी का साथ हमेशा दिया, आर्थिक सहयोग भी बड़े पैमाने पर किया।

जिन्ना की जिद उन्हें रत्ती और वतनपरस्ती से कहीं दूर लेकर चली जा रही थी। जिसे रत्ती बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी। दूर रहते हुए भी ये फिक्र उनका पीछा नही छोड़ रही थी। वह कमजोर होने लगीं। दबे पाँव मौत रत्ती की तरफ बढ़ी चली आ रही थी और इस सूनेपन से लड़ते हुए 20 फरवरी 1929 को 29 साल की उम्र में एक ज़हीन, हिम्मतवर, खुशदिल, प्रतिभासम्पन्न युवती जिसे देश को गुलामी से मुक्त देखने की ख़्वाहिश थी, हमेशा के लिए सो गईं। मुम्बई के थाना में उनकी मज़ार है जहाँ अब कोई फातेहा पढ़ने वाला भी नहीं जाता। ज़माने ने रत्ती के योगदान को जिन्ना के बड़े क़द के आगे आसानी से भुला दिया। इत्तेफाकन 20 फरवरी उनकी पैदाइश और मौत दोनों का दिन है।

औरतों को आसानी से भुला दिया जाता है। उनके योगदान को कम आँका जाता है। रत्ती से अलग होकर जिन्ना ने जो किया वो आज तक और शायद रहती दुनिया तक एक नासूर ही बना रहेगा। जिसकी पीड़ा सभी हिन्दुस्तानी भुगत रहे हैं। जहाँ पाकिस्तान ने रत्ती को जिन्ना की काफिरा बीवी कह कर हिकारत की नज़रों से देखा, वहीं हिन्दुस्तान ने भी रत्ती को आसानी से भुला दिया। उन्हें स्वतन्त्रता सेनानी का दर्जा तक नसीब नहीं हुआ जिसकी वो हकदार थीं। रत्ती की उलझी सी जिन्दगी की ये बस एक मुख्तसर पेशकश है। उस प्रतिभावान देशभक्त महिला को हम अपनी खिराजेअक़ीदत पेश करते हैं।

सन्दर्भ: जिन्ना एक पुनर्दृष्टि: वीरेन्द्र कुमार बरनवाल

रोजे़ज इन दिसम्बर: करीम छागला 1973

मिस्टर एंड मिसेस जिन्ना ए बायोग्राफी: शीला रेड्डी

रत्ती जिन्ना: ख्वाजा रज़ी हैदर 

यंग इंडिया पत्रिका 1920

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता व रिसर्च स्कॉलर हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।)
Ruttie
Rattanbai Jinnah
Muhammad Ali Jinnah
Pakistan
india-pakistan
Communalism

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