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भारत
राजनीति
कोविड-19 : मोदी के ‘आगरा मॉडल’ का खोखलापन दिख रहा है
मंगलवार को, उत्तर प्रदेश के पर्यटक शहर आगरा में जहाँ शानदार ताजमहल है और एक हॉटस्पॉट भी है, में कोविड-19 के 15 नए मामले सामने आए हैं।
अब्दुल अलीम जाफ़री
29 Apr 2020
Translated by महेश कुमार
agra taj

लखनऊ: ख़बरों के अनुसार उत्तर प्रदेश के कई जिलों में फैले कोरोनोवायरस में कथित तौर पर कुछ सुधार हो रहा है, लेकिन पर्यटक हॉटस्पॉट, आगरा में केसों की संख्या में वृद्धि हो रही है। मंगलवार को, ताजमहल के इस शहर में कम से कम 15 कोविड-19 के नए मामले सामने आए हैं, इसे मिलाकर जिले में इस तरह के कुल मामले 401 हो गए हैं जो पूरे राज्य में सबसे अधिक तो है ही साथ ही देश में भी यह 11 वें स्थान पर आ गया है।

स्थिति की गंभीरता का पता आगरा के मेयर नवीन जैन द्वारा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ को लिखे पत्र से चल जाता है, ज़िला प्रशासन की चेतावनी के मुताबिक आगरा में स्थिति खतरनाक है और अगर इस पर वक़्त रहते ठीक से काबू नहीं पाया गया तो यह शहर भारत का "वुहान" बन सकता है। वुहान वह चीनी शहर है जहां सबसे पहले वायरस के संक्रमण की ख़बर मिली थी, और वह संक्रमण का एक बड़ा केंद्र बन गया था।

21 अप्रैल को लिखे इस पत्र में, आदित्यनाथ से 'आगरा को बचाने’ का अनुरोध किया गया है। जैन ने अपने पत्र में लिखा, "मैं यह पत्र बहुत ही दुखी मन से लिख रहा हूं क्योंकि मेरा आगरा बहुत अधिक समस्याओं के दौर से गुजर रहा है। आगरा को बचाने के लिए साहसिक निर्णय लेने की जरूरत है, यहाँ स्थिति बहुत ही गंभीर हो गई है। इसलिए, में हाथ जोड़कर विनती करता हूँ कि कृपया मेरे आगरा को बचा लें।” यह पत्र कहित तौर पर लीक हो गया था।

स्थिति नियंत्रण के बाहर 

संयोग की बात है कि महीने की शुरूआत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना वायरस के प्रसार को आगरा के "क्लस्टर में सफल रोकथाम" के लिए "आगरा मॉडल" की सराहना की थी और अन्य राज्यों से इसका पालन करने की अपील की थी। लेकिन जो लोग हॉटस्पॉट्स (रेड ज़ोन) में रह रहे हैं उनके मुताबिक यहाँ का जीवन बहुत ही कठिन हो गया है क्योंकि वहाँ किराने का सामान, सब्जियां, फल या अन्य दैनिक घरेलू सामान बेचने वाली दुकानें नहीं खुल रही हैं। 10 अप्रैल को सील किए गए जगदीशपुरा क्षेत्र के निवासी नमित सोदिया ने न्यूजक्लिक को फोन पर बताया कि हॉटस्पॉट क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को दरवाजे पर सब्जी, दूध या अन्य किसी भी तरह की आवश्यक आपूर्ति नहीं मिल रही है। उन्होंने कहा, "लोग किसी तरह चुपके से पास की इन गलियों से समान खरीदते हैं, जो कि रेड़ ज़ोन का हिस्सा नहीं है, और वहाँ से अपनी आवश्यकता के अनुसार  खरीद कर सकते हैं। उन्हौने सवाल दागा कि आखिर यह कब तक जारी रहेगा?"

आगरा स्थित मानवाधिकार कार्यकर्ता, नरेश पारस ने दावा किया है कि: "आगरा में स्थिति नियंत्रण के बाहर चली गई है क्योंकि सभी क्लीनिकों और निजी अस्पतालों में सामान्य रोगियों का इलाज नहीं किया जा रहा है और यदि कोई मरीज किसी सरकारी अस्पताल में जाता है, तो उसे पहले कोरोना की जाँच कराने के लिए कहा जाता है। इस वजह से, अस्पताल की लापरवाही के चलते कई लोग अपनी जान से हाथ धो चुके हैं।"

शहर के बिगड़ते हालात पर चर्चा करने के लिए मंगलवार को किसान नेता श्याम सिंह चाहर, समाजसेवी प्रदीप शर्मा और लाखन सिंह त्यागी, ज़िलाधिकारी (डीएम), आगरा से मिलने गए और वापसी पर उन्हौने न्यूज़क्लिक को बताया, कि “ज़िला प्रशासन लोगों का डेटा छिपा रहा है लोग तो हर दिन मर रहे हैं। मुझे पूरा यकीन है कि अगर सही ढंग से जांच की जाती है तो आगरा में करीब 10,000 से अधिक लोग संक्रमित पाए जाएंगे। हर दिन लगभग 10-20 लोग मर रहे हैं, लेकिन न तो मौत के पीछे का विवरण और कारण बताए जा रहे हैं और न ही उनका पोस्टमार्टम किया जा रहा है।"

कोरोनोवायरस हॉटस्पॉट क्षेत्रों में लोगों को आवश्यक वस्तुओं को मुहैया कराए जाने के बारे में पूछे जाने पर, चाहर ने आरोप लगाया कि सरकार भोजन पर एक भी रुपया खर्च नहीं कर रही है, बल्कि सामाजिक कार्यकर्ता और गैर सरकारी संगठन जरूरतमंदों को खाना खिला रहे है। उन्होंने दावा किया कि अगर, "सामाजिक कार्यकर्ता और एनजीओ गरीबों की मदद के लिए अपने घरों से बाहर कदम नहीं रखते तो झुग्गी बस्तियों में रहने वाले कई लोग अब तक मौत का शिकार हो जाते। 

एक वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ और आगरा के इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) के पूर्व अध्यक्ष शरद गुप्ता ने न्यूजक्लिक को बताया कि, "आगरा में प्रशासन हैरान है क्योंकि उन्हें कोई आइडिया ही नहीं है कि उन्हे आखिर करना क्या है। 100 से ज्यादा कोविड-19 के पॉजिटिव केस अकेले पारस अस्पताल में हैं और इसे एक क्वारंटाईन केन्द् के साथ-साथ उचित जांच की क्षमताओं में तब्दील करने के बजाय, ज़िला प्रशासन ने अस्पताल के अंदर उपस्थित रोगियों, चिकित्सा कर्मचारियों के बारे में कुछ सोचे बिना अस्पताल को बंद कर दिया है।"

उन्होंने आरोप लगाया कि अस्पताल की लापरवाही के कारण अन्य जगहों पर भी कोरोना वायरस फैल गया है। सामाजिक दूरी के उल्लंघन की ओर इशारा करते हुए, गुप्ता ने सवाल किया कि जब प्रधानमंत्री ने सामाजिक दूरी की वकालत की थी, तो ज़िला प्रशासन ने पारस अस्पताल को क्यों बंद कर दिया, जहां 300 से अधिक लोग फंसे हुए थे?

उन्होंने कहा, "अस्पताल को बंद करने के बजाय, ज़िला प्रशासन को प्रत्येक व्यक्ति की जांच सुनिश्चित करनी चाहिए थी, लेकिन उन्होंने एक 'पिक एंड चूज' दृष्टिकोण अपनाया, जिसके कारण जिले में वायरस फैल गया।"

डॉक्टर ने यह भी आरोप लगाया कि ज़िला प्रशासन ने ऐसा इसलिए किया होगा क्योंकि वे नहीं चाहते कि कोविड-19 के पॉज़िटिव केसों की संख्या बढ़ती नज़र आए, क्योंकि इससे निवासियों में दहशत पैदा होगी। "ज़िला प्रशासन को केरल से सीखलेनी चाहिए कि वे कैसे आईसीएमआर और डब्लूएचओ दिशानिर्देशों का पालन कर रहे हैं और स्थिति को नियंत्रित करने में सक्षम हैं। यहां वे दिशानिर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा, यदि यह आगरा मॉडल है जिसे केंद्र देश भर में लागू करना चाहता है तो कल्पना करें कि देश की हालत क्या होगी।" 

इस बीच, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ऑफ आगरा के एक पूर्व अध्यक्ष ने प्रशासन पर आरोप लगाया कि ज़िला प्रशासन “आंकड़ों को छिपाने” के लिए पॉज़िटिव केसों को पड़ोसी फिरोजाबाद जिले में स्थानांतरित कर रहा है।

 

क्वारंटाईन केंद्रों की दुर्दशा 

इस बीच, उत्तर प्रदेश में क्वारंटाईन केंद्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी से इसोलेशन में रह रहे लोगों की मुश्किलें बढ़ रही है। बड़ी संख्या में लोग, जो आगरा में विभिन्न ठिकानों में कोविड -19 संक्रमण के संदेह के घेरे में हैं, ने अपर्याप्त भोजन और स्वच्छता सहित दयनीय सुविधाओं के मामले में भयानक  सूचना दी है। इन ठिकानों में हफ्तों से अधिक का समय बिताने के बावजूद उनमें से अधिकतम लोगों की अभी तक कोविड-19 जांच नहीं की गई है।

उत्तर प्रदेश के आगरा में एक क्वारंटाईन सुविधा से दो चौंकाने वाले वीडियो समाने आए हैं, जो सोशल मीडिया पर 26 अप्रैल से ‘आगरा मॉडल’ की धज्जियां उड़ाने का काम कर रहे हैं, ये वीडियो आगरा में एक कोरोनावायरस क्वारंटाईन केंद्र के भीतर के दृश्य को दिखाता है कि कैसे लोगों की बिस्कुट और पानी “फेंका’ जाता है, इस खुलासे के लिए यूपी सरकार ने जांच के आदेश दे दिए है।

आगरा टूरिज़्म एंड डेवलपमेंट फाउंडेशन के अध्यक्ष संदीप अरोड़ा, जो शहर में भोजन और राशन किट का वितरण कर रहे हैं, ने न्यूज़क्लिक को बताया, "यहां इस बात की कोई व्यवस्था नहीं है कि क्वारंटाईन केंद्रों को कैसे संचालित किया जाना चाहिए क्योंकि उनके पास कर्मचारी नहीं हैं। सरकार को सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) के माध्यम से खरीद पर फिर से काम करने की आवश्यकता है"-जबकि सरकार खुद जी यह काम कर अरही है। वे कानून और व्यवस्था का प्रबंधन भी करना चाहते हैं, हॉटस्पॉट क्षेत्रों पर नजर भी रखना चाहते हैं और भोजन भी वितरित करना चाहते हैं। हमारे पास भोजन तैयार करने के लिए पर्याप्त राशन किट है लेकिन प्रशासन हमें वितरित करने की अनुमति नहीं दे रहा है।”

अरोड़ा ने आरोप लगाते हुए कहा कि आगरा में अधिकांश क्वारंटाईन केंद्रों में वॉशरूम जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। उन्होंने कहा, "जब सब कुछ जैसे रुक सा गया है और मजदूर वापस अपने घरों के लिए रवाना हो गए, तो डीएम ने मुझसे क्वारंटाईन केंद्रों को स्थापित करने के लिए 500 कमरों की व्यवस्था करने को कहा। लेकिन, अब उनके पास व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण और मास्क भी नहीं हैं, तो क्वारंटाईन ठिकानों का क्या उपयोग है?"

न्यूजक्लिक ने पिछले हफ़्ते एक स्टोरी की थी जिसमें बताया गया था कि कैसे केसों में बढ़ोतरी के लिए आगरा के एक निजी अस्पताल को दोषी ठहराया जा रहा है।

 

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