NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
श्रीलंका संकट: दर्द भी क़र्ज़ और दवा भी क़र्ज़
दुनिया भर की: यह कोई आकस्मिक घटनाक्रम नहीं है। कोविड के दौर ने इसकी रफ़्तार और मार को भले ही थोड़ा तेज़ बेशक कर दिया हो लेकिन यह लंबे समय से चली आ रही नीतियों का नतीजा है। यह संकट उन तमाम अर्थव्यवस्थाओं के लिए है जो आयात पर बहुत ज्यादा निर्भर रहती हैं।
उपेंद्र स्वामी
29 Mar 2022
sri lanka
श्रीलंका में केरोसिन के लिए कतार में लगे लोग। फोटो साभार: रायटर्स

पिछले दिनों खबरें आ रही थीं कि किस तरह से श्रीलंका के लोग बढ़ती महंगाई के कारण अपने घरेलू खर्चों और यहां तक कि रोजमर्रा के खानपान में भी कटौती कर रहे हैं। एक लीटर पेट्रोल की कीमत तीन महीने में दोगुनी से भी ज्यादा हो चुकी है। इस कीमत पर भी पेट्रोल व केरोसिन हासिल करने के लिए इतनी लंबी कतारें लग रही हैं कि श्रीलंका सरकार को गैस स्टेशनों पर स्थिति को काबू में रखने के लिए सेना की टुकड़ियों को भेजा है। कतारों में लगे वृद्ध लोगों की जानें गई हैं और किल्लत से परेशान लोगों के बीच हिंसा की घटनाएं हुई हैं।

हालत किस तरह से बिगड़ चुकी है इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वहां के दो प्रमुख अखबारों ने न्यूजप्रिंट न मिलने के कारण अपने प्रिंट संस्करण अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिए। अब जरा सोचिए कि जिन संस्थाओं के पास इन मुश्किल दिनों की खबरें लोगों तक पहुंचाने का जिम्मा हो, वो खबरें ही न छाप सकें।

यह संकट तमाम क्षेत्रों में है। केवल कागज-कागज के ही संकट की बात करें तो इसका असर कितना है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि श्रीलंका के शिक्षा विभाग को बच्चों की परीक्षाएं स्थगित करनी पड़ीं क्योंकि पर्चे छापने के लिए कागज नहीं था। इसी वजह से अगले सत्र के लिए पढ़ाई की किताबें भी नहीं छप पाई हैं। अब हम सोच सकते हैं कि मसला केवल रोजमर्रा की महंगाई और जरूरी सामान की कमी तक सीमित नहीं है। इसका असर और गहरा है।

इसे भी पढ़ें: श्रीलंका की तबाही इतनी भयंकर कि परीक्षा के लिए कागज़ का इंतज़ाम भी नहीं हो पा रहा

श्रीलंका बड़ा खूबसूरत द्वीप देश है। भारतीय सैलानियों के लिए भी पसंदीदा रहा है क्योंकि वहां की मुद्रा भारतीय रुपये से हमेशा कमजोर रही है, लिहाजा एक वो जगह है जहां हिंदुस्तानी दिल खोलकर खर्च कर सकते हैं। ऐसा भी रहा है कि कई मर्तबा श्रीलंका में छुट्टी मनाना, भारतीय सैलानियों के लिए अपने देश में गोवा या केरल में छुट्टी मनाने से सस्ता सौदा रहा है। आबोहवा, खानपान में भी श्रीलंका भारत से काफी मिलता-जुलता है।

वहीं, श्रीलंका के मौजूदा आर्थिक हाल से भी हम हिंदुस्तानी काफी कुछ अपनी यादें जोड़ सकते हैं। वहां का मौजूदा आर्थिक संकट बहुत कुछ वैसा ही है जैसा हमने 1991 में चंद्रशेखर की सरकार के समय देखा था, जब हमें अपने देश का सोना गिरवी रखना पड़ा था। उस संकट की परिणति खुले बाजार की आर्थिक व्यवस्था को अपनाए जाने के रूप में हुई थी। कितना अच्छा हुआ और कितना बुरा, यह अलग विषय है।

लेकिन, उस समय की भारत की स्थिति के ही अनुरूप इन दिनों श्रीलंका भी विदेशी मुद्रा की भारी तंगी से गुजर रहा है, जिसकी वजह से उसके लिए आयात करना मुश्किल हो रहा है। वह दूसरे देशों से लिए कर्जे चुका नहीं पा रहा है। और, वह कर्ज पुनर्भुगतान के मामले में डिफॉल्टर बनने के कगार पर खड़ा है जिसके लिए वह भारत व चीन से मदद मांग रहा है और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के सामने भी हाथ फैला रहा है।

खबरों के अनुसार श्रीलंका ने जरूरी सामान के आयात के लिए भारत से एक अरब डॉलर की क्रेडिट लाइन और मांगी है। कुछ ही दिन पहले भारत श्रीलंका को एक अरब डॉलर की क्रेडिट लाइन पहले ही मंजूर कर चुका है। यह क्रेडिट लाइन श्रीलंका को भारत की मौद्रिक साख के आधार पर जरूरी वस्तुओं का आयात करने में मदद देगी। भारत पहले भी श्रीलंका को तेल की खरीद के लिए 50 करोड़ डॉलर की क्रेडिट लाइन दे चुका है और 40 करोड़ डॉलर के मूल्य के बराबर मुद्रा की अदला-बदली कर चुका है।

भारत के सामने 1991 में ठीक यही साख का संकट था और हम भी विदेशी कर्ज के डिफॉल्टर बनने से महज चंद हफ्ते दूर थे। अंतर केवल इतना है कि हमारा वह हाल कथित ‘आर्थिक उदारीकरण’ के पहले ही हो गया था और श्रीलंका उस ‘उदार’ अर्थव्यवस्था पर चलते हुए अब इस हाल में आ पहुंचा है।

उसी साल यानी 1991 में अमेरिकी अर्थशास्त्री शेरिल पेयर की एक किताब आयी थी- लेंट ऐंड लोस्ट . कुछ साल बाद मुझे हिंदी के एक बड़े प्रकाशक के लिए उस किताब का हिंदी तर्जुमा करने का भी मौका मिला था। यह किताब आईएमएफ और विश्व बैंक की नीतियों व कार्यशैली की पोल खोलती थी। मोटे तौर पर यह विकासशील और कम विकसित देशों को ‘कर्जा लेकर घी पीयो ’ के चक्र में धकेलने की कवायद को बेपर्दा करती थी।

श्रीलंका इस समय उसी जाल में है। यह कोई आकस्मिक घटनाक्रम नहीं है। कोविड के दौर ने इसकी रफ्तार और मार को भले ही थोड़ा तेज बेशक कर दिया हो लेकिन यह लंबे समय से चली आ रही नीतियों का नतीजा है। यह संकट उन तमाम अर्थव्यवस्थाओं के लिए है जो आयात पर बहुत ज्यादा निर्भर रहती हैं। घरेलू उत्पादन कम से कम होना, भ्रष्ट शासन, खराब राजकोषीय प्रबंधन, सत्ता पर चंद कुलीनों का कब्जा, अपनों की जेबें भरने की कवायद, दिशाहीन नीतियां, करों में उद्देश्यहीन कटौतियां लंबे समय में ऐसे हालात पैदा करते हैं। फिर जब कोविड के दो सालों में पर्यटन पर रोक लग गई, विदेशों से धन आना बंद हो गया तो अर्थव्यवस्था चरमरा गई।

यह सूरत भी कई महीनों से नजर आ ही रही थी लेकिन वहां की सरकार खुद को और देश के लोगों को भुलावे में रखती रही। आर्थिक लिहाज से इस तरह का संकट तब शुरू होता है जब आपका विदेशी मुद्रा भंडार, आपके द्वारा साल भर में किए जाने वाले कर्ज के पुनर्भुगतान की मात्रा से कम हो जाए। यानी तब आपके सामने यह सवाल खड़ा हो जाता है कि आप इस साल कर्ज की अदायगी कैसे करेंगे। फरवरी में श्रीलंका की हालत यह थी कि उसके पास केवल 2.31 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार था जबकि उसे 4 अरब डॉलर का पुनर्भुगतान इस साल में करना है। जनवरी 2020 के बाद से श्रीलंका के विदेशी मुद्रा भंडार में 70 फीसदी से ज्यादा गिरावट आई है। देर-सबेर इसका असर बैंकिंग व्यवस्था पर भी पड़ेगा।

इस तरह संकट दरअसल चीजों की कमी का नहीं होता बल्कि उन्हें खरीदने के लिए डॉलर की कमी का होता है। उस साख व आशंका का होता है कि आप कर्ज कैसे चुकाएंगे। साख जाती है तो आपको नया कर्ज मिलना बंद हो जाता है, जो आपको पुराने कर्ज को चुकता करने के लिए चाहिए होता है। इसके एक नतीजे के तौर पर आपको मुद्रा का अवमूल्यन करना पड़ता है जैसा कि पिछले दिनों श्रीलंका ने किया। कर्ज देने वाले हमेशा चाहेंगे कि आपकी मुद्रा का अवमूल्यन हो, वे फायदे में रहते हैं। आपके अपने देश का निर्यात बाजार भी पसंद करता है आपकी मुद्रा सस्ती रहे। लेकिन यह खेल तभी चल सकता है जब आयात व निर्यात में एक किस्म का संतुलन हो। अगर सारी निर्भरता आयात पर रहेगी तो मुद्रा का अवमूल्यन संकट को और बढ़ाएगी ही, और आपकी लाचारी को साबित करेगा। श्रीलंका तेल व दवाइयों के अलावा खाने-पीने की चीजों के लिए भी आयात पर खासा निर्भर है।

भारतीय विदेश मंत्री इस समय कोलंबो में हैं। कहा जा रहा है कि श्रीलंका के कर्जे में चीन का बहुत बड़ा योगदान है जब उसने अपने बेल्ट ऐंड रोड (बीआरआई) मकसद के तहत श्रीलंका को काफी धन दिया। आलोचकों का कहना है कि इसका खासा हिस्सा बेकार की परियोजनाओं में खर्च किया गया जिनसे कुछ हासिल होने वाला नहीं था। ऐसे में श्रीलंका की अर्थव्यवस्था भी भारत व चीन के बीच रस्साकसी का खेल जरूर बनेगी, ऐसे कयास लगना स्वाभाविक है। विश्व बैंक व आईएमएफ मदद करेंगे तो अपनी शर्तों पर और उनके दूरगामी नतीजे होते हैं, यह हम सब जानते हैं। हम अपने देश में देख चुके हैं।

Sri Lanka
sri lanka crisis
Economic crisis in Sri Lanka
poverty
Economic Crisis and COVID
Hunger Crisis
Economic Recession
Sri Lankan Currency
Hunger crisis in Sri Lanka
Government of Sri Lanka
Gotabaya Rajapaksa
COVID-19

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

महामारी के दौर में बंपर कमाई करती रहीं फार्मा, ऑयल और टेक्नोलोजी की कंपनियां

विश्व खाद्य संकट: कारण, इसके नतीजे और समाधान

महामारी में लोग झेल रहे थे दर्द, बंपर कमाई करती रहीं- फार्मा, ऑयल और टेक्नोलोजी की कंपनियां

एक ‘अंतर्राष्ट्रीय’ मध्यवर्ग के उदय की प्रवृत्ति

कोविड मौतों पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट पर मोदी सरकार का रवैया चिंताजनक

महंगाई की मार मजदूरी कर पेट भरने वालों पर सबसे ज्यादा 

सारे सुख़न हमारे : भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी की शायरी


बाकी खबरें

  • BJP
    अनिल जैन
    खबरों के आगे-पीछे: अंदरुनी कलह तो भाजपा में भी कम नहीं
    01 May 2022
    राजस्थान में वसुंधरा खेमा उनके चेहरे पर अगला चुनाव लड़ने का दबाव बना रहा है, तो प्रदेश अध्यक्ष सतीश पुनिया से लेकर केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत इसके खिलाफ है। ऐसी ही खींचतान महाराष्ट्र में भी…
  • ipta
    रवि शंकर दुबे
    समाज में सौहार्द की नई अलख जगा रही है इप्टा की सांस्कृतिक यात्रा
    01 May 2022
    देश में फैली नफ़रत और धार्मिक उन्माद के ख़िलाफ़ भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) मोहब्बत बांटने निकला है। देशभर के गावों और शहरों में घूम कर सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन किए जा रहे हैं।
  • प्रेम कुमार
    प्रधानमंत्री जी! पहले 4 करोड़ अंडरट्रायल कैदियों को न्याय जरूरी है! 
    01 May 2022
    4 करोड़ मामले ट्रायल कोर्ट में लंबित हैं तो न्याय व्यवस्था की पोल खुल जाती है। हाईकोर्ट में 40 लाख दीवानी मामले और 16 लाख आपराधिक मामले जुड़कर 56 लाख हो जाते हैं जो लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट की…
  • आज का कार्टून
    दिन-तारीख़ कई, लेकिन सबसे ख़ास एक मई
    01 May 2022
    कार्टूनिस्ट इरफ़ान की नज़र में एक मई का मतलब।
  • राज वाल्मीकि
    ज़रूरी है दलित आदिवासी मज़दूरों के हालात पर भी ग़ौर करना
    01 May 2022
    “मालिक हम से दस से बारह घंटे काम लेता है। मशीन पर खड़े होकर काम करना पड़ता है। मेरे घुटनों में दर्द रहने लगा है। आठ घंटे की मजदूरी के आठ-नौ हजार रुपये तनखा देता है। चार घंटे ओवर टाइम करनी पड़ती है तब…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License