NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
अर्थव्यवस्था
श्रीलंकाई संकट : राजनीति, नीतियों और समस्याओं की अराजकता
वित्तीय संस्थानों के कई हस्तक्षेपों के बावजूद श्रीलंकाई सरकार अर्थव्यवस्था की व्यवस्थित गिरावट को दूर करने में विफल रही है।
मीनुका मैथ्यू
05 Apr 2022
Translated by महेश कुमार
Srilanka crisis

श्रीलंका राजनीतिक और आर्थिक रूप से अपने इतिहास में सबसे काले दिनों को देख रहा है क्योंकि राष्ट्रपति ने पूरे देश में सार्वजनिक आपातकाल की घोषणा कर दी है, क्योंकि आर्थिक संकट के बीच सरकार के खिलाफ सार्वजनिक अशांति ने पूरे द्वीप को अपंग बना दिया है।

सरकार के दावों के बावजूद कि वे संकट को ठीक करने की राह पर हैं, हाल ही में नए मुद्रित नोटों के साथ श्रीलंकन 5000 रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की है और साथ ही बांग्लादेश, चीन और भारत सहित सभी संभावित सहयोगियों से निरंतर ऋण की मांग कर रहा है, जबकि  आम लोगों को कोई भी नहीं उम्मीद दे पा रहा है कि नेतृत्व कम से कम आर्थिक रिकवरी का सही रास्ता चुन रहा है। इसके बजाय, यह समस्याओं को ठीक करने के लिए सत्ता में बैठे लोगों की अनिश्चितता और अक्षमता की पुष्टि कर रहा है। 

दुर्भाग्य से, द्वीप, जो अपने उच्च मानव विकास सूचकांकों के लिए जाना जाता है और स्वास्थ्य और शिक्षा में कुछ बेहतर लागू की गई सामाजिक कल्याण नीतियों के कारण इस क्षेत्र में शीर्ष पर होने का दावा करता रहा है, ने संकट की वर्तमान सुर्खियों से दुनिया को चौंका दिया है। श्रीलंका में उठा यह भयंकर तूफ़ान नेतृत्व द्वारा समर्थित लोकप्रिय बहाने के परिणामस्वरूप हो सकता है। फिर भी, अंतर्निहित सच्चाई यह है कि श्रीलंका का संकट राजनीतिक भ्रष्टाचार के नीतिगत परिणामों के कारण है क्योंकि भ्रष्ट नेतृत्व द्वारा लागू की गई नीतियां हमेशा विफल होती हैं। 

वित्तीय संस्थानों द्वारा कई हस्तक्षेपों के बावजूद, श्रीलंकाई नेतृत्व अर्थव्यवस्था की व्यवस्थित गिरावट को दूर करने में विफल रहा है। युद्ध के बाद की अर्थव्यवस्था निजी निवेश को आकर्षित करने के बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए निर्यात और महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को बढ़ाने के लिए उच्च ऋणों पर निर्भर थी, लेकिन देश की खराब योजना और अनुचित नीति संबंधित रणनीतियों के कारण उन महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को प्राप्त करने में विफल रही है।

जब युद्ध के बाद के श्रीलंकाई विकास के दौरान भ्रष्टाचार सबसे अधिक था, तो लोगों ने राजपक्षे के नेतृत्व को बदल दिया था। 2015 में नए प्रशासन के पास उच्च-ब्याज वाले ऋणों को निपटाने के लिए रणनीतियाँ थीं, और उन्होंने अल्पकालिक ऋणों को सस्ते, दीर्घकालिक ऋणों में बदलने और 7.5 बिलियन अमरीकी डालर तक के विदेशी भंडार का निर्माण करने का प्रबंधन किया था। नतीजतन, विक्रमसिंघा सरकार ने 52 वर्षों में पहली बार बजट अतिरिक्त हासिल किया था। ईस्टर बम विस्फोटों और कोविड प्रकोप के बाद सामने आई घटनाओं के कारण, श्रीलंका को उच्च ऋणों और वैश्विक संकट से निपटने के लिए प्रभावी आर्थिक रणनीतियों को बनाए रखने की आवश्यकता थी। इसके बजाय, त्रासदियों के प्रभाव को एक चुनावी रणनीति के रूप में अपनाया गया, जिसके एवज़ में राजपक्षे ने सत्ता हासिल की थी। इसके बाद, प्रभावी विकास योजना के डिजाइन और कार्यान्वयन में कुछ नीति प्रक्रियाओं का पालन करने की आवश्यकता थी। लेकिन वैश्विक संकट के बीच विकास को संभालने में श्रीलंका का नेतृत्व विफल रहा या उसने ऐसी आदर्श नीति प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया जिनसे संकट पर काबू पाया जा सकता था। इसलिए, यूक्रेन में युद्ध और महामारी पर दोष मढ़ना आसान दिखा। 

श्रीलंका की अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के लिए आईएमएफ की हालिया सिफारिश अपवादों परे करते हुए, आयकर और मूल्य वर्धित कर (वैट) दरों को बढ़ाने की आवश्यकता पर प्रकाश डालती है। राजकोषीय घाटा इसलिए बढ़ गया क्योंकि, करों में संशोधन के नाम पर, नव निर्वाचित सरकार ने 2019 में वैट में 15 प्रतिशत की कमी की थी, जिससे कर राजस्व के रूप में अरबों रुपये का नुकसान हुआ था। आम जनता के लिए कर रियायतों को आर्थिक राहत की ओर मोड़ने के बजाय, कर कटौती से कई व्यापारिक घरानों को लाभ हुआ। दुर्भाग्य से, राजपक्षे की विकास की रणनीति भारी कर्ज पर निर्भर रही है। श्रीलंका का कर्ज 2019 में जीडीपी के 94 प्रतिशत से बढ़कर 2021 में 119 प्रतिशत हो गया था।

जबकि विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट आ रही थी और वस्तुओं की बढ़ती वैश्विक कीमतों के कारण आयात बिल बहुत अधिक बढ़ गया था, आयात बिलों को कम करने के लिए अव्यावहारिक  नीतियां लागू की गईं, जिसके कारण देश को अधिक लागत देनी पड़ी। जवाब में, सरकार ने 2020 में मोटर वाहनों के आयात और 2021 में रासायनिक उर्वरक पर प्रतिबंध लगा दिया था। रासायनिक उर्वरक का न होना आत्मनिर्भर चावल उत्पादक के लिए एक बड़े झटके की शुरुआत बन गया था। हालांकि नेतृत्व ने जैविक खेती करने का आह्वान किया, लेकिन रासायनिक उर्वरक से जैविक खेती में इस बदलाव के संभावित नुकसान को दूर करने के लिए कोई उचित अध्ययन नहीं किया गया था। श्रीलंका के चावल के उत्पादन में 20 प्रतिशत की गिरावट आई, और उसे 450 मिलियन डॉलर के चावल का आयात करने के लिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि जैविक कृषि उपज काफी कम थी। दुर्भाग्य से, नीति निर्माताओं ने उन सरल सिद्धांतों को भुला दिया कि जब पैदावार घटती है, तो कीमतें बढ़ती हैं। परिणामस्वरूप, जनवरी 2022 में चावल की कीमत में 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई और यह आज भी जारी है।

आईएमएफ सहित आर्थिक विशेषज्ञों की सिफारिशों के बावजूद, मार्च 2022 तक, केंद्रीय बैंक ने लंकाई रुपये के अवमूल्यन का विरोध किया और इसके बजाय विदेशी मुद्रा भंडार के माध्यम से इसे संभालने की कोशिश की, जिससे आयात प्रभावित हुआ, जिसके परिणामस्वरूप तेल, रसोई गैस, दवा और कुछ आवश्यक खाद्य पदार्थों की भारी कमी हो गई। मुद्रास्फीति की वृद्धि और ऊर्जा की कमी ने देश की बिजली व्यवस्था को बाधित कर दिया, जिसके चलते प्रति दिन 13 घंटे तक बिजली कटौती की गई। 2021 में, विश्व बैंक के सर्वेक्षण ने पुष्टि की थी कि 44 प्रतिशत परिवार भोजन न मिलने से चिंतित थे और कमजोर सामाजिक सुरक्षा जाल ने उनकी भेद्यता को बढ़ा दिया था।

इसके अतिरिक्त, सरकारी भर्तियों में वृद्धि के कारण भारी सार्वजनिक व्यय का बोझ बढ़ गया था, जो कि केवल दो वर्षों (2019-2021) में 100 प्रतिशत की वृद्धि के लिए अकेले जिम्मेदार था। अमरीकी डॉलर कमाने की बेताबी के कारण, द्वीप में एक दिन से अधिक समय ठहरने के लिए विदेशियों से 500 अमरीकी डालर चार्ज किए जाने लगे और इस तरह की नीतियां पहले से ही खतरे वाले पर्यटन क्षेत्र को नुकसान पहुंचा रही थी, और वैश्विक महामारी के दौरान विदेशियों की चुनौतियों को समायोजित करने में विफल रही थी। 

सार्वजनिक नीतियां परस्पर नुकसान पहुंचा रही थी। किसी भी नीति कार्यान्वयन का दुरुपयोग कई क्षेत्रों में आपदा का कारण बन सकता है। जब सार्वजनिक धन का अनुत्पादक ढंग से इस्तेमा किया जाता है या सार्वजनिक अधिकारी उस अधिकार का दुरुपयोग करते हैं जो उन्हें सौंपा गया है, तो सभी नीति क्षेत्रों में व्यय में वृद्धि होगी। इसलिए, भ्रष्टाचार अल्पावधि में गरीबों को नुकसान पहुंचाएगा क्योंकि वे प्रतिदिन सहायता के लिए सरकार की ओर देखते हैं।

गगनचुंबी इमारतों और राजमार्गों की बढ़ती संख्या द्वीप के आर्थिक विकास का संकेत नहीं हो सकता है, खाकर तब जब इस तरह की बुनियादी ढांचा परियोजनाएं भारी कर्ज पर आधारित होती हैं और मुट्ठी भर क्रोनी कैपिटलिस्ट द्वारा प्रबंधित की जाती हैं। श्रीलंका में, श्रीलंका के लोगों की सहनशीलता के बीच राजनीतिक भ्रष्टाचार कायम है, लेकिन वर्तमान माहौल बदल रहा है, और लोग व्यापक प्रतिरोध कर रहे हैं। फिर भी, यह प्रश्न बना रहता है कि श्रीलंका के नीति निर्माता आदर्श विकास नीति संबंधित रास्तों का अनुसरण कब करेंगे और विकास को कैसे बनाए रखेंगे? हम स्पष्ट कर दें कि मौजूदा संकट केवल एक आर्थिक संकट नहीं है, बल्कि पिछले एक दशक से चल रहे व्यपाक राजनीतिक संकट के बड़े हिस्से का केवल एक छोटा सा हिस्सा है। श्रीलंका के लिए, मौजूदा संकट से बाहर निकलने का रास्ता साक्ष्य-आधारित नीति विकल्पों और रिकवरी के मार्ग में राजनीतिक लाभ पर विशेषज्ञता को प्राथमिकता देने की क्षमता पर निर्भर करेगा

लेखिका जिंदल स्कूल ऑफ़ गवर्नमेंट एंड पब्लिक पॉलिसी में टीचिंग और रिसर्च फेलो हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Sri Lankan Crisis: A Chaos of Policies, Politics and Problems

Sri Lanka
Economy Crisis in Sri Lanka
IMF
Debt in Lanka
Economy Recovery
Sri Lankan Economy
Rajapakshe
World Bank

Related Stories

श्रीलंका की मौजूदा स्थिति ख़तरे से भरी

श्रीलंका में सत्ता बदल के बिना जनता नहीं रुकेगीः डॉ. सिवा प्रज्ञासम

श्रीलंका में हिंसा में अब तक आठ लोगों की मौत, महिंदा राजपक्षे की गिरफ़्तारी की मांग तेज़

आर्थिक संकट के बीच श्रीलंका के प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे का इस्तीफ़ा, बुधवार तक कर्फ्यू लगाया गया

श्रीलंका में कर्फ्यू, प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे ने इस्तीफ़ा दिया

आइएमएफ की मौजूदगी में श्रीलंका के सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र को ख़तरा 

कौन हैं गोटाबाया राजपक्षे, जिसने पूरे श्रीलंका को सड़क पर उतरने को मजबूर कर दिया है

श्रीलंका के नए वित्त मंत्री ने नियुक्ति के एक दिन बाद इस्तीफ़ा दिया

श्रीलंका में सत्ता पर राजपक्षे की पकड़ कमज़ोर हुई

पड़ताल दुनिया भर कीः पाक में सत्ता पलट, श्रीलंका में भीषण संकट, अमेरिका और IMF का खेल?


बाकी खबरें

  • VK
    वर्षा सिंह
    उत्तराखंड की पॉलिटिकल कॉमेडी/ट्रेजडी!: खूब हंसे हरक और धामी और ‘समंदर में तैरने’ निकले हरीश रावत
    29 Dec 2021
     एक बड़ी सी मेज़ के गार्जियन वाली चेयर पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी बैठे थे। बगल वाली कुर्सी पर, भाजपा हो या कांग्रेस की सरकार, मंत्री बने रहने वाले डॉ.
  • left
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    संविधान और जनविरोधी रास्ते पर चल रही है शिवराज सरकार : माकपा
    29 Dec 2021
    माकपा के राज्य सचिव जसविंदर सिंह ने कहा है कि विधानसभा सभा सत्र में भी साबित हो गया है कि यह सरकार किस प्रकार विधायकों के भी अभिव्यक्ति के अधिकार का हनन कर रही है।
  • (अ)धर्म संसद: “नरम हिंदुत्व की राजनीति के सहारे कांग्रेस नहीं लड़ सकती भाजपा की सांप्रदायिकता से”
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    (अ)धर्म संसद: “नरम हिंदुत्व की राजनीति के सहारे कांग्रेस नहीं लड़ सकती भाजपा की सांप्रदायिकता से”
    29 Dec 2021
    छत्तीसगढ़ माकपा ने कहा कि एक राजनीतिक पार्टी के रूप में अब कांग्रेस को यह समझ लेना चाहिए कि 'नरम हिंदुत्व' की राजनीति का सहारा लेकर, साधु-संतों की आवभगत करके और राम के नाम का जाप करके भाजपा की…
  • नया भारत-नई शिक्षा!: अमित शाह की ABCD के जवाब में अखिलेश की ABCD
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    नया भारत-नई शिक्षा!: अमित शाह की ABCD के जवाब में अखिलेश की ABCD
    29 Dec 2021
    यूपी में अमित शाह समाजवादी पार्टी पर प्रहार करते हुए नई ABCD पढ़ा रहे हैं तो अखिलेश यादव भी उन्हीं के अंदाज़ में पलटवार कर रहे हैं। अब बच्चे कन्फ्यूज़ न हों इसलिए आप ही चुनाव में सही फ़ैसला लेकर उनका…
  • JEWER
    मुकुंद झा
    जेवर एयरपोर्टः दूसरे फेज के लिए भूमि अधिग्रहण नहीं होगा आसान, किसानों की चार गुना मुआवज़े की मांग
    29 Dec 2021
    जेवर एयरपोर्ट के निर्माण के दूसरे फेज के लिए छह अन्य गांवों से 1,334 हेक्टेयर और भूमि के अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हो गई है। इसको लेकर किसानों ने विरोध शुरू कर दिया है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License