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लद्दाख में गतिरोध, राजनीतिक समाधान की ज़रूरत
भारत में शून्यवादी और बात-बात में दोष निकालने वाले सबसे ज़्यादा कन्नी काट रहे हैं। ख़ासतौर पर तब, जब वे चीनियों से नफ़रत करने वाले भी हों।
एम. के. भद्रकुमार
12 Jun 2020
लद्दाख
फाइल फोटो

पूर्वी लद्दाख में जारी सैन्य गतिरोध को लेकर शून्यवादी भारतीय मीडिया के बनाये जा रहे अफ़सानों को लेकर अच्छी बात यह है कि सरकार ने बड़े पैमाने पर उनकी अनदेखी कर दी है। उम्मीद है कि दोनों देशों के बीच के तनाव में संभवत: कमी आये।

भारत में शून्यवादी (Nihilists) और बात-बात में दोष निकालने वाले (cynics) सबसे ज़्यादा कन्नी काट रहे हैं। ख़ासकर तब, जब वे समकालीन विश्व की स्थिति के तंग नज़रिये के साथ चीनियों से नफ़रत करने वाले भी हों, जो इस बात की अनदेखी कर जाते हैं कि चीन इस समय महाशक्ति लीग का एक प्रमुख खिलाड़ी है।

कुछ बनायी जा रही प्रमुख धारणाओं में तो इस बात तक की मांग की गयी है कि भारतीय सेना को चीनी पीएलए को 'क़रारा जवाब' देना चाहिए। जो धारणा सामने आ रही है, उससे तो यही लगता है कि इस समय जो अमेरिकी-चीन तनाव नज़र आ रहा है, उसने भारत को अचानक से बड़े रणनीतिक लाभ की स्थिति में पहुंचा दिया है, जब चीन ‘अलग-थलग’ खड़ा है और इसकी आंतरिक राजनीति गड़बड़ चल रही है।

अप्रत्याशित रूप से पुराने पूर्व-ट्रंप युग में सत्ता के चारों तरफ़ से घेरा बनाने वाले कुछ अमेरिकी विश्लेषक भी भारत में उधम मचाने के लिए मैदान में कूद पड़े हैं, उनसे परामर्श किये जाने के लिहाज से हमें अब और ज़्यादा वक़्त बर्बाद नहीं करना चाहिए, ताकि चीन की उस सलामी-स्लाइसिंग (विरोधियों पर जीत हासिल करने और नये क्षेत्रों को हासिल करने के लिए ख़तरों और गठबंधनों को तोड़ने और जीत लेने की प्रक्रिया) रणनीति में आये इस नवीनतम मोड़ से निपटने में एशिया के बाक़ी देशों के साथ शामिल हो सकें, जो अब बढ़ती शक्ति के रूप में अपने वक्र-पथ को विशिष्ट रूप से महसूस करते हैं।'' हालांकि, भारतीय नेतृत्व ने उत्तरी सीमा पर तनाव के शांतिपूर्ण समाधान की तलाश के लिए अब तक एक स्थिर और नियमित प्रक्रिया को ही अपनाया है। एक महीने पहले, जब चीन आगे बढ़ना शुरू किया था, तो अगर बाइबिल के शब्दों में कहा जाय, तो इस स्थिति को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने ‘एक बादल, जो एक आदमी के हाथ जितना छोटा है' की तरह देखा था और चीनी पोलित ब्यूरो के सदस्य यांग जीची के साथ इस हड़बड़ी के बाद कथित तौर पर 6 मई को बातचीत की थी।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस समय चीन-भारत सम्बन्धों की दिशा में एक अहम बदलाव आते हुए दिख रहा है और इस बदलाव की दिशा अच्छी नहीं है, क्योंकि यह एक संक्रमण बिंदु तक पहुंच गया है। ग़ौरतलब है कि डोभाल ने राष्ट्रपति ट्रंप की मध्यस्थता की पेशकश (जो कि तीन हफ़्ते बाद ही देखने को मिला था) का इंतज़ार नहीं किया और उन्होंने बीजिंग से शी जिनपिंग के बाद सबसे उच्चतम संभव नेतृत्व स्तर के साथ संपर्क किया।

ट्रंप ने कहा था कि वाशिंगटन ने भारत और चीन दोनों को सूचित कर दिया है कि संयुक्त राज्य अमेरिका अब कड़वे होते इस सीमा विवाद में मध्यस्थता करने की इच्छा रखता है, इसके लिए तैयार है और मध्यस्था करने में सक्षम भी है।'

यह एक दंग कर देने वाला प्रस्ताव है। मध्यस्थता की इस पेशकश को सामने रखकर ट्रंप ने वस्तुनिष्ठ और निष्पक्ष होने में अपनी रुचि दिखायी है। उन्होंने इस बात का संकेत दे दिया है कि वे किसी का पक्ष नहीं लेंगे। उन्होंने यह भी कहा था कि उनका इरादा भारत-चीन तनाव पर किसी तरह से हमला करने या या इसमें उलझने का नहीं है।

वे भारतीय विश्लेषक, जो पीएलए को सबक सिखाने की कोशिश कर रहे हैं- उनमें से कई अमेरिकी-भारतीय ’साझेदारी के प्रशंसक’ भी हैं, लेकिन वे ट्रंप की मध्यस्थता वाली इस पेशकश के मायने समझ पाने में नाकाम हैं। यदि भारत ‘पुलिस कार्रवाई’ करता है (जैसा कि नेहरू ने एक बार क़सम खायी थी), तो इसका कोई परिणाम भी उससे कम दुखद नहीं होगा, जिसका हमने छह दशक पहले सामना किया था। आज की तारीख़ में चीन के ख़िलाफ़ ‘पुलिस कार्रवाई’ का मतलब एक महाशक्ति के साथ युद्ध होगा, जिसमें भारत अपने मापदंडों या समय-सीमा को निर्धारित करने के लिए स्वतंत्रता नहीं होगा।

लगता है कि हमारे 'चीन विशेषज्ञ' समाचार पत्र नहीं पढ़ते हैं? दुनिया भर में माना जा रहा है कि भारत कोविड-19 महामारी का एपिसेंटर बनने की ओर बढ़ रहा है, जबकि दूसरी ओर, विश्व बैंक का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था साल के अंत तक 3 प्रतिशत से अधिक तक सिकुड़ने जा रही है।

इसके अलावा, इस सबका एक और पक्ष भी है, और वह है-अमेरिका-चीन सम्बन्धों की अस्थिरता और अनिश्चितता, जिसका भारतीय नीति निर्धारण के लिए गहरा निहितार्थ है।

पहली नज़र में ट्रंप के लिए चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को लेकर राज्य सचिव माइक पोम्पिओ के प्रसारित कार्यक्रम में शामिल होने से बेहतर भला और क्या होगा और भारत के लद्दाख तनाव को देखते हुए भारत का चीन का सामना करने के लिए अमेरिकी सहयोगी के रूप में भारत का आलिंगन करने का यह एक सुनहरा अवसर भी होगा। लेकिन, इसमें ट्रंप की दिलचस्पी नहीं दिखती है। इसका मतलब सिर्फ़ यही हो सकता है कि ट्रंप अमेरिका-चीन सम्बन्धों के बारे में एक संपूर्ण दृष्टिकोण रखते हैं।

मॉर्गन स्टेनली एशिया के पूर्व अध्यक्ष और एक जाने-माने चीन विशेषज्ञ, येल विश्वविद्यालय के स्टीफन रोच ने कल ब्लूमबर्ग में एक विचारशील निबंध लिखा था कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में बचत और मौजूदा घाटे के बीच यह तनाव मौजूदा महामारी के साथ एक नयी अहमियत किस तरह अख़्तियार कर रहा है, क्योंकि इस संकट से संबंधित संघीय घाटे की बढ़ोत्तरी व्यक्तिगत बचत में भय से प्रेरित बढ़ोत्तरी से कहीं ज़्यादा आगे निकल रही है।

रोच आगे एक महत्वपूर्ण बिन्दु की तरफ़ इशारा करते हैं और वह है-घरेलू बचत में गिरावट। यानी अगर अमेरिका-चीन व्यापार तनाव क चलते प्रभावी ढंग से अमेरिकी उपभोक्ता कर से घिर जाते हैं, तो एक कमज़ोर डॉलर के साथ मिलकर यह गिरावट, घाटे की बचत के बाहरी वित्तपोषण को बनाये रखने को असंभव बना देगी, ख़ासतौर पर तब, जब ट्रंप चीन से वित्तीय गिरावट को लेकर ‘इस ख़राब समय की अपनी कामना’के साथ आगे बढ़ रहे हैं। ज़ाहिर है कि चीन के ख़िलाफ़ कार्रवाई पर ट्रंप का 29 मई का बयान (जो दिलचस्प था, लद्दाख पर उनके मध्यस्थता वाले प्रस्ताव के सामने आने के बाद) किसी बयान से कहीं ज़्यादा शब्दाडंबर था, जबकि ट्रंप वास्तव में चीन को 'दंडित' करने के लिहाज से सिर्फ़ कुछ प्रतीकात्मक क़दमों के साथ आगे बढ़ रहे थे और उन्होंने चीन के साथ व्यापार करने को लेकर किसी भी संदर्भ को इतना स्पष्ट संकेत दे दिया कि स्टॉक मार्केट रोमांचित हो गया, इसे अमेरिका-चीन व्यापार तनाव की संभावित सहजता के संकेत के रूप में लिया गया!

कहने की ज़रूरत नहीं कि चीन को लेकर हमारी धारणाओं को अंतर्राष्ट्रीय माहौल के साथ जोड़कर देखने की ज़रूरत है। यहां तक कि वरिष्ठ कैबिनेट मंत्रियों ने भी इन काल्पनिक धारणाओं को प्रश्रय देना शुरू कर दिया कि अमेरिकी कंपनियां चीन से बाहर निकल रही हैं और अपने उत्पादन केंद्र भारत में स्थापित करने की ओर बढ़ रही हैं! अमेरिका में भारत के जानकार व्यापारिक मित्रों को इस तरह के भ्रम से बाहर निकलने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ा।

कोई शक नहीं कि यह समय चीन के लिए सबकुछ इसलिए इतना आसान नहीं है, क्योंकि यह वैश्विक राजनीति में बड़े गुट में प्रवेश करने जा रहा है। लेकिन, यह वैसा ही है, जैसा कि इतिहास में होता रहा है, क्योंकि सघन शक्तियां अपने आपको पूरी ताक़त के साथ आकांक्षी शक्तियों को बाहर रखने की पूरी कोशिश करती हैं। चीन को न सिर्फ़ अमेरिका, बल्कि यूरोप के साथ भी समस्यायें हैं। बहरहाल, यह बात उस हद तक तो पहुंच ही गयी है, जहां बड़ी शक्तियों को एहसास हो गया है कि चीन के साथ सुलह होने तक एक बहुपक्षीय विश्व व्यवस्था ज़रूरी है। जहां तक भारत के संकट की बात है, तो 1962 के युद्ध की ओर ले जाने वाले उस दुखद परिणति को भुलाया नहीं जा सकता। उस संघर्ष ने भ्रम से काफी हद तक छुटकारा दिला दिया है। नियंत्रण रेखा और वास्तविक नियंत्रण रेखा के बीच के अंतर वाली भी एक दुनिया है। अपना अस्तित्व बचाये रखने और फलने-फूलने के लिए एक सांसारिक यथार्थवाद और व्यावहारवाद ज़रूरी होता है।

आज भू-राजनीतिक परिस्थितियां ऐसी हैं कि लद्दाख में तनाव को कम करना और उन्हें महज एक क्षेत्रीय विवाद के रूप में मानना संभव नहीं रह गया है। प्रधानमंत्री मोदी वुहान, चेन्नई की बात ही कर सकते हैं, इससे ज़्यादा कुछ भी नहीं। लेकिन, यह सवाल तो पूछा जाना चाहिए कि अनौपचारिक शिखर सम्मेलन के बीच अंतरिम बातचीत के दौरान रणनीतिक संचार के बारे में क्या सोचा गया था? हमारी चीन नीति तो एक प्रवाह में बहती रही है।

हम पिछले अगस्त में जम्मू-कश्मीर के फ़ैसले के बहाव में चीन की चेतावनियों को गंभीरता से लेने में नाकाम रहे, और हमने अक्साई चीन को भारत का अभिन्न अंग घोषित करके इस मामले को और उलझा दिया, और एक लंबे समय के अपने इरादों की पुष्टि करने के लिए नक्शा खींचकर ख़तरे के निशान को भी पार लिया था।

और यह सब तब हुआ, जब हमारे विदेश मंत्री तक कह गये कि हम एक दिन "पीओके (और गिलगित-बाल्टिस्तान) पर भौतिक अधिकार क्षेत्र" स्थापित करने की उम्मीद करते हैं, - तब तो फिर हमें इस बात का भी ख़्याल रखना होगा कि इसी इलाक़े से होकर ही 60 बिलियन डॉलर के चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर, बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव की परियोजना उस काराकोरम दर्रा के आसपास से गुज़रती है, जिसके आसपास हम तेज़ी से सैन्य आवाजाही और तैनाती की सुविधा के लिए सड़क-निर्माण को लेकर हम भी आगे बढ़ रहे हैं।

इसी बीच, हमने बीजिंग को अपमानित करने के लिए पुराने वायरस पर अमेरिका के साथ एक रणनीतिक स्वांग रच लिया और ताइवान के लिए मंत्रिस्तरीय दौरे पर विचार करना भी शुरू कर दिया। आख़िर हम यह चूक कैसे सकते थे कि यह क्षेत्रीय और विश्व राजनीति का ऐसा सबसे अहम मोड़ है, जो परिवर्तनकारी स्तर पर है? राजकौशल की अनेक नाकामियों के बीच भारतीय कूटनीति लड़खड़ा गयी है।

बीजिंग के साथ रणनीतिक रास्ते को बनाये रखने में अक्षमता, जड़ता, अरुचि या फिर चाहे जो भी हो, उस कारण ज़िम्मेदार अधिकारियों को उनकी नितांत नाकामी के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए, जो निस्संदेह भारत के लिए आने वाले दशकों का सबसे नतीजे देने वाला रास्ता होता।

शीत युद्ध के सबसे कठिन दौर में भी सोवियत-अमेरिकी संचार में किसी तरह की कोई कमी नहीं थी। जबकि, भारतीय कूटनीति को केवल ब्राज़ील, अमेरिका, इज़रायल, ऑस्ट्रेलिया वाला मस्त गुट ही भाता है।

सौजन्य: इंडियन पंचलाइन

अंग्रेज़ी में लिखा मूल आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

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