NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
मीडिया में महिलाओं की स्थिति चिंताजनक : स्वान-युनेस्को शोध
अध्ययन में प्रिंट मीडिया, विज्ञापन और फिल्म-मनोरंजन में महिलाओं की स्थिति का आंकलन कंट्री-सर्वे के जरिये किया गया। इस क्षेत्र में महिलाओं की जद्दोजहद और मीडिया में किस तरह से उन्हें पेश किया जा रहा है-इन बातों पर ओकड़ों सहित विस्तार से अध्ययन पेश है।
कुमुदिनी पति
15 Mar 2020
 women in media
प्रतीकात्मक तस्वीर

इंडियन इंस्टिटियूट ऑफ मास कम्युनिकेशन और इंस्टिटियूट फॅार स्डडीज़ इन सोशल डेवलपमेंट ने 8 मार्च, 2020 को 2 भाग का शोध-ग्रन्थ जारी किया, जिसका शीर्षक है-‘विमेन फाॅर चेंजः बिल्डिंग ए जेंडर्ड मीडिया इन साउथ एशिया’’। 2014 में शुरू इस अध्ययन को 9 देशों के कंट्री रिपोर्टों के आधार पर समेकित किया गया है। ये हैं-भारत, पाकिस्तान, भुटान, श्रीलंका, बंग्लादेश, म्यांमार, नेपाल, मालदीव्स और अफगानिस्तान। इसमें दिखाया गया है कि कैसे मीडिया महिलाओं को या तो हाशिये पर रखता है या फिर उनका व्यावसायिक इस्तेमाल करता है। अध्ययन में प्रिंट मीडिया, विज्ञापन और फिल्म-मनोरंजन में महिलाओं की स्थिति का आंकलन कंट्री-सर्वे के जरिये किया गया।

एक ओर, किस तरह महिलाएं इस क्षेत्र में अपनी जगह बनाने के लिए जद्दोजहद में लगी हैं और उन्हें अपने काम के लिए न के बराबर सुविधाएं, अवसर और प्रोत्साहन दिये जाते हैं, दूसरी तरफ महिला को मीडिया में किस तरह से पेश किया जा रहा है-इन बातों पर ओकड़ों सहित विस्तार से अध्ययन पेश है। अंत में लिंग संवेदनशील दिशा निर्देश (जेंडर सेन्सिटिव गाइडलाइन्स) व नीति निर्देशों की बात कही गई है। इस शोध ग्रन्थ को तैयार करने में युनेस्को और साउथ एशिया विमेन्स नेटवर्क (स्वान) की बड़ी भूमिका रही है; यह इनका ही प्राॅजेक्ट है।

सबसे पहले तो यह बात सामने आई है कि साउथ एशिया में जेंडर गैप विश्व में सिर्फ मध्य पूर्वी देशों और उत्तरी अफ्रीका से बेहतर है; भारत का विश्व में जेंडर गैप के मामले में दूसरा स्थान है! इसका एक बहुत बड़ा कारण है यहां की सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, जो पितृसत्तात्मक है। यह मीडिया में भी परिलक्षित होता है। कई बार महिलाओं की लैगिकता ही पत्र-पत्रिकाओं में चर्चा का विषय होती है। फिर औरतों के प्रति आदर-सम्मान भी उदार पितृसत्ता की अभिव्यक्ति के अलावा कुछ नहीं होती होती है।

विज्ञापन में महिला

शोध के अनुसार विज्ञापनों की दुनिया अरबों रुपयों की है, पर यहां लैंगिक स्टीरियोटाइपिंग होती है। विज्ञापनों में महिलाओं की निजी पसंद या चाॅयस केवल काॅस्मेटिक्स, घर साफ करने वाले उत्पाद और खाना पकाने संबंधित वस्तिुओं की खरीददारी के दायरे में सिमटी है। बाकी कार, इलेक्ट्रनिक अप्लायंसेज़, कम्प्यूटर, मकान, आदि खरीदने के मामले में महिला को किनारे खड़ा कर दिया जाता है; पुरुष ही सबकुछ तय करता है। विज्ञापन अधिकतर महिलाओं को घर की सेटिंग्स में दिखाते हैं और पुरुषों को बिज़नेस सेटिंग में।

यदि महिला को किन्हीं प्राॅडक्टस को लाॅन्च करने के लिए सामने लाया भी गया तो उसकी देह का व्यवसायिक इस्तेमाल ही होता है, जबकि अश्लील प्रदर्शन के विरुद्ध कानून है। ज्यादातर सेलिब्रिटीज़ को ही विज्ञापनों में लाया जाता है क्योंकि उनकी ‘बाॅडी इमेज’ सेक्सी होती है। महिलाओं की बाॅडी शेमिंग भी की जाती है-मोटी या काली औरत बदसूरत मानी जाती है। यह भी देखा गया कि पुरुषों को ऐसे विज्ञापनों में लाया जाता है जिनमें उनकी कतई जरूरत नहीं होती; और वे अपनी बाॅडी का प्रदर्शन भी करते हैं। भारत में 30 प्रतिशत महिलाएं विज्ञापन उद्योग से जुड़ी हैं और भुटान में 64 प्रतिशत।

फिल्म और मनोरंजन की दुनिया में भी अधिकतर महिलाओं को उनकी ‘सेक्स अपील’ के लिये प्रयोग किया जाता है और उनपर हिंसा और अपराध दिखाना तो आम बात है। पर महिलाओं को पुरुषों की अपेक्षा काफी कम वेतन मिलता है। महिलाओं की जेंडर स्टीरियोटाइपिंग इस उद्योग में भी होती है। यौन उत्पीड़न भी आम है।

महिला भागीदारी साउथ एशिया के मीडिया संगठनों में महिला-पुरुष भागीदारी के आंकड़े: में इस प्रकार हैंः

table_0.JPG

इससे समझ में आता है कि भारत की स्थिति नेपाल से भी पीछे है और एक महत्वपूर्ण बात जो सामने आई है वो यह है कि अफगानिस्तान, भूटान, म्यांमार और पाकिस्तान जैसे देशों में महिलाओं की रोज़गार-सुरक्षा न्यूनतम है, जबकि भारत में मध्यम है। पर किसी भी देश में जाॅब सिक्युरिटी अधिकतम नहीं है। वेतन की बात करें, तो केवल नेपाल में एनडब्लूजे ऐक्ट 2007 के कारण न्यूनतम वेतन तय है, बाकी देशों में मनमानी चलती है और भारत में तो महिलाओं को काॅन्ट्रैक्ट पर रखा जाता है और वांछित वेतन बोर्ड भी नहीं होते।

न्यूज़ मीडिया में महिलाओं पर काम का भारी बोझ होता है, उन्हें फ्लेक्सी-टाइम नहीं मिलता और क्रेश सुविधा नहीं दी जाती। 55.3 प्रतिशत को 10,000-30,000 वेतन मिलता है। एच आर पाॅलिसी महिला-विरोधी होती है। साथ में, पदोन्नति और छुट्टी देने के मामले में काफी भेदभाव किया जाता है। सुरक्षा और संवेदनशीलता के मामले में सारे नौ देश एक ही हाल में पाए गए। काम के संदर्भ में लैंगिक भेदभाव, लैंगिक स्टीरियोटाइपिंग, भयभीत करना, कार्यस्थल पर पुरुष-प्रधानता का प्रदर्शन आम बात है।

भारत में पत्रकारिता और जन संचार के संस्थानों का बुरा हाल है क्योंकि करीक्युलम में यूजीसी ने लैंगिक संवेदनशीलता बढ़ाने के लिए कोई कंटेंट नहीं रखा है। बंग्लादेश में 75 प्रतिशत संस्थाओं में ऐसा कंटेंट है। यह बहुत ही आश्चर्य की बात है क्योंकि यहां महिलाओं की कार्यशक्ति में भागीदारी घटकर 27 प्रतिशत हो गई है, और मीडिया में युवतियों की बड़ी संख्या रोज़गार प्राप्त करने की इच्छुक है; उन्हें कैसा लगेगा जब जेंडर की चर्चा तक न हो रही हो। यही कारण है कि न्यूज़ मीडिया कंटेन्ट में अधिक प्राथमिकता महिलाओं के साथ यौन अपराध और उत्पीड़न को दी जाती है। मालदीव और भारत में अक्सर महिला पर ही दोष मढ़ दिया जाता है, यही मीडिया रिपोर्ट्स में भी परिलक्षित होता है।

यह भी देखा गया कि अधिक महिला पत्रकारों को लाइफस्टाइल ऐण्ड एन्टरटेनमेंट के पृष्ठ या स्तम्भ संपादित करने का काम मिलता है। सभी देशों में महिलाएं पदोन्नति या बीट दिये जाने के मामले में लैंगिक भेदभाव झेलती हैं। नेतृवकारी पदों में पहुंचने की जहां तक बात है, अफगानिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान, मालदीव और भुटान में केवल 1-20 प्रतिशत महिलाएं पहुंच पाती हैं; भारत में औसत 21.7 प्रतिशत और मालदीव में केवल 5 प्रतिशत। आजकल भारत में कुछ महिलाओं को अन्य मुद्दे भी दिये जा रहे हैं, जैसे आर्थिक मामले, खेल-कूद, अंतर्राष्ट्रीय मामले, आदि। पर ये चुनिन्दा नाम ही हैं। भारतीय न्यूज़ मीडिया में 34.6 प्रतिशत महिलाएं लेख, स्तम्भ आदि लिखती हैं। पर महिला मुद्दों पर केंद्रित लेख केवल 3 प्रतिशत होते हैं। प्रबन्धन के शीर्ष पदों पर महिलाएं केवल 13.8 प्रतिशत पायी गईं।

अधिकतर महिला पत्रिकाओं में सौंदर्य, व्यंजन बनाने के तरीके, फैशन, काॅस्मेटिक्स के उपयोग की विधि, पति को खुश करने के तरीके, शिशुओं की देख-रेख, सिलाई-बुनाई और घर सजाने के तरीकों पर लेख होते हैं। आजकल युवतियों के लिए आत्मरक्षा के टिप्स और स्वास्थ्य ठीक रखने के नुस्खे भी जुड़ गए हैं और कुछ कविता-कहानी के पृष्ठ दिखने लगे हैं। पर अख़बारों में महिला पृष्ठ या विशेषांक कम ही दिखते हैं। टी वी पर अंग्रेज़ी में महिला मुद्दों पर फ्लैगशिप बहसें 7.5 प्रतिशत हैं और हिंदी में 3.2 प्रतिशत। 21.73 प्रतिशत महिलाओं को अपराध की शिकार और केवल 6.34 प्रतिशत को विशेषज्ञ या नेतृत्वकारी भूमिका में दिखाया जाता है।

भारत में केवल 28 प्रतिशत महिला ऐंकर हैं-अंग्रेजी में बराबर-बराबर, हिंदी में 11 प्रतिशत और क्षत्रीय भाषाओं में 24 प्रतिशत। पैनेल चर्चाओं में 86 प्रतिशत पैनेलिस्ट पुरुष होते हैं; 65 प्रतिशत पैनलों में महिलाएं होती ही नहीं। मीडिया शिक्षण-प्रशिक्षण में हमारे देश में महिलाओं की स्थिति कुछ बेहतर है 46.20 प्रतिशत महिलाएं बनाम 53.80 प्रतिशत पुरुष जबकि अफगानिस्तान में महिलाओं के लिए यह आंकड़ा केवल 15.75 प्रतिशत है।

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न

यह भी एक गंभीर समस्या है। आंतरिक शिकायत समितियां या तो गायब हैं या बुरी स्थिति में हैं, जहां हैं भी तो महिलाओं की शिकायतों का निवारण करने में असमर्थ हैं और इनके सदस्य आम तौर पर वरिष्ठ स्टाफ के विरुद्ध प्रतिरोध करने में डरती हैं। शिकायतकर्ता अनाम होती हैं क्योंकि उन्हें समिति के सदस्यों पर भरोसा नहीं होता। अफगानिस्तान, बंग्लादेश और पाकिस्तान में तो 50 प्रतिशत महिलाओं ने लिंग-आधारित हिंसा का सामना किया है। इन देशों सहित नेपाल और श्रीलंका में पुरुष प्रधान कार्यस्थल हैं। महिलाओं के लिए अलग प्रसाधन और स्तनपान कराने के लिए कमरों की सुविधा नहीं होती। लगभग सभी देशों में सेक्सुअल फेवर्स के लिए उच्च पदों पर बैठे पुरुषों की ओर से मांग आती है। पिछले समय में भारत के कुछ जाने-माने संपादकों पर महिलाओं ने यौन हमलों का आरोप लगाया है।

आईएसआईडी रिसर्च टीम ने विज्ञापनों में लैंगिक संवेदनशीलता के कुछ मापदंड तय कर उसके परीक्षण हेतु मल्टिमीडिया टूल किट विकसित किया है। इसे अन्य देश भी अपना सकते हैं। 9 देशों पर आधरित जो शोध ग्रन्थ तैयार हुआ है, उसके ढेर सारे सुझावों पर मीडिया संगठनों को काम करना होगा, जिनमें प्रमुख हैं- यौन उत्पीड़न की आॅनलाइन शिकायत व्यवस्था, महिलाओं को लैंगिक संवेदनशील माहौल देना और उनकी योग्यता को पहचानना तथा उसके अनुरूप पद देना, महिलाओं का चित्रण स्वस्थ ढंग से करना और उनको बराबर वेतन का अधिकार देना।

(कुमुदिनी पति एक महिला एक्टिविस्ट और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

sex ratio
gender discrimination
Indian media
International Media
SWAN-UNESCO research
Print Media
Advertisement
MOVIE
sexual harassment
Sexual harassment at the workplace

Related Stories

डराये-धमकाये जा रहे मीडिया संगठन, लेकिन पलटकर लड़ने की ज़रूरत

बीएचयू: लाइब्रेरी के लिए छात्राओं का संघर्ष तेज़, ‘कर्फ्यू टाइमिंग’ हटाने की मांग

बीएचयू: 21 घंटे खुलेगी साइबर लाइब्रेरी, छात्र आंदोलन की बड़ी लेकिन अधूरी जीत

मध्य प्रदेश : मर्दों के झुंड ने खुलेआम आदिवासी लड़कियों के साथ की बदतमीज़ी, क़ानून व्यवस्था पर फिर उठे सवाल

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस: महिलाओं के संघर्ष और बेहतर कल की उम्मीद

लॉकडाउन में लड़कियां हुई शिक्षा से दूर, 67% नहीं ले पाईं ऑनलाइन क्लास : रिपोर्ट

‘दिशा-निर्देश 2022’: पत्रकारों की स्वतंत्र आवाज़ को दबाने का नया हथियार!

जेएनयू में छात्रा से छेड़छाड़, छात्र संगठनों ने निकाला विरोध मार्च

यौन शोषण के आरोप में गोवा के मंत्री मिलिंद नाइक का इस्तीफ़ा

निर्भया कांड के नौ साल : कितनी बदली देश में महिला सुरक्षा की तस्वीर?


बाकी खबरें

  • श्रुति एमडी
    ‘तमिलनाडु सरकार मंदिर की ज़मीन पर रहने वाले लोगों पर हमले बंद करे’
    05 Apr 2022
    द्रमुक के दक्षिणपंथी हमले का प्रतिरोध करने और स्वयं को हिंदू की दोस्त पार्टी साबित करने की कोशिशों के बीच, मंदिरों की भूमि पर रहने वाले लोगों की आजीविका पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। 
  • भाषा
    श्रीलंका में सत्ता पर राजपक्षे की पकड़ कमज़ोर हुई
    05 Apr 2022
    "सरकारी बजट पर मतदान के दौरान गठबंधन के पास 225 सांसदों में से 157 का समर्थन था, लेकिन अब 50 से 60 सदस्य इससे अलग होने वाले हैं। इसके परिणामस्वरूप सरकार न सिर्फ दो-तिहाई बहुमत खो देगी, बल्कि सामान्य…
  • विजय विनीत
    एमएलसी चुनाव: बनारस में बाहुबली बृजेश सिंह की पत्नी के आगे दीन-हीन क्यों बन गई है भाजपा?
    05 Apr 2022
    पीएम नरेंद्र मोदी का दुर्ग समझे जाने वाले बनारस में भाजपा के एमएलसी प्रत्याशी डॉ. सुदामा पटेल ऐलानिया तौर पर अपनी ही पार्टी के दिग्गज नेताओं, पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं पर आरोप जड़ रहे हैं कि वो…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: आज दूसरे दिन भी एक हज़ार से कम नए मामले 
    05 Apr 2022
    देश में कोरोना से पीड़ित 98.76 फ़ीसदी यानी 4 करोड़ 24 लाख 96 हज़ार 369 मरीज़ों को ठीक किया जा चुका है। और एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.03 फ़ीसदी यानी 12 हज़ार 54 रह गयी है।
  • मुकुल सरल
    नफ़रत की क्रोनोलॉजी: वो धीरे-धीरे हमारी सांसों को बैन कर देंगे
    05 Apr 2022
    नज़रिया: अगर किसी को लगता है कि ये (अ)धर्म संसद, ये अज़ान विवाद, ये हिजाब का मुद्दा ये सब यूं ही आक्समिक हैं, आने-जाने वाले मुद्दे हैं तो वह बहुत बड़ा नादान है। या फिर मूर्ख या फिर धूर्त। यह सब यूं…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License