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गोवा मुक्ति-संग्राम की कहानी
भारत ब्रिटिशों से 1947 में आज़ाद हो गया था लेकिन गोवा 19 दिसंबर 1961 को आज़ाद हुआ। गोवा पर तकरीबन साढ़े चार सौ साल तक पुर्तगालियों ने राज किया। जिसके खिलाफ यहां के स्थानीय लोगों ने ना सिर्फ कड़ा संघर्ष किया बल्कि अनेक यातनाएं भी झेलीं।
राज कुमार
19 Dec 2020
गोवा मुक्ति-संग्राम की कहानी

सभी देशवासियों को गोवा स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। जी हां! गोवा आज, यानी 19 दिसंबर को पुर्तगालियों के शासन से आज़ाद हुआ था। भारत ब्रिटिशों से 1947 में आज़ाद हो गया था लेकिन गोवा 19 दिसंबर 1961 को आज़ाद हुआ। गोवा पर तकरीबन साढ़े चार सौ साल तक पुर्तगालियों ने राज किया। जिसके खिलाफ यहां के स्थानीय लोगों ने ना सिर्फ कड़ा संघर्ष किया बल्कि अनेक यातनाएं भी झेलीं। ये 450 साल का इतिहास सिर्फ पराधीनता का इतिहास नहीं है, बल्कि 450 साल तक चले आज़ादी के अनवरत संघर्ष का भी इतिहास है। आइये, इसे जानते हैं।

पु्र्तगालियों का गोवा में आगमन

पुर्तगालियों से पहले गोवा पर आदिलशाह का शासन था। पुर्तगाली जहाज समुद्री रास्ते से 1510 में सैनिक टुकड़ियों के साथ गोवा के रीस मार्गोस पहुंचे। कमांडर आल्फॉन्सों दे अल्बुकर्क के नेतृत्व में आदिलशाह पर हमला किया गया। जिसमें पुर्तगालियों की हार हुई। लेकिन, कुछ समय बाद आल्फॉन्सो दे अल्बुकर्क ने फिर से हमला किया। इस बार एक स्थानीय सामंत तिमोजा ने पुर्तगालियों की मदद की। इस बार अल्बुकर्क की विजय हुई। 25 नवंबर 1510 को अल्बुकर्क ने ओल्ड गोवा में प्रवेश किया। जिसने गोवा की अगले साढ़े चार सौ साल की कहानी लिख दी।

लेकिन पूरे गोवा को फतह करना इतना आसान नहीं था। पूरे गोवा पर कब्ज़ा करने में पुर्तगालियों को तकरीबन 250 साल लग गये। पुर्तगालियों ने 1540 में तिस्वाड़ी और सैलसेट पर कब्ज़ा कर लिया। 1763 में फोंडा, सांगे, काणकोण पर भी पुर्तगालियों का राज हो गया। 1786 में पेडणे, सत्तरी और बिचोलिम पर भी कब्ज़ा कर लिया गया। 1786 तक पूरे गोवा पर पुर्तगालियों को राज हो चुका था।

साथ आये मिशनरियों ने धर्मप्रचार का काम शुरु कर दिया। हिंदू, मुस्लिम, यहूदी विभिन्न धर्मों के लोग और कई आदिवासी जनजातियां गोवा में रहते थे। धीरे-धीरे धर्म प्रचार ने कड़े धर्म परिवर्तन का रूप ले लिया। लोगों के लिये स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा करने, धार्मिक प्रतीकों के इस्तेमाल करने और उनकी मूर्तियां आदि घर में रखने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। लोगों पर अनाप-शनाप टैक्स थोप दिये गये। जिससे लोगों में रोष बढ़ रहा था। 1560 में Inquisition न्यायिक जांच लागू की गई। जिसके तहत नव इसाईयों को पुराने धार्मिक रीति-रिवाज़ और आचार व्यवहार करने पर न्यायिक जांच और कड़े दंड का प्रावधान था। प्रतिबंधों का शिकंजा बढ़ता जा रह था। परिणामस्वरूप रोष भी बढता जा रहा था, जो विद्रोह के रूप में फूटना ही था।

पुर्तगाली शासन के ख़िलाफ़ विद्रोह

कुंकली विद्रोह

पुर्तगालियों के खिलाफ पहला विद्रोह 15 जुलाई 1583 को कुंकली में हुआ। जब धर्म-परिवर्तन के लिये आए पांच पादरियों पर स्थानीय लोगों ने योजनाबद्ध तरीके से हमला किया और उनकी हत्या कर दी। स्थानीय लोगों के लिए अब ये अस्मिता और अस्तित्व की लड़ाई बन गई थी। इस घटना का बदला पुर्तगालियों ने धोखे से लिया। उन्होंने बातचीत के लिये कुंकली इलाके से 15 लोगों को बुलाया और उन्हें घेरकर धोखे से हमला कर दिया। जिसमें सभी की मौत हो गई। माना जाता है कि ये गोवा के स्वतंत्रता संग्राम के पहले शहीद थे।

पिंटो विद्रोह

1788 में पिंटो विद्रोह हुआ। वितोरिनो फारिया और जोस गोंसाल्वेज़जो उस समय पुर्तगाल में थे। दोनों यूरोप में लोकतंत्र के आगाज़ को देख रहे थे। ये दोनों गोवा लौटे और आज़ादी व लोकतंत्र के विचार को गोवा में पोषित किया। पिंटो परिवार की मदद से 1788 में विद्रोह हुआ जिसे कुचल दिया गया। 13 दिसंबर 1788 को 47 नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। जिनमें से कई को फांसी दी गई।

राणे विद्रोह

गोवा के स्वतंत्रता आंदोलन का एक बहुत ही महत्वपूर्ण अध्याय है राणे सशस्त्र विद्रोह। 1755 से लेकर 1912 तक राणे समुदाय ने अनेकों बार शासकों से सशस्त्र संघर्ष किया। शासकों ने बार-बार इस संघर्ष को बर्बर तरीके से कुचला दिया। बंदूक, तलवार आदि स्थानीय हथियारों के साथ सत्तरी इलाके के राणों ने बहादुरी से लड़ाई लड़ी और पुर्तगाली शासन के दिल में खौफ भर दिया। पहाड़ी इलाकों और अंदरूनी जंगलों में तकरीबन 150 साल तक गुरिल्ला लड़ाई चलती रही।

गोवा कांग्रेस कमेटी का गठन

1926 में तरिस्ताव दे ब्रागांझा कुन्हा भारत लौटे और उन्होंने अपने पांच साथियों के साथ मिलकर 1928 में गोवा कांग्रेस कमेटी का गठन किया। जिसने गोवा की आज़ादी के लिये सत्याग्रह और अहिंसा को अपना औज़ार बनाया। वो अपनी क़लम के जरिये लगातार गोवा की आज़ादी का मसला पूरी दुनिया के सामने रखते रहे। टीबी कुन्हा के हीरिश्तेदार रहे लुईस दे मिनेझिस ब्रागांझा जो एक पत्रकार और उपनिवेशवादी कार्यकर्ता थे, लगातार पुर्तगाली शासन के खिलाफ सक्रिय रहे। मिनेझिस ब्रागांझा, द हेराल्ड, द डिबेट, द इवनिंग न्यूज़ डेली आदि के संस्थापकों में शामिल रहे। द हेराल्ड में आप व्यंग्यात्मक कॉलम लिखते थे। जिसमें विचार की आज़ादी, बोलने की आज़ादी, शोषण से आज़ादी और धर्मनिरपेक्षता आदि मुद्दों को प्रमुखता से उठाते रहे। आप भारत में चल रहे आज़ादी के आंदोलन और रणनीतियों से भी गोवा की जनता को सजग करते रहे। मिनेझिस ब्रागांझा विभिन्न संगठनों और एजेंसियों में मुख्य भूमिका में रहे और हर मंच से गोवा की आज़ादी का नारा बुलंद करते रहे।

गोवा में सेंसरशिप और कोलोनियल एक्ट का फरमान

1930 में पुर्तगाल में कोलोनियल एक्ट पास किया गया। जिसके अनुसार पुर्तगाल के किसी भी उपनिवेश में रैली, मीटिंग और अन्य कोई सरकार विरोधी सभा और गतिविधि पर प्रतिबंध लगा दिया। जयहिंद तक बोलने पर जेल में डाला जाने लगा। 1932 में जब अतोनियो द ओलिवीरा सालाज़ार पुर्तगाल के शासक बनें तब गोवा में दमन अपने इंतिहां पर पहुंच गया। भयानक सेंसरशिप थोप दी गई। यहां तक कि शादी के कार्ड भी सेंसर किये जाने लगे कि कहीं आज़ादी का कोई गुप्त संदेश तो नहीं फैलाया जा रहा।

महिलाओं की भागेदारी

महिलाओं ने भी इस संघर्ष में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। सुधाताई जोशी ऐसी ही एक विरांगना हैं। सुधाताई ने 1955 में मापसा में महलाओं की एक सभा का आयोजन किया। जैसे ही सुधाताई ने भाषण देना शुरू किया एक पुलिसकर्मी ने सीधे सुधाताई के मुंह की तरफ बंदूक तान दी। सुधाताई बिना डरे बोलती रही। सभा में शामिल महिलाओं ने तिरंगा लहराते हुए जयहिंद के नारे लगाने शुरू कर दिये। सुधाताई को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। मात्र सुधाताई ही नहीं बल्कि वत्सला किर्तानी, शारदा साव, सिंधू देसपांडे, लिबिया लोबो, अंबिका दांडेकर, मित्रा बीर, सेलिना मोनिझ, शालिनी लोलयेकर, किशोरी हरमलकर ऐसी अनेक महिलाएं थीं जिन्होनें स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया और कुर्बानियां दी। ये फेहरिस्त बहुत लंबी है।

राममनोहर लोहिया की मडगांव में सभा

1946 में जब राममनोहर लोहिया गोवा आये तब गोवा में सभा ओयोजित करने पर सरकार ने प्रतिबंध लगा रखा था। नागरिक अधिकारों को कुचल रखा था। राममनोहर लोहिया ने इसे तोड़ने की सोची। राममनोहर लोहिया ने जूलियाओ मिनेझिस के साथ मिलकर एक सभा करने की योजना बनाई। और गोवा के लोगों के नागरिक अधिकारों की बहाली के लिए सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत कर दी।

18 जून को जूलियाओ मिनेझिस के घर से राममनोहर लोहिया और जूलियाओ तांगे में बैठकर सभा स्थल की तरफ निकलें। जहां पहले से ही पुलिस की तैनाती की जा चुकी थी। राममनोहर लोहिया जैसे ही तांगे से उतरे एक पुलिस अफसर ने पिस्तौल निकालकर उनकी तरफ तान दिया। राममनोहर लोहिया ने अफसर का हाथ पकड़कर एक तरफ धकेल दिया और बोलना शुरू कर दिया। राममनोहर लोहिया को गिरफ्तार कर लिया गया और मडगांव जेल में डाल दिया गया। लेकिन इस घटना ने आज़ादी की लहर को तेज कर दिया। जिसने पुर्तगालियों की चूलें हिला दी।

भारत की आज़ादी और गोवा

इस दौरान एक महत्वपूर्ण घटना घट चुकी थी। भारत 15 अगस्त 1947 को आज़ाद हो चुका था। गोवा के आंदोलन को शुरू से ही देश के बाकी हिस्सों से समर्थन मिलता रहा जो अब काफी बढ चुका था। देश के हर हिस्से से गोवा की आज़ादी की आवाज़ उठ रही थी। 1955 में देश के बाकी राज्यों से सत्याग्रहियों ने गोवा की आज़ादी के लिये प्रयास तेज किये और अलग-अलग दिशाओं से हज़ारों सत्याग्रहियों ने गोवा में प्रवेश करने की कोशिश की। पुर्तगाली सरकार ने हिंसात्मक कार्रवाई की और सत्याग्रहियों पर फायरिंग कर दी। जिसमें 20 सत्याग्रहियों की मौत हो गई।

आज़ादी के बाद से ही भारत सरकार लगातार पुर्तगालियों के साथ बातचीत के ज़रिये शांतीप्रिय हल निकालने के लिए चर्चा करती रही। लेकिन पुर्तगालियों ने गोवा को आज़ाद करने से मना कर दिया। मामला अंतर्राष्ट्रीय संस्था युनाइटेड नेशन तक गया। इस दौरान पुर्तगाली सैनिकों की हिंसक गतिविधियां भी जारी रहीं। नवंबर 1961 में साबरमती नाम के एक स्टीमर पर फायरिंग की गई जिसमें कई स्थानीय नागरिकों की मौत हो गई। माना जाता है कि ये घटना आपरेशन विजय का तात्कालिक कारण बनी।

अंततः तत्कालीन रक्षा मंत्री श्री कृष्ण मेनन ने प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू से सैनिक कार्रवाई करने की सिफारिश की। फिर शुरू हुआ आपरेशन विजय। जल, थल, वायु तीनों भारतीय सेनाओं ने 18 दिसबंर 1961 को गोवा की तरफ रुख कर दिया। और देखते-देखते मात्र 36 घंटों के अंदर ही पुर्तगालियों को आत्मसमर्पण के लिये मज़बूर कर दिया। 19 दिसंबर 1961 को गोवा पुर्तगालियों के उपनिवेश से मुक्त हुआ और तिरंगा लहराया गया।

(गोवा स्थित लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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