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भारत
राजनीति
जवानों की बढ़ती आत्महत्या का असल ज़िम्मेदार कौन?
ये विडंबना ही है कि जवानों की सबसे अधिक हितैषी बनने वाली मोदी सरकार के कार्यकाल में ही जवानों ने सबसे अधिक खुदकुशी की है।
सोनिया यादव
31 Mar 2022
indian army
'प्रतीकात्मक फ़ोटो'

बीते कुछ सालों में चुनावों के दौरान अक्सर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी बीजेपी सेना और जवानों के नाम पर वोट मांगती नज़र आती है। कभी सेना की सर्जिकल स्ट्राइक तो कभी पुलवामा के शहीद सीआरपीएफ जवान, मोदी सरकार हर मौके को अपने पक्ष में भुनाती दिखाई दी है। हालांकि ये विडंबना ही है कि जवानों की सबसे अधिक हितैषी बनने वाली मोदी सरकार के कार्यकाल में ही जवानों ने सबसे अधिक खुदकुशी की है।
केंद्र सरकार के खुद के ही आंकड़ों से ये बात सामने आई है कि पिछले कुछ सालों में देश की सुरक्षा में लगे जवानों में आत्महत्या की दर बढ़ी है। केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने लोकसभा में बताया कि पिछले एक दशक में अर्द्धसैनिक बलों के 1,205 जवानों ने आत्महत्या की है, जिनमें सर्वाधिक मामले वर्ष 2021 में आए हैं।

बता दें कि केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ, आईटीबीपी, बीएसएफ, एनएसजी और असम राइफल्स (ए आर) और राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड जैसे बल शामिल हैं। कुल मिलाकर इन बलों के पास नौ लाख कर्मी हैं। हैरानी की बात ये है कि पिछले साल हर दूसरे दिन इन केंद्रीय बलों में कोई न कोई आत्महत्या का केस सामने आया है, जो कहीं न कहीं एक खबर बनने के बाद नजरअंदाज कर दिया गया है।

क्या है पूरा मामला?

केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने मंगलवार 29 मार्च को संसद में बताया कि पिछले साल 156 केंद्रीय सशस्त्र बल के जवानों ने और साल 2020 में कुल 143 जवानों ने आत्महत्या की। ये जवान देश के भीतर और सीमा की सुरक्षा में लगे हुए थे। राय ने एक प्रश्न के लिखित उत्तर में कहा कि इससे पहले 2019 में 129 मामले, 2018 में 96 मामले, 2017 में 125 मामले, 2016 में 92 मामले, 2015 में 108 मामले , 2014 में 125 मामले, 2013 में 113 मामले और 2012 में 118 ऐसे मामले दर्ज किए गए थे।

ध्यान रहे कि यह आंकड़े ऐसे समय में सामने आए हैं जब हाल की घटनाओं की पृष्ठभूमि में बीएसएफ जवानों में तनाव का मुद्दा चर्चा में रहा है। खबरों के मुताबिक इसी महीने फ्रेट्रीसाइड यानी किसी साथी पर हमला करने की घटनाओं में बीएसएफ के सात जवान मारे गए। 2019 से अब तक बलों में ऐसी 25 से अधिक घटनाएं हुई हैं।

जवानों की आत्महत्या के पीछे क्या कारण हैं?

जवानों की आत्महत्या के पीछे सरकार घरेलू समस्याओं, बीमारी और वित्तीय समस्याओं को कई कारणों में मानती है। हालांकि गृह मंत्रालय से जुड़ी संसदीय समिति इन आत्महत्याओं के पीछे मानसिक और भावनात्मक तनाव को भी वजह मानती है। वहीं पूर्व अफसरों और जानकारों का कहना है कि जवानों पर वर्कलोड ज्यादा है। कई स्थानों पर जवानों को 12 से 15 घंटे तक ड्यूटी देनी पड़ती है। कड़ी कामकाजी परिस्थितियों, पारिवारिक मुद्दों और जरूरत होने पर छुट्टी न मिल पाना भी जवानों को मानसिक तनाव की ओर ढ़केलता है।

सरकार का क्या कहना है?

केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने सदन को बताया कि प्रासंगिक जोखिम कारकों के साथ-साथ प्रासंगिक जोखिम समूहों की पहचान करने और सीएपीएफ और असम राइफल्स (एआर) कर्मियों में आत्महत्या की रोकथाम के लिए उपचारात्मक उपायों का सुझाव देने के लिए अक्टूबर 2021 में एक टास्क फोर्स का गठन किया गया था। उन्होंने कहा कि सरकार सीएपीएफ कर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल के लिए कई कदम उठा रही है। इसके तहत सीएपीएफ के लिए ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ कोर्स संचालित किए जा रहे हैं… जो जवानों पर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने ‘सीएपीएफ के तबादले और छुट्टी से संबंधित पारदर्शी नीतियों’ की शुरुआत की है, और कठिन क्षेत्र में सेवा देने वाले कर्मियों के लिए इसके बाद जहां तक संभव हो सकता है, उनकी पसंद की पोस्टिंग पर विचार किया जाता है।

उन्होंने यह भी जोड़ा कि ड्यूटी के दौरान घायल होने के चलते अस्पताल में भर्ती होने की अवधि को ऑन-ड्यूटी माना जाता है, यहां तक कि सैनिकों से उनकी शिकायतें जानने और उनका समाधान करने के लिए अधिकारियों की नियमित बातचीत का आयोजन किया जाता है। राय ने बताया कि मंत्रालय दुर्गम क्षेत्रों में तैनात जवानों को पर्याप्त मुआवजा भी दे रहा है।

क्या कहते हैं बल के पूर्व अधिकारी?

अमर उजाला ने 'कॉन्फेडरेशन ऑफ एक्स पैरामिलिट्री फोर्स मार्टियर्स वेलफेयर एसोसिएशन' के महासचिव रणबीर सिंह के हवाले से लिखा है कि इन जवानों को घर की परेशानी नहीं है। सरकार इस मामले में झूठ बोल रही है। इन्हें ड्यूटी पर क्या परेशानी है, इस बारे में सरकार कोई बात नहीं करती। आतंक,नक्सल, चुनावी ड्यूटी, आपदा, वीआईपी सिक्योरिटी और अन्य मोर्चों पर इन बलों के जवान तैनात हैं। इसके बावजूद उन्हें सिविल फोर्स बता दिया जाता है। जवानों को पुरानी पेंशन से वंचित रखा जा रहा है। सिपाही से लेकर कैडर अफसरों तक की प्रमोशन में लंबा वक्त लग रहा है। नतीजा, जवान टेंशन में रहने लगते हैं। रणबीर सिंह की मांग है कि केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को भारतीय सेना के बराबर शहीद का दर्जा मिले। इन बलों के लिए पुनर्वास और पुनःस्थापन बोर्ड गठित किया जाए। 

बीएसएफ के पूर्व एडीजी संजीव कृष्ण सूद कहते हैं, "कई जगहों पर वर्कलोड ज्यादा है। जवान ठीक से सो नहीं पाते हैं। वे अपनी समस्या किसी के सामने रखते हैं, तो वहां ठीक तरह से सुनवाई नहीं हो पाती। ये बातें जवानों को तनाव की ओर ले जाती हैं। कुछ स्थानों पर बैरक एवं दूसरी सुविधाओं की कमी नजर आती है। कई दफा सीनियर की डांट फटकार भी जवान को आत्महत्या तक ले जाती है। समय पर प्रमोशन या रैंक न मिलना भी जवानों को तनाव देता है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 2019 में सीआरपीएफ जवानों को एक साल में 100 दिन की छुट्टी देने की घोषणा की थी। अभी तक किसी भी बल में यह योजना लागू नहीं हो सकी है।"

नौकरी मिलने के बाद भी इसे छोड़ने वालों की संख्या में इजाफा

गौरतलब है कि साल 2019 में गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि सीएपीएफ कर्मियों के लिए उपलब्ध अवकाश मौजूदा 75 दिनों से बढ़ाकर 100 दिन किए जाएंगे, हालांकि इस पर अब तक अमल होना बाकी है। सीएपीएफ द्वारा रक्षाकर्मियों की तर्ज पर इसके कर्मियों के आकस्मिक अवकाश को 15 दिन से बढ़ाकर 30 दिन करने का प्रस्ताव भी गृह मंत्रालय द्वारा स्वीकार नहीं किया गया है।

मालूम हो कि संसद की स्थायी समिति ने हाल ही में सशस्त्र बलों से जवानों के अलग होने को लेकर भी चिंता जताई थी। 2020 के मुकाबले पिछले साल यह दर बढ़ी है। इसमें सबसे ज्यादा बीएसएफ और सीआरपीएफ के जवान हैं। कमिटी ने जवानों के फोर्स से अलग होने का आंकड़ा भी पेश किया। इसके मुताबिक साल 2021 में 14 हजार 311 जवान इन बलों का साथ छोड़ गए। साल 2020 में 9 हजार 729 जवान, तो वहीं साल 2019 में 14 हजार 872 जवान इन बलों से अलग हो गए। 2018 में ये संख्या 16 हजार 100 रही जबकि 2017 में 20 हजार 575।

इन फोर्सेस से अलग होने की भी कई वजहें है, जिसमें पेंशन, इस्तीफा, पद से हटाया जाना, वॉलेंट्री रिटायरमेंट, मौत भी शामिल हैं। गृह मंत्रालय ने इसके पीछे भी कई कारणों को गिनाया था, जिसमें लंबे समय तक कठिन क्षेत्रों में तैनाती और परिवार से दूर होना भी है। सरकार इन जवानों के नाम पर चुनाव तो जीत जाती है, लेकिन वास्तव में इन जवानों की जिंदगी में कुछ नहीं बदल पाती। ऐसे में जल्द ही सरकार को किसी ठोस कदम के साथ आगे आना होगा, जिससे देश की रक्षा करने वालों की भी रक्षा की जा सके।

ये भी पढ़ें: सैनिक स्कूल पर भाजपा का इतना ज़ोर देना क्या जायज़ है?

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