NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
साहित्य-संस्कृति
भारत
राजनीति
इतवार की कविता : सत्ता, किसान और कवि
आज ‘इतवार की कविता’ में पढ़ते हैं प्रेमलता वर्मा की कुछ नयी और चुनिंदा कविताएं। प्रेमलता वर्मा, हिंदी और स्पानी भाषा की लेखिका हैं, जो कई दशकों से अर्जेंटीना में रह रही है। वह कवि, कहानीकार और अनुवादक हैं। उनके कई संग्रह और अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं।
न्यूज़क्लिक डेस्क
07 Feb 2021
इतवार की कविता
प्रतीकात्मक तस्वीर। यह तस्वीर किसान एकता मोर्चा के ट्विटर से साभार ली गई है।

सत्ता, किसान और कवि

 

  सत्ता का गिरगिट

  बदलता रंग आंख काढ़ कर                   

  मौके मौके पर

  खालिस अपने ही

  फायदे की खातिर;

  मगर

किसान और कवि

प्रकृति में अपने रंग ढाल कर

युगों में  बल भर कर

देता बदल

समय को ही

 मानवीय

चेतना जगा कर |

 

        दांव

 

   रखती हूँ आखिरी गोट

   चौपड़ के बीच

   उस कानून के खिलाफ

   जो नहीं बदलती हाशिये की नियति

   चूंकि ये आँखें  महज़

   दरिद्रता और स्वप्न में

   मरते गुल देखने के लिए

   नहीं बनी!

   मुखालिफत तो करेंगी ही !

 

   बहार की नरम चोटों में

   खिलती खिलखिलाहट की जूही के

   पार थीं वे गोटें –चोंटे ...

   और मेरी कई चुनौतियाँ

   माँ की सीखों के बीच

  

      घर था बड़ी आँख

 

 तीसरे पहर का 

  मेरी बाई आँख के घाव सा

   यह सिमसिमा सन्नाटा

       करकराता

   सांप की केंचुल सा

       व्यर्थ

   मेरी दहलीज़ पर,

   दीवारों से सटा हुआ

   गमलों से लिपट

   तो इसे उठाएगा

   चढ़ा हुआ सूरज ही

   इसमें डाल कर

   काली सुराख़...

   मेरा बचा घाव

   पूरने की प्रतीक्षा में

        (?)

   हो तो, गनीमत! ख़ुदा न ख़ैर!

  शेष मगर

  एक प्रश्न :

   घर था आँख –विशाल आंख

   जिसे चूमती थी कविता

   विभोर होकर

   जब  तब....

   सड़क पर

   माँ का हाथ थामे

   सृष्टि के सबसे सुंदर,

   अद्भुतता के अवतार

   नन्हे मुन्नों की कतार पर

   अघा जाती

   ममता से  सराबोर

   माँ की  सुगन्धित अस्मिता ;

   तब  आखिर है अब भी

क्यों  घायल आँखवाला मेरा घर

किस इन्तजार में बेताब?

-    प्रेमलता वर्मा

इसे भी पढ़ें :  'कब तलक लुटते रहेंगे लोग मेरे गाँव के...' बल्ली सिंह चीमा की कविता

इसे भी पढ़ें :   इतवार की कविता : साधने चले आए हैं गणतंत्र को, लो फिर से भारत के किसान

इसे भी पढ़ें :  माना कि राष्ट्रवाद की सब्ज़ी भी चाहिए/ लेकिन हुज़ूर पेट में रोटी भी चाहिए

इसे भी पढ़ें :  इतवार की कविता : तुम्हारी जाति क्या है कुमार अंबुज?

इसे भी पढ़ें :  सावित्रीबाई फुले : खेती ही ब्रह्म, धन-धान्य है देती/अन्न को ही कहते हैं परब्रह्म

Sunday Poem
Hindi poem
farmers protest
Farm bills 2020
Modi government
इतवार की कविता
हिन्दी कविता
कविता

Related Stories

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है

छोटे-मझोले किसानों पर लू की मार, प्रति क्विंटल गेंहू के लिए यूनियनों ने मांगा 500 रुपये बोनस

ज़रूरी है दलित आदिवासी मज़दूरों के हालात पर भी ग़ौर करना

मई दिवस: मज़दूर—किसान एकता का संदेश

किसान-आंदोलन के पुनर्जीवन की तैयारियां तेज़

ग्राउंड रिपोर्टः डीज़ल-पेट्रोल की महंगी डोज से मुश्किल में पूर्वांचल के किसानों की ज़िंदगी

सावधान: यूं ही नहीं जारी की है अनिल घनवट ने 'कृषि सुधार' के लिए 'सुप्रीम कमेटी' की रिपोर्ट 

मोदी सरकार की वादाख़िलाफ़ी पर आंदोलन को नए सिरे से धार देने में जुटे पूर्वांचल के किसान

यूपी चुनाव: किसान-आंदोलन के गढ़ से चली परिवर्तन की पछुआ बयार

किसानों को आंदोलन और राजनीति दोनों को साधना होगा


बाकी खबरें

  • न्यूज़क्लिक डेस्क
    लॉकडाउन-2020: यही तो दिन थे, जब राजा ने अचानक कह दिया था— स्टैचू!
    27 Mar 2022
    पुनर्प्रकाशन : यही तो दिन थे, जब दो बरस पहले 2020 में पूरे देश पर अनियोजित लॉकडाउन थोप दिया गया था। ‘इतवार की कविता’ में पढ़ते हैं लॉकडाउन की कहानी कहती कवि-पत्रकार मुकुल सरल की कविता- ‘लॉकडाउन—2020’।
  • डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    लीजिए विकास फिर से शुरू हो गया है, अब ख़ुश!
    27 Mar 2022
    ये एक सौ तीस-चालीस दिन बहुत ही बेचैनी में गुजरे। पहले तो अच्छा लगा कि पेट्रोल डीज़ल की कीमत बढ़ नहीं रही हैं। पर फिर हुई बेचैनी शुरू। लगा जैसे कि हम अनाथ ही हो गये हैं। जैसे कि देश में सरकार ही नहीं…
  • सुबोध वर्मा
    28-29 मार्च को आम हड़ताल क्यों करने जा रहा है पूरा भारत ?
    27 Mar 2022
    मज़दूर और किसान आर्थिक संकट से राहत के साथ-साथ मोदी सरकार की आर्थिक नीति में संपूर्ण बदलाव की भी मांग कर रहे हैं।
  • अजय कुमार
    महंगाई मार गई...: चावल, आटा, दाल, सरसों के तेल से लेकर सर्फ़ साबुन सब महंगा
    27 Mar 2022
    सरकारी महंगाई के आंकड़ों के साथ किराना दुकान के महंगाई आकड़ें देखिये तो पता चलेगा कि महंगाई की मार से आम जनता कितनी बेहाल होगी ?
  • जॉन पी. रुएहल
    क्या यूक्रेन मामले में CSTO की एंट्री कराएगा रूस? क्या हैं संभावनाएँ?
    27 Mar 2022
    अपने सैन्य गठबंधन, सामूहिक सुरक्षा संधि संगठन (सीएसटीओ) के जरिये संभावित हस्तक्षेप से रूस को एक राजनयिक जीत प्राप्त हो सकती है और अपने अभियान को आगे बढ़ाने के लिए उसके पास एक स्वीकार्य मार्ग प्रशस्त…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License