NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
समाज
साहित्य-संस्कृति
भारत
...कैसा समाज है जो अपनी ही देह की मैल से डरता है
“और मैं बार-बार पूछता रहूंगा वही एक पुराना सवाल-यह दुनिया ऐसी क्यों है?”, वरिष्ठ कवि अरुण कमल को पढ़ना अपने समय-समाज की एक पूरी यात्रा करना है। एक मुठभेड़ भी। आज ‘इतवार की कविता’ में पढ़ते हैं उनकी कुछ चुनिंदा कविताएं।
न्यूज़क्लिक डेस्क
26 Jul 2020
समाज
प्रतीकात्मक तस्वीर, साभार : ssir.org

संधि-पत्र

जब उन्होंने कहा कि मेरी बात से उनकी भावना को
चोट पहुँची है और उनका मर्म आहत हुआ है
तो मैंने एक बार आँख फेर उन सब को देखा यहाँ से वहाँ तक--
जो अपनी पत्नियों को पीट कर आए
जो अपनी बेटियों को मार कर आए
जो अपनी बहुओं को मार कर आए
जो अपने पड़ोसियों को काट कर आए
जो लाशों पर पैर रखते नाले पार कर जयघोष करते आए--
उधर है हृदय, इधर निष्ठुरता

वे चाहते हैं मैं होंठ सी कर रहूँ
पर मेरी भावना दहलती है भुनता है कलेजा
काँपती है आत्मा, जली हुई चमड़ी उतरी देह-सी

रोको इस पर आक्रमण, मैं भी चुप हो जाऊंगा--
यह रहा संधि-पत्र!

 

पुराना सवाल

पहले खेत बिके
फिर घर फिर जेवर
फिर बर्तन
और वो सब किया जो ग़रीब और अभागे
तब से करते आ रहे हैं जब से यह दुनिया बनी
पत्नी ने जूठा धोया
बेटों ने दुकानों पर ख़रीदारों का हुक्म बजाया
बेटियाँ रात में देर से लौटीं
और पैठान मुझे छेंकते रहे सड़कों पर

इस तरह एक-एक कर घर उजड़े गाँव उजड़े
और यह नगर महानगर बना
पर कोई नहीं बोलता ऎसा हुआ क्यों
अब कोई नहीं पूछता यह दुनिया ऎसी क्यों है
बेबस कंगालों और बर्बर अमीरों में बँटी हुई

नहीं मैं हारा नहीं हूँ
मैं भी वो सब करूंगा
हम सब वो सब करेंगे जो हम जैसे लोग तब से
करते आ रहे हैं जब से यह दुनिया बनी
जो अभी-अभी बोलिविया कोलम्बिया ने किया
जो अभी-अभी नेपाल के बाँकुड़ों ने किया
और मैं बार-बार पूछता रहूंगा वही एक पुराना सवाल-
यह दुनिया ऐसी क्यों है?

 

बस एक निशान छूट रहा था

बस इसलिए कि तुम्हारे देश में हूँ
और तुम मुझे दो मुट्ठी अन्न देते हो
और रहने को कोठरी
मैं चुप्प रहूँ?
इतना तो मुझे वहाँ भी मिल जाता
या इससे भी ज़्यादा बहुत-कुछ अगर इतना बस
सीख जाता कि कहीं कुछ भी हो बस नज़र फेर लो

कैसा समाज है जो
अपनी ही देह की मैल से डरता है
कैसी देह है जो अपने ही नाख़ून से डरती है

लोग तो बोलते ही रहते हैं
इतने अख़बार पत्रिकाएँ फ़िल्म टेलिविजन लगातार
फिर भी ऎसा क्या था जो बोलने में रह गया
ऎसा क्या था जिसका बोलना खतरनाक था?

मैंने कुछ भी तो नहीं किया
बस एक निशान छूट रहा था जो लगा दिया।

 

किसकी ओर से

मैं किसकी ओर से बोल रहा हूँ

उन असंख्य जीवों वनस्पतियों पर्वतों नदियों नक्षत्र तारे,
उन सबकी ओर से जो अब इस पृथ्वी पर नहीं हैं
पर जो कभी थे या होंगे?

नहीं, केवल मनुष्य योनि की ओर से, बस उन्हीं के लिए
जो अभी मृत्यु की प्रतीक्षा में जीवित हैं मर्त्यलोक में।

तो क्या मैं सभी महादेशों द्वीपों समुद्रों की ओर से बोल सकता हूँ?

नहीं, केवल एशिया की ओर से।

तो मैं पाकिस्तान चीन नेपाल वियतनाम की ओर से बोल सकता हूँ?

नहीं, तुम केवल भारत के नागरिक हो।

अखंड भारत का नागरिक अखंड भारत की ओर से?

नहीं, तुम्हें केवल बिहार आबंटित है।

...जिसकी देह अभी-अभी काटी गई दो हिस्सों में?
ख़ैर इतना भी कम नहीं कम से कम छह करोड़ लोगों की ओर...?

नहीं, छह करोड़ नहीं, केवल अपने धर्मवालों की बात करो।

तो क्या मैं अपने दोस्त इम्तू को छोड़कर बोलूंगा?

नहीं, उतना भी नहीं, केवल अपनी जाति, नहीं उपजाति की ओर से और केवल पुरुषों की
ओर से जो धन में तुमसे न ऊपर हैं न नीचे और यह तो तुम जानते ही हो तुम सबसे दरिद्र
हो सबसे कमज़ोर
महज एक कवि मनुष्यता का फटा हुआ दूध
इसलिए तुम्हें चेतावनी दी जाती है कि तुम किसी की ओर से
नहीं बोलोगे, अपनी ओर से भी नहीं-
उसके लिए राष्ट्र की संसद काफ़ी है।

-    अरुण कमल

(सभी कविताएं ‘कविता कोश’ से साभार)

इसे भी पढ़े : वरवर राव : जो जैसा है, वैसा कह दो, ताकि वह दिल को छू ले

इसे भी पढ़े : क्या हुआ छिन गई अगर रोज़ी, वोट डाला था इस बिना पर क्या!

इसे भी पढ़े : ‘इतवार की कविता’: मेरी चाहना के शब्द बीज...

इसे भी पढ़े : मुफ़्त में राहत नहीं देगी हवा चालाक है...

इसे भी पढ़े : तुम ज़िंदा हो पापा... : फ़ादर्स डे विशेष

poem
Hindi poem
Sunday Poem
hindi poetry
society
कविता
हिन्दी कविता
इतवार की कविता

Related Stories

वे डरते हैं...तमाम गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज और बुलडोज़र के बावजूद!

सारे सुख़न हमारे : भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी की शायरी

...हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

जुलूस, लाउडस्पीकर और बुलडोज़र: एक कवि का बयान

गणेश शंकर विद्यार्थी : वह क़लम अब खो गया है… छिन गया, गिरवी पड़ा है

दिवाली, पटाख़े और हमारी हवा

इतवार की कविता : "मुझमें गीता का सार भी है, इक उर्दू का अख़बार भी है..."

महिला दिवस विशेष: क्या तुम जानते हो/ पुरुष से भिन्न/ एक स्त्री का एकांत

हर सभ्यता के मुहाने पर एक औरत की जली हुई लाश और...

चलो ख़ुद से मुठभेड़ करते हैं...


बाकी खबरें

  • mayawati
    कृष्ण सिंह
    मुद्दा: सवाल बसपा की प्रासंगिकता का नहीं, दलित राजनीति की दशा-दिशा का है
    26 Feb 2022
    जहां तक बसपा की राजनीतिक प्रासंगिकता का प्रश्न है, तो दो या तीन चुनाव हारने से किसी भी पार्टी की प्रासंगिकता खत्म नहीं होती है। लेकिन असल प्रश्न यह है कि पार्टी की राजनीतिक दशा और दिशा क्या है? साथ…
  • cartoon
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    काश! अब तक सारे भारतीय छात्र सुरक्षित लौट आते
    26 Feb 2022
    बहुत सारे काश हैं, लेकिन क्या कीजिए...युद्धग्रस्त यूक्रेन में फिलहाल करीब 20,000 भारतीय फंसे हुए हैं जिनमें ज्यादातर छात्र हैं। भारत सरकार ने अब उनकी वापसी के प्रयास शुरू किए हैं। एयर इंडिया का विमान…
  • लाल बहादुर सिंह
    यूपी चुनाव, पांचवा चरण : ख़त्म हो सकती है भाजपा की चुनौती
    26 Feb 2022
    पांचवें चरण के मतदान के साथ यूपी चुनाव 2022 में भाजपा की चुनौती खत्म हो सकती है, क्योंकि इसके बाद पूर्वांचल के आखिरी दो चरणों में बदले सामाजिक समीकरणों के चलते भाजपा की संभावनाएं  क्षीण हो चुकी हैं।
  • Russia
    पीपल्स डिस्पैच
    हम यूक्रेन की निष्पक्षता पर बातचीत करने के लिए प्रतिनिधि मंडल भेजने को तैयार- रूस
    26 Feb 2022
    मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ कीव और यूक्रेन के अन्य शहरों के आसपास लड़ाई चल रही है। संयुक्त राष्ट्रसंघ की शरणार्थी संस्था के मुताबिक़, इस युद्ध की वज़ह से फिलहाल 1 लाख लोग विस्थापित हो चुके हैं।
  • tomb
    तारिक़ अनवर
    अयोध्या: राजनीति के कारण उपेक्षा का शिकार धर्मनिरपेक्ष ऐतिहासिक इमारतें
    26 Feb 2022
    यह शहर सिर्फ़ मंदिरों ही नहीं मकबरों और स्मारकों से भी भरा हुआ है जो देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब या हिंदू और मुस्लिम संस्कृतियों के आपसी मेल का प्रतीक है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License