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भारत
राजनीति
क्या सुप्रीम कोर्ट हिंदुत्व के जाल में फंस गया है?
जानिए कैसे सबरीमाला पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला अब अहम हो जाता है?
एजाज़ अशरफ़
16 Nov 2019
sabrimala issue

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मामले को इसी प्रकृति के लंबित मुक़दमों के साथ शामिल कर सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ी सात सदस्यीय पीठ के पास भेज दिया है। वो भी तब जब दक्षिणपंथी हिंदुओं के तर्क और मांग धार्मिक सुधारों के साथ टकराते हैं।

मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद़/दरगाह में प्रवेश, गैर पारसी लोगों से शादी कर चुकी पारसी महिलाओं के अग्नि मंदिर में प्रवेश और दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं के ‘खतना की प्रथा’ इन लंबित मुक़दमों में शामिल हैं। जस्टिस आरएफ नरीमन और जस्टिस डी वाय चंद्रचूड़ ने बहुमत से अलग राय दी। उन्होंने कहा कि दूसरे लंबित मामलों में सबरीमाला की तरह 50 याचिकाएं दाख़िल कर पुनर्विचार की मांग नहीं की गई थी। इस फ़ैसले के ज़रिए सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में हर उम्र की महिलाओं के प्रवेश को अनुमति दी थी।

कई मुक़दमे जिनके ज़रिए धार्मिक सुधार किए जाने हैं, उनको एकसाथ करना रूढ़िवादी हिंदू नेताओं की मांग को पूरा करना है, जिनका कहना है कि भारतीय राज्य, धार्मिक-सांस्कृतिक सुधारों के मामले में धार्मिक अल्पसंख्यकों से जुड़ी बातों में दख़ल नहीं देता। हिंदू नेताओं के मुताबिक़, सुधारों में इस तरह का दोहरा रवैया भारतीय राज्य में पश्चिमीकरण के शिकार कुलीनों की पकड़ के चलते है। न तो यह हिंदू परंपराओं को जानते हैं, न हिंदू धर्म को, फिर भी यह हिंदू धर्म को सुधारने की वकालत करते हैं। इसके उलट अल्पसंख्यकों के मामले में यह लोग कुछ नहीं करते।

इस तरह के तर्क 1940 के दशक में भारतीय स्वतंत्रता के बाद हिंदू कोड बिल पर हुई जबरदस्त बहस के दौरान उपजे थे। 1985-86 में जब भारत सरकार ने शाह बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पलट दिया, तब यह दक्षिणपंथी हिंदुओं के लिए एक तरह का धर्मसिद्धांत बन गया। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो के पति को मुआवज़ा देने का निर्देश दिया था।

हाल ही में विजय दशमी के भाषण में भी मोहन भागवत ने इस दोहरी नीति का ज़िक्र किया था। सबरीमाला पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से पैदा हुई अशांति के संदर्भ में बोलते हुए भागवत ने कहा था, ‘’आखिर क्यों सिर्फ हिंदू समाज के विश्वासों को लगातार इस तरह से ख़ारिज किया जाता है, यह बात लोगों के दिमाग में बैठ गई और इससे अशांति पैदा हुई। इस तरह की स्थतियां समाज में शांति के लिए सही नहीं हैं।’’

हिंदू, मुस्लिम और पारसी समुदाय में धार्मिक स्थलों पर होने वाले लिंग आधारित भेदभाव से जुड़े मामलों को एकसाथ लाकर सुप्रीम कोर्ट ने भागवत की बात मान ली है। भविष्य में सात सदस्यीय पीठ के फ़ैसले का तीनों धार्मिक समुदायों पर अलग-अलग प्रभाव हो सकता है।

इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट हिंदू, इस्लाम और पारसी धर्म की बारीकियों का एकसाथ परीक्षण करेगा। यह हिंदू दक्षिणपंथियों की बड़ी जीत है। अब उनकी विचारधारा न्याय को तय करने और राजनीति का ढांचा बनाने लगी है।

हिंदू नेताओं का आरोप कि सुधारों के लिए बस हिंदू धर्म को चुना जाता है, यह बात 1941 से शुरू होती। तब जस्टिस बीएन राउ की अध्यक्षता में हिंदू लॉ कमेटी का गठन किया गया, जिसे शादी और उत्तराधिकार के हिंदू कानूनों को आधुनिक करने का जिम्मा मिला था। इस कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर दो हिस्सों में हिंदू कोड बिल को बनाकर विमर्श के लिए पेश किया गया। बिल के पहले हिस्से में उत्तराधिकार की बात है, जिसे सर सुल्तान अहमद ने फ्रेम किया था। इसे 1943 में केंद्रीय विधान परिषद में रखा गया।

रूढ़िवादी हिंदू नेताओं ने बिल का खूब विरोध किया। आलोचना करने वालों में गीता प्रेस भी शामिल था, जो हिंदू दक्षिणपंथियों के नज़रिए का प्रतिनिधित्व कर रहा था। पत्रकार और स्वतंत्र शोधार्थी अक्षय मुकुल ने अपनी किताब, “गीता प्रेस एंड द मेकिंग ऑफ हिंदू इंडिया’’ में लिखा है, “गीता प्रेस ने अनुभव किया कि अगर उनके तर्कों को हिंदू-मुस्लिम के नज़रिए से पेश किया जाए, तो उनका ज्यादा प्रभाव होगा...”

इस तरह बिल में बेटी को अपने पिता की संपत्ति का उत्तराधिकारी बनाए जाने की बात को हिंदुओं पर मुस्लिम कानून थोपने की तरह पेश किया गया। गीता प्रेस प्रकाशन से निकलने वाले कल्याण ने लिखा, “क्योंकि बिल को सर सुल्तान अहमद ने बनाया था, इसलिए इस तरह का प्रावधान डाला गया। भाई-भाई की लड़ाई भाई-बहन की नहीं बनेगी। अगर बेटियों को अपने पिता से अधिकार मिलेंगे, तो उन्हें अपनी ननद को ऐसे अधिकारों से वंचित करना होगा। ऐसे में हमारे घरों की शांति खत्म हो जाएगी।”

लेकिन बिल लंबित हो गया और इसे संविधान सभा में दोबारा रखा गया। बिल को कानून मंत्री बीआर अंबेडकर की अध्यक्षता वाली कमेटी के सामने पेश किया गया। कमेटी की रिपोर्ट पर संविधान सभा में विमर्श किया गया, जिसमें हिंदू दक्षिणपंथियों ने अपने हमलों के तरीके को बदल दिया। बिल को एक मुस्लिम षड्यंत्र बताया गया और सरकार पर आरोप लगाया गया कि उनकी धर्मनिरपेक्षता सिर्फ हिंदू कानूनों के सुधार और धर्म में छेड़खानी तक सीमित है।

इस आलोचना को कांग्रेस में शामिल रूढ़िवादी हिंदू नेताओं के स्पर्श से बल मिला। वहीं परिषद के बाहर आरएसएस ने बिल पर हमला किया। इंडिया ऑफ्टर गांधी में रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि हिंदू कोड बिल का विरोध करने आरएसएस स्वयंसेवकों को दिल्ली लाती, जो अपनी गिरफ्तारी देते। उनकी वृहत मांगों में पाकिस्तान को तोड़ने और नेहरू को गद्दी से हटाने की मांग होती थी।। वे नारा लगाते, “पाकिस्तान तोड़ दो, नेहरू हुकूमत छोड़ दो।”

अकदामिक दुनिया में कार्यरत चित्रा सिन्हा ने अपने पेपर, ‘रियोटॉरिक, रीज़न एंड रिप्रेजेंटेशन: फोर नैरेटिव इन द हिंदू कोड बिल’ में लिखा है कि हिंदू महासभा की चेन्नई शाखा ने ‘हिंदू कोड बिल’ को ‘आत्मघाती मूर्खता’ करार दिया था। क्यों? इसलिए कि महासभा का तर्क था कि एकल विवाह पद्धति पर आधारित नए हिंदू कोड बिल के ज़रिए पूरे भारत को एक बड़ा पाकिस्तान बना दिया जाएगा, जहां बचे हुए हिंदुओं से उनकी ही पितृभूमि में अजनबियों की तरह व्यवहार किया जाएगा।

संविधान सभा में हिंदू दक्षिणपंथी अतार्किक नहीं थे। वह सवाल उठाते हुए पूछते हैं कि क्यों सिर्फ हिंदुओं का सुधार किया जा रहा है, दूसरे धर्मों का नहीं। सरकार उन्हें इस बात से सहमत नहीं करवा पाई कि एक बेहद विशाल हिंदू बहुसंख्यक, पंथनिरपेक्ष भारत अल्पसंख्यकों के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा।

जैसे, कांग्रेस के दक्षिणपंथी नेता सेठ गोविंद दास ने संविधान सभा में कहा, “आज जब हम अपने देश को एक पंथनिरपेक्ष देश कहते हैं… तब डॉ अंबेडकर को एक ऐसा बिल पेश करना था, जो सिर्फ हिंदुओं के लिए ही नहीं, बल्कि सभी नागरिकों पर लागू होता। इस देश को ‘पंथनिरपेक्ष राज्य’ मानना, पर साथ में हिंदू कोड बिल को लाना मेरे हिसाब से सही नहीं है।”

पश्चिम बंगाल से चुने गए लक्ष्मीकांत मित्रा ने उस वक्त कहा था कि सरकार इसलिए यूनिवर्सल सिविल कोड नहीं लाई क्योंकि वो मुस्लिमों को छू नहीं सकती। उन्होंने कहा, “आप जानते हैं कि आज हिंदू समाज इतनी बुरी अवस्था में है कि आप उसके साथ कुछ भी कर सकते हैं। केवल कुछ अति-आधुनिक लोग जो काफी मुखर हैं, लेकिन जिनके पास देश में कोई आधार नहीं है, वे ही इस बिल में रुचि ले रहे हैं।”

मित्रा को यह भी लगता था कि बिल में हिंदू धर्म से इतर विचारों को जगह दी गई थी। पूरे बिल में हिंदुओं की मान्यताओं के उल्लंघन की भावना दिखती है।

1963 में पद्म विभूषण पाने वाले एचवी पातस्कर की टिप्पणियां भी किसी संघ प्रचारक की तरह पागलपन भरी समझ में आती हैं। एक यूनिफॉर्म सिविल कोड से मुस्लिमों के कुछ विशेषाधिकार खत्म हो जाते, जो उन्हें पर्सनल लॉ के चलते मिले हैं। पातस्कर ने कहा, “मौजूदा बिल के जरिए आप मुस्लिमों को चार बीवियां रखने तक मनचाही की छूट दे रहे हैं। अब ऐसा होगा कि अगर किसी बहुत अमीर आदमी को एक से ज्यादा बीवियां रखनी हैं, तो वह मुस्लिम बन जाएगा और जितनी पत्नियां रखनी हैं, रख लेगा।”

1971 में पद्म भूषण पाने वाले गोकुलभाई दौलतराम भट्ट ने कहा था, “केवल हिंदू समुदाय ही ऐसा है कि आप कुछ भी करेंगे, वो सहता रहेगा। मुस्लिमों को देखिए। क्या किसी की हिम्मत है कि उनके लिए कोड बनाए। क्यों शिया और सुन्नी विचारों को एक नहीं कर दिया जाता? क्या आप ईसाईयों के क़ानून से खिलवाड़ कर सकते हैं? या आप पारसियों को छेड़ सकते हैं?बेचारे हिंदुओं को हर चीज सहनी पड़ती है।” भट्ट के मुताबिक़, यह बिल अंबेडकर की हीन भावना का परिणाम है।

लेकिन अंबेडकर को लगता था कि यूनिफॉर्म सिविल कोड की मांग, हिंदू कोड बिल को खत्म करने की रणनीति है। रामचंद्र गुहा लिखते हैं, “वो जो कल तक इस कोड के सबसे बड़े विरोधी थे, जो हिंदुओं के पुरातन कानूनों की वकालत करते थे आज पूरे भारत के लिए एक सिविल कोड की मांग कर रहे हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें लगता है कि हिंदू कोड बिल को बनाने में ही चार से पांच साल लग गए, तो सिविल कोड बनाने में तो दस साल लग जाएंगे”
 
जब हिंदू, मुस्लिम और पारसी मुद्दों को जोड़ दिया जाएगा, तब आरएसएस प्रमुख इस बात पर हैरानी नहीं जता पाएंगे कि क्यों सिर्फ हिंदु समाज की आस्थाओं और विश्वास का लगातार हनन होता है। जनता के लिए, सबरीमाला केस के फैसले में यह देखना अहम होगा कि क्या जज, हिंदुत्ववादी ताकतों का प्रतिरोध कर पाएंगे।

ऐजाज़ अशरफ़ स्वतंत्र पत्रकार हैं। यहां उनके विचार निजी हैं।

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

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