NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कृषि
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
कृषि क्षेत्र पर कॉरपोरेट घरानों की सर्जिकल स्ट्राइक!
राजनीति में चुनाव तो ग़रीब के वोट से जीता जाता है; लेकिन चुनाव लड़ा हमेशा अमीरों के पैसों से जाता है। मोदीजी की अगुवाई में भाजपा को इलेक्टोरल बॉन्ड के ज़रिये अरबों की कॉरपोरेट फंडिंग हुई है इसलिए सरकार पर कृषि क्षेत्र को उनके लिए खोलने का दबाव है।
अंशुल त्रिवेदी
21 Sep 2020
cartoon click

बीते जून कोरोना काल के दौरान आत्मनिर्भर भारत अभियान की कड़ी में केंद्र सरकार ने तीन अध्यादेशों के माध्यम से कृषि क्षेत्र में आमूलचूल बदलाव की नींव रखी। रविवार, 20 सितंबर को इन अध्यादेशों को राज्यसभा में विपक्ष की वोटिंग की मांग को नज़अंदाज़ करते हुए विवादास्पद ढंग से केवल ध्वनि मत से पारित कराया गया। ज़ाहिर है कि केंद्र सरकार ने इन सुधारों को किसान हितैषी बतलाया है। उनका कहना है कि विपक्षी दलों का विरोध निराधार है और वे अपने राजनीतिक फायदे के लिए किसानों को गुमराह कर रहे हैं। लेकिन गौरतलब है की पंजाब और हरियाणा में किसानों ने इन प्रस्तावित बदलावों का सड़क पर उतर कर विरोध शुरू कर दिया है और तो और इन विधेयकों के विरोध में भाजपा के सबसे पुराने साथी अकाली दल की नेता हरसिमरत कौर ने भी मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा दे दिया है। ऐसे में इनका प्रभाव समझना ज़रूरी है।

बैरियर - फ्री कृषि: किसके लिए बैरियर हटाए जा रहे हैं?

इन नए क़ानूनों में फसलों की खरीद को कृषि उत्पाद बाज़ार समिति या एपीएमसी कानूनों से छूट प्राप्त होगी। यानी किसान अपनी फसल सरकार द्वारा अधिकृत मंडियों के ज़रिये बेचने के लिए बाध्य नहीं होंगे। वहीं कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा देने के लिए स्पॉनसर यानी कोई भी व्यक्ति या कंपनी और किसान के बीच निजी करार के प्रावधान लाए गए हैं। इन करारों के अंतर्गत पैदा हुई फसलों पर किसी भी राज्य के क़ानून और अनिवार्य वस्तु अध्यादेशों के प्रावधान लागू नहीं होंगे। इसके साथ ही अनिवार्य वस्तु अधिनियम में स्टॉक लिमिट के प्रावधान को बदल दिया गया है --  जब तक बाग़वानी उत्पादों की कीमतों में 100% और ख़राब न होने वाले उत्पादों (non perishable produce) की कीमतों में 50% वृद्धि नहीं होती तब तक सरकार स्टॉक लिमिट नहीं लगा सकती। नए संशोधनों के अनुसार सरकार अनाज, तिलहन, दाल, आलू और प्याज की कीमतों को केवल असाधारण परिस्थितियों -- जैसे अकाल या युद्ध -- के दौरान ही नियंत्रित कर सकती है।

सामान्य परिस्थितियों में इन्हें पूर्णतः बाज़ार के अधीन छोड़ दिया गया है। स्टॉक लिमिट हटाने का तर्क यह दिया गया है की चूंकि हम आवश्यकता से अधिक खाना उत्पादित करने वाले देश हैं इसलिए अब इसकी ज़रुरत नहीं है। सरकार के अनुसार इन कदमों से गैर-ज़रूरी विनियमन समाप्त होगा, कृषि व्यापार में बैरियर ख़तम होंगे; प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी जिससे किसानों के विकल्प बढ़ेंगे और नतीजतन उनकी आय बढ़ेगी और आम आदमी को दाम सही मिलेंगे।

पहली नज़र में तो यह तर्कसंगत प्रतीत होता है किन्तु गौर करने पर यह दावे खोखले नज़र आते हैं। इन क़ानूनों में कृषि सम्बंधित मामलों का अप्रत्याशित केन्द्रीकरण किया गया है। उपमहाद्वीप से विशाल आकार के देश में हर क्षेत्र के किसानों की समस्याएँ और आवश्यकताएं अलग हैं। राज्य सरकारों को अनदेखा कर हरियाणा के बड़े किसान और अलीराजपुर के छोटे आदिवासी किसान को एक ढाँचे में ठूंसना कहाँ तक उचित है? एपीएमसी और राज्यों द्वारा बनाए गए कानूनों से छूट भारत के पूरे कृषि क्षेत्र और उस पर आश्रित करोड़ों परिवारों को एक मंत्रालय और उसके चंद बाबुओं के रहम-ओ-करम पर छोड़ देगा।

इसे भी पढ़ें :  कृषि सुधार या पूंजीपतियों की झोली में ‘किसानों’ की सरकार?

एपीएमसी क़ानून, मंडियों और समर्थन मूल्य का खेल

इन क़ानूनों के तहत मंडियों की भूमिका नगण्य कर दी जायेगी। कहा जा रहा है कि मंडियों में व्यापारियों की संख्या कम होने के कारण किसानों को उचित दाम नहीं मिलते। मंडियों में शुल्क आदि किसानों से ही वसूला जा रहा है और कई व्यापारियों ने अपना एक समूह बना लिया है जिसके कारण किसानों के साथ अन्याय होता है। इन सबसे बचने के लिए एपीएमसी से अलग प्राइवेट मंडियां और सीधे किसान से खरीद के उपाय सुझाए गए हैं। एपीएमसी की मंडियों में सुधार की ज़रुरत है इससे कोई इंकार नहीं कर रहा लेकिन किसान को अपनी फसल पर न्यूनतम समर्थन मूल्य सिर्फ वहीं मिलता है। मंडियों को ख़त्म करना मतलब न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था को समाप्त करना। वैसे भी मंडियों के एकाधिकार के दावे गलत हैं।

एनएसएसओ की एक रिपोर्ट के अनुसार सोयाबीन को छोड़ किसी भी फसल की 25% से ज़्यादा बिक्री मंडी में नहीं बल्कि निजी व्यापारियों के द्वारा ही हुई है। यह इसलिए क्योंकि ज़्यादातर छोटे किसान कमज़ोर आर्थिक स्थिति या इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण स्थानीय व्यापारियों को फसल बेचने पर विवश हो जाते हैं। 2017 में किसानों की आय दुगुनी करने की रिपोर्ट के अनुसार पूरे देश में 6, 676 मंडियां हैं जबकि हमें 3, 500 थोक बाज़ारों और 23, 000 ग्रामीण हाटों की आवश्यकता है।

बिहार में 2006 में एपीएमसी क़ानून को ख़त्म कर देने के परिणाम छोटे और सीमान्त किसानों के लिए प्रतिकूल ही रहे हैं। सरकार द्वारा नियंत्रित मंडियों के अभाव में व्यापारियों द्वारा खुद की मंडियां शुरू हुई जिसमें छोटे किसानों की सुनवाई और मुश्किल थी। लेकिन उससे ज़रूरी बात यह थी की किसी भी निजी कंपनी ने फसल खरीदी और भंडारण की समानांतर व्यवस्था खड़ी नहीं की। एपीएमसी को दिए गए शुल्क से किसानों के लिए सुविधाएं जुटाई जाती थी लेकिन बिहार में यह पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर जर्जर अवस्था में पहुँच गया। मध्य प्रदेश में जहां आईटीसी को मंडी के बाहर खरीदी का मौका मिला वहाँ किसानों को अच्छी कीमतें मिलीं लेकिन यह केवल उन फसलों पर मिली जो आईटीसी की रणनीति में ज़रूरी थी और वो भी सीमित समय तक। बाकी फसलों के उचित दामों के लिए किसान को मंडी की और ही मुड़ना पड़ा।

इन विधेयकों का तीसरा सबसे चिंताजनक पहलू यह है की इसमें विवादों को सुलझाने का अधिकार चुने हुए मंडी प्रतिनिधियों से छीन कर एसडीएम और कलेक्टर को दे दिया है। नौकरशाही का झुकाव हमेशा सत्तापक्ष की तरफ होता है और गरीब किसानों को लालफीताशाही में उलझाकर रख देगा जबकि धनाढ्य व्यापारियों के लिए राह आसान कर देगा। और तो और इन मामलों में न्यायपालिका के दरवाज़े भी किसानों के लिए बंद हैं।

न्यू इंडिया की कृषि नीति किसके लिए?

इन नए क़ानूनों से छोटे किसान, छोटे और मध्यम व्यापारी और राज्यों का नुकसान है तब भी केंद्र सरकार इन्हें लागू करने को आतुर क्यों है? शायद इसलिए की अब कुछ बड़े कॉरपोरेट घराने खुदरा व्यापार में आने के लिए अपने खुद के सप्लाई चेन बनाना चाहते हैं और ऐसे में यह अध्यादेश बड़े पैमाने पर कृषि क्षेत्र में हस्तक्षेप करने में उपयोगी होंगे। एपीएमसी की मंडियां बंद हो जाएंगी तो उनकी जगह चंद कॉरपोरेट घराने सबसे बड़े खरीददार बन जाएंगे। लेकिन एक बार इन कंपनियों ने कृषि क्षेत्र में अपनी पैठ बना ली तो इन पर किसी भी तरह का लोकतांत्रिक दबाव काम नहीं करेगा।

राजनीति में चुनाव तो गरीब के वोट से जीता जाता है; लेकिन चुनाव लड़ा हमेशा अमीरों के पैसों से जाता है। मोदीजी की अगुवाई में भाजपा को इलेक्टोरल बॉन्ड के ज़रिये अरबों की कॉरपोरेट फंडिंग हुई है इसलिए सरकार पर कृषि क्षेत्र को उनके लिए खोलने का दबाव है लेकिन हैरत की बात यह है की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के किसान संगठन भारतीय किसान संघ और भारतीय मज़दूर संघ ने भी इस नीति को मौन समर्थन दे दिया है। शायद मोदीजी की लोकप्रियता और कॉरपोरेट के धनबल ने संघ के अनुशासित संगठनों और समर्पित कार्यकर्ताओं को भी समझौता करने पर मजबूर कर दिया है। शायद अब संघ के स्वदेशी जागरण मंच की तरह इन संगठनों को भी मार्गदर्शक मंडल का रास्ता दिखा दिया जाएगा।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। आप जेएनयू में सेंटर फॉर पॉलिटिकल स्टडीज से एमफिल कर चुके हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

इसे भी पढ़ें : कृषि विधेयक: क्या संसद और सांसदों की तरह सड़क को ख़ामोश और किसानों को ‘निलंबित’ कर पाएगी सरकार!

Parliament of India
Agriculture Bill
farmer crises
agricultural crises
Farm Bills
MPs Suspended
Rajya Sabha
Modi Govt
Farmers’ Protests
Opposition Protests
Agri Bills
cartoon
cartoon cllick
Irfan ka cartoon

Related Stories

ब्लैक राइस की खेती से तबाह चंदौली के किसानों के ज़ख़्म पर बार-बार क्यों नमक छिड़क रहे मोदी?

बिहार: कोल्ड स्टोरेज के अभाव में कम कीमत पर फसल बेचने को मजबूर आलू किसान

ग्राउंड  रिपोर्टः रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के गृह क्षेत्र के किसान यूरिया के लिए आधी रात से ही लगा रहे लाइन, योगी सरकार की इमेज तार-तार

किसानों और सरकारी बैंकों की लूट के लिए नया सौदा तैयार

पूर्वांचल से MSP के साथ उठी नई मांग, किसानों को कृषि वैज्ञानिक घोषित करे भारत सरकार!

किसानों की ऐतिहासिक जीत के मायने

क्या चोर रास्ते से फिर लाए जाएंगे कृषि क़ानून!

ग्राउंड रिपोर्ट: पूर्वांचल में 'धान का कटोरा' कहलाने वाले इलाके में MSP से नीचे अपनी उपज बेचने को मजबूर किसान

किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है कृषि उत्पाद का मूल्य

खेती गंभीर रूप से बीमार है, उसे रेडिकल ट्रीटमेंट चाहिएः डॉ. दर्शनपाल


बाकी खबरें

  • असद रिज़वी
    CAA आंदोलनकारियों को फिर निशाना बनाती यूपी सरकार, प्रदर्शनकारी बोले- बिना दोषी साबित हुए अपराधियों सा सुलूक किया जा रहा
    06 May 2022
    न्यूज़क्लिक ने यूपी सरकार का नोटिस पाने वाले आंदोलनकारियों में से सदफ़ जाफ़र और दीपक मिश्रा उर्फ़ दीपक कबीर से बात की है।
  • नीलाम्बरन ए
    तमिलनाडु: छोटे बागानों के श्रमिकों को न्यूनतम मज़दूरी और कल्याणकारी योजनाओं से वंचित रखा जा रहा है
    06 May 2022
    रबर के गिरते दामों, केंद्र सरकार की श्रम एवं निर्यात नीतियों के चलते छोटे रबर बागानों में श्रमिक सीधे तौर पर प्रभावित हो रहे हैं।
  • दमयन्ती धर
    गुजरात: मेहसाणा कोर्ट ने विधायक जिग्नेश मेवानी और 11 अन्य लोगों को 2017 में ग़ैर-क़ानूनी सभा करने का दोषी ठहराया
    06 May 2022
    इस मामले में वह रैली शामिल है, जिसे ऊना में सरवैया परिवार के दलितों की सरेआम पिटाई की घटना के एक साल पूरा होने के मौक़े पर 2017 में बुलायी गयी थी।
  • लाल बहादुर सिंह
    यूपी में संघ-भाजपा की बदलती रणनीति : लोकतांत्रिक ताकतों की बढ़ती चुनौती
    06 May 2022
    नज़रिया: ऐसा लगता है इस दौर की रणनीति के अनुरूप काम का नया बंटवारा है- नॉन-स्टेट एक्टर्स अपने नफ़रती अभियान में लगे रहेंगे, दूसरी ओर प्रशासन उन्हें एक सीमा से आगे नहीं जाने देगा ताकि योगी जी के '…
  • भाषा
    दिल्ली: केंद्र प्रशासनिक सेवा विवाद : न्यायालय ने मामला पांच सदस्यीय पीठ को सौंपा
    06 May 2022
    केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच इस बात को लेकर विवाद है कि राष्ट्रीय राजधानी में प्रशासनिक सेवाएं किसके नियंत्रण में रहेंगी।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License