NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कोविड-19
नज़रिया
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
टैंक रोड-करोल बाग़ : बाज़ारों की स्थिति ख़राब, करना होगा लम्बा इंतज़ार
"पहले ही जीएसटी से काम को नुकसान हुआ और अब कपड़े के बढ़े दामों ने परेशान कर दिया है। जीवन यापन करना कठिन हो रहा है।”
सना सुल्तान
24 Mar 2021
Tank Road
टैंक रोड

लॉकडाउन के एक साल पूरे होने पर जहां सफलता के नए दावे किये जा रहे हैं, वहीं फिर से कोरोना गो-कोरोना गो चीखते हुए ताली पीटने, बर्तन बजाते भारतीय नागरिको के वीडियो और फोटोज़ दोबारा वाइरल हो रहे हैं

लेकिन उन भारतीय नागरिकों का दुःख-दर्द बहुत कम सामने आ पाया जो सम्मान से दो जून की रोटी कमा रहे हैं और छोटा-मोटा धंधा-कारोबार कर रहे हैं। दो-चार लोगों को कम तन्खवाह पर ही सही, नौकरी पर तो रखे हुए थे-देश के असंगठित लघु-माध्यम वर्गीय कारोबार की लॉकडाउन ने कमर ही तोड़ दी। इसका जीता-जगता मिसाल है देश की राजधानी में खुदरा थोक बाजार का हब-करोल बाग़। करोल बाग़ का टैंक रोड बाजार रेडीमेड जीन्स की पेंट-शर्ट के लिए पूरे इलाके में मशहूर है। राजधानी दिल्ली की दूसरी सब से बड़ी जीन्स की मार्किट है। टैंक रोड पर मुर्दनी छाई हुई है। आज टैंक रोड मार्किट का हाल बुरा है। ऐसे ही हमने बात की टैंक रोड के दुकानदारों से कि कितना गहरा पड़ा है कोरोना का अर्थव्यवस्था और काम पर असर।

पंकज जी टैंक रोड पर पिछले 10-12 सालों से किराए की दुकान से दुकानदारी कर रहे थे। अचानक लॉकडाउन से बाजार बंद हुए न कोई कमाई का साधन रहा जिससे किराया दिया जा सके। साथ ही दुकान पर काम करने वालों का वेतन भी देना मुश्किल था। इसके चलते दुकान को बंद करना पड़ा। पंकज जी बताते हैं, “मैंने काम दोबारा शुरू किया, लेकिन अब भी आमदनी उतनी नहीं है। काम का स्तर इतना घट गया है की अपना खर्चा निकलना ही मुश्किल हो रहा है। जो लगे-बंधे खरीदार हैं उन्हीं से काम चल रहा है, असल में अगर बाजार की हालत देखी जाए तो सुधार जितने भी देखेंगे, वो कमजोर ही लगेंगे। पहले ही जी.एस.टी से काम को नुकसान हुआ और अब कपड़े के बढ़े दामों ने परेशान कर दिया है। जीवन यापन करना ही कठिन हो रहा है।”  

हर कोई मंदी से परेशान है। अब सब की नींव कमज़ोर हो गई है। सालों की मेहनत खत्म हो गई है| लॉकडाउन को एक साल हो गया है लेकिन यहां के कारोबारियों के संकट खत्म नहीं हो रहे। अर्थव्यवस्था कमज़ोर हो चुकी है। लॉकडाउन ने अर्थव्यवस्था को पूरी तरह नष्ट कर दिया है। लॉकडाउन से जल्दी उबरना मुश्किल लगता है।  

अभिषेक पाण्डेय पेशे से सी.ए हैं जो टैंक रोड पर ही एक दुकान पर नौकरी करते हैं जिनके नीचे 3-4 अकाउंटेंट काम किया करते थे। वो कहते हैं, “मैं पूरी फर्म का लेखा जोखा देखता हूँ। लॉकडाउन के चलते उन सब अकाउंटेंट्स की नौकरियां चली गईं जो मेरे नीचे काम किया करते थे। मेरी तनख्वाह 40 के पार थी, अब आधी रह गई है। 5-6 साल से नौकरी पेशे में हूँ | सी.ए. के लिए काम मिलना कोई मुश्किल बात नहीं है, लेकिन कहीं काम न होने की वजह से बहुत नुकसान हुआ है। आज जिस दुकान में मैं बैठता हूँ, खाली पड़ी रहती है। सभी दुकानदार परेशान हैं। नौकरियां जा चुकी हैं| काम की मंदी है, पैसे की तंगी है। इतनी समस्याओं के साथ इतने समय से कम तन्खवाह में ही गुज़ारा कर रहे हैं। लोगों के पास आय का कोई और साधन नहीं है। नौकरी छोड़ नहीं सकते क्योंकि आज कहीं और नौकरी असानी से मिल नहीं रही हैं| 

सुधीर गुप्ता अपने 3 भाइयों के साथ जीन्स की फैक्टरी चलाते हैं। वे जीन्स की फैक्ट्री के 3 मालिकों में से एक हैं। फैक्ट्री का माल टैंक रोड पर अपनी दुकान पर ही सप्लाई करते हैं। सुधीर जी का काम दिल्ली में एक अच्छे स्तर चला करता था। फैक्ट्री में तक़रीबन 300 से अधिक लोग काम करते थे। दिल्ली में ही 3 से 4 अलग-अलग जगह फैक्ट्रियां थीं, लेकिन लॉकडाउन ने सब बर्बाद कर दिया।

सुधीर जी बताते हैं, “कपड़े के काम में हमेशा उधारी चलती है। हम पर लोगों का उधार होता है। हमारा सब कुछ बंद हो गया। कहीं से पैसा न आया तो हम भी किसी को पैसा न दे सके। उन पैसों की उधारी अभी तक चल रही है। लोग अभी भी पैसा नहीं दे रहे हैं। लॉकडाउन के बाद भी लोग पैसा नहीं दे पा रहे हैं।”

वे आगे कहते हैं, “इतना बड़ा घर परिवार देखना चलाना मुश्किल था। बर्बादी का आलम ऐसा है कि हमें भी लोगों का पैसा चुकाने के लिए अपनी फैक्टरी बेचनी पड़ी। लॉकडाउन से काम बिल्कुल खत्म हो चुका था। थोड़ा-थोड़ा कर के फिर से शुरआत हुई। फैक्ट्री में माल बनाना शुरू किया तो उसके बिकने की समस्या आ गई। फिर भी कोशिश कर रहे हैं कि बाजार ठीक हो जाये। अर्थव्यवस्था पटरी से खिसकी हुई है, वापस आने में थोड़ा समय लगेगा। हम कारोबार को उठाने के लिए कदम उठा रहे हैं।”

सरकार पर गुस्सा निकालते हुए सुधीर बताते हैं, “यह सरकार भी हमारे लिए एक बड़ी समस्या बनी है। जब से सत्ता में आई हैं तब से काम की हालत को और देश की हालत को कमज़ोर कर दिया है। सरकार से तो कोई उम्मीद ही नहीं की जा सकती कि वह व्यापार मंडलों की मदद करेगी।”

आने वाले समय के बारे में टिप्पणी करते हुए वे कहते हैं, “मुझे अभी भी लगता है कि बाज़ारों की हालत को ठीक होने में और दोबारा से कारोबार को सुधरने में 1-2 साल लगेंगे। जैसे पहले माहौल था वैसे होने में अभी समय लगेगा। मेरे लिए बहुत बड़ी परेशानी है कि मैंने अपनी फैक्टरियां बंद की जिससे हम लोगों का पैसा दे सके। फिर से फैक्टरियां शुरू करना आसान काम नहीं है। पैसा लगता है, मेहनत लगती है, लोग चाहिए होते हैं, सब से बड़ी बात लोगों को पैसा देना होता है, जब आज हाथ में इतना पैसा नहीं कि हम दोबारा फैक्टरियां लगा सके।” 

बालकिशन जी गुरुग्राम में कपड़े की फैक्ट्री में सुपरवाइजर हैं और उनकी फैक्ट्री से कपड़े तैयार हो कर बेचने के लिए टैंक रोड पर ही आते हैं। वे बताते हैं, “जो काम कभी रुकता ही नहीं था, जो फैक्ट्री सातों दिन चलती थी। अब हफ्ते में एक-दो बार ही प्लांट स्टार्ट करते हैं। दिन के खर्चे वही हैं, लेकिन पैसा नहीं है। लॉकडाउन से कमाई पर बहुत असर पड़ा है। हमारी फैक्ट्री में जहां 300 लोग काम किया करते थे अब 20 से 25 लोगों का ही काम रह गया है, दुकानों पर खरीदार कम हो गये हैं जिस से आय पर बड़ा असर पड़ा है।” 

बालकिशन काम के स्तर के बारे में जानकारी देते हुए कहते हैं, “दुकानदारी 100% से घट कर अब सिर्फ 10-20% रह गई है। लॉकडाउन में फैक्ट्रियां बंद थी। सब कारीगर अपने-अपने घर चले गए। मुझे भी लॉकडाउन में 4-5 महीने कोई तनख्वाह नही मिली। पांचवे-छटे महीने जब काम शुरू हुआ तो कुछ पैसों में ही गुज़ारा किया। साल भर हो गया है कि अब तक किसी भी महीने पूरी तनख्वाह नहीं मिली। जितनी मिल रही है उसी मे काम चला रहे हैं। तब से अभी तक काम में कोई तेज़ी नहीं दिखी। त्योहारों पर भी लोग कम ही खरीदारी कर रहे हैं। टैंक रोड पर पहली जैसी भीड़ नहीं हैं। दुकानों में काम करने वाले लड़कों की गिनती कम करदी गई।”

लॉकडाउन के चलते लाखों लोगों की नौकरियां खत्म हुई हैं। सब कुछ रुकने के बाद किसी चीज़ को दोबारा से चलाना बेहद कठिन काम है। जब लोगों के पास पैसा ही नहीं होगा तो लोग क्या खरीदेंगे और क्या खाएंगे। गरीब के लिए पेट पालना पहली प्राथमिकता है। अभी भी बाज़ारों को और अर्थव्यवस्था को सुधरने में कम से कम एक साल लगेगा। टैंक रोड ही नहीं पूरे देश को पूरी तरह सुधरने में अभी भी लम्बा समय लगेगा।

(लेखिका एक समाजसेवी हैं।)

economic crises
India Lockdown
Coronavirus lockdown
job loss

Related Stories

रोजगार, स्वास्थ्य, जीवन स्तर, राष्ट्रीय आय और आर्थिक विकास का सह-संबंध

कोविड-19 महामारी से उबरने के लिए हताश भारतीयों ने लिया क़र्ज़ और बचत का सहारा

कोविड महामारी की दूसरी लहर में लोगों का बैंक जमा घटा, हाथ में रखी नकदी भी कम हुई: आरबीआई लेख

सात साल के सबसे बड़े संकट में नरेंद्र मोदी

फिर एक बार, Middle Class का बुरा हाल

बिहारः लॉकडाउन में आर्थिक तंगी से जूझ रहे निचली अदालतों के वकील

तीसरी लहर की तैयारी ही अर्थव्यवस्था को बचा सकती है

गोल्ड लोन की ज़्यादा मांग कम आय वाले परिवारों की आर्थिक बदहाली का संकेत

क्या 2021 में स्टॉक मार्केट हो सकता है ठप्प?

बीजेपी के समझना चाहिए कि महामारी को हराने के लिए बड़बोलापन नहीं, वैक्सीन काम आती है


बाकी खबरें

  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    ज्ञानवापी मामला : अदालत द्वारा नियुक्त कोर्ट कमिश्नर को बदलने की मांग खारिज
    12 May 2022
    ज्ञानवापी मस्जिद प्रबंधन समिति की तरफ से एक अधिवक्ता ने अदालत के अधिकारी अजय कुमार मिश्रा को बदलने की मांग करते हुए एक आवेदन दिया था, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि वह निष्पक्ष रूप से काम नहीं कर…
  • taj
    सुभाष गाताडे
    कब तक रहेगा पी एन ओक का सम्मोहन ?
    12 May 2022
    ताज़महल के तेजोमहल अर्थात शिव मंदिर होने को लेकर अदालत में एक और याचिका दायर की गयी है। इस याचिका में कहा गया कि ताजमहल के बंद कमरे खोले जाएं ताकि मालूम चल सके कि उसके भीतर क्या है?
  • inflation
    न्यूज़क्लिक टीम
    आटा भी हो गया महंगा, क्या कर रही सरकार?
    12 May 2022
    पेट्रोल, डीजल, सरसों तेल और तमाम ज़रूरी चीजों के बाद अब गेहूं का आटा भी महंगा हो रहा है। इस वक़्त आटे की खुदरा बाज़ार में औसतन कीमत 32-33 रुपये प्रति किलो है, यही क़ीमत पिछले साल मई में 29 रुपये प्रति…
  • भाषा
    झारखंड की खान सचिव पूजा सिंघल जेल भेजी गयीं
    12 May 2022
    झारखंड की खान सचिव एवं 2000 बैच की भारतीय प्रशासनिक सेवा की अधिकारी पूजा सिंघल को प्रवर्तन निदेशालय ने तीन दिनों तक चली लंबी पूछताछ के बाद करोड़ों रुपये के भ्रष्टाचार के मामले में गिरफ्तार कर लिया ।
  • राम पुनियानी
    क्या ताजमहल भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं है?
    12 May 2022
    कहा जा सकता है कि लोगों की मिली-जुली अभिव्यक्तियों की समग्रता ही भारतीय संस्कृति है; यह समावेशी है और इसमें सामाजिक जीवन के सभी पहलुओं का समन्वय है
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License