NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
पेट्रो डकैती: सार्वजनिक लूट का सरकारी ब्लूप्रिन्ट
मोदी सरकार लोगों से पैसा वसूलने और अपने संसाधनों को बढ़ाने के लिए बेरहमी से पेट्रोल और डीज़ल पर टैक्स बढ़ाती रही है।
सुबोध वर्मा
18 Jun 2021
तेल के नाम पर आम जनता से वसूली!

चूंकि कुछ साल पहले पेट्रोलियम उत्पादों की क़ीमतों को नियंत्रण मुक्त कर दिया गया था और इन क़ीमतों को बाज़ार से "जोड़" दिया गया था। केंद्र सरकार अब इसका इस्तेमाल लोगों पर अप्रत्यक्ष कर लादने के लिए करता है।

उदाहरण के लिए चार बड़े महानगरों– दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई को ही लें। इन महानगरों में पेट्रोल की औसत क़ीमतें 2014-15 की तक़रीबन 58.91 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर 15 जून 2021 को 98.26 रुपये हो गयी हैं। क़ीमतों में यह बढ़ोत्तरी सात सालों में लगभग 67 प्रतिशत की है। इसी तरह, इसी अवधि में डीज़ल की औसत क़ीमत 48.26 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर 91.01 रुपये प्रति लीटर हो गयी, जो कि स्तब्धकर देने वाली तक़रीबन 89% की वृद्धि है (नीचे दिये गये चार्ट को देखें)

पिछले कुछ सालों में दैनिक क़ीमतों की यह पूरी सूची पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के तहत काम करने वाले पेट्रोलियम योजना और विश्लेषण प्रकोष्ठ (Petroleum Planning and Analysis Cell)) के पास उपलब्ध है।

भारत अपने ज़्यादातर पेट्रोलियम उत्पादों की ज़रूरतों को अन्य देशों से एक निश्चित सम्मिश्रण में कच्चे तेल का आयात कर के और फिर इसे पेट्रोल, डीज़ल, एलपीजी और दूसरे उपयोगी रसायनों सहित विभिन्न उत्पादों में रिफाइन कर के पूरा करता है। अक्सर यह कह दिया जाता है कि कच्चे तेल की बढ़ती इन वैश्विक क़ीमतों के चलते ही घरेलू क़ीमतें बढ़ रही हैं। इससे बड़ा झूठ कुछ हो नहीं सकता है।

जैसा कि ऊपर दिये गये चार्ट से पता चलता है कि पिछले सात सालों में कच्चे तेल (भारतीय परिधि) की क़ीमतें 2014-15 की औसतन  46.59 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर मई 2021-22 में  66.95 डॉलर प्रति बैरल हो गयी है, जो कि तक़रीबन 44% की बढ़ोत्तरी है। लेकिन, इसके मुक़ाबले घरेलू क़ीमतों में बहुत ज़्यादा वृद्धि हुई, जो यह दर्शाता है कि पेट्रोल और डीज़ल की आसमान छूती क़ीमतों का कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय क़ीमतों से कोई लेना-देना नहीं है।

फिर सवाल पैदा होता है कि इन बढ़ती क़ीमतों के पीछे की वजह क्या  है? दरअस्ल, यह विभिन्न पेट्रोलियम उत्पादों के उत्पादन पर लगातार बढ़ते उस कर का नतीजा है, जो भारत सरकार तेल विपणन कंपनियों पर लगाती है। इन करों में शामिल हैं– केंद्रीय उत्पाद शुल्क, एकीकृत वस्तु और सेवा कर (IGST), केंद्रीय GST, सीमा शुल्क, आदि। कच्चे तेल पर भी चुंगी लगती है। लेकिन, कर का बड़ा हिस्सा केंद्रीय उत्पाद शुल्क के तौर पर सरकार वसूल करती है।

उत्पाद शुल्क संग्रह में भारी बढ़ोत्तरी

जैसा कि नीचे दिये गये चार्ट से पता चलता है कि 2014-15 के बाद से पेट्रोलियम उत्पादों पर उत्पाद शुल्क से केंद्र सरकार के राजस्व में 138% की चकित कर देने वाली बढ़ोत्तरी हुई है। ग़ौरतलब है कि 2020-21 का अभी पूरा डेटा उपलब्ध नहीं है। पीपीएसी की ओर से सिर्फ़ नौ महीने का डेटा ही प्रकाशित किया गया है।

2014-15 में जब प्रधान मंत्री मोदी ने सत्ता की बागडोर संभाली थी, उस समय उत्पाद शुल्क का कलेक्शन एक लाख करोड़ रुपये से कम, यानी सटकी आंकड़े की बात की जाये, तो यह  99,068 करोड़ रुपये का था। लेकिन, 2020-21 के दिसंबर तक यही कलेक्शन 2.36 लाख करोड़ रुपये हो गया था ! यह 138% की अविश्वसनीय वृद्धि है। मोदी सरकार के लिए पेट्रोलियम उत्पादों पर लगाया जाने वाला यह कर पैंसों का कभी न ख़त्म होने वाला एक निरंतर स्रोत बनकर रह गया है।

कहने की ज़रूरत नहीं कि बढ़ा हुआ यह टैक्स देश की जनता ही दे रही है। पेट्रोल और डीज़ल की खपत मुख्य रूप से परिवहन ज़रूरतों को पूरा करने में होती है। इसकी खपत लोगों के लिए चलाये जा रहे सार्वजनिक और निजी परिवहन के अलावे ट्रक और रेलवे इंजन चलाने में होती है। इसके साथ ही डीज़ल का व्यापक पैमाने पर इस्तेमाल किसान खेतों की सिंचाई करने के लिए खेतों में पंप से पानी पहुंचाने के लिए जनरेटर सेट चलाने के लिए करते हैं। 

पेट्रोल या डीजल में होने वाली इस बढ़ोत्तरी का फ़ायदा ट्रांसपोर्टरों को नहीं मिलता है। वे तो बस इसे अपने ग्राहकों तक पहुंचा देते हैं। ऐसे में अगर कोई ट्रक सब्ज़ियों या दालों या अनाज या किसी अन्य वस्तु को ढो रहा रहा है, तो ईंधन की क़ीमतों में होने वाली इस बढ़ोत्तरी का लाभ उन व्यापारियों और उत्पादकों को मिलता है, जो बदले में इसे आख़िरी उपभोक्ताओं तक पहुंचा देते हैं। अनुमान है कि पिछले छह महीनों में ही पेट्रोल/डीज़ल की क़ीमतों में इस बढ़ोत्तरी से इन आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं की क़ीमतों में 10-15% की वृद्धि हुई है।

हालांकि, कुछ लोगों ने यह तर्क देने की कोशिश की है कि यह उत्पाद कर संग्रह पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ती खपत के चलते ज़्यादा है और उत्पाद शुल्क में बढ़ोतरी के कारण नहीं है। मगर, यह सच नहीं है क्योंकि  2014-15 और 2019-20 (पिछले वर्ष का डेटा उपलब्ध है) के बीच खपत में महज़ 29% की वृद्धि हुई है। उसके बाद यह इससे ज़्यादा इसलिए नहीं बढ़ सकता था क्योंकि 2020-21 का ज़्यादातर समय उस महामारी के हवाले हो गया है,जिसकी वजह से संपूर्ण लॉक डाउन लगाया गया था और ट्रेनों की आवाजाही पर पूरी तरह रोक थी और सड़क परिवहन का एक बड़ा हिस्सा ठप रहा था। इसलिए, खपत में बढ़ोत्तरी नहीं हो सकती थी।

राज्य सरकारों की तरफ़ से लगाये जाने वाले कर का भार उतना नहीं

केंद्र सरकार की ओर से लगाये जाने वाले करों के अलावे कुछ कर ऐसे होते हैं, जो हर राज्य की सरकार अपनी ओर से भी लगाती हैं। यही वजह है कि पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतें अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग होती हैं। इनमें राज्य जीएसटी, वैट, उपकर, प्रवेश शुल्क आदि शामिल होते हैं। कुछ लोगों ने यह तर्क देने की भी कोशिश की है कि यह राज्य सरकार की तरफ़ से लगाये जा रहे कर ही हैं, जो इन उच्च क़ीमतों के लिए ज़िम्मेदार हैं। मगर, यह भी सही नहीं है।

पीपीएसी के पास जो आंकड़ें हैं उनके मुताबिक़ पेट्रोलियम उत्पादों से राज्य के कर राजस्व 2014-15 के 1,60,526 करोड़ रुपये से बढ़कर 2019-20 में 2,20,841 करोड़ रुपये के हो गये हैं, जो कि 37.5% की बढ़ोत्तरी है। ज़ाहिर है, राज्य के कर राजस्व की यह बढ़ोत्तरी पेट्रोलियम की ऊंची क़ीमतों का कारण नहीं हो सकता क्योंकि केंद्र सरकार के उत्पाद शुल्क संग्रह में तो 2019-20 तक 125% की वृद्धि हुई है।

मोदी सरकार टैक्स बढ़ाती क्यों है ?

यह सवाल अपने आप में बहुत ही बड़ा है। सैद्धांतिक तौर पर तो कोई भी सरकार मुख्य रूप से करों और शुल्कों के ज़रिये एकत्रित राजस्व के आधार पर ही विभिन्न ख़र्च कर सकती है। भारत जैसे देश, जहां बहुत ज़्यादा ग़ैर-बराबरी है और जहां बहुत बड़ी संख्या में बेहद ग़रीब लोग रहते हैं, वहां एक न्यायसंगत और तर्कसंगत कराधान नीति का अर्थ तो यही होगा कि अमीरों पर ज़्यादा से ज़्यादा कर लगाया जाये ताकि बाक़ी लोगों को बेहतर सेवा मुहैया करायी जा सके।

हालांकि, मोदी सरकार ने इसे उल्टा कर दिया है। इसने अमीरों के करों में भारी कटौती कर दी है और उन्हें भारी छूट भी दे रही है। ऐसे में अपने संसाधनों के संरक्षण के लिए सरकार  या तो ख़र्च में कटौती कर देती है या आम लोगों पर अतिरिक्त कर का बोझ डाल दे रही है।

जैसा कि पहले बताया गया है कि पेट्रोल और डीज़ल पर कर का बढ़ाया जाना बड़ी संख्या में लोगों पर कराधान बढ़ाये जाने का एक चालाकी भरा तरीक़ा है। पेट्रोल/डीज़ल पर लगे करों में होने वाली वृद्धि से बाक़ी चीज़ों पर पड़ने वाले असर की वजह से बहुत बड़ी संख्या में लोगों को सरकार को ज़्यादा से ज़्यादा भुगतान करना पड़ता है।

अपने संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए लोगों पर पड़ रहे इस आर्थिक बोझ को कम करने के बजाय मोदी सरकार ने कॉर्पोरेट करों में कटौती कर के कॉर्पोरेट तबकों पर पड़ने वाले बोझ को ही कम कर दिया है, जिससे सरकारी राजस्व को 1.45 लाख करोड़ रुपये का अनुमानित नुक़सान हुआ है। सरकार ने 2015-16 और 2019-20 के बीच 6.08 लाख करोड़ रुपये की विभिन्न रियायतें और छूट भी दी हैं (राज्य सभा में पूछे गये सवाल संख्या-1656; 9 मार्च, 2021)। 2018-19 से 2020-21 (लोकसभा में पूछे गये सवाल संख्या 2286; 8 मार्च, 2021) में 5.9 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा के बैंक ऋण (ज़्यादातर बड़े कॉर्पोरेट घरानों के लिए) को बट्टे खाते में डाल दिया गया है।

कॉररपोरेटों के प्रति दिखायी गयी इस दरियादिली की भरपाई में मोदी सरकार पेट्रोल/डीज़ल के दाम बढ़ाने जैसी नीतियों के ज़रिए आम लोगों को निचोड़ रही है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

The Great Petro Robbery

PRICE RISE
Hike in Petrol Prices
petroleum products
crude oil prices
Modi government
Inflation
Price Rise under Modi Government
petrol price
fuel price hike

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

क्या जानबूझकर महंगाई पर चर्चा से आम आदमी से जुड़े मुद्दे बाहर रखे जाते हैं?

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

आख़िर फ़ायदे में चल रही कंपनियां भी क्यों बेचना चाहती है सरकार?

मोदी@8: भाजपा की 'कल्याण' और 'सेवा' की बात

गतिरोध से जूझ रही अर्थव्यवस्था: आपूर्ति में सुधार और मांग को बनाये रखने की ज़रूरत

तिरछी नज़र: ये कहां आ गए हम! यूं ही सिर फिराते फिराते


बाकी खबरें

  • श्याम मीरा सिंह
    यूक्रेन में फंसे बच्चों के नाम पर PM कर रहे चुनावी प्रचार, वरुण गांधी बोले- हर आपदा में ‘अवसर’ नहीं खोजना चाहिए
    28 Feb 2022
    एक तरफ़ प्रधानमंत्री चुनावी रैलियों में यूक्रेन में फंसे कुछ सौ बच्चों को रेस्क्यू करने के नाम पर वोट मांग रहे हैं। दूसरी तरफ़ यूक्रेन में अभी हज़ारों बच्चे फंसे हैं और सरकार से मदद की गुहार लगा रहे…
  • karnataka
    शुभम शर्मा
    हिजाब को गलत क्यों मानते हैं हिंदुत्व और पितृसत्ता? 
    28 Feb 2022
    यह विडम्बना ही है कि हिजाब का विरोध हिंदुत्ववादी ताकतों की ओर से होता है, जो खुद हर तरह की सामाजिक रूढ़ियों और संकीर्णता से चिपकी रहती हैं।
  • Chiraigaon
    विजय विनीत
    बनारस की जंग—चिरईगांव का रंज : चुनाव में कहां गुम हो गया किसानों-बाग़बानों की आय दोगुना करने का भाजपाई एजेंडा!
    28 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश के बनारस में चिरईगांव के बाग़बानों का जो रंज पांच दशक पहले था, वही आज भी है। सिर्फ चुनाव के समय ही इनका हाल-चाल लेने नेता आते हैं या फिर आम-अमरूद से लकदक बगीचों में फल खाने। आमदनी दोगुना…
  • pop and putin
    एम. के. भद्रकुमार
    पोप, पुतिन और संकटग्रस्त यूक्रेन
    28 Feb 2022
    भू-राजनीति को लेकर फ़्रांसिस की दिलचस्पी, रूसी विदेश नीति के प्रति उनकी सहानुभूति और पश्चिम की उनकी आलोचना को देखते हुए रूसी दूतावास का उनका यह दौरा एक ग़ैरमामूली प्रतीक बन जाता है।
  • MANIPUR
    शशि शेखर
    मुद्दा: महिला सशक्तिकरण मॉडल की पोल खोलता मणिपुर विधानसभा चुनाव
    28 Feb 2022
    मणिपुर की महिलाएं अपने परिवार के सामाजिक-आर्थिक शक्ति की धुरी रही हैं। खेती-किसानी से ले कर अन्य आर्थिक गतिविधियों तक में वे अपने परिवार के पुरुष सदस्य से कहीं आगे नज़र आती हैं, लेकिन राजनीति में…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License