NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
अर्थव्यवस्था
दो तालिकाओं में झलकती देश की वास्तविक अर्थव्यवस्था
मामूली आर्थिक वृद्धि पर इतना हो-हल्ला हो रहा है, इसी बीच आइए इसके वास्तविक कारण और इसके अनदेखे पहलुओं पर नज़र डालते हैं।
सुबोध वर्मा
05 Mar 2021
Translated by महेश कुमार
GDP

हाल ही में, सितंबर-दिसंबर 2020 तिमाही की जीडीपी वृद्धि की संख्या जारी की गई जिस पर बहुत बड़ा जश्न मनाया जा रहा है: लगातार दो तिमाहियों में गिरावट के बाद, तीसरी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद 0.4% तक बढ़ गया। इसे लेकर वी-आकार की रिकवरी की बातें की जाने लगी, और इसे मंदी का अंत और इसी तरह की बात की जाने लगी। किसी की भी उस वाक्यांश के इस्तेमाल करने की हिम्मत नहीं हुई, जोकि कई लोगों के मन में था कि- अंतत "अच्छे दिन" आ गए हैं! महामारी और लॉकडाउन के दोहरे झटके आखिरकार खत्म हो गए!

लेकिन अगर आप सड़क पर चलते आम आदमी या महिला या किसी दुकानदार, या छोटे व्यापारी, या यहां तक कि किसी वेतनभोगी व्यक्ति से से पुछें तो उनका अजवाब सुन कर वृद्धि को लेकर सारा का सारा उत्साह फुर होता नज़र आएगा। तो, ये कौन लोग हैं जो जश्न मना रहे है और आम आदमी इस जश्न से खुश क्यों नहीं है? यही बात सबसे महत्वपूर्ण हैं कि क्यों?

बढ़ता मुनाफ़ा

सबसे पहले, नीचे दिए गए चार्ट पर एक नज़र डालें जो दर्शाता है कि बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) में सूचीबद्ध कंपनियों का इस तिमाही त्रैमासिक लाभ बढ़ा है (जिसमें पूर्व अवधि/असाधारण लेनदेन पर टैक्स का भुगतान करने और समायोजित करने के बाद ये मुनाफा दर्ज़ किया गया है)। ये देश की शीर्ष कंपनियां हैं। डाटा सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी या CMIE से लिया गया है।

दिसंबर 2020 को समाप्त हुई तिमाही में इन कंपनियों ने अब तक का सबसे अधिक मुनाफा दर्ज किया है- जो लगभग 1621 बिलियन डॉलर या 1.6 लाख करोड़ रुपये है। जैसा कि ऊपर दी गई लाल रेखा दिखाती है, ये चौंका देने वाली वृद्धि ठीक महामारी/लॉकडाउन के दौरान हुई है।

जश्न मनाने की सच्ची नींव यहाँ है। और, जाहिर है, ये जश्न मनाने वाले लोग कॉर्पोरेट दिग्गज और मीडिया हैं जिस मेडिया की मिल्कियत सरकार के अलावा कॉर्पोरेट के पास हैं। यह कोई बड़े आश्चर्य की बात नहीं कि वे इसे वी-आकार की रिकवरी बता रहे हैं- निश्चित तौर पर टैक्स जमा करने के बाद उनका मुनाफा वी-आकार में बढ़ रहा है। वास्तव में, वे पेज से बाहर हैं।

लेकिन कॉरपोरेट जगत के भीतर भी हर किसी ने इस अमृत का स्वाद नहीं चखा है। जैसा कि सीएमआईई का विश्लेषण बताता हैं, इसमें बड़ी वृद्धि इसलिए हुई है क्योंकि वित्तीय क्षेत्र की आय का स्वस्थ पहले के मुलाबले तेज़ गति से बढ़ा है जबकि गैर-वित्तीय कंपनियां अभी भी डगमगाई हुई हैं।

फिर भी मुनाफा हर जगह बढ़ रहा है। यह बिक्री और आय में ठहराव और बढ़ते लाभ के बीच का विरोधाभास है- क्या यह इसलिए है कि इन कंपनियों ने लागत में भारी कटौती की है, वह भी मुख्य रूप से कर्मचारियों की संख्या को कम करके, नए लोगों को काम पर न रख कर, और नए निवेश को कम करके ऐसा किया गया है। वृद्धि जैसी भी हो लेकिन लाभ को बनाए रखना जरूरी है। 

अंधकार भरा पहलू 

अब हम तस्वीर के दूसरे रुख की तरफ मुड़ते हैं। नीचे दिया गया चार्ट, सीएमआईई के सैंपल सर्वे के नतीजों से तैयार किया गया है, जो सभी बेरोजगार व्यक्तियों की अनुमानित संख्या को दर्शाता है। इसमें काम करने के इच्छुक सभी लोग शामिल हैं, चाहे वे सक्रिय रूप से काम की तलाश में  रहे हों या नहीं।

दिसंबर में हुई समाप्त तिमाही में बेरोजगारों की संख्या 5.29 करोड़ से भी अधिक रही है, जबकि इसी दौरान मुनाफा रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया और जीडीपी की विकास दर 0.4 प्रतिशत बढ़ गई।

बेरोजगारों की यह विशाल संख्या 2019 की सितंबर-दिसंबर तिमाही यानि महामारी के पहले की तुलना में अधिक है। तब, बेरोजगारों की संख्या 4.45 करोड़ थी और अब यह 5.29 करोड़ है। 2019 की तुलना में लगभग 84 लाख से अधिक व्यक्ति थे जो बेरोजगार हुए जिसमें यह लगभग 20 प्रतिशत की छलांग है। 

महामारी/लॉकडाउन के दौरान दर्ज की गई बेरोजगारी पिछली दो तिमाहियों में परिलक्षित होती है- उस वक़्त बेरोज़गारी ने उन दो तिमाहियों में 7 करोड़ और फिर 7.41 करोड़ की दीगर ऊंचाई को छू लिया था। उसके बाद जैसे ही अर्थव्यवस्था खुली और असहाय नागरिकों ने फिर से काम शुरू करने लगे, तब जाकर बेरोजगारों की संख्या में सुधार हुआ। लेकिन बेरोज़गारी की संख्या अचेतन उच्च स्तर पर बनी हुई हैं।

यह कोई संयोग की बात नहीं है कि इस तरह के बड़े पैमाने की बेरोजगारी और अंधा मुनाफा साथ-साथ चल रहा है। यही पूंजीवाद है। किसी भी कीमत पर मुनाफे को बनाए रखना है, भले ही कामकाजी लोग अपनी झोपड़ियों में भूख से मर रहे हों।

लेकिन यह सरकार की बेरहमी और पक्षपात को भी दर्शाता है। इन विकट परिस्थितियों में लोगों की मदद करने के लिए कुछ सार्थक उपाय करने चाहिए थे। लेकिन हम सरकार से जो सुन रहे हैं वह कि देश अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाना है, अर्थव्यवस्था में बड़ा उछाल आने वाला है, जिसे प्रधानमंत्री खुद निर्देशित कर रहे हैं और नए भारत के तथाकथित "धन रचनाकारों" के बारे में अंतहीन तारीफ यानी कॉर्पोरेट घराने और उनके शानदार सर्वेसर्वा।

यह केवल अन्यायपूर्ण या अनैतिक नहीं है। यह मूर्खतापूर्ण भी है क्योंकि जब तक लोगों को नौकरी नहीं मिलती है, जब तक उन्हें बेहतर मजदूरी नहीं मिलेगी, जब तक कि किसानों को बेहतर कीमतें नहीं मिलती है, तब तक अर्थव्यवस्था में पर्याप्त मांग नहीं बढ़ेगी। और अगर ऐसा नहीं होता तो अर्थव्यवस्था के तेज़ी से बढ़ने की बड़ी-बड़ी बातें ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी। लेकिन प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल को कौन समझाए?

डाटा : पीयूष शर्मा

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करे

The Real Economy in Two Charts

indian economy
GDP growth
capitalism
unemployment
Pandemic Lockdown
CMIE
Corporate Profits

Related Stories

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

उत्तर प्रदेश: "सरकार हमें नियुक्ति दे या मुक्ति दे"  इच्छामृत्यु की माँग करते हजारों बेरोजगार युवा

मोदी@8: भाजपा की 'कल्याण' और 'सेवा' की बात

UPSI भर्ती: 15-15 लाख में दरोगा बनने की स्कीम का ऐसे हो गया पर्दाफ़ाश

मोदी के आठ साल: सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर क्यों नहीं टूटती चुप्पी?

जन-संगठनों और नागरिक समाज का उभरता प्रतिरोध लोकतन्त्र के लिये शुभ है

ज्ञानव्यापी- क़ुतुब में उलझा भारत कब राह पर आएगा ?

वाम दलों का महंगाई और बेरोज़गारी के ख़िलाफ़ कल से 31 मई तक देशव्यापी आंदोलन का आह्वान


बाकी खबरें

  • manual scevenging
    सक्षम मलिक
    हाथ से मैला ढोने की प्रथा का ख़ात्मा: मुआवज़े से आगे जाने की ज़रूरत 
    19 Oct 2021
    सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक बेजवाड़ा विल्सन के मुताबिक़, देश भर में हाथ से मैला ढोने के चलते 2016 से 2020 के बीच कुल मिलाकर 472 और सिर्फ़ साल 2021 में 26 मौतें हुई हैं।
  • Bakhtawarpur
    न्यूज़क्लिक टीम
    बख्तावरपुर : शहर बसने की क़ीमत गाँव ने चुकाई !
    19 Oct 2021
    दिल्ली के नरेला के पास बसे बख्तावरपुर गाँव के निवासी शहर के बसने की क़ीमत चुका रहे है. उनका आरोप है कि दिल्ली सरकार ने उनको उनके हाल पर छोड़ दिया है. वे बरसों से अपने इलाक़े के लिए एक अदद नाले की…
  • Muzaffarpur rail
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहार में भी दिखा रेल रोको आंदोलन का असर, वाम दलों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया
    19 Oct 2021
    संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर हुए धरना-प्रदर्शन के दौरान नेताओं ने केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा को बर्खास्त करने और कृषि कानून और श्रम कोड रद्द करने सहित अन्य कई मांगें उठाई।
  • MK Stalin
    विग्नेश कार्तिक के.आर., विशाल वसंतकुमार
    तमिलनाडु-शैली वाला गैर-अभिजातीय सामाजिक समूहों का गठबंधन, राजनीति के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है? 
    19 Oct 2021
    देश में तमिलनाडु के पास सबसे अधिक सामाजिक रुप से विविध विधायी प्रतिनिधित्व है, और साथ ही देश में सभी जातीय समूहों का समानुपातिक प्रतिनिधित्व मौजूद है।
  • cartoon
    आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक: ख़ाकी का 'भगवा लुक'
    19 Oct 2021
    कर्नाटक के उडूपी ज़िले में एक पुलिस थाने के कभी सिपाहियों ने वर्दी की जगह भगवा रंग के कपड़े पहने। फिर तर्क आया कि विजयदशमी का दिन था इसलिए वर्दी की जगह “भगवा लुक” का आनंद ले लिया। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License