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हागिया सोफ़िया की मस्जिद में हुई तब्दीली को कान लगाकर सुनने की ज़रूरत है
बाबरी मस्जिद से लेकर हागिया सोफ़िया जैसी इमारतें दुनिया से कुछ कहना चाह रही हैं लेकिन दुनिया उन पर कान लगाना क्यों नहीं चाहती? अगर ऐसा ही चलता रहा तो यह दुनिया कट्टरपंथ के दीवारों में बंटती चली जाएगी।  
अजय कुमार
13 Jul 2020
हागिया सोफ़िया

दुनिया के अधिकतर मुल्क अपनी चिंतन प्रक्रिया में आगे बढ़ने की बजाय खुद को पीछे धकेल रहे हैं। वजह है धार्मिक आधार पर की जाने वाली राजनीति। जिसमें भावनात्मक असर इतना गहरा होता है कि रोजमर्रा के जरूरी मुद्दे छोड़कर आम जनता इन मुद्दों से आसानी से जुड़ जाती है। इस प्रवृत्ति का हालिया गवाह तुर्की बना है।

जानकारों का कहना है कि तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन ने जब यह महसूस किया कि उनका जनाधार तुर्की के जनता के बीच कम हो रहा है तो हागिया सोफ़िया म्यूजियम को पूरी गर्मजोशी के साथ मस्जिद बनाने का इरादा जनता के बीच उछाला दिया।

बात तुर्की के प्रशासनिक कोर्ट में पहुंची। प्रशासनिक कोर्ट ने भी हागिया सोफ़िया म्यूजियम को मस्जिद बनाने की मंजूरी दे दी।

प्यू सर्वे के मुताबिक म्यूजियम से मस्जिद बनाने के इस फैसले को तुर्की के 47 फ़ीसदी आबादी ने सही ठहराया और 38 फ़ीसदी आबादी ने गलत ठहराया। कहने का मतलब है कि तुर्की की बहुत बड़ी आबादी इस फैसले को सही मानती है।

जानकारों का कहना है कि असल बात यह है कि म्यूजियम से मस्जिद बनाने का यह फैसला केवल तुर्की को ही प्रभावित नहीं करता है बल्कि पूरी दुनिया को प्रभावित करता है। जानकारों का कहना है कि इस फैसले की वजह से इस्लाम और ईसाई धर्म के लोगों के बीच एक बहुत बड़ी दरार डाल दी गई है और इसका प्रभाव पूरी दुनिया के इस्लाम और ईसाई धर्म को मानने वाले लोगों पर पड़ेगा।

अब यहीं पर मौजूदा दुनिया की एक खास प्रवृत्ति भी समझ लेनी चाहिए। तुर्की, कुर्दों पर कहर बरपा रहा है लेकिन पूरी दुनिया में इसके खिलाफ कोई हो हल्ला नहीं हुआ। पत्रकारों, सरकारी अफसरों, विपक्षी पार्टियो, जमीनी कार्यकर्ताओं समेत तकरीबन डेढ़ लाख लोगों को तुर्की के राष्ट्रपति एर्डोनान ने अचानक जेल में बंद कर दिया। इतनी बड़ी खबर दुनिया की गलियों में छाने में नाकामयाब रही। लेकिन एक म्यूजियम को जब मस्जिद में बदला गया तो यह खबर पूरी दुनिया में एक लहर की तरह फैल गई। इसका साफ मतलब है कि पूरी दुनिया में अभी भी धर्म नामक संस्था का सबसे अधिक दबदबा है और इसी का फायदा लोकतांत्रिक समाजों में राजनीति करने वाले मोदी और एर्डोनान  जैसे नेता उठाने में कामयाब रहे हैं। इस वैचारिक पृष्ठभूमि में अब बात करते हैं कि आखिरकार तुर्की की इस इमारत हागिया सोफ़िया का प्रतीकात्मक तौर पर इतना अधिक महत्व क्यों है?

हागिया सोफ़िया की इमारत की पृष्ठभूमि की शुरुआत होती है रोमन साम्राज्य से। रोमन साम्राज्य में क्रिश्चियनिटी आधिकारिक धर्म के तौर पर माना जाता था। इस साम्राज्य के दो हिस्से थे पहला पश्चिमी हिस्सा और दूसरा पूर्वी हिस्सा। साम्राज्य का पश्चिमी हिस्सा दक्षिणी यूरोप का इलाका था और साम्राज्य का पूर्वी हिस्सा वह इलाका था जहां आज का तुर्की बसा है। उस समय साम्राज्य के पूर्वी हिस्से की राजधानी बैजेंटियम हुआ करती थी। आगे चलकर साल 330 के करीब बैजेंटियम इलाके की राजधानी कॉन्स्टेनटिनोपोल.शहर को बनाया गया। इसी शहर में लकड़ी की छत वाला एक चर्च बनाया गया। कॉन्स्टेनटिनोपोल.पर खूब हमले हुए हमले में इस इस चर्च में आग लगा दिया जाता और फिर से एक नया लकड़ी का चर्च बना दिया जाता।

यह सिलसिला साल 532 में जाकर खत्म हुआ। करीब 10,000 मजदूरों के दिन रात लगे रहने के बाद 5 साल में जाकर एक नया चर्च तैयार हुआ। एक भव्य गुंबद वाला चर्च। इसी चर्च का नाम रखा गया हागिया सोफ़िया चर्च। बताया जाता है कि हागिया सोफिया को तुर्की भाषा में आयासोफ़िया (Ayasofya) कहा जाता है। अंग्रेजी में कभी कभी उसे सेंट सोफ़िया (Saint Sophia) भी कहा जाता है। इसकी भव्यता बेमिसाल थी। राजाओं का प्रचलन हुआ करता था कि वह धार्मिक इमारतों को भव्य से भव्य बनाएं। इस बहाने वह आम जनता से जुड़ जाते थे और उन्हें खुद भी लगता था कि ईश्वर की दुनिया में वह इस कृति से ईश्वर के सबसे प्यारे हो जाएंगे। इसलिए धार्मिक इमारतों और राजाओं के बीच का भी दुनिया में एक शानदार और अचरज से भरा इतिहास रहा है।

आयासोफ़िया ग्रीक शब्द से मिलकर बने हैं। आया का अर्थ होता है पवित्र और सोफ़िया का अर्थ होता है बुद्धि यानी कि पवित्र बुद्धि। यह चर्च अपनी भव्यता की वजह से ईसाई धर्म का केंद्र बन गया। बैंजंटाइन साम्राज्य में इस इमारत की तूती बोलने लगी। इमारत ईसाई धर्म की प्रतीकात्मक पहचान बनकर उभरा।

कॉन्स्टेंटिनपोल शहर की एक जबरदस्त खासियत थी कि इस शहर का किला यानी इस शहर को चारों तरफ से घेरे हुईं दीवारें अभेद मानी जाती थी। इसे कोई पार नहीं कर पाया था। लेकिन साल 1453 में एक 21 साल के सुल्तान ने इस किले को भेद दिया। इस 21 साल के सुल्तान का नाम फतिह महमद था। इतिहास की किताबें कहती हैं कि सुल्तान ने किले को कई बार भेदने की कोशिश की कई बार नाकाम हुआ। लेकिन अंत में जाकर इस सुल्तान की जीत हुई। सुल्तान ने कॉन्स्टेंटिनपोल शहर पर कब्जा कर लिया।

चूँकि रोमन साम्राज्य से जुड़े इस शहर का प्रतीकात्मक महत्व था इसलिए कब्जा जमाते ही ऐसा लगा जैसे पूरी दुनिया के मुसलमानों का सपना साकार हो गया हो। इस शहर का नाम बदलकर इस्तांबुल कर दिया गया। यह इस्तांबुल ऑटोमन साम्राज्य की राजधानी बन गया। उसी ऑटोमन साम्राज्य की जिसका एक देश तुर्की हुआ करता था। इसके बाद हागिया सोफ़िया का भी धर्मांतरण कर दिया गया। और यह चर्च मस्जिद में बदल दी गई।

बीसवीं सदी में ऑटोमन साम्राज्य पूरी तरह से जर्जर हो गया। तुर्की को यूरोप का बीमार देश कहा जाने लगा। इसी समय प्रथम विश्व युद्ध हुआ। तुर्की ने जर्मनी वाले खेमे का साथ दिया। तुर्की की जबरदस्त हार हुई। ब्रिटेन फ्रांस रूस ग्रीस जैसे विजेता देशों ने ऑटोमन साम्राज्य के ज्यादातर हिस्से को आपस में बांट लिया। इसके साथ ही तुर्की में खलीफाशाही का अंत हो गया। यानी तुर्की से राजशाही खत्म हो गई। इसके बाद साल 1923 में रिपब्लिक ऑफ टर्की की स्थापना हुई। मुस्तफा कमाल अतातुर्क इसके राष्ट्रपति बने।

इतिहास की किताबें गवाही देती हैं कि कमाल अतातुर्क कमाल के नेता थे। इन्होंने तुर्की को एक सेकुलर स्टेट की तरह स्थापित किया। और हागिया सोफ़िया मस्जिद को सेकुलर रंग देते हुए म्यूजियम में बदल दिया। यानी हागिया या आया सोफ़िया न चर्च रहा न मस्जिद, बल्कि एक म्यूजियम बना दिया गया ताकि अपमान का घूंट न मुस्लिमों को पीना पड़े और न ही ईसाईयों को।

लेकिन यहीं पर जरा ठहर कर सोचिए। एक समाज जो सदियों से मुस्लिम धर्म में पलने बढ़ने का आदी हो चुका हो। उस समाज में अचानक से डाली गई सेकुलर की दीवार कैसे काम करेंगी? आप समझ सकते हैं कि यह बहुत अच्छी तरह से काम नहीं करेगी। इसलिए तुर्की में अतातुर्क की प्रशंसा भी होती थी लेकिन अतातुर्क के कदमों की निंदा ही बहुत अधिक होती थी।

तुर्की में आधुनिक विकास के साथ-साथ मुस्लिम कट्टरपंथ का भी बोलबाला रहा। साल 2002 में रिसेप तैयाब एर्दोगन तुर्की के राष्ट्रपति बने.एर्दोगन इस्लामिक अतीत की तरफ लौटने की दुहाई देने लगे। कुर्द के साथ तो एर्दोगन ने घनघोर नाइंसाफी भरा फैसले लिए हैं। ईसाई तुर्की में नाममात्र की संख्या में मौजद हैं। एर्दोगन ने कई बार हागिया सोफ़िया म्यूजियम को अपने शासनकाल के दौरान मस्जिद में बदलने की बात कहीं। कई बार अपने कामों से यह इशारा दिया है कि वह दुनिया के मुस्लिमों को एक करना चाहते हैं। हिंदुस्तान की तरह तुर्की के राष्ट्रवाद में धर्म का जबरदस्त तड़का लगाया गया है। एर्दोयान ने अपने भाषण में कहा कि “हागिया सोफ़िया का पुनरुद्धार मुसलमानों की सारे सताए हुए, दबे कुचलों की भी उम्मीद की आग को फिर से सुलगाएगा।” “जिसमें अल अक़्सा यानी येरुशलम की मुक्ति शामिल है।”

तुर्की से ही सटा हुआ है ग्रीस। यूरोप में पड़ता है। खुद को बैजेन्टाइन साम्राज्य का उत्तराधिकारी मानता है। उसी बाइजेंटाइन साम्राज्य का जिस साम्राज्य के काल में आया सोफ़िया एक भव्य चर्च के तौर पर दुनिया के सामने आया था। ग्रीस की आपत्ति पर तुर्की ने ग्रीस को झाड़ लगाई है। एर्दोआ ने ग्रीस से कहा 'तुर्की को तुम चलाते हो कि हम'। बाकी दुनिया भर के तमाम देशों ने तुर्की के इस कदम का मुखर विरोध किया है। सबका कहना है तुर्की को यह कदम नहीं उठाना चाहिए था इससे ईसाइयों और मुस्लिमों के बीच एक गहरी दरार पड़ेगी। लेकिन इन सबका फायदा अभी भी तुर्की के कटटरपंथ को ही होता दिख रहा है। अभी भी तुर्की की जनता की तरफ से इसका कोई मुखर विरोध नहीं हुआ है।  

ओरहान पामुक तुर्की के नोबेल विजेता उपन्यासकार हैं। तुर्की के इस कदम पर खेद जताते हुए ओरहन पमुक ने कहा कि “मैं क्षुब्ध हूँ। तुर्की राष्ट्र को एकमात्र ऐसा मुसलमान मुल्क होने का फख्र था जो धर्मनिरपेक्ष है और यह (हागिया सोफ़िया) उसका सबसे बड़ा प्रतीक था। लेकिन आज उन्होंने इस देश से वह गौरव छीन लिया है। यह कमाल अतातुर्क का सबसे महत्त्वपूर्ण और सोचा समझा फ़ैसला था जिसके ज़रिए वे बाक़ी दुनिया को बताना चाहते थे, ‘हम दूसरे मुसलमान देशों से अलग हैं, हम आधुनिक हैं। हम इसी तरह दीखना चाहते हैं। बदनसीबी है कि हम धर्मनिरपेक्ष नहीं रहे।”

असीम अली सेंटर फॉर रिसर्च में एक रिसर्च फेलो हैं। इस मुद्दे पर असीम अली ने अंग्रेजी की आउटलुक पत्रिका में लिखा है कि तुर्की एक मुस्लिम मेजॉरिटी देश है, फिर भी इसने सेक्युलरिज्म को अपनाया। लेकिन यह सेक्युलरिज्म को पूरे देश में फैला पाने में नाकामयाब रहा। इसी वजह से एर्दोगन जैसे नेता आये और आया सोफ़िया जैसे इमारत को मस्जिद में बदलने में कामयाब रहे। यहां पर ज़रूरी सवाल यह उठता है कि हिंदुस्तान और तुर्की जैसे देशों में बहुसंख्यकवाद इतना अधिक हावी क्यों हो रहा है?

क्या इन दोनों देशों में सेक्युलरिज्म पूरी तरह से फेल हुआ है? क्या सेक्युलरिज्म इन दोनों देशों में पश्चिम की उधार ली हुई अवधारणा बनकर रह गया है? पश्चिम में जिस तरह से लोकतांत्रिककरण और सेक्युलरिज्म आगे बढ़ रहा है ठीक वैसे ही भारत और तुर्की जैसे देशों में आगे क्यों नहीं बढ़ पाया? क्या इसकी वजह यह तो नहीं कि भारत और तुर्की ने अपने अंदर सामाजिक सुधार का सारा जिम्मा स्टेट पर छोड़ दिया खुद समाज ने वैसे कदम नहीं उठाए जो एक लोकतांत्रिक समाज में सेक्युलरिज्म के पनपने के लिए जरूरी था। बाबरी मस्जिद से लेकर आया सोफ़िया जैसी इमारतें दुनिया से कुछ कहना चाह रही हैं लेकिन दुनिया उन पर कान लगाना क्यों नहीं चाहती? अगर ऐसा ही चलता रहा तो यह दुनिया कट्टरपंथ के दीवारों में बंटती चली जाएगी।  

 

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