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जो निधि राज़दान के साथ हुआ, वो साइबर फ्रॉड आपके साथ भी हो सकता है!
आजकल डेटा हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है, महत्वपूर्ण जानकारियों से लेकर हमारी रोज़-मर्रा की ज़रूरतें सब डेटा-बेस में कैद हैं। इस मामले में हमारी सतर्कता ही हमारा बचाव है।
सोनिया यादव
16 Jan 2021
निधि राज़दान

“मेरे साथ हुए इस फिशिंग हमले में साजिशकर्ताओं ने मेरे व्यक्तिगत डाटा, कम्यूनिकेशन, डिवाइस और सोशल मीडिया अकाउंट तक पहुँचकर उससे हासिल जानकारियों का इस्तेमाल किया है।"

ये बयान एनडीटीवी की पूर्व पत्रकार निधि राज़दान का है। निधि ने शुक्रवार, 15 जनवरी को एक ट्वीट कर इस बात की जानकारी दी कि उनके साथ एक गंभीर ऑनलाइन धोखा हुआ है जिसके तहत उन्हें हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर की नौकरी की पेशकश की गई थी।

निधि राज़दान के इस ट्वीट के बाद सोशल मीडिया पर कई तरह की प्रतिक्रिया आनी शुरू हो गई। कई लोगों ने इस घटना को 'डरावना' बताया और निधि के प्रति 'सहानुभूति' दिखाई तो वहीं कई लोगों ने निधि का मज़ाक बनाकर उन्हें ज्यादा सावधानी बरतने की नसीहत तक दे डाली।

हालांकि निधि के साथ हुआ ये धोखा किसी के भी साथ, कहीं भी, कभी भी हो सकता है। इसकी वहज हमारी डेटा पर निर्भरता है। आजकल डेटा हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है, महत्वपूर्ण जानकारियों से लेकर हमारी रोज़मर्रा की जरूरतें सब डेटा-बेस में कैद हैं, जिसे चाह कर भी हम बच नहीं सकते लेकिन हमारी सतर्कता हमारे जोखिम को कम जरूर कर सकती है।

आख़िर फिशिंग है क्या?

सबसे पहले समझते हैं फिशिंग के मामले को, जिसका निधि शिकार हुई हैं। गूगल ने पिछले साल अप्रैल में बताया था कि कोरोना वायरस महामारी के कारण दुनिया भर में 'फिशिंग अटैक्स' की बाढ़ आ गई है। साइबर अपराधी आसानी से ये तरीका अपनाकर लोगों को अपना शिकार बना रहे हैं।

दरअसल, फिशिंग इंटरनेट पर धोखाधड़ी का वो तरीक़ा है जिसमें कोई अपराधी ईमेल के ज़रिए यूजर्स को झांसा देकर उनके पासवर्ड, क्रेडिट कार्ड डिटेल जैसी निजी जानकारियां हासिल करने की कोशिश करते हैं। ये एक तरह का ऑनलाइन फ़्रॉड है जिसके ज़रिए लोगों को अपनी निजी जानकारियां जैसे बैंक डिटेल्स या पासवर्ड शेयर करने के लिए कहा जाता है।

इस जालसाज़ी में शामिल लोग ख़ुद को बिल्कुल सही और प्रतिष्ठित कंपनी का प्रतिनिधि बताते हैं और सामने वाले को अपनी बातों का यक़ीन दिलाकर उनसे उनकी निजी जानकारियां हासिल कर लेते हैं। जालसाज़ जीमेल यूजर्स को कई तरह के ईमेल भेजते हैं, सरकारी संस्थाओं के नाम पर भी फ़ायदा उठाने की कोशिश करते हैं।

इस तरह के ऑनलाइन हमलावर टेक्स्ट मैसेज, मेल या फोन के ज़रिए लोगों से संपर्क करते हैं। फ़िशिंग के शिकार लोगों को लगता है कि मैसेज, मेल या फ़ोन कॉल उनके ही बैंक या सर्विस प्रोवाइडर की तरफ़ से आया है। इसलिए लोग अपनी जानकारी आसानी से साझा कर देते हैं।

फिशिंग के अलावा मोबाइल फोन पर इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ने से स्पाईवेयर, रैनसमवेयर और मैलवेयर के जरिए भी साइबर अपराध हो रहे हैं। देश-विदेश में कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए लोग डिजिटल लेन-देन को ज्यादा बढ़ावा दे रहे हैं, दफ्तर जाने के बजाय घर से काम कर रहे हैं, तो वहीं साइबर अपराधी इसका फायदा उठाने की जुगत में लगे हैं। कई एजेंसियां इस मामले में पहले ही आगाह कर चुकी हैं कि कोराना का वजह से साइबर ठगी और साइबर हमलों का खतरा भी बढ़ गया है।

इसे भी पढ़ें: सावधान! कोरोना संकट के बीच साइबर क्राइम भी रफ्तार पकड़ रहा है!

क्या है स्पाईवेयर, रैनसमवेयर और मैलवेयर?

स्पाईवेयर आपके मोबाइल फोन से ज़रूरी जानकारी चुरा लेता है, वहीं रैनसमवेयर आपके लॉगइन और अन्य चीजों पर कंट्रोल कर लेता है और फिर उसके बदले आपसे फिरौती की रकम वसूली करने की कोशिश होती है। मैलवेयर में आपके मोबाइल फोन के ऐप की जानकारियां असुरक्षित हो जाती हैं। इससे बचने कि लिए अपने मोबाइल फोन के ऐप को हमेशा अपडेटेड रखें।

कैसे होती है धोखाधड़ी?

अक्सर साइबर क्राइम के शिकार लोगों से कहा जाता है कि उन्हें अपने बैंक खाते या किसी सर्विस के एक्टिवेशन या सिक्योरिटी चेक के लिए कुछ जानकारियाँ देनी होंगी। उन्हें कहा जाता है कि अगर वो जानकारियाँ नहीं दीं तो उनकी सेवा को बंद किया जा सकता है। हाल ही में कोरोना वैक्सीन के रेजिस्ट्रेशन में भी धोखाधड़ी की शिकायतें सामने आईं थी।

साइबर जालसाज़ी को फ़ेक वेबसाइट के जरिए बढ़ावा दिया जाता है, जो कि बिल्कुल असली लगती है। लोगों को उस वेबसाइट में जाकर अपनी निजी जानकारियां डालने के लिए कहा जाता है। जैसे ही निजी जानकारी लोग डालते हैं, साइबर अपराधी उनका इस्तेमाल करके आपको आसानी से लूट लेते हैं। उन फ़ेक वेबसाइट्स में मॉलवेयर इंस्टॉल किया रहता है जो आपको निजी जानकारियों को चुरा भी लेता है।

ऑनलाइन जालसाज़ी से कैसे बचें?

* आपकी सतर्कता ही इस तरह के फ़र्ज़ीवाड़े से बचाव का तरीका है। अनजान जगहों से आने वाले फ़ोन कॉल, मेल और मैसेज से हमेशा सतर्क रहें ख़ासकर उन हालात में जब आपसे संपर्क करने वाला आपको आपके नाम से संबोधित नहीं करता है। बड़ी कंपनियां कभी भी आप से आपकी निजी जानकारियां फ़ोन या मेल के ज़रिए नहीं मांगती हैं।

* उन मेल और टेक्स्ट मैसेज से और भी सतर्क रहें जिसमें आपको कोई लिंक क्लिक करने के लिए कहा जाता है। अगर आपको पूरा यक़ीन नहीं है कि आपको मेल भेजने वाला या फ़ोन करने वाला असली और वास्तविक है या नहीं तो सबसे बेहतर है कि आप कंपनी को ख़ुद फ़ोन करें और इसके लिए फ़ोन नंबर भी वही इस्तेमाल करें जो कि बैंक स्टेटमेंट, फ़ोन बिल या डेबिट कार्ड के पीछे लिखा हो।

इसे भी पढ़ें: लॉकडाउन में ऑनलाइन होना जितना अच्छा है, उतना ही रिस्की भी!    

* इंटरनेट या मोबाइल फोन से किसी भी तरह के संवेदनशील डाटा का चोरी, गलत इस्तेमाल या उसे मिटने/खो जाने से बचाने के लिए मोबाइल फोन और सभी ऐप को सुरक्षित रखना ज़रूरी है। किसी भी ऐप को हमेशा अपने मोबाइल हैंडसेट निर्माता या ऑपरेटिंग सिस्टम के आधिकारिक स्टोर से ही डाउनलोड करें। किसी अज्ञात स्रोत से ऐप डाउनलोड ना करें।

* सोशल मीडिया अकाउंट के जरिए किसी और ऐप में साइन-इन करते हुए सतर्क रहें। कुछ ऐप सोशल मीडिया साइटों के साथ जुड़े होते हैं, ऐसे में वे ऐप आपके सोशल मीडिया अकाउंट से सूचनाएं ले सकते हैं।

* एसएमएस और ईमेल पर आए लिंक पर क्लिक करने से पहले, अज्ञात स्रोत से आए अटैचमेंट खोलने से पहले ध्यान दें इसमें वायरस का खतरा हो सकता है। किसी भी बैंक के नाम से आने वाली फोन कॉल, मैसेज या ईमेल पर भरोसा ना करें, अपने खाते की जानकारी किसी से साझा न करें।

* मोबाइल फोन पर सार्वजनिक वाई-फाई नेटवर्क का इस्तेमाल करने से बचें। अपने फोन के ज़रूरी ऐप के लॉगइन आईडी और पासवर्ड उसमें सेव न रखें। ज़रूरत नहीं होने पर ब्लूटूथ सेटिंग को ऑफ करके रखें।

* किसी भी ऐप के जरिए ऑनलाइन मनी ट्रांसफर करते समय सतर्क रहें और वेरिफाइड ऑनलाइन स्टोर से ही सामान ऑडर करें। डिस्काउंट या फ्री के चक्कर में सही-गलत की जांच किए बगैर कोई भी ऐप, कोई भी सर्विस, गेम या वेबसाइट के झांसे में आ जाएं।

डेटा सुरक्षा को लेकर सरकारें गंभीर क्यों नहीं दिखाई देतीं?

गौरतलब है कि डेटा की सुरक्षा आज के दौर की सबसे अहम जरूरत है। हाल ही में वाट्सऐप प्राइवेसी पॉलिसी में बदलाव को लेकर मचा बवाल हम सबके सामने है। इस पूरे विवाद पर लगाम लगाने के लिए फिलहाल वाट्सऐप ने अपनी नई पॉलिसी को तीन महीने और एक्सटेंड कर दिया है। हालांकि सवाल अभी भी बरकरार है कि आख़िर आम लोगों की डेटा सुरक्षा को लेकर सरकारें गंभीर क्यों नहीं दिखाई देती, मज़बूत कानून क्यों नहीं बनाए जाते।

इसे भी पढ़ें: क्या वाट्सऐप की नई प्राइवेसी पॉलिसी से आपको डरने की ज़रूरत है

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