NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
गुजरात दंगों की बीसवीं बरसी भूलने के ख़तरे अनेक
इस चुनिन्दा विस्मृति के पीछे उन घपलों, घोटालों, साजिशों, चालबाजियों, न्याय प्रबंधन की तिकड़मों की याद दिलाने से बचना है जिनके जरिये इन दंगों के असली मुजरिमों को बचाया गया था।
बादल सरोज
05 Mar 2022
Gujarat Riots

जिस समय ये पंक्तियाँ लिखी जा रही हैं उससे बीस साल पहले उन दिनों गुजरात धधक रहा था। ताजे इतिहास के सबसे भीषण नरसंहार - गुजरात में 2002 में हुई सांप्रदायिक हिंसक बर्बरता - की यह 20वीं बरसी है। इस बार कोई बयान नहीं आया, कहीं स्मृति सभा नहीं हुई। 28 फरवरी और 1 मार्च 2002 से शुरू हुयी भीषण हिंसा ; जिनमे बहे रक्त के  ज्वार पर सवार होकर वे सत्ता के शीर्ष पर पहुंचे हैं ; की याद तो खैर हुक्मरान क्यों ही करते, उन्होंने गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस की एस-6 बोगी में जलकर मर गए उन 59 कारसेवकों को भी याद नहीं किया , जिनके हादसे को आधार बनाकर उन्होंने आजाद भारत के इस सबसे जघन्य नरसंहार को अंजाम दिया था। 

27 फरवरी 2002 की सुबह मुजफ्फरपुर से अहमदाबाद लौट रही साबरमती एक्सप्रेस की एस-6 बोगी में सवार कुछ लोगों ने गोधरा के रेलवे प्लेटफार्म पर चाय नाश्ता बेच रहे हॉकर्स के साथ झगड़ा किया।  ट्रेन के थोड़ा आगे बढ़ने और सिग्नल पर रुकने के साथ ही समीप की बस्ती के लोगों ने इस बोगी पर हमला कर दिया - बोगी में आग लगा दी जिसके नतीजे में उसमे सवार 59 यात्रियों की मृत्यु हो गयी थी। आग लगने की वजह विवादित रही। 

इसकी जांच के लिए बने जस्टिस यू सी बनर्जी की रिपोर्ट ने आग की वजह बोगी में रखे ज्वलनशील पदार्थ का आग  पकड़ना बतायी।  हालांकि बाद में इस आयोग की नियुक्ति के तरीके को  सही न मानने के तकनीकी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने इस आयोग को ही खत्म कर दिया था।  बहरहाल करीब 11 वर्षों तक चली सुनवाई के बाद अंततः  न्यायालय ने 31 लोगों को अपराधी माना और 11 को मृत्युदण्ड 20 को आजन्म कारावास की सजा सुनाई। बाद में ऊपरी अदालत ने मृत्युदंड को आजन्म कारावास में बदल दिया।  इसी के साथ अदालत ने इस हादसे के पीछे किसी भी तरह की साजिश होने की संभावना को पूरी तरह से खारिज कर दिया। 

27 फरवरी 2002 के गोधरा काण्ड के बाद जो हुआ वह असाधारण था। रेल बोगी के मृतकों के शवों को सार्वजनिक रूप से निकालकर उन्माद भड़काया गया और उसी के साथ सीधे राज्य के संरक्षण, पुलिस तथा प्रशासनिक अधिकारियों के मार्गदर्शन में गुजरात के ज्यादातर जिलों में मुस्लिम समुदाय के खिलाफ हत्यारी मुहिम शुरू कर दी गयी।

बच्चों के साथ जघन्यता, खुले आम सामूहिक बलात्कार, दसियों हजार घरों, दुकानों, ऑटो रिक्सा, जीप, हाथठेलों , गैरेज, मस्जिदों को ध्वस्त किया गया।  आगजनी की गयी।  कई जगह सप्ताह भर तो कुछ जगह महीनो तक चली इस उन्मादी हिंसा में सरकार द्वारा 2005 में राज्य सभा में दिए एक जवाब के मुताबिक़ कुल 1044 लोग मारे गए, 223 लापता हैं और 2500 से ज्यादा गंभीर रूप से घायल हुए।

दसियों हजार बेघर हुए जिनमें से अनेक अपनी पुरानी जगह कभी वापस नहीं लौट पाए।  हालांकि अलग अलग समूहों द्वारा की गयी जांच के  अनुसार मरने वालों की तादाद 2000 से कहीं ज्यादा थी। दंगा भड़काने, हिंसा का आव्हान करने, उसे बिना किसी रोकथाम के जारी रहने देने को लेकर सिर्फ पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की आपराधिक लिप्तता ही सामने नहीं आयी ; तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके गृहमंत्री अमित शाह पर भी आरोप लगे।  हालांकि बाद में इन्हे खुद इनकी सरकार द्वारा गठित एसआईटी ने क्लीनचिट भी दे दी। यह क्लीन चिट और पूर्व सांसद एहसान जाफरी और उनकी गुलबर्ग सोसायटी के हत्याकांड के मामले में उनकी बेबा जकिया जाफरी की याचिका अभी भी सुप्रीम कोर्ट के सामने लंबित है। 

बाकी अपराधियों के गुनाहों के मामले में भी न्याय या तो हुआ ही नहीं या आधा अधूरा हुआ।  बाबू बजरंगी के साथ 28 वर्ष की सजा पाने वाली मोदी मंत्रिमंडल की मंत्राणी माया कोडनानी बाद में बरी कर दी गयीं।  खुद सुप्रीम कोर्ट की एसआईटी ने सरदारपुरा, नरोदा ग्राम, चमनपुरा की गुलबर्ग सोसायटी, आणंद के ओढे गाँव, दीपाड़ा दरवाजा, बेस्ट बेकरी नाम से कुख्यात नरसंहारों और बिलकीस बानो कांड में कुछ लोग दोषी साबित हुए।  उन्हें सजा सुनाई गयी।  मगर बाकी हजारों मामले या तो तफ्तीश के दौरान या पुलिस की जानबूझकर की गयी कमजोर तैयारी के चलते अदालतों में दम तोड़ गए। 

2002 के गुजरात के अस्थिपंजर लोकतंत्र के चारों स्तम्भों के ऊपर मंडरा रहे हैं और पूछ रहे हैं कि क्यों आज तक इतने बर्बर, प्रायोजित नरसंहार के गुनहगार सूचीबद्ध नहीं हुए हैं ? क्यों बेइंतहा ज़ुल्म के शिकार हजारों भारतीयों के साथ  इन्साफ नहीं हुआ है ? अब इन सब अपराधों पर पर्दा डालना है इसलिए जो हजारों कई मामलों में तो लाखों करोड़ों वर्षों तक की याद दिलाते रहते हैं, वे 2002 के गुजरात और गोधरा की याद नहीं करना चाहते।

उस वक़्त के गुजरात के मुख्यमंत्री और गृहमंत्री आज देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री बने हुए हैं।  उनकी इस खामोशी की वजह सिर्फ पांच राज्यों में हो रहे चुनाव नहीं हैं।  इस चुनिन्दा विस्मृति के पीछे उन घपलों, घोटालों, साजिशों, चालबाजियों, न्याय प्रबंधन की तिकड़मों की याद दिलाने से बचना है जिनके जरिये इन दंगों के असली मुजरिमों को बचाया गया था। 

भूलने और याद करने वाली बातों को अलग अलग करने की यह कला हुक्मरानों के लिए फायदेमंद हो सकती है, क़ानून और इन्साफ पर आधारित सभ्य समाज की कामना करने वाले अवाम के लिए, राष्ट्र राज्य के लिए यह नुकसानदेह ही होती है। एक तो इसलिए कि इन दिनों जिस हिंदुत्व के ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज से भी ऊपर लहराने के लायक बनाने के लिए ध्वजस्तंभ तामीर किया जा रहा है उसकी चिनाई ईंट पत्थरों से नहीं  2002 में गुजरात में बिछाई गयी लाशों के ढेर से हुयी है।  जिसकी बीसवीं बरसी है उस 2002 के गुजरात ने ही फासीवाद के भारतीय संस्करण के लिए ऐसी राह बनाई है जिसपर चलकर अब तक तिरस्कृत और बहिष्कृत सा रहा गिरोह इस देश के सत्ता शीर्ष तक जा पहुंचा है।

दूसरे इसलिए कि ताजे इतिहास में घटी ऐसी बर्बरताओं -  नेल्ली (1983), दिल्ली (1984), भागलपुर (1989) की अनदेखियों और विस्मृतियों का नतीजा गुजरात (2002) के रूप में सामने आया।   इस गुजरात को सही तरह से अजेंडे पर न लेने की कीमत देश को कंधमाल (2008), कोकराझार (2012), मुजफ्फरनगर-शामली (2013) और अभी हाल में पूर्वी दिल्ली (2020) की इसी तरह की विभीषिकाओं के रूप में चुकानी पड़ी है। 

तीसरे इसलिए भी कि इस देश की आधी आबादी 25 वर्ष से कम और 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है।  उस दौर की जो इस देश के राजनीतिक सामाजिक वैचारिक विमर्श में साम्प्रदायिकता के विष की सुनामी का दौर है। वह खतरनाक कालखण्ड है जब इतिहास को विकृत करके उसे एक ख़ास तरह के उन्माद को भड़काने वाले रसायन में डुबोया जा रहा है।  ऐसे समय में नरसंहारों को भूलना सदियों को अभिशप्त कर सकता है। 

ठीक यही वजह है कि देश की एकता, सौहार्द्र और क़ानून के राज का महत्त्व समझने वाली जनता और उसके संगठन जानते हैं कि गुजरात को याद रखा जाना , उसके सभी अपराधियों को सजा देने की माँग उठाने के साथ उस कुत्सित विचार के खिलाफ नयी और तेज मुहिम छेड़ी जाना पहले से कहीं ज्यादा जरूरी आज है। 

(संपादक - लोकजतन, संयुक्त सचिव अखिल भारतीय किसान सभा )

Gulbarg society massacre
Gujarat Riots
2002 Gujarat Riots
Communal Riots in India

Related Stories

आपातकाल पर राहुल के बयान के बाद अब बीजेपी से गुजरात दंगों के लिए माफ़ी की मांग

गुजरात: फ़ैक्ट-फ़ाइंडिग रिपोर्ट कहती है कि अब दंगे ग्रामीण इलाकों की तरफ़ बढ़ गए हैं

ट्रंप और मोदी : फ़्रेंड्स विदाउट बेनेफ़िट्स

गुजरात: गोधरा में ‘जय श्रीराम' न बोलने पर 3 मुस्लिम युवकों की पिटाई का आरोप

गुजरात दंगों की विरासत और उन्मादी भीड़ की हिंसा के 17 साल

15 साल बाद भी सिसक रही है गुलबर्ग सोसाइटी


बाकी खबरें

  • mayawati
    सुबोध वर्मा
    यूपी चुनाव: दलितों पर बढ़ते अत्याचार और आर्थिक संकट ने सामान्य दलित समीकरणों को फिर से बदल दिया है
    28 Feb 2022
    एसपी-आरएलडी-एसबीएसपी गठबंधन के प्रति बढ़ते दलितों के समर्थन के कारण भाजपा और बसपा दोनों के लिए समुदाय का समर्थन कम हो सकता है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 8,013 नए मामले, 119 मरीज़ों की मौत
    28 Feb 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 1 लाख 2 हज़ार 601 हो गयी है।
  • Itihas Ke Panne
    न्यूज़क्लिक टीम
    रॉयल इंडियन नेवल म्युटिनी: आज़ादी की आखिरी जंग
    28 Feb 2022
    19 फरवरी 1946 में हुई रॉयल इंडियन नेवल म्युटिनी को ज़्यादातर लोग भूल ही चुके हैं. 'इतिहास के पन्ने मेरी नज़र से' के इस अंग में इसी खास म्युटिनी को ले कर नीलांजन चर्चा करते हैं प्रमोद कपूर से.
  • bhasha singh
    न्यूज़क्लिक टीम
    मणिपुर में भाजपा AFSPA हटाने से मुकरी, धनबल-प्रचार पर भरोसा
    27 Feb 2022
    मणिपुर की राजधानी इंफाल में ग्राउंड रिपोर्ट करने पहुंचीं वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह। ज़मीनी मुद्दों पर संघर्षशील एक्टीविस्ट और मतदाताओं से बात करके जाना चुनावी समर में परदे के पीछे चल रहे सियासी खेल…
  • up elections
    न्यूज़क्लिक टीम
    उत्तर प्रदेश चुनाव: क्या हैं जनता के असली मुद्दे?
    27 Feb 2022
    न्यूज़क्लिक ने उत्तर प्रदेश बनारस विधानसभा में मीलों का सफ़र तय किया, यह जानने की कोशिश थी की आखिर जनता क्या चाहती है? क्या जनता इस बार भी धर्म को सबसे ऊपर रखते हुए अपना मुख्यमंत्री चुनेगी या…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License