NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
हमारे लिए गधा आज भी 'गधा', जबकि विदेश में बढ़ रही कद्र!
आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2012 की पशुधन गणना से वर्ष 2019 की नवीनतम पशुधन गणना तक, गधों की आबादी में सबसे तेज 61.23 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई है।
शिरीष खरे
10 Feb 2022
donkey
प्रतीकात्मक तस्वीर साभार: विकिपीडिया

भारत में गधों की घटती संख्या को लेकर तरह-तरह के कारण बताए जा रहे हैं। लेकिन, पिछले दिनों 'ब्रूक इंडिया' नामक संस्था ने इंवेस्टिगेटिव स्टडी सार्वजनिक की, जिसमें उसने कुछ दावे किए। दरअसल, स्टडी में इस प्राणी की घटती संख्या को लेकर चिंता न सिर्फ जाहिर की गई, बल्कि उसके पीछे एक अन्य कारण भी बताया गया। ये कारण हमें यह सोचने के लिए बाध्य करता है कि जो प्राणी आज तक हमारे लिए मजाक का विषय है, वही हमारे पड़ोसी देश चीन के लिए किस प्रकार से अहम हो सकता है।

दरअसल, इस इन्वेस्टिगेटिव स्टडी में यह दावा किया गया है कि भारत में घटती गधों की आबादी के पीछे एक कारण चीन में बढ़ती भारतीय गधों की मांग भी है। स्टडी में कहा गया कि भारत के गधों की त्वचा के लिए चीन बड़े पैमाने पर उनकी तस्करी कर रहा है और गधों की त्वचा का इस्तेमाल पारंपरिक चीनी दवाओं को बनाने के लिए कर रहा है।

इसमें नई बात यह है कि चीन गधों को अहमियत दे रहा है, जो स्वास्थ्य की दृष्टि से उसके लिए अति लाभदायक सिद्ध हो सकते हैं। अब स्टडी में किया गया दावा किस सीमा तक सच है, यह एक दूसरा मुद्दा हो सकता है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि भारत में गधों की संख्या तेजी से घट तो रही ही है, इसलिए विदेशी खतरों से जुड़ी इस प्रकार की खबर पढ़ते हुए चिंता तो होती ही है, साथ ही एक संभावना भी दिखाई देती है कि अच्छा होगा यदि यह स्थिति भारत में गधों के प्रति प्रचलित धारणा को तोड़ सके तो!

दरअसल, यह स्थिति हमें इस बात का एहसास करा सकती है कि गधा जिसे हम पारंपरिक तौर पर उसके सीधेपन के कारण मूर्ख मानते आ रहे हैं, 'गधे के आगे गीता पढ़ना' जैसी कई प्रचलित कहावत और मुहावरों के जरिए जिसका मजाक उड़ाते रहे हैं, उसकी उपेक्षा और उसका उपहास अब समाज व देश हित में नहीं होना चाहिए।

अब तक की सबसे बढ़ी गिरावट

इस मुद्दे को दूसरे आयामों से देखने से पहले एक नजर तथ्यों पर डाल लेनी चाहिए। पशुधन गणना के तथ्य बताते हैं कि अपने यहां जनसंख्या के अनुपात में मनुष्यों के अनुकूल गधे जैसे पशुओं की संख्या लगातार घट रही है। लेकिन, इस गिरावट को भी यदि हम देखें तो यह हमारे लिए और बड़ा झटका है। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2012 की पशुधन गणना से वर्ष 2019 की नवीनतम पशुधन गणना तक, गधों की आबादी में सबसे तेज 61.23 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई है। 2019 में देश की गधों की आबादी घटकर 0.12 मिलियन हो गई है, जो 2012 में 0.32 मिलियन थी, जबकि 2007 में 0.44 मिलियन गधे थे।

गधों की संख्या के मामले में बेशक उत्तर-प्रदेश पहले स्थान पर है लेकिन, उत्तर-प्रदेश जैसे विशाल राज्य में जहां इन दिनों चुनाव का माहौल भी है, वहां यदि हम यह प्रश्न पूछें कि हर पशुधन गणना में गधों की संख्या क्यों कम हो रही है, तो संवेदना के स्तर पर गधों को लेकर जो धारणा बनी हुई है, उसके आधार पर शायद यह प्रश्न ही मजाक का विषय समझ लिया जाए! इसके बावजूद कि सरकारी गणना के मुताबिक उत्तर-प्रदेश जैसे घनी आबादी वाले राज्य में गधों के घटने की दर 71 प्रतिशत से भी अधिक है।

इसके बाद राजस्थान और गुजरात जैसे राज्य आते हैं और हैरानी की बात यह है कि इन राज्यों में भी गधों की संख्या बहुत तेजी से घट रही है, राजस्थान में 71 प्रतिशत तो गुजरात में 70 प्रतिशत की गति से गधों की संख्या घट गई है। फिर भी, इस मामले में सबसे ज्यादा आश्चर्यचकित बिहार करता है, इस विशाल जनसंख्या वाले राज्य में 47 प्रतिशत गधों की संख्या में गिरावट दर्ज हुई है, जो तुलनात्मक तौर पर कम लगती है। इसी तरह, दक्षिण भारत की ओर आंध्र प्रदेश है जहां गधों में 53% की गिरावट देखी गई. वहीं, गधों की संख्या में सबसे कम गिरावट महाराष्ट्र में देखी गई है जो कि 39 प्रतिशत है।

यह गिरावट स्वाभाविक नहीं

हालांकि, इन आंकड़ों के पीछे के विश्लेषण में जाएं तो एक वेदनापूर्ण परिदृश्य उभरता है। दरअसल, गधों की संख्या में गिरावट आनी स्वाभाविक नहीं है। जब हम कह रहे हैं कि गधों की संख्या में गिरावट अस्वाभाविक है तो इसका अर्थ है कि एक विस्तृत अध्ययन कराया जाए, जो इस बिंदु पर आधारित हो कि गधों में प्रजनन शक्ति कहीं कम तो नहीं होती जा रही है, या वे कुछ गंभीर संचारी रोगों के कारण विलुप्त होने की कगार पर तो नहीं पहुंच रहे हैं।

इसके बाद हमें उन दावों या आरोपों की छानबीन करनी चाहिए, जो कि इन्वेस्टिगेटिव स्टडीज के हवाले से आ रहे हैं। इस कड़ी में हमें यह देखना चाहिए कि प्राचीन चीनी चिकित्सा में गधे की त्वचा का उपयोग किया जाता था, व्यापक रूप से विभिन्न दवाओं के लिए कच्चे माल के रूप में। कहा यह भी जा रहा है कि चीनी दवा में गधे की त्वचा का उपयोग उम्र बढ़ाने के लिए भी होता है।

यह बात इसलिए कही जा रही है कि चिकित्सा क्षेत्र में जो कार्य चीन कर रहा है, वह हम क्यों नहीं कर सकते हैं। लिहाजा, भारतीय पारंपरिक चिकित्सा की दृष्टि से भी गधों की उपयोगिता के बारे में सोचा जा सकता है। जाहिर है कि पशुधन गणना से निकले आंकड़े महज स्थिति की भयावहता बता रहे हैं, स्थिति का समाधान सर्वे में नहीं है। इसलिए कई प्रश्न अनुत्तरित हैं, जिनके उत्तर नये सर्वे और शोध से ही मिल सकते हैं।

गधों के प्रजनन की राष्ट्रीय योजना

गधे यदि गायब हो रहे हैं तो जैव विविधता की दृष्टि से भी उन्हें बचाना आवश्यक है। लेकिन, सवाल है कि अब तक वृहद स्तर पर गधों के संरक्षण की कोई कारगर योजना लागू की गई है? इसके अलावा यदि गधों की भारी कमी के पीछे किसी विदेशी साजिश की आशंका जाहिर की जा रही है तो सरकारी स्तर पर गधों के प्रजनन की राष्ट्रीय योजना क्यों नहीं बनाई जानी चाहिए?

ऐसा इसलिए भी कि जब कई किस्म के अन्य जीव जंतुओं के संरक्षण की योजनाएं चल रही हैं, तो गधा जो कि विलुप्त होने की कगार पर तेजी से बढ़ रहा है, उसके लिए भी संरक्षण की योजना बनाई जा सकती है, जिसका लक्ष्य होना चाहिए गधों की संख्या बढ़ाने में आने वाली बाधाओं की पहचान और उन बाधाओं को दूर करने के उपाय।

दूसरी तरफ, यदि हम आधुनिकता के क्रम को देखें तो इसमें गधा मनुष्य का पुराना साथी रहा है। गधे की एक विशेषता यह बताई जाती है कि ये ज्यादा पानी नहीं पीता और बहुत कम चारा खाकर अपना गुजारा कर सकता है। इसलिए यह माल ढुलाई के लिए हमेशा ही उपयोगी रहा है। यह ठीक है कि जैसे-जैसे संचार व यातायात के साधन बढ़ रहे हैं तो इसकी उपयोगिता कम होती जा रही है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत गांवों का देश है और आज भी एक बड़ी आबादी परंपरागत तरह से जीवन निर्वाह कर रही है। वहीं, गधे के संरक्षण के मामले में एक अच्छी बात यह है कि इसके लिए किसी जंगली क्षेत्र से जनजातियों को बाहर भी नहीं निकाला जा सकेगा। जाहिर है कि बाघ जैसे प्राणी की बजाय गधे का संरक्षण कहीं आसान और कम खर्चीला है।

(शिरीष खरे पुणे स्थित स्वतंत्र पत्रकार व लेखक हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Donkey
Population of Donkey

Related Stories


बाकी खबरें

  • Farmers Protest in UP
    सुबोध वर्मा
    उत्तर प्रदेश में एक ऐसी लड़ाई, जिसे पूरा भारत आगामी वर्षों में लड़ेगा
    14 Feb 2022
    प्रदेश यह तय करने के लिए बड़े पैमाने पर मंथन से गुजर रहा है कि क्या धार्मिकता के गढ़े गए आक्रामक तर्कों और तरीकों से आदमी की भूख शांत की जा सकती है।
  • up elections
    लाल बहादुर सिंह
    यूपी चुनाव दूसरा चरण: अल्पसंख्यकों का दमन, किसानी व कारोबार की तबाही और बेरोज़गारी हैं प्रमुख मुद्दे
    14 Feb 2022
    दूसरे चरण की सीटों पर विपक्ष ने पिछली बार भी अन्य चरणों की तुलना में सबसे अच्छा प्रदर्शन किया था। सपा को अपनी कुल 47 में 15 अर्थात लगभग एक तिहाई सीटें इसी इलाके में मिली थीं।
  • up elections
    प्रज्ञा सिंह
    यूपी चुनाव : कुराली गाँव के हँसते ज़ख़्म
    14 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश चुनाव के दूसरे चरण का मतदान जारी है। इस बीच पढ़िये सहारनपुर ज़िले के कुराली गांव में टूटी सड़कों ग़रीबों को रही परेशानियों की यह रिपोर्ट।
  • uttarakhand
    मुकुंद झा
    उत्तराखंड चुनाव: भाजपा एक बार फिर मोदी लहर पर सवार, कांग्रेस को सत्ता विरोधी लहर से उम्मीद
    14 Feb 2022
    उत्तराखंड में चुनावी शोर अब ख़त्म हो गया है। हर दल ने अपने-अपने वादें और घोषणाओं को जनता के सामने रख दिया है। अब उन सभी वादों और घोषणाओं पर जनता के फैसले का समय है। न्यूज़क्लिक ने इस पूरे चुनाव के…
  • channi
    न्यूज़क्लिक टीम
    पंजाब चुनाव: यह हमारे लिए आसान चुनाव है: चरणजीत सिंह चन्नी
    13 Feb 2022
    इस ख़ास एपीसोड में वरिष्ठ पत्रकार नीलू व्यास ने पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी से बातचीत की। मुख्यमंत्री चन्नी का मानना है कि कांग्रेस दो तिहाई बहुमत के साथ वापस आ रही है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License