NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
भारतीय टेलीकॉम में एकाधिपत्य का लगातार बढ़ता ख़तरा
किसी भी उद्योग में एकाधिपत्य (Monopoly) का खामियाजा सबसे अधिक कंज्यूमर यानी उपभोक्ता को भुगतना पड़ता है।
बी सिवरामन
07 Mar 2020
भारतीय टेलीकॉम
साभार

हाल के वर्षों में भारतीय टेलीकॉम उद्योग एक संकट से दूसरे संकट की ओर बढ़ता रहा है। सभी को मालूम है कि 2जी घोटाले के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने कैसे 122 टेलीकॉम लाइसेंस रद्द कर दिये थे।

दूसरा प्रमुख संकट तब गहराया जब रिलायंस जियो ने मोबाइल टेलीफोनी के क्षेत्र में प्रवेश किया। यह भारतीय टेलीकॉम में एकाधिपत्य (Monopoly) की शुरुआत का संकेत भी था। यदि नई सहस्राब्दी के आरम्भ में 15 कम्पनियां मोबाइल टेलीफोन सेवा दे रही थीं, इसके दूसरे दशक के अन्त आते-आते केवल 4 कम्पनियां बचीं। कई तो दिवालिया हो गयीं और कुछ जो बचीं, दूसरों के साथ विलय कर गईं। मसलन, आइडिया वोडाफोन के साथ विलय कर गया और टेलेनाॅर व टाटा डोकोमो एयरटेल के साथ विलय कर लिये ताकि रिलायंस जियो द्वारा पेश की गई प्रतिस्पर्धा में वे अपने को जीवित रख सकें। दूसरी ओर मुकेश अंबानी के अपने भाई अनिल अंबानी को और एयरसेल को अपने को दिवालिया घोषित करना पड़ा क्योंकि वे मुकेश अंबानी के ‘प्राइस वार’ से निपट नहीं सके।

करीब 40-50 अरब डालर की पूंजी, जो इन कम्पनियों ने निवेशित की थी, पानी में गई। 19 सितम्बर 2018 को अपने एक साक्षात्कार में अनिल अंबानी ने घोषणा की कि टेलीकॉम उद्योग में करीब 20 लाख नौकरियां खत्म होंगी, जिसमें से 50,000 नौकरियां उनके अपने रिलायंस काॅम की होंगी। बाकी ‘जाॅब लाॅस’ 10 प्रमुख मोबाइल इकाइयों और दर्जनों छोटे टेलिफोनी व हैंडसाइट इकाइयों तथा अन्य टेलीकॉम हार्डवेयर इकाइयों में होना था, जो बंद हो गए थे। हम कह सकते हैं कि अगर किसी को एकाधिपत्य की वजह से सबसे अधिक धक्का लगा तो वे श्रमिक थे।

27 दिसम्बर 2015 को मुकेश अंबानी ने धमाके के साथ रिलायंस जियो लांच किया और अनलिमिटेड फ्री वायस काल सेवा और डाटा प्लान पेश किये, जो 50 रु प्रति जीबी की बहुत ही कम दर से शुरू हो रहे थे, क्योंकि उन्हें बड़ी सब्सिडी मुहय्या हो रही थी। रिलायंस जियो मोबाइल हैंडसेट भी कौड़ी के दाम बिक रहे थे, यदि कोई रिलायंस जियो की सेवा लेना पसंद करे। पर्यवेक्षकों ने कहा कि यह ‘प्रिडेटरी प्राइसिंग’, यानी निगल जाने वाली (दूसरों को) कीमतें थीं; क्योंकि इससे एयरटेल को अपनी टैरिफ 80 प्रतिशत घटानी पड़ी।

अगला संकट तब गहराया जब 24 अक्टूबर 2019 को सर्वोच्च न्यायालय में जस्टिस अरुण मिश्रा का फैसला आया। 1999 में सरकार ने राजस्व सहभाजन की नीति लागू की थी पर सकल राजस्व को लेकर अंतरविरोध पैदा हुए। इन कम्पनियों ने केवल मूल टेलीकॉम सेवाओं में से सरकार को राजस्व का हिस्सा दिया, पर डिविडेन्ड से आय और हैंडसेट की बिक्री और अन्य सेवाओं से प्राप्त पूंजी का लाभ शामिल नहीं किया। पर दूरसंचार विभाग इस सारे आय को जोड़ना चाहता था और मामला न्यायालय तक पहुंच गया। तब सर्वोच्च न्यायालय ने तीन कंपनियों- एयरटेल, वोडाफोन-आइडिया और टाटा इन्फोकाॅम को निर्देशित किया कि वे सरकार को 1.04 लाख करोड़ बकाया, ब्याज और जुर्माना अदा करें।

एयरटेल को 35,586 करोड़ और वोडाफोन को 53,039 करोड़ एजीआर (ऐड्जस्टेड ग्राॅस रेवेन्यू) बकाया भुग्तान करने को निर्देशित किया गया। 2019 के पहले 3 महीनों में ही एयरटेल को 2866 करोड़ का घाटा सहना पड़ा; यह दूसरे 3 महीनों में 23,045 करोड़ हो गया, क्योंकि एजीआर बकाए का भुगतान करना था। तीसरे क्वाटर में भी 1035 करोड़ का घाटा लगा। इसके अलावा एयरटेल पर 1 लाख करोड़ का ऋण भी था। एयरटेल और वोडाफान अस्तित्व का संकट झेल रहे हैं। यह संकट यहीं नहीं समाप्त होता है। दो आने वाले घटनाक्रमों से एकाधिपत्य को और भी बढ़ावा मिलेगा। टेलकाॅम टेक्नोलाॅजी और उसकी सेवाएं ‘कन्वर्जेन्स एरा’ की ओर बढ़ रहे हैं।

एक स्मार्टफोन या हाथ में पकड़ा जाने वाले डिवाइस को हम टीवी अथवा कम्प्यूटर के रूप में प्रयोग कर सकते हैं; और इससे भी अधिक बहुत कुछ। ऐसे संचार और प्रसारण के कन्वर्जेंस में, जो केबल टीवी संचालकों को व्यर्थ साबित कर रहा है, स्मार्टफोन के जरिये सारे टीवी चैनेलों को देखा जा सकता है। समाचार की लाइव-स्ट्रीमिंग, स्पोर्ट्स, मनोरंजन, फिल्में, गेम और संगीत, सबकुछ स्मार्टफोन पर उपलब्ध है; साथ ही समस्त इंटरनेट सेवाएं मिल जाती हैं। और ‘ऑगमेंटेड रियलिटी' व 'वर्चुअल रियलिटी' जैसे वैल्यू-ऐडेड सर्विसेज़ भी होंगी। पर इस सब की कल्पना हाई-स्पीड 5जी के बिना की ही नहीं जा सकती। पर 5जी बहुत ही महंगा है। डिजिटल कम्यूनिकेशन कमिशन ने मार्च-अप्रैल 2020 में 5जी की नीलामी के लिए हरी झंडी दिखा दी है।

चेन्नई जिले के नेशनल फेडरेशन ऑफ टेलीकॉम एम्प्लाॅईज़ के पूर्व सचिव और टेलीकॉम क्षेत्र के जाने-माने सोशल मीडिया सलाहकार इलंगो सुब्रमण्यम ने न्यूज़क्लिक के लिए बताया कि "आने वाली 5जी की निलामी फ्लाॅप शो साबित होगी। जब ऐयरटेल, वोडाफोन और रिलायंस जियो पर एजीआर बकाए का भारी ऋण लदा है, ये तीनों बड़ी कम्पनियां तो सभी क्षेत्रों में 5जी स्पेक्ट्रम के लिए बोली नहीं लगा सकेंगे। 5जी स्पेक्ट्रम नीलामी के लिए 8300 यूनिटों में बंटा हुआ है, और सभी 8300 यूनिटों के लिए बोली लगाने पर सरकार को 5.22 लाख करोड़ की आमदनी होगी। स्विस रेटिंग एजेंसी यूबीएस ने आंकलन किया है कि तीन टेलीकॉम कम्पनियों-जियो, एयरटेल और वोडाफोन को 30.5 अरब डालर, यानी 2.2 लाख करोड़ खर्च करना पड़ेगा, यदि वे सभी सर्किलों में 5जी लाॅन्च करना चाहेंगे।

इन तीनों की वर्तमान आर्थिक संकट की स्थिति में, वे केवल कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में, खासकर मेट्रो शहरों के लिए बोली लगाएंगे और परीक्षण के आधार पर 5जी लांच करेंगे, ताकि उसकी लाभप्रदता को आंका जा सके। इसके मायने हैं कि वे उपलब्ध स्पेक्ट्रम के 10 प्रतिशत से भी कम के लिए बोेली लगाएंगे, और सरकार को 40,000 करोड़ से अधिक नहीं मिल सकेगा’’। पर 5जी के लांच होने से अगर किसी को लाभ होगा तो वह रिलायंस जियो है, क्योंकि वही आज लाभ कमाने वाली प्रमुख कम्पनी है।

टेलीकॉम विभाग की और एक प्रमुख पहल है इन्फ्रास्ट्रक्चर, नेटवर्क और सर्विसेज़ सहित सभी लेयर्स को अन्बंडल करना। पहले भी, सरकार एकीकृत लाइसेंस पद्धति की ओर बढ़ गई थी, जिसके अंतरगत एक ही पद्धति से एक विशालकाय टेलीकॉम कम्पनी विविध सेवाओं को चला सकती है-जैसे वाॅयस टेलीफोनी, डाटा/इंटरनेट सेवाएं आदि। अब उन्होंने घोषणा की है कि वे लाइसेंस अनबन्डल करके अलग-अलग सेवाओं के लिए छोटे हिस्से वाले लाइसेंस देंगे; ये सेवाएं ऐसी छोटी कंपनियां भी दे सकती हैं जिनके पास अपना स्पेक्ट्रम नहीं है पर बड़ी कम्पनियों से स्पेक्ट्रम भाड़े पर ले सकती हैं। यदि पहले के एकीकृत लाइसेंस व्यवस्था से कुछ एकाधिकार वाली कम्पनियों में पूंजी के संकेंद्रण (Concentration) को प्रश्रय या संरक्षण देती थी, प्रस्तावित अनबंडलिंग से एक नई ज़मींदारी व्यवस्था और पूंजी केंद्रीकरण का आविर्भाव होगा, जिसके तहत कुछेक एकाधिकार वाली कम्पनियां ढेर सारे छोटीे-छोटी कम्पनियों से भाड़ा उगाह सकेंगी।

सरकारों ने एकाधिपत्य को समर्थन दिया है

बीएसएनएल यूनियनें उत्तरोतर सभी सरकारों पर अभियोग लगाती रही हैं कि वे राज्य-संचालित बीएसएनएल की कीमत पर एकाधिकार वाली कम्पनियों को समर्थन देती रही हैं। जबकि एसरटेल ने 2012 में ही 4जी लांच कर दिया था, और रिलायंस जियो व वोडाफोन ने 2016 में, सरकार ने बीएसएनएल को 4जी स्पेक्ट्रम नहीं दिया। जब बीएसएनएल कर्मियों ने अनिश्चितकालीन हड़ताल की धमकी दी तभी सरकार ने 2019 के अंत में रिवाइवल प्लान की घोषणा की और बीएसएनएल को 4जी स्पेक्ट्रम का ऑफर दिया और ज़रूरी अनुदान देने का वायदा भी किया।

सीटू यूनियन ने आरोप लगाया है कि ट्राय ने ‘प्रिडेटरी प्राइसिंग’ को काबू में करने के लिए कुछ नहीं किया। रिलायंस बाद में आया और उसके पास स्पेक्ट्रम भी नहीं था, पर इसी सरकार ने जबकि दूसरी कम्पनियों को स्पेक्ट्रम हस्तांतरण से रोका था, अब एक कम्पनी से दूसरे को स्पेक्ट्रम के हस्तांतरण व बिक्री के लिए अनुमति दे दी। यह इसलिए कि जियो अनिल अंबानी के रिलायंस काॅम के स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल कर सके। जबकि जियो के ‘प्रिडेटरी प्राइसिंग’ के विरुद्ध सरकार ने कुछ नहीं किया, अब ट्राॅय जियो की बीएसएनएल की सस्ती सेवाओं से प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिये ‘फ्लोर प्राइस’ का प्रस्ताव दे रही है।

किसी भी उद्योग में एकाधिपत्य या एकाधिकार का खमियाजा सबसे अधिक कंज्यूमर यानी उपभोक्ता को भुगतना पड़ता है। पहले ही रिलायंस जियो इंटरकनेक्टिविटी में तमाम किस्म की सीमाएं लगा चुका है और अपनी ‘फ्री वाॅयस काल’ सेवा केवल रिलायंस जियो के उपभोक्ताओं को उपलब्ध कराता है। दामों का युद्ध एक दुधारी तलवार ही है, और रिलायंस जियो पर भारी ऋण भी है। वह अपनी सब्सिडी को लम्बे समय तक जारी नहीं रख सकेगा, इसलिए जब बाज़ार में उसके सारे प्रतिद्वन्द्वी खत्म हो जाएंगे, वह अपने टैरिफ अचानक तेज़ी से बढ़ा देगा।

(लेखक आर्थिक और श्रम मामलों के जानकार हैं।)

Telecom
telecom sector
Telecom companies
Airtel
Idea
Vodafone
Jio
Mobile Telecom
BSNL
MTNL

Related Stories

भारती एयटेल में एक अरब डॉलर का निवेश करेगी गूगल, 1.28 फीसदी हिस्सेदारी भी खरीदेगी

उच्च न्यायालय में रिलायंस का हलफ़नामा झूठे दावों से भरा है: किसान समिति

सरकार विवादास्पद कृषि क़ानूनों पर संसद क्यों नही जाती?

खोज ख़बर: जय किसान: रद्द हुआ संसद सत्र, जिओ हुआ परेशान

26-27 नवंबर को किसानों-मज़दूरों का मोर्चा देश को बचाने की लड़ाई है

रिलायंस को जिओ स्पेक्ट्रम के लिए भारी बकाये का भुगतान करना होगा: सांसद

दिवालिया टेलीकॉम कंपनियों का बक़ाया : क्या कोई चूक जियो और एयरटेल के पक्ष में जा रही है?

वोडाफ़ोन मध्यस्थता मामले के केंद्र में है औपनिवेशिक विरासत

डाटा एम्पावरमेंट एंड प्रोटेक्शन आर्किटेक्चर: ठंडे बस्ते में डाले गए पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन बिल का कमज़ोर विकल्प

जस्टिस अरुण मिश्रा के फ़ैसले से रिलायंस जियो को फ़ायदा, वोडाफोन को झटका


बाकी खबरें

  • manual scevenging
    सक्षम मलिक
    हाथ से मैला ढोने की प्रथा का ख़ात्मा: मुआवज़े से आगे जाने की ज़रूरत 
    19 Oct 2021
    सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक बेजवाड़ा विल्सन के मुताबिक़, देश भर में हाथ से मैला ढोने के चलते 2016 से 2020 के बीच कुल मिलाकर 472 और सिर्फ़ साल 2021 में 26 मौतें हुई हैं।
  • Bakhtawarpur
    न्यूज़क्लिक टीम
    बख्तावरपुर : शहर बसने की क़ीमत गाँव ने चुकाई !
    19 Oct 2021
    दिल्ली के नरेला के पास बसे बख्तावरपुर गाँव के निवासी शहर के बसने की क़ीमत चुका रहे है. उनका आरोप है कि दिल्ली सरकार ने उनको उनके हाल पर छोड़ दिया है. वे बरसों से अपने इलाक़े के लिए एक अदद नाले की…
  • Muzaffarpur rail
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहार में भी दिखा रेल रोको आंदोलन का असर, वाम दलों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया
    19 Oct 2021
    संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर हुए धरना-प्रदर्शन के दौरान नेताओं ने केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा को बर्खास्त करने और कृषि कानून और श्रम कोड रद्द करने सहित अन्य कई मांगें उठाई।
  • MK Stalin
    विग्नेश कार्तिक के.आर., विशाल वसंतकुमार
    तमिलनाडु-शैली वाला गैर-अभिजातीय सामाजिक समूहों का गठबंधन, राजनीति के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है? 
    19 Oct 2021
    देश में तमिलनाडु के पास सबसे अधिक सामाजिक रुप से विविध विधायी प्रतिनिधित्व है, और साथ ही देश में सभी जातीय समूहों का समानुपातिक प्रतिनिधित्व मौजूद है।
  • cartoon
    आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक: ख़ाकी का 'भगवा लुक'
    19 Oct 2021
    कर्नाटक के उडूपी ज़िले में एक पुलिस थाने के कभी सिपाहियों ने वर्दी की जगह भगवा रंग के कपड़े पहने। फिर तर्क आया कि विजयदशमी का दिन था इसलिए वर्दी की जगह “भगवा लुक” का आनंद ले लिया। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License