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वित्तीय क्षेत्र संकट जीवित टाइम बम बना हुआ है!
अच्छे पैसे को बुरे पैसों को उबारने के लिये जो लगाया गया है,उससे फिलहाल के लिए यस बैंक को दीवालिया होने से बचा लिया गया। विडम्बना यह है कि यस बैंक के संकट को देखने के बाद घबराए हुए जमाकर्ता कई अन्य निजी बैंकों से अपना पैसा निकालने लगे।
बी सिवरामन
23 Mar 2020
financial crisis in india

राणा कपूर 2019 तक एक रॉकस्टार बैंकर था। 2020 में वह प्रवर्तन निदेशालय (एन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट) की हिरासत में पहुंच गया, क्योंकि उसने अपने संदिग्ध सौदों की वजह से यस बैंक को विनाश के करीब पहुंचा दिया। मोदी सरकार शॉर्ट कट में विश्वास रखती है। जैसे पहले उसने विलय के फार्मुले को अपनाकर संकटग्रस्त सरकारी बैंकों का बोझ स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के मत्थे मढ़ दिया था, एक बार फिर उसी पर दिवालियापन के करीब यस बैंक को भी लाद दिया गया है।

एक बहुत ही बुरी मिसाल के बतौर, जिसे भाविष्य में कभी दोहराया नहीं जा सकता है, एसबीआई को 7250 करोड़ रुपये निवेश करने पड़े। ऐक्सिस बैंक, आईसीआईसीआई, एचडीएफसी और कोटक महिंद्रा बैंक को ज़ोर-ज़बरदस्ती के माध्यम से क्रमशः 600 करोड़, 1000 करोड़,1000 करोड, 500 करोड़ निवेशित करना पड़ा, ताकि यस बैंक की डूबती नैया के शेयर खरीदे जा सकें। जैसा कि पहले कभी नहीं देखा गया, केंद्रीय बैंक आरबीआई ने यस बैंक के लिए 60,000 करोड़ की क्रेडिट के लिए छूट दे दी (फ्रेश लाइन ऑफ क्रेडिट)।

अच्छे पैसे को बुरे पैसों को उबारने के लिये जो लगाया गया है,उससे फिलहाल के लिए यस बैंक को दीवालिया होने से बचा लिया गया। विडम्बना यह है कि यस बैंक के संकट को देखने के बाद घबराए हुए जमाकर्ता कई अन्य निजी बैंकों से अपना पैसा निकालने लगे। इंडसइंड बैंक, करूर वैश्य बैंक और लक्ष्मी विलास बैंक के यहां भी पैसा निकालने की होड़ लग गई। राज्य सरकारें भी इसी होड़ में शामिल हो गईं। एक निजी बैंक बच गया पर कई दूसरे खतरे की स्थिति में (रेड में) धकेल दिये गए हैं।

बुरे समाचार मात्र निजी बैंकों तक सीमित नहीं रहे। जब विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सरकार से मांग की कि 50 विलफुल डिफाल्टरों के नाम घोषित करे, 16 मार्च 2020 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लोक सभा में जवाब पेश किया। यद्यपि उन्होंने डिफॉल्टरों के नाम घोषित करने से इंकार कर दिया, उन्हें बताना पड़ा 19 सरकारी बैंकों को इन डिफॉल्टरों द्वारा कितनी पूंजी देय है और सरकार ने उनको कितनी कर्ज माफी दी है। जोड़कर कुल पूंजी 61,510 करोड़ निकली।

यह टॉप 50 डिफाल्टरों का बकाया है, जबकि समस्त विलफुल डिफॉल्टरों का बकाया सहित कर्ज माफी 1.5 लाख करोड़ बनती है, जैसा कि सीतारमण ने 2 जुलाई 2019 को लोकसभा में बताया था। ये तो केवल वे हैं जो विलफुल डिफॉल्टर हैं, यानी ऐसे, जिनके पास बकाया अदा करने की क्षमता है, फिर भी वे कर्जदाता के साथ छल कर रहे हैं। अन्य डिफॉल्टरों को यदि देखा जाए तो ढेर सारे ऐसे हैं जिनका कर्ज एनपीए में बदल गया है।

इनके द्वारा बैंको को देय, यानी कुल एनपीए, 31 दिसम्बर 2019 को निर्मला जी के अनुसार 9,58,156 करोड़ था। पर एक स्विस बैंक, क्रेडिट स्विस की रिपोर्ट कहती है कि बैंकिंग क्षेत्र की कुल बिगड़ी सम्पत्ति (इम्पेयर्ड असेट्स) 16,88,600 करोड़ थी, यानी दिसम्बर 2019 तक के बैंकों के कुल उधार का 15.7 प्रतिशत। इम्पेयर्ड असेट में शामिल होते हैं तनावग्रस्त सम्पत्ति (स्टेस्ड असेट) और संदिगध सम्पत्ति (डाउटफुल असेट), इसलिए सरकारी बैंकों के संकट की गहराई को केवल एनपीए नहीं दर्शाते।

मोदी सरकार ऋण चूक (लोन डिफॉल्ट) की समस्या को हल करने के लिए भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता कोड (इन्सॉल्वेंसी ऐण्ड बैंक्रप्टसी कोड) लाई। इसको लागू करने की धमकी देकर शिड्यूल्ड कॉमर्शियल बैंकों ने 5,12,687 करोड़ रुपये की वसूली पिछले चार वित्तीय वर्षों में और वर्तमान वित्तीय वर्ष के तीसरे क्वाटर में की है, यह दावा निर्मला सीतारमण कर रही हैं। पर अश्चर्यजनक बात है कि उन्होंने यह नहीं बताया कि 2 जुलाई 2019 को जारी आरबीआई आंकड़ों के अनुसार सरकारी बैंकों का कुल एनपीए 31 मार्च 2015 को 2,67,065 करोड़ रुपये से बढ़कर 31 मार्च 2018 को 8,45,475 करोड़ रुपये हो गये, यानी 5,78,410 करोड़ बढ़े। यह तब, जबकि पिछले 4 वित्तीय वर्षों में सरकारी बैंकों का 3.12 लाख करोड़ का पुनः पूंजीकरण (रीकैपिटलाईज़ेशन) हुआ था।

इससे भी बुरा तो यह था कि एनपीए उस स्थिति में इतने बढ़े जब मोदी सरकार ने कॉरपोरेट बुरे ऋण को भारी मात्रा में माफ किया था। वित्तीय वर्ष 2014-15 में, जबसे मोदी सत्ता में आए हैं  बैंको के कॉरपोरेट एनपीए की माफी कुल 7,77,800 करोड़ तक पहुंच गई है। यह कुल बैंक एडवांस का 7.3 प्रतिशत हिस्सा है।

दरअसल राहुल गांधी को केवल विलफुल डिफॉल्टरों का नहीं बल्कि शीर्ष के 50 कॉरपोरेट घरानों के एनपीए के बारे में प्रश्न करना चाहिये था। टॉप 12 कॉरपोरेट घरानों को ले लें तो इनके बुरे ऋण किसानों की ऋण माफी का दोगुना पाया गया। इंडिया स्पेंड की गणना के अनुसार वित्तीय वर्ष 2017-18 में 10 राज्य सरकारों ने किसानों के लिए 184,800 करोड़ की कर्ज माफी की घोषणा की थी। इसके बरखिलाफ भारत के 12 टॉप कॉरपोरेट घरानों के कुल एनपीए 345,000 करोड़ थे।

कुल क्रडिट का 17 प्रतिशत गैर-बैंकिंग वित्तीय कम्पनियों (एनबीएफसीज़) से आता है; ये वित्तीय क्षेत्र का अगला प्रमुख कम्पोनेंट है। इनमें आते हैं वे वित्तीय संस्थान जो पब्लिक से जमा यानी डिपॉज़िट स्वीकार करते हैं और उधार, यानी क्रेडिट देते हैं-अधिकतर एमएसएमईज़ को। इनमें वे भी शामिल हैं जो शेयर, स्टॉक और म्यूचल फंड आदि में व्यापार करते हैं; साथ में मकान और वाहन के लिए कर्ज़ देते हैं। सितम्बर 2018 तक एनएफबीसी क्षेत्र की कई कम्पनियों का कुल डिफाल्ट 1 लाख करोड़ तक पहुंच गया था। हम कह सकते हैं कि इस क्षेत्र में ‘डॉमिनो इफेक्ट’ लागू हो गया यानी हाल के समय में संकटों की श्रृंखला चल पड़ी।

28 जुलाई 2019 को भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने इंडिया बुल्स द्वारा एक लाख करोड़ के कथित घोटाले की बात उठाई। ये एनएफबीसी प्रमुख तौर पर हाउसिंग के क्षेत्र में काम करता है। स्वामी के अनुसार इस कम्पनी ने नेशनल हाउसिंग बैंक से भारी कर्ज उठाया और इस पैसे को नकली उधारकर्ताओं को देकर घोटाला किया। स्वामी ने 28 जून 2019 को मोदी को एक पत्र लिखकर मांग भी की थी कि इसकी जांच हो।

16 दिसम्बर 2019 को जिन लोगों ने बीएमसी वेल्थ नामक एनएफबीसी द्वारा व्यापार किये जा रही प्रतिभूति (सिक्युरिटीज़)/बॉन्ड और शेयरों में निवेश किया था, सेबी के समक्ष प्रदर्शन कर रहे थे। कारण-बीएमसी वेल्थ ने 45,000 निवशकों की सिक्युरिटीज़ कहीं और गिरवी रखकर घोटाला किया था।

दिवान हाउसिंग फाइनेन्स लिमिटेड ने सरकारी बैंकों और म्यूच्वल फंड्स से उधार लेकर 12,773 करोड़ रुपये 79 शेल कम्पनियों को दिया, ताकि उनके मसध्यम से 10,000 फर्जी ग्राहकों को हाउसिंग लोन दें और पैसों का घोटाला कर ले, फिर उनके उधार में डिफॉल्ट किया।  नवम्बर 20, 2019 को आरबीआई ने उसके बोर्ड का अतिक्रमण कर उसे एक प्रशासक के अधीन रख दिया।

इसी तरह कार्वी स्टॉक ब्रोकिंग ने कथित रूप से 83,000 निवेशकों के शेयर और प्रतिभूति दूसरी कम्पनियों के यहां गिरवी रखा, पर उन्हें छुड़ा न पाने के कारण इन कम्पनियों द्वारा बेच दिये गए। आईएल एण्ड एफएस ने बैंक लोन वापस करने के मामले में व टर्म डिपॉजि़ट व शॉर्ट टर्म डिपॉज़िट वापस अदा करने में डिफॉल्ट किया। साथ ही उसने उधार के पैसों को संदिग्ध ग्राहकों को देने के बाद कॉमर्सियल पेपर रिडेंप्शन ऑब्लिगेशन्स भी पूरे न किये। जब उसके लिये बैंकों का 94,000 करोड़ का कर्ज वापस करना संभव न हुआ, सरकार ने उसके बोर्ड को खारिज करके नए प्रबंधन की नियुक्ति की और यस बैंक की भांति उसमें ताज़ा फंड डाला।

एनएफबीसी क्षेत्र का संकट सर्व-व्यापी है और करीब 11,000 एनएफबीसीज़ को कवर करता है। उनका उधार दिया हुआ बकाया धन 31 मार्च, 2019 तक 17.2 लाख करोड़ हो चुका था, यानी कुल बैंक-ऐडवांस का 20 प्रतिशत हिस्सा। कई तो संकटग्रस्त स्थिति में है और यह बढ़ता संकट एक-के-बाद एक सामने आएगा। आर्थिक मामलों के विभाग ने तो यहां तक सोचना शुरू किया है कि संदिग्ध कारोबार की वजह से 1500 एनएफबीसीज़ के लाइसेंस खारिज कर दिये जाएं।

पिछले साल के पीएमसी बैंक संकट शहरी सहकारी बैंकों के संकट को सबसे बेहतर दर्शा रहा था। भारत में करीब 2000 शहरी सहकारी बैंक थे और इनमें से 500 तो बंद हो गए। बाकी 1500 जो संपूर्ण बैंक क्रेडिट का 11 प्रतिशत हिस्सा देते हैं, बम की तरह फटने वाले हैं। क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की भी यही दशा है। केवल तात्कालिक संकट समाधान और अल्प-कालिक समाधानों के अलावा मोदी सरकार को वित्तीय क्षेत्र के संकट को हल करने के रास्तों का तनिक भी ज्ञान नहीं है।

यदि हम थ्योरी में वित्तीय क्षेत्र के ठोस संकट से वित्तीय पूंजी के संकट की ओर बढें तो संकट और भी गहरा प्रतीत होगा। वित्तीय पूंजी विस्तार और संकुचन के चक्र में काम करती है पर वित्तीय चक्र अंततोगत्वा अर्थव्यवस्था के उत्पादक क्षेत्रों के व्यापार-चक्र से नियंत्रित होता है। दीर्घकालीन मंदी और भारतीय उद्योग व व्यापार में मंदी ऐसे विस्फोट कर सकती है जैसे 2018-09 में यूएस के वित्तीय मेल्टडाउन में हुआ था। भारत में ऐसी संभावित घटना शायद दूर नहीं।

(लेखक आर्थिक और श्रम मामलों के जानकार हैं। विचार निजी हैं।)

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