NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
राजद्रोह का क़ानूनः सिमटे तो दिले आशिक़ फैले तो ज़माना है
“आज देश और दुनिया की भलाई इसी में है कि लफ़्ज़े मोहब्बत का दायरा निरंतर फैले और सारे ज़माने को अपने में समेट ले। जबकि राजद्रोह का दायरा निरंतर संकुचित हो...।” वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार त्रिपाठी की टिप्पणी
अरुण कुमार त्रिपाठी
27 Feb 2021
free speech
प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार: Scroll

जिगर मुरादाबादी से माफ़ी मांगते हुए लफ़्ज़े मोहब्बत के बारे में कही गई उनकी प्रसिद्ध पंक्तियों की विरोधाभासी तुलना राजद्रोह के कानून से की जा सकती है।

जिगर साहेब कहते हैं---

इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना सा फ़साना है,

सिमटे तो दिल-ए-आशिक़, फैले तो ज़माना है।

ज़ाहिर है कि अगर मोहब्बत का संकुचित अर्थ लगाएंगे तो वह सिर्फ़ प्रेमी और प्रेमिका के बीच की बात रहेगी लेकिन अगर उसे फैलाते जाएंगे तो उसमें पूरी दुनिया सिमट कर आ जाएगी। कहा भी गया है कि प्रेम का ढाई आखर पढ़ने से कोई भी पंडित हो जाता है। कुछ ऐसी बात राजद्रोह के कानून के साथ है। अगर हम उसमें से हिंसा का तत्व निकाल दें तो वह सरकार की नीतियों से असहमति के अलावा कुछ खास नहीं है। वह असहमति तो पूरी दुनिया में है और जहां नहीं है वहां होनी चाहिए क्योंकि सरकार की नीतियों से असहमत होने का अधिकार ही लोकतंत्र का आधार है। बल्कि संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार घोषणा पत्र के तहत वह मनुष्य का नैसर्गिक अधिकार है। सरकारें जिस विचारधारा को अराजकतावाद कहती हैं वह अपने में सरकार के बिना समाज का काम चलाने वाली सोच ही है। मार्क्स से गांधी तक सभी चिंतकों ने राज्य विहीनता की कल्पना की है।

आज़ाद भारत में भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए के तहत जब भी कोई मुकदमा बड़ी अदालतों तक पहुंचा है तो अदालतों ने यही कहा है कि इसे संकुचित करके परिभाषित किया जाना चाहिए न कि इसका व्यापक अर्थ लगाया जगाया जाना चाहिए। अगर इसका व्यापक अर्थ लगाएंगे तो असहमति और अभिव्यक्ति के अधिकार पर आघात होगा और अगर संकुचित करके परिभाषित करेंगे तो इसके दायरे में बहुत कम लोग आएंगे। यानी यहां मामला लफ़्ज़े मोहब्बत का उल्टा है। लफ़्ज़े मोहब्बत को जितना फैलाने की जरूरत है राजद्रोह के कानून को उतना ही संकुचित करने की आवश्यकता है।

यह बात सुप्रीम कोर्ट ने 1962 में केदार नाथ सिंह बनाम बिहार राज्य के चर्चित फैसले में कही। केदार नाथ सिंह फारवर्ड कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे और बरौनी की एक सभा में भाषण दे रहे थे। उन्होंने कहा, `आज बरौनी के आसपास सीआईडी के कुत्ते घूम रहे हैं। कुछ सरकारी कुत्ते इस मीटिंग में भी बैठे हैं। भारत के लोगों ने इस देश से अंग्रेजों को भगाया और कांग्रेसी गुंडों को गद्दी पर बिठाया। आज कांग्रेसी गुंडे जनता की गलती से सत्ता में बैठे हुए हैं। जब हम अंग्रेज गुंडों को सत्ता से बाहर कर सकते हैं तो इन कांग्रेसी गुंडों को भी खदेड़ देंगे।’ बस क्या था उन पर राजद्रोह की धारा लग गई और कहा गया कि वे क्रांति के माध्यम से व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की अपील कर रहे थे। निचली अदालत ने उन्हें सजा सुना दी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बरी करते हुए कहा कि इस कानून की व्यापक और उदार नहीं संकीर्ण व्याख्या होनी चाहिए और उन्हीं पर राजद्रोह का आरोप लगाया जाना चाहिए जो अपने कथन से हिंसा को भड़का रहे हों।

ऐसा ही फैसला सुप्रीम कोर्ट ने 1995 में बलवंत सिंह बनाम पंजाब सरकार के मामले में दिया। जब अक्टूबर 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हुई तो चंडीगढ़ के नीलम सिनेमा के बाहर बलवंत सिंह और उनके साथी नारे लगा रहे थे--` खालिस्तान जिंदाबाद, राज करेगा खालसा, हिंदुआ नूं पंजाब छोड़ काढ़ के छाडेंगे, हुन मौका आया है राज कायम करने दा।’ उन पर भी धारा 124 ए के तहत मुकदमा हुआ और निचली अदालत से सजा हुई। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया और कहा कि सिर्फ़ नारा लगाने को सरकार पलटने की हिंसक तैयारी नहीं माना जा सकता। नारे के साथ हिंसा की आशंका जुड़ी होनी चाहिए।

यहां यह जानना दिलचस्प है कि इस कानून के तहत लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को भी सजा हुई थी और महात्मा गांधी को भी। तिलक ने बंग भंग के विरोध में मुजफ्फरपुर में चीफ प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट किंगफोर्ड की गाड़ी पर बम फेंकने वाले प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस की गतिविधि का समर्थन अपने अखबार में किया था। जूरी ने उनकी पत्रकारिता की कड़ी आलोचना की और उन पर 1000 रुपए का जुर्माना लगाने के साथ उन्हें छह साल की सजा दी। इस सजा को तिलक ने मांडले जेल में काटा। यहां यह बात ध्यान देने की है तिलक ने अपने को निर्दोष बताया था और कहा था कि इस अदालत से ऊपर भी एक अदालत है जिसकी वे इस सजा के बाद बेहतर सेवा कर सकेंगे।

इसके ठीक उलट महात्मा गांधी को यंग इंडिया और नवजीवन में लिखे अपने तीन लेखों के लिए 1922 में राजद्रोह के अपराध में छह साल की सजा हुई। रोचक तथ्य यह है कि तिलक ने बम फेंके जाने यानी हिंसा किए जाने का समर्थन किया था जबकि गांधी ने चौरी चौरा की हिंसा का विरोध करते हुए अपना असहयोग आंदोलन ही वापस ले लिया था। जिसके कारण स्वाधीनता सेनानियों ने उनकी कड़ी आलोचना की और बहुत सारे लोग कांग्रेस छोड़कर बाहर हो गए। लेकिन गांधी ने अदालत में अपराध को स्वीकार करते हुए स्पष्ट कहा था कि वे इस अपराध के दोषी हैं क्योंकि यह सरकार अन्यायी है और इसका वे बार बार विरोध करेंगे।

पर गांधी ने अदालत में अपने बयान में एक बात जरूर कही थी कि अभिव्यक्ति पर अंकुश लगाने वाले जितने भी कानून हैं उनमें सबसे खतरनाक राजद्रोह का कानून है। आज भी यह बात उतनी ही सही है। अभिव्यक्ति के अधिकार के बिना लोकतंत्र एकदम बेकार है। क्योंकि अभिव्यक्ति के भय रहित वातावरण के बिना न तो स्वस्थ जनमत निर्मित हो सकता है और न ही सच्चाई का पता लगाया जा सकता है। इसलिए सच्चे लोकतंत्र के लिए जरूरी है कि न सिर्फ़ असहमति का अधिकार हो बल्कि उसकी अभिव्यक्ति का अधिकार भी हो। यही वजह कि इंग्लैंड में 2009 में राजद्रोह का कानून वापस ले लिया गया। भले बाद में ब्रेग्जिट के कारण ग्रेट ब्रिटेन टूट गया। यहां यह अंतर भी देखना होगा कि अंग्रेजों ने अपने नागरिकों के लिए राजद्रोह के कानून को संकुचित तरीके से लागू किया जबकि भारतीयों के लिए उसका दायरा फैला दिया। यह बात रेक्स बनाम अल्फ्रेड के 1909 के मुकदमे से साफ है। विडंबना है कि आज भारत में आश्चर्यजनक रूप से अपनी ही चुनी हुई सरकार इस कानून को अपने नागरिकों पर कड़ाई से लागू कर रही है।

चूंकि भारतीय लोकतंत्र निरंतर सिमट रहा है इसलिए यहां की राजसत्ता राजद्रोह के कानून को विस्तार दे रही है। एक ओर वह अपने पक्ष में अभद्र और हिंसक शब्दावली से भरी बहसों को प्रोत्साहित करती है तो दूसरी ओर विपक्ष की शालीन और गंभीर टिप्पणियों को भी राजद्रोह की श्रेणी में रखने से नहीं चूकती। रोचक बात यह है कि अगर चुनी हुई सरकारों को गिराना राजद्रोह है तो यह काम पहले बड़े पैमाने पर कांग्रेस पार्टी करती थी और अब भारतीय जनता पार्टी सबसे जोर शोर से कर रही है। कर्नाटक, गोवा, मध्य प्रदेश और पुडुचेरी सभी जगहों पर भाजपा ने वही काम किया है। या यूं भी कह सकते हैं कि लोकतंत्र में विपक्ष सदैव सत्तापक्ष को हटाकर खुद सत्ता में आने की तैयारी में रहता है। तो क्या उसे राजद्रोह कहा जा सकता है। नहीं। क्योंकि वे वैसा वैधानिक तरीकों से करते हैं। वे तरीके भले एक हद तक अवैधानिक हों और उसमें रिश्वत या दबाव शामिल हो लेकिन प्रत्यक्ष रूप से हिंसा तो बिल्कुल नहीं होती। ऐसे में विपरीत विचारों की अभिव्यक्ति कैसे राजद्रोह की श्रेणी में आ जाता है समझ से परे है।  

इसलिए आज देश और दुनिया की भलाई इसी में है कि लफ़्ज़े मोहब्बत का दायरा निरंतर फैले और सारे ज़माने को अपने में समेट ले। जबकि राजद्रोह का दायरा निरंतर संकुचित हो और वह सिर्फ़ हिंसा करने वालों के लिए रहे और वह असहमति रखने वाले और उसकी अभिव्यक्ति करने वालों के पास भी न फटके।    

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

इन्हें भी पढ़ें :

राजद्रोह, असहमति और अभियुक्त के अधिकार 

मंथन: जब सरकारें ख़ुद क़ानून के रास्ते पर चलती नहीं दिखतीं…

हम कर्कश ध्वनि वाले समाज का हिस्सा बन चुके हैं, जिसकी आंखों पर जाला छाया हुआ है : टी एम कृष्णा

Treason
Treason case
free speech
Right to free speech
Indian Penal Code

Related Stories

मैरिटल रेप : दिल्ली हाई कोर्ट के बंटे हुए फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, क्या अब ख़त्म होगा न्याय का इंतज़ार!

राजद्रोह कानून से मुक्ति मिलने की कितनी संभावना ?

आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) विधेयक, 2022 के रहस्य को समझिये

दिल्ली गैंगरेप: निर्भया कांड के 9 साल बाद भी नहीं बदली राजधानी में महिला सुरक्षा की तस्वीर

मीडिया का ग़लत गैरपक्षपातपूर्ण रवैया: रनौत और वीर दास को बताया जा रहा है एक जैसा

निजी रक्षा का अधिकार : एक क़ानूनी दृष्टिकोण

शादी का झांसा देकर बलात्कार वाले मामलों में महिलाओं की आवाज़ को अहमियत देने की ज़रूरत

सुप्रीम कोर्ट को राजद्रोह क़ानून ही नहीं,यूएपीए और एनएसए के दुरुपयोग पर भी विचार करना चाहिए

प्रिया रमानी जजमेंट #MeToo आंदोलन को सही ठहराता है!

झारखंड: फादर स्टेन स्वामी की गिरफ़्तारी के ख़िलाफ़ बढ़ते विरोध और सवालों के स्वर!


बाकी खबरें

  • mamta banerjee
    भाषा
    तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल में चारों नगर निगमों में भारी जीत हासिल की
    15 Feb 2022
    तृणमूल कांग्रेस ने बिधाननगर, चंदरनगर और आसनसोल नगरनिगमों पर अपना कब्जा बरकरार रखा है तथा सिलीगुड़ी में माकपा से सत्ता छीन ली।
  • hijab
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    हिजाब विवादः समाज सुधार बनाम सांप्रदायिकता
    15 Feb 2022
    ब्रिटेन में सिखों को पगड़ी पहनने की आज़ादी दी गई है और अब औरतें भी उसी तरह हिजाब पहनने की आज़ादी मांग रही हैं। फ्रांस में बुरके पर जो पाबंदी लगाई गई उसके बाद वहां महिलाएं (मुस्लिम) मुख्यधारा से गायब…
  • water shortage
    शिरीष खरे
    जलसंकट की ओर बढ़ते पंजाब में, पानी क्यों नहीं है चुनावी मुद्दा?
    15 Feb 2022
    इन दिनों पंजाब में विधानसभा चुनाव प्रचार चल रहा है, वहीं, तीन करोड़ आबादी वाला पंजाब जल संकट में है, जिसे सुरक्षित और पीने योग्य पेयजल पर ध्यान देने की सख्त जरूरत है। इसके बावजूद, पंजाब चुनाव में…
  • education budget
    डॉ. राजू पाण्डेय
    शिक्षा बजट पर खर्च की ज़मीनी हक़ीक़त क्या है? 
    15 Feb 2022
    एक ही सरकार द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे बजट एक श्रृंखला का हिस्सा होते हैं इनके माध्यम से उस सरकार के विजन और विकास की प्राथमिकताओं का ज्ञान होता है। किसी बजट को आइसोलेशन में देखना उचित नहीं है। 
  • milk
    न्यूज़क्लिक टीम
    राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के साथ खिलवाड़ क्यों ?
    14 Feb 2022
    इस ख़ास पेशकश में परंजॉय गुहा ठाकुरता बात कर रहे हैं मनु कौशिक से राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड से सम्बंधित कानूनों में होने वाले बदलावों के बारे में
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License