NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
साहित्य-संस्कृति
भारत
राजनीति
साहित्यिक-सांस्कृतिक समुदाय ने भाजपा-नरेंद्र मोदी को कभी स्वीकार नहीं किया
"भाजपा बेशक लोकसभा में प्रबल बहुमत पा गयी, लेकिन सांस्कृतिक-साहित्यिक समुदाय ने उसे अपने स्तर पर हरा दिया और नकार दिया।" अजय सिंह का विशेष कॉलम- फ़ुटपाथ
अजय सिंह
03 Jan 2020
protest

दिसंबर, 2019 के शुरू में भारत की विभिन्न भाषाओं और कला माध्यमों से जुड़े 600 से ज़्यादा लेखकों, कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों व बुद्धिजीवियों ने नागरिकता संशोधन विधेयक (अब यह क़ानून बन चुका है) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) का सख़्त लफ़्ज़ों में विरोध करते हुए संयुक्त बयान जारी किया, जिसमें कहा गया कि ये देश के लिए विभाजनकारी व विघटनकारी हैं, और इन्हें फ़ौरन रद्द किया जाना चाहिए। लेखकों व कलाकारों ने कहा कि हिंदुत्व फ़ासीवादी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नागरिकता संशोधन विधेयक और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के माध्यम से भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का लंबे समय से फ़ासीवादी एजेंडा रहा है। हिंदू राष्ट्र बनने का मतलब है, बहुलतावादी और समावेशी भारत का नष्ट हो जाना।

यह बयान बताता है कि भारत का व्यापक साहित्यिक-सांस्कृतिक समुदाय, जो आम तौर पर सेकुलर-उदार-लोकतांत्रिक-वाम-प्रगतिशील विचार पद्धति से जुड़ा है, मोदी का या आरएसएस-भाजपा का या हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना का मुखर विरोधी है। 2014 के बाद से यह विरोध लगातार ज़ोर पकड़ता गया है। इसके लिए मोदी कभी ‘अपना’ नहीं रहा, हो भी नहीं सकता। क्योंकि मोदी जिस हत्यारी, नफ़रत पर टिकी, आतंककारी हिंदू बहुसंख्यकवादी हिंसक संस्कृति की नुमाइंदगी करते हैं, वह वृहत्तर साहित्यिक-सांस्कृतिक समुदाय के लिए असह्य है।

इस समुदाय में संगठन-बद्ध और संगठन-निरपेक्ष दोनों तरह के साहित्यकार व कलाकार है, और उनके बीच द्वंद्वात्मक रिश्ता है। यहां हर किसी की स्वायत्तता व स्वतंत्र पहचान बनी हुई है। उनके बीच आपसी संवाद, विचारों का आदान-प्रदान और मिलीजुली कार्रवाइयां पहले की तुलना में ज़्यादा सघन व तेज़ हुई है। हालांकि तनाव और असहमतियां भी हैं, वैचारिक अवसरवाद और विचलन भी है, बीच-बीच में दक्षिणपंथ की ओर रूझान भी दिखायी देने लगता है, कभी-कभी तीखी बहस भी सामने आती है। और, इन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता, न किया जाना चाहिए। बहस ज़रूरी है। लेकिन एकता के सूत्र ज़्यादा मज़बूत हैं। और वह है : हिंदुत्व राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का हर हाल में विरोध, हिंदुत्व फ़ासीवाद की राजनीति को ‘ना’ कहना। विरोध की यह आवाज़ कहीं तेज़ है, कहीं मद्धम। लेकिन यह आवाज़ लगातार बनी हुई है।

ख़ास बात यह है कि हिंदी-उर्दू पट्टी के ज़्यादातर लेखक, कवि व संस्कृतिकर्मी-कहना चाहिए कि क़रीब 90 प्रतिशत-‘मोदी भारत-हिंदू भारत’ के खि़लाफ़ हैं और इस दिशा में वे सक्रिय हैं। 2014 के पहले लेखकों व संस्कृतिकर्मियों की ऐसी सक्रियता, इस बड़े पैमाने पर, नहीं देखी गयी थी। यह आज़ाद भारत के इतिहास में महत्वपूर्ण घटना है। ये लेखक व संस्कृतिकर्मी खुल कर मोदी-विरोधी अभियान में शामिल हैं, बयान जारी करते हैं, दस्तख़त करते हैं, लिखते हैं और सांस्कृतिक व आंदोलनात्मक प्रतिरोधमूलक कार्रवाइयां करते हैं। लेखन व रचनाशीलता को नया आवेग मिला है। इसके चलते हिंदी-उर्दू पट्टी में, कम-से-कम बौद्धिक धरातल पर, लोकतंत्र की चेतना का विस्तार हुआ है और उसे आमूल परिवर्तनकारी (रैडिकल) रूप देने में मदद मिली है।

मई, 2019 के लोकसभा चुनाव में हिंदुत्व फ़ासीवादी भाजपा फिर जीत कर केंद्र की सत्ता में आ गयी और नरेंद्र मोदी दोबारा प्रधानमंत्री बन गये। लेकिन देश के व्यापक सांस्कृतिक-साहित्यिक समुदाय ने (कुछ अपवादों को छोड़ कर) नरेंद्र मोदी को कभी स्वीकार नहीं किया, उन्हें देश के लिए अत्यंत विभाजनकारी व विघटनकारी ख़तरनाक तत्व के रूप में देखा, और वह उन्हें ‘गुजरात का हत्यारा’ व ‘मौत का सौदागर’ कहता-समझता रहा। भाजपा बेशक लोकसभा में प्रबल बहुमत पा गयी, लेकिन सांस्कृतिक-साहित्यिक समुदाय ने उसे अपने स्तर पर हरा दिया और नकार दिया।

लोकसभा चुनाव-2019 के लिए जब प्रचार अभियान चल रहा था, तब देश के लेखकों व कलाकारों ने जो फ़ासीवाद-विरोधी सक्रियता दिखायी, उस पर बात करना ज़रूरी है। आज़ाद भारत के इतिहास में शायद ऐसा पहली बार हुआ। बहुत बड़े पैमाने पर देश के लेखकों, कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों और बुद्धिजीवियों ने केंद्र में भाजपा सरकार व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हराने के लिए खुलकर और साहस के साथ जनता के नाम अपील जारी की।

इतने व्यापक और संगठित स्तर पर लेखकों-कलाकारों-बुद्धिजीवियों का सार्वजनिक तौर पर अपनी वैचारिक और राजनीतिक पक्षधरता जताना व इसके लिए ख़तरा मोल लेना आज़ाद भारत के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण-और दुर्लभ-घटना है। इसका दायरा और परिधि 2015 के पुरस्कार वापसी अभियान से कहीं ज़्यादा बड़ी व व्यापक थी। बल्कि यह कहा जाये कि पुरस्कार वापसी अभियान-जैसे ज़बर्दस्त लोकतांत्रिक सांस्कृतिक आंदोलन ने 2019 में साहित्य, कला व संस्कृति की दुनिया में हिंदुत्व फ़ासीवाद-विरोधी वैचारिक पक्षधरता और एकजुटता का इतना बड़ा शामियाना खड़ा किया।

इतनी बड़ी तादाद में-क़रीब 2000 से ऊपर-लेखकों-कलाकारों- बुद्धिजीवियों का सामने आना और अपने नाम व अनुमोदन से आम चुनाव में जनता के पक्ष में और नफ़रत व हिंसा की ताक़तों के खि़लाफ़ और लोकतंत्र व धर्मनिरपेक्षता की हिफ़ाज़त के लिए सक्रिय हस्तक्षेप करना एक बड़ी ऐतिहासिक घटना थी। उन्होंने मोदी, भाजपा व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम लेकर-और उन पर निशाना साधते हुए-अपील जारी की। उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा कि भाजपा के संचालक व नियंत्रक संगठन आरएसएस की विभाजनकारी हिंदुत्ववादी विचारधारा को-जो पूरी तरह फ़ासीवादी है और ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की पोषक है-शिकस्त देना ज़रूरी है, क्योंकि यह देश को बांटने और बर्बाद कर देने की मुहिम चला रही है।

सुखद आश्चर्य की बात यह रही कि ऐसी अपीलों को (इस तरह की तीन-चार अपीलें जारी की गयी थीं) व्यापक समर्थन मिला और उनमें अपना नाम जुड़वाने की जैसे होड़ लग गयी। जबकि सीधे-सीधे वैचारिक-राजनीतिक स्टैंड लिया जा रहा था, फिर भी अपना नाम शामिल कराने में हिचक नहीं दिखायी दे रही थी। इसमें हिंदी लेखकों, कवियों, बुद्धिजीवियों और संस्कृतिकर्मियों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। इसमें वरिष्ठ रचनाकारों के अलावा नौजवान रचनाकारों की तादाद अच्छी-ख़ासी थी। यह और भी सुखद दृश्य था। अन्य भारतीय भाषाओं के साथ भी यही स्थिति थी।

(लेखक वरिष्ठ कवि और पत्रकार हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।) 

Literary-cultural
BJP
Narendra modi
CAA
nrc and citizenship act
NPR
Hindutva
Hindutva Fascist

Related Stories

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

ख़बरों के आगे-पीछे: मोदी और शी जिनपिंग के “निज़ी” रिश्तों से लेकर विदेशी कंपनियों के भारत छोड़ने तक

कविता का प्रतिरोध: ...ग़ौर से देखिये हिंदुत्व फ़ासीवादी बुलडोज़र

ख़बरों के आगे-पीछे: केजरीवाल के ‘गुजरात प्लान’ से लेकर रिजर्व बैंक तक

यूपी में संघ-भाजपा की बदलती रणनीति : लोकतांत्रिक ताकतों की बढ़ती चुनौती

बात बोलेगी: मुंह को लगा नफ़रत का ख़ून

इस आग को किसी भी तरह बुझाना ही होगा - क्योंकि, यह सब की बात है दो चार दस की बात नहीं

ख़बरों के आगे-पीछे: क्या अब दोबारा आ गया है LIC बेचने का वक्त?

मुस्लिम जेनोसाइड का ख़तरा और रामनवमी

ख़बरों के आगे-पीछे: भाजपा में नंबर दो की लड़ाई से लेकर दिल्ली के सरकारी बंगलों की राजनीति


बाकी खबरें

  • Assam
    संदीपन तालुकदार
    असम के दक्षिण-पश्चिमी जिलों में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बेहद दयनीय – I
    13 Nov 2021
    भले ही महामारी हो या न हो, किंतु कर्मचारियों की भारी कमी, आवश्यक उपकरणों और बुनियादी व्यवस्था के अभाव और खराब कनेक्टिविटी ने स्वास्थ्य सेवाओं को दूर-दराज के इलाकों में रह रहे लोगों की पहुँच से बाहर…
  • The Human Cost of War
    न्यूज़क्लिक टीम
    जंग की इंसानी कीमत
    13 Nov 2021
    11 अक्टूबर 2021 को LOC के पास के इलाके में एन्टी-इंसर्जेंसी ऑपरेशन के दौरान पांच जवान शहीद हो गए। न्यूज़क्लिक की टीम मारे गए सैनिकों के परिवारों से मिलने के लिए पंजाब गई।
  • US China
    जोसेफ गेर्सन
    पेंटागन को चीनी ख़तरे के ख़्वाब से बाहर आने की ज़रूरत
    13 Nov 2021
    यह पल राष्ट्रपति जो बाइडेन और उनके आजू-बाजू के लोगों पर इस बात का दबाव बनाने का है कि वे ‘पहले परमाणु हमला न करने के सिद्धांत’ को अपनाएं। वहीं, कांग्रेस के लिए यह क्षण भूमि-आधारित आइसीबीएम और अन्य…
  • Kangana Ranaut
    राजेंद्र शर्मा
    नया इंडिया आला रे!
    13 Nov 2021
    अब तो आजादी की भी नयी डेट आ चुकी है। संविधान की नयी डेट तो पहले ही आ चुकी थी। संसद की तो नयी डेट क्या, पूरी की पूरी इमारत ही नयी बन रही है।
  • Mahapanchayat
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    किसान आंदोलन: 14 नवंबर को पूरनपुर में लखीमपुर न्याय महापंचायत
    13 Nov 2021
    एसकेएम ने दावा किया है कि लखीमपुर खीरी किसान हत्याकांड में घायलों को वायदा किए गए मुआवजे का भुगतान नहीं किया गया है। 4 अक्टूबर 2021 को यूपी सरकार ने प्रत्येक घायल किसान को दस लाख रुपये के मुआवजे को…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License