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राजनीति
“नए कृषि क़ानून सिर्फ किसान ही नहीं बल्कि राष्ट्रविरोधी हैं”
झारखंड और बिहार में आंदोलनकारी किसानों के पक्ष में ‘ भारत बंद’ काफ़ी असरदार रहा। बंद को सफल बनाने के लिए सभी वामपंथी दलों व संगठनों के अलावा झारखंड सरकार के कई मंत्री–विधायक भी सड़कों पर उतरे ।
अनिल अंशुमन
09 Dec 2020
 किसान

"देश के किसानों के सम्मान में हम खड़े मैदान में..." 8 दिसंबर के भारत बंद के समर्थन को लेकर सोशल मीडिया में वायरल यह पोस्ट झारखंड और बिहार में ज़मीनी स्तर पर तो कारगर होता नज़र आया। किसानों के बंद को सफल बनाने के लिए सभी वामपंथी दलों व संगठनों के अलावा झारखंड सरकार के कई मंत्री–विधायक भी सड़कों पर उतरे ।

खबरों के अनुसार भाकपा माले विधायक विनोद सिंह के नेतृत्व में सुबह से ही बगोदर से गुजरनेवाले राष्ट्रीय राजमार्ग 2 जीटी रोड को घंटों जाम कर मोदी सरकार की किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ और आंदोलनकारी किसानों के समर्थन में विरोध मार्च निकाला गया। घाटशिला के चर्चित झामुमो विधायक पारंपरिक आदिवासी परिधान में कार्यकर्त्ताओं के साथ बंद कराते हुए नज़र आए।

झारखंड की राजधानी रांची में भाकपा माले – सीपीएम – सीपीआई – मासस के आलवे झामुमो – राजद व कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने बंद को सफल बनाने के लिए मार्च निकाल कर अल्बर्ट एक्का चौक पर प्रतिवाद प्रदर्शन किया। रामगढ़, झुमरीतिलैया, धनबाद, बोकारो, गढ़वा – पलामू व जमशेदपुर के आलवे आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र बुण्डू समेत पूर्वी सिंहभूम के कई स्थानों पर सड़कें जाम कर बंद के समर्थन में मार्च निकाले गए। कई कोलियारियों के मजदूरों ने भी बंद के समर्थन में स्थानीय स्तर पर सक्रिय होकर मोदी सरकार की मजदूर – किसान विरोधी नीतियों का विरोध किया।

खबरों के अनुसार बंद समर्थकों और प्रशासन में छिटपुट नोक – झोंक को छोड़ शेष सभी स्थानों पर बंद पूरी तरह से शांतिपूर्ण और असरदार रहा। 7 जिलों में बंद समर्थकों ने गिरफ्तारियां भी दीं। झारखंड में बंद पर वाम दलों ने जारी बयान में कहा है कि यह केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ जनता का बढ़ता आक्रोश और चेतावनी है। बंद को सफल बनाने में झारखंड सरकार के कृषि मंत्री बादल पत्रलेख, ग्रामीण विकास मंत्री आलमगीर आलम व वित्त सह खाद्य आपूर्ति मंत्री रामेश्वर उरांव के आलवे कांग्रेस-झामुमो कई विधायक अपने कार्यकर्ताओं के साथ सक्रिय दीखे।

प्रदेश भाजपा प्रवक्ताओं ने बंद को विफल करार देते हुए विपक्ष पर मुद्दे से राजनीति करने का आरोप लगाया। जवाब देते हुए झामुमो प्रवक्ता ने कहा कि दिल्ली – रांची के बंद कमरों में बैठे भाजपा के लोग आँखें खोलकर देख लें कि बंद की स्वतःस्फूर्त सफलता ने साबित कर दिया है कि अब मोदी सरकार के खिलाफ उलगुलान का आगाज़ हो चुका है। अब हेमंत सोरेन सरकार भी दबाव नहीं सहेगी और राज्य के आर्थिक व संवैधानिक मुद्दों पर चुप नहीं रहेगी। केंद्र की सरकार एक ओर विधि व्यवस्था को राज्यों का विषय बताती है , वहीं दूसरी तरफ कई एजेंसियां बना दी है जिन्हें राज्य की अनुमति लेने की ज़रूरत ही नहीं है।

झारखंड के साथ साथ बिहार में भी भारत बंद को ‘ मिलाजुला – आंशिक असर ’ की बजाय काफी हद तक असरदार कहा जाएगा। जिसकी एक विशेषता यह भी रही कि विधान सभा चुनाव में विपक्षी महागठबंधन से अलग रहे सभी राजनीतिक दल भी सड़कों पर उतरे, वहीं कई ऐसे संगठनों की भी स्वतःस्फूर्त सक्रिय भागीदारी रही जो आम दिनों में नहीं दीखती है।

बिहार मीडिया की तथाकथित खबरों में राजधानी पटना की हृदयस्थली कहे जानेवाले और सबसे व्यस्त रहनेवाला डाकबंगला चौराहा ‘ पाँच घंटे बंद समर्थकों के क़ब्ज़े’ में रहा। जहां हल और धान के साथ साथ अनगिनत पोस्टर – बैनरों के साथ बंद के समर्थक में भाजपा – जदयू को छोड़कर सम्पूर्ण विपक्ष के कार्यकर्त्ता भरी पुलिस मौजूदगी में डटे रहे। 

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समिति के सभी घटक किसान संगठनों ने भी सक्रिय भागीदारी निभायी।

कार्यक्रम में बिहार विधानसभा के माले विधायक सुदामा प्रसाद ( अखिल भारतीय किसान महासभा नेता) तथा गोपाल रविदास ( खेत ग्रामीण मजदूर सभा बिहार सचिव ) के अलावा सभी वामपंथी दलों के केंद्रीय और राज्य नेताओं के साथ  राजद– कांग्रेस व अन्य संगठनों - दलों के भी नेता शामिल हुए। वामपंथी ट्रेड यूनियन सीटू , एआईसीसीटीयू व अन्य मजदूर संगठनों के प्रतिनिधियों के आलवे छात्र- युवा संगठन आइसा– एआइएसएफ – एसएफआई - इनौस तथा ऐपवा व एडवा समेत कई महिला संगठनों की भी अच्छी भागीदारी देखी गयी।

यहाँ आयोजित विरोध सभा को सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों ने संबोधित करते हुए एक स्वर से मांग की कि 9 दिसंबर की वार्ता में केंद्र सरकार बिना कोई अगर मगर किए किसानों की सभी मांगों को मान ले अन्यथा आंदोलन और तेज़ होगा।

मीडिया और सोशल मीडिया की खबरों में बिहार के प्रायः सभी जिलों में बंद के समर्थन में काफी संख्या में उतरकर आंदोलनकारी किसानों से एकजुटता प्रदर्शित की गयी। कई स्थानों पर विभिन्न राष्ट्रीय राजमार्गों पर चक्का जाम करने के साथ साथ रेल रोको अभियान भी चलाया गया। कुछेक स्थानों पर प्रशासन के साथ हल्की झड़प और बंद के समर्थन में गिरफ्तारियाँ देने की भी सूचना है। कई स्थानों पर महागठबंधन में शामिल दलों के विधायकों ने भी अपने क्षेत्रों में बंद अभियान का नेतृत्व किया।  केंद्र सरकार और उसके गठबंधन के सभी सत्ताधारी दलों और उनके नेताओं द्वारा दिये जा रहे अनाप शनाप बयानों और विपक्ष पर किसानों को भड़काने के लगाए जा रहे बेबुनियाद आरोपों के बीच भारत बंद की सफलता काफी कुछ दर्शाती है । भारत बंद के मिले आम जन के समर्थन के पीछे आलू – प्याज़ की बढ़ती कीमतों से उपजा लोगों का गुस्सा भी एक कारण बताया जा रहा है।

जबकि किसानों के समर्थन में उतरे कई नामी और वरिष्ठ खिलाड़ियों , लेखक – कलाकार – बुद्धिजीवियों और उनके संगठनों का स्पष्ट कहना है कि केंद्र सरकार के नए कृषि कानून सिर्फ किसान ही नहीं बल्कि राष्ट्रविरोधी हैं । जिसका सीधा फायदा सिर्फ और सिर्फ निजी - कॉर्पोरेट कंपनियों – घरानों को होगा और अडानी– आंबानी जैसे लोग इस देश में अब नए जमींदार बनकर राज करेंगे।  

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