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भारत
राजनीति
आजीविका और रोज़गार का प्रश्न उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में प्रमुख मुद्दा बन रहा है
छात्रों-युवाओं की नाराज़गी की मोदी-योगी सरकार को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। रोज़गार का मोर्चा आने वाले चुनाव में उनके लिए वाटरलू बनेगा।  
लाल बहादुर सिंह
23 Jun 2021
आजीविका और रोज़गार का प्रश्न उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में प्रमुख मुद्दा बन रहा है
शिक्षक भर्ती मे आरक्षण घोटाले तथा 1.37 लाख शिक्षक भर्ती पूरा करने की मांग को लेकर छात्र-युवाओं ने 22 जून को लखनऊ में SCERT कार्यालय पर धरना-प्रदर्शन किया। 

अब यह निर्विवाद है कि कोरोना महामारी की खतरनाक दूसरी लहर मोदी-योगी सरकार द्वारा विशेषज्ञों की चेतावनियों की अनदेखी करके करवाये गए विधानसभा चुनाव, पंचायत चुनाव, कुम्भ मेला और नरेंद्र मोदी स्टेडियम अहमदाबाद में IPL मैच जैसे आयोजनों से फैली और  उसके आपराधिक कुप्रबंधन ने  अनगिननत जिंदगियों को लील लिया। इसी के साथ अब जो पोस्ट कोविड असर है, उसने उबरे लोगों के स्वास्थ्य के साथ-साथ सरकार की अदूरदर्शिता और कारपोरेटपरस्त नीतियों के चलते देश की अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य को भी पूरी तरह चौपट कर दिया है।

CMIE की रिपोर्ट के अनुसार कोरोना की दूसरी लहर में अप्रैल-मई के महीने में 2.27 करोड़ लोग बेरोजगार हो गए। बेरोजगारी दर 12% पहुँच गयी। मोदी सरकार के नोटबन्दी और अनियोजित लॉकडाउन जैसे विनाशकारी कदमों के चलते अर्थव्यवस्था जिस रसातल में पहुंच चुकी है, वहां एक बार बेरोजगार होने के बाद फिर रोजगार मिल पाना कठिन है, विशेषकर वेतन वाली नौकरियों में। जिनको काम पुनः मिल भी रहा है, उन्हें कम वेतन तथा बदतर सेवा शर्तों वाली नौकरियों से सन्तोष करना पड़ रहा है।

पहली लहर में जिन लोगों का काम गया, उसमें से 55 लाख लोग पहली लहर खत्म होने के बाद भी, मार्च 21 तक पुनः काम नहीं पा सके थे। (कोरोना के पहले 2019-20 में सभी क्षेत्रों में मिलाकर कुल रोजगार प्राप्त लोगों की संख्या 40 करोड़ 35 लाख थी, जो मार्च 21 में 39 करोड़ 80 लाख रह गयी थी)। 

असंगठित क्षेत्र जहां नियमित नौकरियों के अभाव में हमारी विराट मेहनतकश आबादी ( कुल रोजगार का 93% ) जीविका का अर्जन करती है, वह पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। कामगार तथा छोटे-मोटे व्यवसायी, स्वरोजगार में लगे अधिकांश लोग बदहाल हैं और उनका एक हिस्सा भुखमरी के कगार पर है।

ताजा CMIE रिपोर्ट के अनुसार कोरोना के दौर में 97% लोगों की आय में गिरावट हुई है, मात्र 3% लोगों की आमदनी बढ़ी है।( बेशक, इसी दौरान देश के कारपोरेट घरानों, विशेषकर मोदी जी के चहेते अडानी, अम्बानी ने अकूत मुनाफा कमाया है और एशिया के सबसे बड़े अमीर बन गए हैं।) 

सरकार का रिस्पांस यह है कि इन हालात में मजदूरों का जो इकलौता सहारा है मनरेगा वहां भी उत्तर प्रदेश में काम का मिलना मांग की तुलना में पहले से भी घट गया है।

20 जून के Indian Express में एक बेहद चौंकाने वाली खबर आयी, पिछले साल मई के 42.29 लाख की तुलना में इस साल मई में मात्र 8 लाख लोगों ने मनरेगा के तहत काम किया अर्थात 83% की अकल्पनीय गिरावट हुई, यहां तक कि यह संख्या 2019 मई के 11.33 लाख से भी 29% कम है।( राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा पिछली मई के 3.30 करोड़ के सापेक्ष 2.18 करोड़ रहा, 34% की गिरावट के साथ)।  इससे समझा जा सकता है कि सरकार के दावों के विपरीत उत्तर प्रदेश के गांवों में महामारी का कहर कितना खौफनाक था कि उस दौरान 83% लोगों को आजीविका  से वंचित होना पड़ा! 

आज महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इन हालात ने मेहनतकशों को जिस संकट में धकेल दिया है, क्या उसकी क्षतिपूर्ति महीने में महज 5 किलो अनाज से हो सकती है?  जनता को इस दौर में दुनिया के और देशों की तरह समुचित नकद सहायता दी जानी चाहिए, मोदी सरकार को यह सलाह अमर्त्यसेन, अभिजीत बनर्जी, प्रभात पटनायक जैसे ख्यातिलब्ध अर्थशास्त्रियों ने दी। लेकिन सरकार ने इसको निर्ममता-पूर्वक ठुकरा दिया।

उत्तर प्रदेश मोदी-योगी की डबल इंजन सरकार की संवेदनहीनता का सबसे बदतरीन शिकार है। क्योंकि दूसरी लहर की मार अबकी बार सुदूर गांवों, कस्बों तक थी और प्रदेश में बड़े पैमाने पर प्रवासी मजदूर महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली से बेरोजगार होकर इस दौरान वापस लौटे थे।

आये दिन प्रदेश के किसी न किसी इलाके से भुखमरी और आत्महत्या की दिलदहला देने वाली खबरें आ रही हैं। बरेली में एक परिवार के बच्चों ने घर से निकलकर पड़ोसी को बताया कि पापा 3 दिन से घर मे खुदकशी कर लटके हैं, हम लोग भूखे हैं। अलीगढ़ में परिवार के मुखिया की पहली लहर में मौत हो गयी, महिला जो 4000 रुपये महीने की नौकरी कर अपने 5 बच्चों को पाल रही थीं, उनकी नौकरी दूसरी लहर में चली गयी। दूसरों से अनियमित रूप से मिलने वाली सहायता पर निर्भर भुखमरी और बीमारियों का शिकार पूरा परिवार अब अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रहा है।

ये हादसे उत्तर प्रदेश में न जाने कितनों के साथ गुजर रहे हैं, कोई नहीं जानता।

सुरक्षित माने जाने वाले वेतनभोगी रोजगार (salaried jobs) के अवसर पहली लहर के दौरान सबसे ज्यादा खत्म हुए और उनमें से अधिकांश वापस नहीं आये।

CMIE के अनुसार 2020-21 में salaried jobs में 98 लाख की गिरावट हुई, 2019-20 के 8 करोड़ 59 लाख से घटकर मार्च, 21 में 7.62 करोड़ नौकरियां बचीं। इनमें से ग्रामीण क्षेत्र में जिन 60 लाख लोगों की नौकरियां गईं, वे व्यवसाय बंद होने से खेती की ओर लौटे 30 लाख लोगों के साथ आकर जुड़ गए। इस तरह कृषि पर 90 लाख लोगों का अतिरिक्त बोझ आ गया। जाहिर है, यह disguised unemployment ही है जो कृषि-उत्पादकता बढ़े बिना लंबे समय तक sustainable नहीं है।

उत्तर प्रदेश में शिक्षित बेरोजगारी का आलम यह है कि प्रतियोगी छात्रों और शिक्षा के ऐतिहासिक केंद्र इलाहाबाद से निराश युवक-युवतियों की खुदकशी की उदास कर देने वाली खबरें आती रहती हैं।

जाहिर है इस भयावह मंजर का political repercussion होगा। चुनाव वर्ष में इस आशंका से घबराई योगी सरकार पूरे आत्मविश्वास के साथ बड़े बड़े झूठ बोल कर वैतरणी पार करना चाहती है। अन्य तबकों का गुस्सा तो शायद मौन ढंग से वोट के माध्यम से फूटेगा, पर छात्र नौजवान इनके झूठ का मुखर विरोध कर रहे हैं और आने वाले दिनों में बड़े आंदोलन की तैयारी में हैं।

सरकार लाख कोशिश कर ले, पड़ोसी राज्य बिहार में जिस तरह लाखों सरकारी नौकरियों को भरने का सवाल एक तरह से चुनाव का केंद्रीय मुद्दा बन गया था, वैसे ही यह उत्तर प्रदेश में भी बनेगा। सच तो यह है कि पश्चिम बंगाल में भी अंतर्धारा के बतौर आम जनता विशेषकर युवाओं के बीच चुनावी विमर्श में यह बेहद अहम सवाल था और मोदी-भाजपा की करारी शिकस्त में रोजगार के मोर्चे पर उसकी विफलता और विश्वासघात से उपजी नाराजगी ने भी भूमिका निभाई। 

दरअसल, बिहार चुनाव के ठीक पहले पिछले साल 17 सितंबर को मोदी जी के जन्मदिन पर पूरे देश में छात्र-युवाओं ने राष्ट्रीय बेरोजगारी दिवस का जो आह्वान किया था, वह #NationalUnemploymentDay और #राष्ट्रीयबेरोजगारीदिवस पूरे दिन सोशल मीडिया में टॉप ट्रेंड करता रहा, यह 46 लाख बार शेयर किया गया!

छात्र-नौजवान इलाहाबाद से लेकर अमृतसर तक, कोल्हापुर से लेकर भोजपुर-समस्तीपुर तक सड़क पर उतरे। पूरे देश में जगह जगह छात्रों-नौजवानों पर लाठीचार्ज हुआ और गिरफ्तारी हुई। इलाहाबाद में युवा मंच के आह्वान पर, बालसन चौराहे पर छात्रों का हुजूम सड़क पर उतरा था। लखनऊ में सारे नियम-कानून, मर्यादा को तार-तार करते विश्वविद्यालय की छात्रा को बेहद आपत्तिजनक ढंग से दबोचे मर्द पुलिस वाले कि तस्वीर वायरल हो गयी थी। 

उस दिन शाम को BHU से लेकर आरा, सिवान, पटना पूरे बिहार से मशाल जुलूस के वीडियो आते रहे, " छात्र-युवा की जली मशाल, भागे तानाशाह और दलाल"! ट्विटर पर मोदीजी के जन्मदिन के शुभकामना संदेशों को बहुत पीछे छोड़ते हुए नौजवानों का ट्विटर स्टॉर्म #17Sept17hrs17minutes पर छाया रहा था।

सरकारी नौकरी के वादे, दावे और सच

17 सितंबर के ऐतिहासिक आंदोलन के बाद योगी सरकार ने घोषणा की थी कि प्रदेश में लंबित भर्तियों को 3 महीने में पूरा कर लिया जाएगा और रिक्त पदों पर 6 महीने के अंदर भर्ती प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।

अब जब चुनाव सामने है तो वह अपनी उपलब्धियों के बड़े बड़े दावे कर रही है। यहां तक कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश उन राज्यों में है जिसने कोरोना के दौर में सबसे बेहतर ढंग से बेरोजगारी पर नियंत्रण किया है, जहां बेरोजगारी दर सबसे कम है। सरकार ने 4 लाख युवाओं को सरकारी नौकरी दे दिया है, आदि-आदि.....।

पर छात्र-युवा सरकार के इन दावों से impress नहीं हैं। वे  इसे चुनौती देते हुए सरकार के खिलाफ लगातार सोशल मीडिया पर अभियान चला रहे हैं और सड़क पर उतर रहे हैं।

सरकार कैसे रोजगार सृजन करे की बजाय महज आंकड़ों का खेल कर रही है, इसे कुछ उदाहरणों से समझा जा सकता है-

सरकार द्वारा बहुप्रचारित 1 लाख 30 हजार शिक्षकों की भर्ती की सच्चाई यह है कि 1 लाख 40 हजार शिक्षामित्रों को हटाने के बाद यह नई भर्ती की गई, अर्थात वास्तव में कोई नया रोजगार सृजन नहीं हुआ है।

इसी तरह विभिन्न विभागों के clerical grade की भर्तियों में सरकार कैसे धूर्तता कर रही है, इसे रोजगार के लिए आंदोलन का नेतृत्व कर रहे युवा मंच के इस वक्तव्य से समझ जा सकता है, " प्रदेश में समूह 'ग' की भर्तियां अधीनस्थ सेवा चयन आयोग से की जाती हैं। प्रदेश में अभी भी मोटे तौर पर आकलन के अनुसार 2 लाख पद समूह 'ग' के रिक्त हैं। भर्तियों की संख्या के लिहाज से यह प्रदेश का सबसे बड़ा आयोग है। इस आयोग में 22 से अधिक भर्तियां अभी तक अधर में हैं। योगी सरकार द्वारा विज्ञापित की गई एक भी भर्ती इस आयोग द्वारा अभी तक पूरी नहीं की गई है। 2016 में जिन भर्तियों के आवेदन लिये गये थे उनमें कई ऐसी भर्तियां हैं जिनकी परीक्षाओं के आयोजन का आयोग के पास कोई कार्यक्रम नहीं है।"

" साल भर पहले कहा गया कि इस आयोग के द्वारा 50 हजार पदों पर भर्ती की जायेगी, जिसके लिए पहले पात्रता परीक्षा (Preliminary Eligibility Test) होगी, उसे भी आयोजित नहीं कराया गया। अब इसका विज्ञापन जारी कर सरकार प्रचार में लगी है कि 50 हजार पदों पर चयन प्रक्रिया शुरू कर दी गई, जबकि पात्रता परीक्षा (Preliminary Eligibility Test ) का चयन प्रक्रिया से सीधे कोई संबंध ही नहीं है। इस परीक्षा में आयोग के मुताबिक 30-35 लाख युवा शामिल होंगे। जब चयन प्रक्रिया के ठप्प होने की प्रमुख वजह कोरोना संक्रमण को सरकार बता रही है तब ऐसे में इतनी बड़ी पात्रता परीक्षा का आयोजन कैसे होगा? जब आम तौर पर भर्ती परीक्षाएं एक दो साल से पहले पूरी नहीं होती हैं और 5-7 साल का वक्त भी लग जाता है ऐसे में पात्रता परीक्षा की पूरी चयन प्रक्रिया 6-7 महीने के अंदर पूरी हो जायेगी, इसकी संभावना नगण्य है। फिर भी सरकार पीईटी आयोजित कराने की जिद पर अड़ी है। अगर वास्तव में रोजगार को लेकर सरकार गंभीर होती तो पीईटी रद्द कर समूह ग के कम से कम 50 हजार पदों के लिए विज्ञापन एक सप्ताह में ही जारी किया जा सकता था। अन्य चयन आयोगों का हाल इससे इतर नहीं है।" 

इस बीच उत्तर प्रदेश के अंदर रोजगार के सवाल पर एक संगठित आंदोलन खड़ा करने के लिए 10 युवा-छात्र संगठनों ने छात्र युवा रोजगार अधिकार मोर्चा का गठन किया है। इसमें ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन(AISA), स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI ), ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (AISF), ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन (AIDSO),  इंकलाबी छात्र मोर्चा (ICM), रिवॉल्यूशनरी यूथ एसोसिएशन (RYA), डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन आफ इंडिया (DYFI), ऑल इंडिया यूथ फेडरेशन (AIYF), ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक यूथ ऑर्गेनाइजेशन (AIDYO), विद्यार्थी युवजन सभा शामिल हैं।

छात्र-युवाओं ने ‘ आंकड़ों में मत उलझाओ, रोजग़ार कहाँ है ये बतलाओ’  नारे के साथ सभी रिक्त पदों को भरने और सभी नौजवानों को सम्मानजनक रोजगार की गारंटी के लिए प्रदेशव्यापी आंदोलन में उतरने का एलान किया है।

मोर्चे के बयान में कहा गया है, " उत्तर प्रदेश की योगी सरकार रोजगार देने में फेल साबित हुई है। सरकार बनने के बाद से ही लगातार नौजवानों को सड़क पर उतरकर संघर्ष करना पड़ रहा है। आयोगों के गठन, फार्म निकालने, परीक्षा कराने, रिजल्ट घोषित करने, नियुक्ति करने,आरक्षण लागू करने के साथ-साथ परीक्षाओं में अनियमितता, अपारदर्शिता, भ्रष्टाचार व पेपर आउट के खिलाफ भी सड़क पर लड़ना पड़ रहा है....सरकार स्थाई काम के लिए स्थाई रोजगार उपलब्ध कराए और ठेका, संविदा व निजीकरण पर रोक लगाए।"

5 जून को युवा मंच व अन्य संगठनों के संयुक्त आह्वान पर आयोजित यूपी बेरोजगार दिवस पर 10 लाख से ज्यादा ट्वीट हुए और यह ट्विटर पर घंटों ट्रेंड करता रहा।

शिक्षक भर्ती मे आरक्षण घोटाले तथा 1.37 लाख शिक्षक भर्ती पूरा करने की मांग को लेकर छात्र-युवाओं ने 22 जून को SCERT कार्यालय पर लखनऊ में प्रदेशव्यापी धरने का आयोजन किया और घोटाले के जिम्मेदार शिक्षामंत्री सतीश द्विवेदी को बर्खास्त करने की मांग की, जिनका हाल ही में अपने भाई को EWS कोटे में नौकरी दिलाने का भी कारनामा सामने आया था।

आज सच्चाई यह है कि मिशन रोजगार, इन्वेस्टर समिट, रोजगार मेला, एक जिला-एक उद्योग जैसे तमाशों और जुमलों के बावजूद पिछले साढ़े चार साल में प्रदेश में न नया औद्योगीकरण हुआ है, न कृषि आधारित उद्योगों का विकास हुआ है न सेवा क्षेत्र में कोई गतिशीलता आयी है क्योंकि पूरी अर्थव्यवस्था चौपट है। जब अर्थव्यवस्था में गति नहीं, विकास नही तो कथित स्किल्ड लोग भी कहां जॉब पाएंगे? बदहाल कानून-व्यवस्था, साम्प्रदायिक  राज्य-संचालन और अन्य कारणों से राज्य में निजी निवेश आ नहीं रहा है, सार्वजनिक  निवेश सरकार कर नहीं रही है, फिर रोजगार पैदा कैसे होगा? थोड़ी बहुत भर्ती जहां हो भी रही है, वहां भी स्थायी चरित्र के कामों में भी वह ठेके पर हो रही है, जहां बेहद कम वेतन और प्रतिकूल सेवाशर्तों पर श्रमिक वही काम करने को मजबूर हैं।

भारी लागत कीमतों के बोझ और लाभकारी मूल्य के अभाव से जूझते किसानों की तरह ही, उनके बेटे भी रोजगार और नौकरियों के अभाव में खुदकशी को अभिशप्त हैं। लेकिन बॉर्डर पर लड़ते किसानों ने जो मशाल जलाई है, उसके साथ जुड़कर आज छात्र-नौजवान भी पलायन और खुदकशी का रास्ता छोड़कर सरकार से दो-दो हाथ करने को तैयार हैं।

छात्रों-युवाओं की नाराजगी की मोदी-योगी सरकार को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी, रोजगार का मोर्चा आने वाले चुनाव में उनके लिए वाटरलू बनेगा।  

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। विचार व्यक्तिगत हैं)

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