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खेतों से बाहर हैं किसानों की समस्याओं की जड़ें और उनके हल के उपाय भी
किसानों की समस्याओं की जड़ें तो खेतों से दूर सरकारी नीतियों में छिपी हुई हैं। इसलिए उनका हल भी सही सरकारी नीतियों के माध्यम से ही संभव हो सकता है।
राकेश सिंह
12 Jun 2020
 किसानों की समस्या
Image courtesy: Financial Times

सरकार ने कृषि क्षेत्र में आमूलचूल बदलाव लाने और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में दूरदर्शी कदम बताते हुए आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन के लिये कृषि उपज वाणिज्य एवं व्यापार (संवर्धन एवं सुविधा) अध्यादेश 2020 को मंजूरी दी है। आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन के जरिए अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेलों, प्याज और आलू जैसी वस्तुओं को आवश्यक वस्तुओं की सूची से हटा दिया जाएगा।

दलील दी गई कि कई तरह के नियामक प्रतिबंधों के कारण देश के किसानों को अपने उत्पाद बेचने में काफी दिक्कत आती है। अधिसूचित कृषि उत्पाद विपणन समिति वाले बाजार क्षेत्र के बाहर किसानों पर उत्पाद बेचने पर कई तरह के प्रतिबंध हैं। उन्हें अपने उत्पाद सरकार द्वारा लाइसेंस प्राप्त खरीदारों को ही बेचने की बाध्यता है। इसके अतिरिक्त एक राज्य से दूसरे राज्य को ऐसे उत्पादों के सुगम व्यापार के रास्ते में भी कई तरह की बाधाएं हैं।

इसके साथ ही कैबिनेट ने कांट्रेक्ट फार्मिंग को बढ़ावा देने के लिए ‘मूल्य आश्वासन पर किसान (बंदोबस्ती और सुरक्षा) समझौता और कृषि सेवा अध्यादेश, 2020’ को भी मंजूरी दी है। सरकार द्वारा जो कदम उठाए गए हैं, ये उस श्रृंखला में सिर्फ कुछ ताजा कदम हैं जो भारत के मेहनतकश किसानों के कल्याण के नाम पर कारपोरेट और बहुराष्ट्रीय निगमों कार्य को आगे बढ़ाने के प्रति सरकार की निरंतर प्रतिबद्धता को दिखाते हैं। ये सभी उपाय ताली-थाली बजाकर, दीपक जलाकर और अस्पतालों पर वायुसेना के हेलीकॉप्टरों से फूल बरसात कोरोनावायरस को दूर करने जैसी हास्यास्पद बातें हैं।

किसानों की समस्याओं की जड़ें तो खेतों से दूर सरकारी नीतियों में छिपी हुई हैं। इसलिए उनका हल भी सही सरकारी नीतियों के माध्यम से ही संभव हो सकता है। सरकार ने जिन देशों की नकल करके इन नीतियों को लागू किया है, वहां पर किसानों की स्थिति की वास्तविक जानकारी किसी से छिपी नहीं है। किसानों की वास्तव में हिमायती कोई भी सरकार तो भूलकर भी इस दिशा में अपने कदम नहीं बढ़ाती। सरकार ने इस सबसे आंख मूंदकर निहित स्वार्थों की राह आसान करने का निश्चय कर लिया है।

कई अध्ययनों और रिपोर्टों में कहा गया कि अमेरिका में 1980 के दशक में कृषि उत्पादों की बिक्री से हासिल हर डॉलर में से 37 सेंट किसान को मिलते थे। आज किसान हर डॉलर में से केवल 15 सेंट घर ले जाते हैं। यह दशकों से कुछ बहुराष्ट्रीय निगमों के हाथों में आर्थिक शक्ति की बढ़ते केंद्रिकरण के परिणामों की ओर इशारा करता है। छोटे अमेरिकी किसान अब विलुप्त होने वाले हैं। दुनिया में कृषि के बारे जानने वाले यह साफ महसूस कर सकते हैं कि कैसे मुक्त बाजारों और कहीं भी बेचने की स्वतंत्रता के नाम पर छोटे किसानों को जमीनों से बाहर धकेल दिया जाता है।

अपने इन किसानों की बचाये रखने के लिये धनी देश भारी मदद देते हैं। विकसित देशों में घरेलू कृषि सब्सिडी को अगर खत्म कर दिया जाए तो अमेरिका, यूरोपीय संघ और कनाडा से कृषि निर्यात में लगभग 40 प्रतिशत की गिरावट आएगी। विश्व व्यापार संगठन के अस्तित्व में आने के 25 साल बाद भी ओईसीडी देश अभी भी कृषि के लिए भारी सब्सिडी दे रहे हैं, जो 2018 में 246 अरब डॉलर थी। जिनमें से ईयू के 28 देश प्रति वर्ष 110 अरब डॉलर का योगदान करते हैं। इसका लगभग 50 प्रतिशत प्रत्यक्ष आय समर्थन के रूप में होता है। ये सब्सिडी कोविड-19 संकट के बाद की अवधि में और बढ़ने की उम्मीद है।

मुक्त बाजार से किसानों को होने वाले लाभ को दुनिया में चॉकलेट उद्योग से किसानों तक पहुंचने वाले पैसे के आधार पर साफ तौर से देखा जा सकता है। 103 बिलियन डॉलर के चॉकलेट उद्योग में कोको बीन्स की कीमतें काफी हद तक कमोडिटी फ्यूचर्स द्वारा तय की जाती हैं। अफ्रीकी देश दुनिया में लगभग 75 प्रतिशत कोको का उत्पादन करते हैं। लेकिन इससे कोको किसानों को भारी नुकसान होता है। कोको किसानों को मुश्किल से चाकलेट उद्योग के कुल राजस्व का केवल 2 प्रतिशत ही मिल पाता है और लाखों अफ्रीकी किसान भारी गरीबी में जी रहे हैं।

भारतीय कृषि क्षेत्र में कितनी अधिक संभावनाएं हैं, इसका अंदाजा केवल पहली पंचवर्षीय योजना के एक उदाहरण से ही समझा जा सकता है। भारत में पहली पंचवर्षीय योजना को कृषि विकास की दिशा में आगे बढ़ने के लिये तैयार किया गया था। किसानों के शोषण से बचाना, कृषि की उत्पादकता में वृद्धि करना और इनपुट और प्रौद्योगिकी का उपयोग बढ़ाना प्रमुख लक्ष्य था। इसके अलावा कृषि विकास के लिए संस्थागत बाधाओं को दूर करने और भूमि सुधारों पर विशेष ध्यान दिया गया था। इस कार्यक्रम में बिचौलियों के उन्मूलन, किरायेदारों के किराये के नियमन और भूमि के स्वामित्व पर सीलिंग, भूखंडों की चकबंदी सहित किरायेदारी सुधारों को लागू किया गया था।

पहली पंचवर्षीय योजना में सिंचाई और बिजली सहित कृषि को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई थी। कृषि और सामुदायिक विकास, प्रमुख और लघु सिंचाई और बिजली विकास पर योजना परिव्यय का सापेक्ष हिस्सा क्रमशः पहली योजना में 15 प्रतिशत, 16 प्रतिशत और 13 प्रतिशत था। इसलिए राष्ट्रीय आय में लगभग 17.5 प्रतिशत और प्रति व्यक्ति आय में 10.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई। कृषि और सहायक क्षेत्रों का उत्पादन 14.7 प्रतिशत बढ़ा। पहली पंचवर्षीय योजना के दौरान 30 लाख हेक्टेयर में सिंचाई क्षमता सृजित हुई और बिजली उत्पादन में 23 लाख किलोवॉट से 34 लाख किलोवॉट तक की वृद्धि हुई।

ऐसा भी नहीं है कि भारत में कृषि क्षमता अपने चरम स्तर पर पहुंच गई है और उसमें वृद्धि की कोई गुंजाइश नहीं बची है। इसके विपरीत भारतीय कृषि की संभावनाओं का गला तो हरित क्रांति की सफलता के बाद ही घोंट दिया गया था। देश में अनाज की पर्याप्त उपलब्धता होने से ही यह मान लिया गया कि अब देश में भुखमरी और कुपोषण का अंत हो गया है, जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। पोषण इंडेक्स और बाल स्वास्थ्य इंडेक्स में भारत की स्थिति बहुत नीचे है।

एफएओ के अनुसार भारत में भूखे या अल्पपोषित लोगों की सबसे बड़ी संख्या है। "ग्लोबल हंगर इंडेक्स" में भारत की रैंकिंग साल-दर-साल गिरती जा रही है। जबकि भारत अपने उत्पादन का लगभग 10 प्रतिशत चावल निर्यात करके सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश बन गया है। 1970-71 के बाद से देश में खाद्य उत्पादन की वृद्धि 3 प्रतिशत के करीब बढ़ी है, जबकि इसी अवधि में जनसंख्या वृद्धि 1.86 प्रतिशत थी। जाहिर है प्रति व्यक्ति उत्पादन में वृद्धि देखी गई है। हाल ही में चीनी का विशाल अधिशेष भी जमा हुआ है। भारत " खाद्यान्नों की बहुलता के बीच में भूख" की विरोधाभासी स्थिति का प्रतिनिधित्व करता है।

1980 के दशक की शुरुआत में भारत में अंडे और मांस उत्पादों की प्रति व्यक्ति आपूर्ति चीन के करीब-करीब बराबर थी। अगले तीन दशकों में चीन में इन वस्तुओं की आपूर्ति भारत की तुलना में पाँच गुना हो गई। अंडे और मांस उत्पादों की ज्यादा खपत के साथ चीन के लोगों के लिये सब्जियों की उपलब्धता तीन गुना ज्यादा है और वे भारतीयों की तुलना में 80 प्रतिशत अधिक फलों का उपयोग करते हैं।

खाद्य आपूर्ति के आंकड़ों से पता चलता है कि हालांकि भारत में बागवानी और पशुधन उत्पादों का उपयोग करने की दिशा में बड़ा बदलाव हुआ है। लेकिन चीन जैसे देशों की तुलना में वृद्धि बहुत कम है, जिन्होंने पोषण और बाल और मातृत्व स्वास्थ्य में काफी सुधार किया है। संतुलित भोजन का कम सेवन व्यापक भूख और कुपोषण का मुख्य कारण है। देश को कृषि में ऐसे नीतिगत हस्तक्षेपों को दूर करना होगा, जो चावल, गेहूं और चीनी के लिये भारी पक्षपातपूर्ण पूर्वाग्रह से भरी हैं। जिनके कारण उनका उत्पादन घरेलू और निर्यात मांग से भी अधिक है।

भारत में जोतों का निरंतर विखंडन भी जारी है। भारत में जोत औसत आकार अब 1.15 हेक्टेयर है और अभी भी गिर रहा है। इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में सीमांत और छोटे किसानों की बहुलता है। भारत में 85% कृषि जोतों का आकार 2 हेक्टेयर से कम हैं और ये कुल फसली क्षेत्र के 45% का प्रतिनिधित्व करते हैं। भारत में केवल 5% किसान 4 हेक्टेयर से बड़ी जोत के स्वामी हैं, लेकिन वे सभी कृषि योग्य भूमि (कृषि जनगणना भारत, 2016 के अनुसार) के लगभग 32% हिस्से पर काबिज हैं।

भारत में साठ के दशक में किए गए भूमि सुधारों का लाभ अब धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। चकबंदी के दो पीढ़ियों के बाद गांव आज फिर उसी स्थिति में पहुंच गए हैं, जहां खेती के छोटे-छोटे टुकड़े अलाभकारी जोतों में बदल गए। इसलिए अब भूमि सुधारों के साथ ही भू-स्वामित्व को भी नये सिरे से निर्धारित करने की आवश्यकता है। अनुपस्थित जमींदारों को भूमि से बेदखल करने के लिए जमींदारी उन्मूलन कानून लागू किया गया था। ठीक उसी तरह का एक और वर्ग खासकर उत्तर भारत में पैदा हो चुका है। जो खेती से तो दूर हो गया है लेकिन भू स्वामित्व पर कब्जा अभी भी बनाए हुए है।

भारत में कृषि से जुड़े उद्योगों से अक्सर किसानों से दूर रखा गया है। चीनी उद्योग, सूती कपड़ा उद्योग, चमड़ा उद्योग, जूट उद्योग जैसे सभी उद्योग कच्चे माल के लिए कृषि पर सीधे रूप से निर्भर हैं। किसानों को कभी भी इन उद्योगों में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया गया। इसके विपरीत सरकारी नीतियां किसानों को हमेशा हतोत्साहित करती रही हैं। अगर केवल खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को ही देखें तो उसमें किसानों के लिए अनंत संभावनाएं हैं। वर्तमान में भारत में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग की भारत के खाद्य बाजार में 32% हिस्सेदारी है। जबकि विकसित देशों में खाद्य प्रसंस्करण का खाद्य बाजार में 100% हिस्सा है। इस दिशा में अभी बहुत ज्यादा संभावनाएं हैं। घरेलू खाद्य उद्योग में रोजगार का कुल 11.6% हिस्सा उपलब्ध है। खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र देश के लिए एक ऐसा क्षेत्र है और किसी भी अन्य उद्योग की तुलना में 10 गुना रोजगार पैदा कर सकता है और इससे किसानों की समृद्धि बढ़ती है।

कृषि अनुसंधान और कौशल विकास सेवाओं पर शुरुआती पंचवर्षीय योजनाओं में काफी जोर दिया गया था। इन संस्थानों ने कमोबेश अपनी क्षमता के हिसाब से किसानों को नई-नई प्रौद्योगिकी और तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अब इस तरफ सरकार का ध्यान नहीं है और वह इस क्षेत्र को भी निजी क्षेत्र के हवाले छोड़ कर अपने कर्तव्य से मुंह मोड़ने की कोशिश में लगी है। 2012-14 के दौरान कृषि सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 0.4% भारत में अनुसंधान और विकास अनुसंधान को प्राथमिकता देने और मजबूत करने में खर्च हुआ। ब्राजील (1.8%) और उच्च आय वाले देशों (लगभग 3.0%) की तुलना में यह बहुत कम है। सरकार को भविष्य के लिए अनुसंधान के महत्व का संज्ञान लेकर अनुसंधान पर खर्च को 1% तक बढ़ाने के लिए प्रयास करना चाहिये।

कृषि विस्तार सेवाओं और कृषि शिक्षा को मजबूत करना भारत में हरित क्रांति के प्रसार का एक महत्वपूर्ण कारक था। यदि भारत की बड़ी आबादी के जीवन स्तर में सुधार किया जाना है, तो कृषि विस्तार सेवाओं में व्यावसायिक कौशल को शामिल करने के लिए प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के पारंपरिक क्षेत्रों से परे जाने की जरूरत  होगी। संसाधनों की कमी को दूर करके आवश्यक विविधीकरण की सुविधा प्रदान करनी चाहिए और किसानों को नए कौशल सिखाये जाने चाहिए। खाद्य श्रृंखलाओं में मूल्य वर्द्धन का प्रशिक्षण और बाजार में कुशलता से व्यापार सबसे जरूरी उपाय हैं, जो किसानों को लाभ पहुंचा सकते हैं।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)   

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