NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
बढ़ रहा है तंगी व भूख का दायरा : लोअर मिडिल क्लास भी बेहाल
आमदनी का ज़रिया खो चुके इस वर्ग के लोगों की त्रासदी यह है कि वे न तो दाल-भात या खिचड़ी के लिए सरकारी स्कूलों में लगने वाली ग़रीबों की लंबी कतार में खड़े हो सकते हैं और न ही किसी से मदद मांग सकते हैं।
 अफ़ज़ल इमाम
27 Apr 2020
 लोअर मिडिल क्लास
Image courtesy: Newsd

कोरोना महामारी व लॉकडाउन से पैदा हुए भूख के दानव ने अब ग़रीबों के साथ-साथ ग़रीबी की रेखा से थोड़ा ऊपर वाले निम्न मध्यम वर्ग के एक तबके को भी अपने शिकंजे में लेना शुरू कर दिया है। आमदनी का जरिया खो चुके इस वर्ग के लोगों की त्रासदी यह है कि वे न तो दाल-भात या खिचड़ी के लिए सरकारी स्कूलों में लगने वाली ग़रीबों की लंबी कतार में खड़े हो सकते हैं और न ही किसी से मदद मांग सकते हैं। तंगहाली और भूख उन्हें जीने नहीं दे रही है, जबकि उनका आत्म सम्मान उन्हें किसी के आगे हाथ फैलाने से रोक रहा है।

ध्यान रहे कि लॉकडाउन पार्ट-2 की मियाद खत्म होने में अभी हफ्ते भर का समय बाकी हैं, लेकिन जिस रफ्तार से कोरोना मरीजों की संख्या और मौतें बढ़ रही हैं, उससे लगता नहीं है कि मई में भी सब कुछ सामान्य हो पाएगा ! लोग हालात को समझ रहे हैं, जिसके चलते उनमें घुटन बढ़ती जा रही है। दिल्ली के विभिन्न मुहल्लों व बस्तियों में निजी तौर जो लोग जरूरतमंदों की मदद कर रहे हैं, उनकी भी हिम्मत अब जवाब देने लगी है। शुरू में तो इन लोगों ने दिल खोल कर गरीबों में राशन और ज़रूरत की चीजें बाटीं थीं, लेकिन अब इनकी भी जेबें तंग होने लगी हैं।

पूर्वी दिल्ली के लक्ष्मी नगर इलाके में सीमा (बदला हुआ नाम) ट्यूशन पढ़ा कर अपना परिवार चलाती हैं। घर में बीमार मां और एक छोटा भाई है जो एक प्राइवेट अंग्रेजी स्कूल में पढ़ता है। सामान्य दिनों में 25 से 30 हजार रुपये प्रति माह कमा लेती थीं, लॉकडाउन के चलते उनके सारे ट्यूशन छूट गए हैं। आमदनी शून्य हो गई है और जो कुछ भी बचत थी, वह खत्म हो चुकी है। सीमा के एक पूर्व शिष्य को जब उनकी स्थिति के बारे में भनक लगी तो वह राशन का थैला लेकर उनके घर जा पहुंचा। वे कुछ पल खामोश रहीं, लेकिन फिर थोड़ी हिचकिचाहट के साथ उस थैले को स्वीकार कर लिया।

इसी तरह एक सज्जन जो, गरीबों में राहत सामग्री बांट रहे हैं, जब उन्होंने अपने किसी जानने वाले को फोन करके उनका हाल-चाल पूछा तो उधर से जवाब मिला ‘ हां सब ठीक ही है...।’ इसके बाद जब उनके घर पर राशन का पैकेट भेजा गया तो उन्होंने भी चुपाचाप उसे रख लिया। वे नोएडा के एक माल में किसी शोरूम में सेल्समैन हैं। इस नौकरी से उन्हें करीब 15000 रुपये की आमदनी हो जाती थी और पत्नी भी घर में छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ा कर 10-12 हजार रुपये कमा लेती थीं। परिवार ठीक-ठाक चल रहा था, लेकिन अब दोनों की आमदनी ठप हो चुकी है।

उन्होंने बताया कि इस दौरान उन्हें कई ऐसे लोगों का पता चला है कि, जो भारी मुसीबत का सामना कर रहे हैं, लेकिन अपनी हालत किसी को बताने से हिचक रहे हैं।

यह ऐसा वर्ग है, जिसके पास कोई ऐसा कार्ड या दस्तावेज भी नहीं है, जिससे सरकार की ओर से मिलने वाली मामूली सहायता भी उसे मिल सके। संकट के समय में संबंधियों व मित्रों से कर्ज या मदद मिलना भी मुश्किल हो रहा है, क्योंकि सभी को अपने भविष्य की चिंता सता रही है। यदि किसी ने थोड़ा बहुत मदद की भी तो उससे ज्यादा से ज्यादा हफ्ते भर का राशन व कुछ अन्य खर्चे ही चलाए जा सकते हैं। यदि किसी घर में एक-दो लोग बीमार हैं तो उन्हें दवाओं के लिए काफी परेशानी उठानी पड़ रही है। दूसरी तरफ टीवी पर रोज इम्यूनिटी बढ़ाने, योग करने और पौष्टिक आहार लेने के फंडे बताए जा रहे हैं, लेकिन जब लोगों को दो जून की रोटी ही मिलने में मुश्किल हो रही हो तो इम्यूनिटी कहां से आएगी?  देर रात अक्सर गरीब परिवारों के घरों से बच्चों के बिलखने की आवाज सुनाई पड़ती है, शायद दूध के लिए!

दिल्ली के लक्ष्मीनगर में ही कंप्यूटर का काम करने वाले आरिफ़ अपने परिवार में अकेले कमाने वाले हैं। जब हालात ठीक थे तो वे माह में 40-45 हज़ार रुपये कमा लिया करते थे। उन्हें लगता है कि यदि निकट भविष्य़ में मार्केट खुली, तो भी पहले जैसी आमदनी नहीं हो पाएगी। परिवार में दो बहनें, एक छोटा भाई और माता-पिता हैं। अप्रैल में बहन की शादी होने वाली थी, लेकिन लॉकडाउन के कारण यह मामला भी लटक गया है।

पांडव नगर के प्रमोद एक प्राइवेट कंपनी में काम करते हैं, जहां से उन्हें करीब 35 हजार वेतन मिलता था, लेकिन कंपनी की हालत खस्ता होने के कारण पिछले दो माह से उन्हें कुछ नहीं मिल सका है। इनके परिवार में भी 4 लोग हैं, जिनकी पूरी जिम्मेदारी इन्हीं के सिर पर है। वर्तमान में वे मित्रों व संबंधियों से उधार मांग कर किसी सूरत से काम चला रहे हैं।

इसी मुहल्ले के एक और सज्जन जो पेशे से कंप्यूटर डिजाइनर हैं। सामान्य दिनों में उनकी काफी अच्छी आमदनी होती थी और दो माह पहले उन्होंने कर्ज लेकर एक फ्लैट भी खरीदा है, लेकिन लॉकडाउन की घोषणा होने के कारण उनका परिवार उसमें शिफ्ट नहीं हो सका। वर्तमान में इनकी कमाई शून्य हो गई है। घर बहुत मुश्किल से चल पा रहा है। पहले जिन लोगों का काम किया था, वे भी पैसा देने में टाल-मटोल कर रहे हैं।

उधर विभिन्न छोटी-बड़ी कंपनियों में सेल्स रिप्रजेंटेटिव का काम करने वाले तमाम युवा भी मार्केट की स्थिति को देख कर काफी चिंतित हैं। इसी तरह साइकिल व मोपेट पर ब्रेड, बिस्कुट और अन्य सामग्री मुहल्लों की दुकानों तक पहुंचाने वाले वेंडर्स के पास भी कोई काम नहीं बचा है। इन्हें अपना परिवार चलाने में भारी मुसीबत का सामना करना पड़ रहा है।

यदि छोटे दुकानदारों की बात की जाए तो लक्ष्मीनगर की एक्सपोर्ट मार्केट में बब्लू कपड़े की दुकान चलाते हैं। उनका कहना है कि कारोबार पर पहले से ही मंदी का असर था। अब रही-सही कसर कोरोना ने पूरी कर दी है। जो कुछ भी जमा पूंजी थी, वह अब खत्म होने वाली है। यदि 4 मई से बाजार नहीं खुले तो परिवार चलाना मुश्किल हो जाएगा।

चंदर दिल्ली के विभिन्न क्षेत्रों में लगने वाले मंगल व अऩ्य साप्ताहिक बाजारों में फुटपाथ रेडीमेड कपड़े बेचते हैं, जबकि उनका भाई बर्तन व अन्य घरेलू सामानों की दुकान लगाता है। वर्तमान में दोनों के ही हाथ से काम छिन गया है। पहले से जो कुछ कमा कर रखा था, उसी से परिवार का भरण-पोषण हो रहा है। यदि लॉकडाउन की मियाद बढी और हालात सामान्य नहीं हुए तो उन्हें रोटी के लाले पड़ जाएंगे। ऐसी सूरत में गांव वापस जाना उनकी मजबूरी होगी, क्योंकि दिल्ली में तो मकान का किराया भी एक बड़ा बोझ होता है।

इतना ही नहीं छोटे ब्यूटी पार्लर व बुटीक आदि चलाने वाली महिलाएं भी काफी परेशान हैं। इनमें अधिकांश ऐसी हैं, जिनके कंधो पर परिवार चलाने की जिम्मेदारी है। पिछले एक माह से इनकी आमदनी बिल्कुल बंद हो गई है, जबकि निकट भविष्य में भी इन्हें अपने लिए कोई संभावना नजर नहीं आ रही है।

खुरेजी इलाके में टेलरिंग की दुकान चलाने वाले नसीम ने बताया कि इस बार होली के मौके पर भी कमाई काफी हल्की थी। उम्मीद थी कि लगन यानी शादी-ब्याह के सीजन में अच्छा काम निकलेगा, लेकिन कोरोना ने सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। जो थोड़ा-बहुत बचत थी, उसी से परिवार का भरण-पोषण हो रहा है। यदि लॉकडाउन का सिलसिला आगे भी जारी रहा और काम नहीं मिला तो भुखमरी की नौबत आ जाएगी।

अहम बात यह है कि टीवी में खबरों व बहसों को एजेंडा भले ही कुछ हो, लेकिन उपरोक्त सभी लोगों में एक ही जिज्ञासा है कि हालात कब सामान्य होंगे और बाजार कब खुलेगा ?

लोअर मिडिल क्लास की स्थिति का अंदाजा घने मुहल्लों में किराना, फल व सब्जी की दुकानों से लगाया जा सकता है। दुकानें तो खाने-पीने की चीजों से भरी हुई है, लेकिन बिक्री तो सिर्फ सस्ते राशन और कुछ सब्जियों की ही हो रही है। लक्ष्मीनगर के एक किराने की दुकान वाले ने बताया कि उसके यहां ब्रांडेड कंपनियों का आटा व बासमती चावल कम बिक रहा है। लोग सस्ते चावल और लूज आटे की मांग कर हैं। मेवे व अन्य महंगी चीजों की खरीददारी भी कम हुई है।

इसी तरह फल की दुकान वाले नईम ने बताया कि 6 दिन पहले उसने 20 किलो संतरा लगाया था, लेकिन बिक्री सिर्फ 5 किलो की ही हुई। बचा हुआ माल छुहारे की तरह सूख गया है। सेब की बिक्री भी बहुत कम हो रही है, क्योंकि यह काफी महंगा है। अलबत्ता केले की बिक्री थोड़ा बहुत हो रही है, क्योंकि वह 40-50 रुपये दर्जन में मिल जा रहा है।

सब्जी की दुकान पर भी कुछ ऐसा ही दिखा, जहां लोग परवल, शिमला मिर्च व भिंडी जैसी महंगी सब्जियों के बजाय आलू, प्याज व अन्य सस्ती सब्जियां ही ज्यादा खरीद रहे हैं।

उधर यदि यमुना पुश्ता झुग्गीवासियों पर नजर डाली जाए तो, वहां की स्थिति और भी भयावह है। दोपहर 12 बजे और शाम साढ़े 4 बजे जब दाल-भात बंटने का समय होता है तो सैकड़ों की तादाद में छोटे-छोटे बच्चे बर्तन लेकर भागते हुए नजर आते हैं। हर किसी की कोशिश होती है कि उसे लाइन में आगे की जगह मिल जाए। रमेश पार्क के प्राइमरी स्कूल में खाना लेने का इंतजार कर रहीं गीता ने बताया कि उनके पति एक्सपोर्ट मार्केट में चौकीदार का काम करते थे, लेकिन लॉकडाउन के बाद से सेठ लोगों ने काम से हटा दिया है। अब घर में कोई आमदनी नहीं रह गई है, जिसके चलते उन्हें यहां खाने के लिए लाइन लगानी पड़ रही है। इसी तरह मीनाक्षी ने बताया कि उनके पति गोविंद कचरा व प्लास्टिक चुनने का काम करते हैं, जबकि वे कुछ घरों में पोछा लगाती हैं, लेकिन लॉकडाउन के कारण उनका रोजगार छिन चुका है।

परिवार को दो वक्त का खाना तो मिल जा रहा है, लेकिन सुबह जब बच्चे चाय मांगते हैं तो वे उन्हें नहीं दे पाती हैं, क्योंकि उनके पास दूध, चीनी व पत्ती खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं। बीच में एक बार झुग्गी में चावल और आटा वितरित किया गया था, लेकिन उसके बाद से कोई नहीं आया। मीनाक्षी के पास खड़े एक लड़के करऩ ने बताया एक दिन कुछ लोग मोमबत्ती बांटने आए थे। इसी झुग्गी में रहने वाले एक रिक्शा चालक बाबू ने बताया कि उसके परिवार में 4 लोग हैं। सुबह और शाम जब लॉकडाउन में थोड़ा ढील मिलती है तो वह लक्ष्मीनगर की गलियों में कुछ सवारी ढो लेता है, जिससे 50-60 रूपए तक की आमदनी हो जाती है। इसी कमाई से वह अपना परिवार चला रहा है।

इस काम में उसे कई बार पुलिस के डंडे भी खाने पड़ते हैं। बाबू ने बताया कि वह सरकारी भोजन नहीं लेता है, क्योंकि इसमें काफी देर तक लाइन में लगना पड़ता है। वहां समय लगाने के बजाय वह मेहनत करके दो पैसा कमाना बेहतहर समझता है। सामान्य दिनों में वह तीन-साढ़े तीन सौ रुपये तक प्रतिदिन कमा लेता था। इसी तरह एक और नौजवान बंटी ने बताया कि वह गांधीनगर कपड़ा मार्केट में काम करता था, जहां उसे 12 से 15 हजार रुपये प्रतिमाह की आमदनी हो जाती थी, लेकिन अब सब कुछ ठप हो गया है। सेठ लोग कुछ भी मदद करने को तैयार नहीं हैं। यहां तक कि उसने एक सेठ से 2000 रुपये उधार मांगे, जिस पर वह 500 रुपये ब्याज देने को भी तैयार था, लेकिन उसने साफ मना कर दिया। उसने बताया कि इस झुग्गी में रहने वाले अधिकांश लोगों के पास न तो राशन कार्ड है और न ही कोई अऩ्य दस्तावेज। यहां के सभी लोग रोज मेहनत-मशक्कत कर अपना पेट पालते हैं। लॉकडाउन खत्म होने में अभी समय है और उसके बाद भी क्या हालात होंगे कहना मुश्किल है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Lockdown
Lockdown crisis
Corona Crisis
poverty
unemployment
Loosing jobs
Lower middle class
Hunger Crisis
Central Government

Related Stories

दवाई की क़ीमतों में 5 से लेकर 5 हज़ार रुपये से ज़्यादा का इज़ाफ़ा

उत्तराखंड: मानसिक सेहत गंभीर मामला लेकिन इलाज के लिए जाएं कहां?

कोरोना अपडेट: देश के 14 राज्यों में ओमिक्रॉन फैला, अब तक 220 लोग संक्रमित

ओमिक्रॉन से नहीं, पूंजी के लालच से है दुनिया को ख़तरा

दुनिया की 42 फ़ीसदी आबादी पौष्टिक आहार खरीदने में असमर्थ

कोरोना संकट के बीच भूख से दम तोड़ते लोग

कोरोना से दुनिया भर में आर्थिक संकट की मार, ग़रीब भुखमरी के कगार पर

विश्व में हर एक मिनट में भुखमरी से 11 लोगों की मौत होती है: ऑक्सफैम

टीका रंगभेद के बाद अब टीका नवउपनिवेशवाद?

गुजरात के बाद बनारस मॉडल : “भगवान बचाए ऐसे मॉडल से”


बाकी खबरें

  • स्मार्ट सिटी में दफन हो रही बनारस की मस्ती और मौलिकता
    विजय विनीत
    स्मार्ट सिटी में दफन हो रही बनारस की मस्ती और मौलिकता
    22 Aug 2021
    बनारस का मज़ा और मस्ती लुप्त होती जा रही है। जनता पर अनियोजित विकास जबरिया थोपा जा रहा है। स्मार्ट बनाने के फेर में इस शहर का दम घुट रहा है... तिल-तिलकर मर रहा है। बनारस वह शहर है जो मरना नहीं, जीना…
  • विपक्षियों में सहमति, योगी की राजनीति और गडकरी का नेहरू-प्रेम
    न्यूज़क्लिक टीम
    विपक्षियों में सहमति, योगी की राजनीति और गडकरी का नेहरू-प्रेम
    21 Aug 2021
    सत्ताधारी भाजपा यूपी के चुनावों की तैयारी में अभी से जुट गयी है. वह इन दिनों तालिबान पर सियासी-खेल 'खेलने' में लगी है. जहां किसी खास व्यक्ति के किसी बयान में वह तनिक गुंजायश देखती है, फौरन ही समूचे…
  • ‘ईश्वर के नाम पर’ शपथ संविधान की भावना के विरुद्ध
    वसंत आदित्य जे
    ‘ईश्वर के नाम पर’ शपथ संविधान की भावना के विरुद्ध
    21 Aug 2021
    संविधान कहता है कि राज्य को विचार और कर्म में धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए और यही बात राजनीतिक पार्टियों के लिए भी लागू होती है।
  • मोदी सरकार ने दिखाया है कि हमें विभाजन के दर्द को किस तरह याद नहीं करना चाहिए
    स्मृति कोप्पिकर
    मोदी सरकार ने दिखाया है कि हमें विभाजन के दर्द को किस तरह याद नहीं करना चाहिए
    21 Aug 2021
    भारत को विभाजन को याद करने की जरूरत है, लेकिन मोदी सरकार ने इसके लिए ऐसी तारीख़ चुनी, जिसका मक़सद ध्रुवीकरण को बढ़ावा देना और उनकी पार्टी को चुनावी फायदा दिलाना है। ना कि इसके ज़रिए शांति और…
  • भारत अमेरिका की अफ़गान नीति का पिछलग्गू न बन कर, स्थानीय ताकतों के साथ मिलकर काम करे
    अमिताभ रॉय चौधरी
    भारत अमेरिका की अफ़गान नीति का पिछलग्गू न बन कर, स्थानीय ताकतों के साथ मिलकर काम करे
    21 Aug 2021
    ‘किसी भी सूरत में, तालिबान शासित अफगानिस्तान भारत के लिए एक बेहद चिंताजनक विषय बना रहने वाला है, जिसका वहां करोड़ों डॉलर मूल्य का निवेश लगा हुआ है...’
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License