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लैटिन अमेरिका
वर्तमान और भविष्य के बीच संघर्ष का नाम है क्रांति : फिदेल कास्त्रो
50 वर्षों तक क्यूबा के राष्ट्रपति रहे फिदेल कास्त्रो ने क्यूबा में उस समय क्रांति को अंजाम दिया जब लैटिन अमेरिका के लगभग सभी देश तानाशाही के अधीन थे। क्यूबा लैटिन अमेरिकी देशों में स्वतन्त्रता प्राप्त करने वाला अंतिम देश था।
अनीश अंकुर
13 Aug 2021
वर्तमान और भविष्य के बीच संघर्ष का नाम है क्रांति : फिदेल कास्त्रो
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के साथ फिदेल कास्त्रो। (फाइल फ़ोटो) साभार: गूगल 

आज लैटिन अमेरिकी महादेश के विश्विविख्यात क्रांतिकारी फिदेल कास्त्रो का 95 वां जन्मदिन है। जिस ढंग से अमेरिका क्यूबा में दखल देने की कोशिश कर सत्ता परिवर्तन के लिए प्रयास कर रहा है वैसे में फिदेल कास्त्रो की स्मृति न सिर्फ क्यूबा बल्कि समूची दुनिया में साम्राज्यवाद विरोधी संघर्षों को आवेग प्रदान कर रही है। फिदेल कास्त्रो रूज  को दुनिया भर में प्यार से  ‘फिदेल’ कहा जाता रहा है। अपने जीते जी लीजेंड बन चुके फिदेल कास्त्रो दुनिया भर में गरीबों, मजलूमों, शोषितों एवं संघर्षषील लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बने रहे। 

इस बात से शायद ही किसी केा गुरेज होगा कि वे इक्कसवीं सदी की सबसे महान शख्सीयत थे।  फिदेल और चे ग्वेरा की बेतरतीब दाढ़ी वाली तस्वीर ने युवाओं को जितना प्रेरित किया उतना शायद ही कियी अन्य तस्वीर ने। इन्हीं वजहों से फिदेल और चे पूरी दुनिया के युवाओं के ऑईकन बने। उनसे प्रेरणा लेते हुए टीशर्ट, टोपी, कैप पर उनकी फोटो और अपने शरीर के विभिन्न हिस्सों पर उनके टैटू अंकित किये गए।

50 वर्षों तक क्यूबा के राष्ट्रपति रहे फिदेल कास्त्रो ने क्यूबा में उस समय क्रांति को अंजाम दिया जब लैटिन अमेरिका के लगभग सभी देश तानाशाही के अधीन थे। क्यूबा लैटिन अमेरिकी देशों में स्वतन्त्रता प्राप्त करने वाला अंतिम देश था। 1898 में उसे स्पेनी उपनिवेशवाद से मुक्ति मिली थी लेकिन उसके बाद वह नए उभरते साम्राज्यशाही ताकत अमेरिका के चंगुल में फंस गया था। अमेरिका ने क्यूबाई संविधान में यह संशोधन कर दिया कि यदि क्यूबा में अमेरिकी हित प्रभावित होते हों तब उसे सैन्य कार्रवाई करने का एकतरफा अधिकार रहेगा। इस प्रकार क्यूबा की  स्वाधीनता महज औपचारिक ही बन कर रह गई। 

क्यूबाई क्रांति ने लैटिन अमेरिकी महाद्वीप में नये युग का सूत्रपात किया। फिदेल के नेतृत्व में हुआ क्रांतिकारी परिवर्तन  रूसी क्रांति, द्वितीय विश्व युद्ध में हिटलर की सेना का पराभव एवं चीनी क्रांति की विजय की तीन युगांतकारी बदलावों की अगली कड़ी में चौथी सबसे महत्वूपर्ण घटना थी। 

क्यूबा में क्रांति  

फिदेल कास्त्रो का जन्म 13 अगस्त 1926 के दिन एक धनी परिवार में हुआ था। फिदेल के पिता ने क्यूबा के स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया था लेकिन जब वे क्यूबा आये तो गरीब थे, लेकिन धीरे-धीरे हजारों एकड़ जमीन पर खेती करने लगे थे। इस प्रकार वे काफी संपन्न हो चुके थे।

फिदेल कास्त्रो ने हवाना विश्विद्यालय से 1950 में कानून की डिग्री हासिल की और वकालत करने का प्रयास भी किया। इसके पूर्व फिदेल ने कोलंबिया के लोकप्रिय नेता एलियसर गैतान की हत्या के खिलाफ होने वाले प्रदर्शनों  में हिस्सा लिया। 

26 जुलाई 1953 के दिन फिदेल ने सैंटियागो दे क्यूबा के बाहर सबसे बड़ी चौकी मोकांडा बैरकों पर सशस्त्र हमला किया। हमला विनाशकारी साबित हुआ। फिदेल कास्त्रो और टीम के अन्य जीवित सदस्य सैंटियागो के बीहड़ सिएरा मेस्त्रा की पहाड़ियों में जा छिपे लेकिन अंततः पकड़े गए।

इसमें  शामिल 135 गुरिल्लों में से 60 से अधिक मारे गए। फिदेल पर मुकदमा चला और उन्हें 15 साल की सजा हुई।   उस मुकदमे में उन्होंने अपना खुद बचाव किया। अपने बचाव के दौरान दिया गया उनका वक्तव्य ‘‘ चाहे मुझे सजा दे दो। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। इतिहास मुझे सही साबित करेगा’’ दुनिया भर में प्रसिद्ध हुआ। 

बातिस्ता सैन्य तानाशाही के खिलाफ लड़ने का कोई कानूनी तरीका न पाकर फिदेल कास्त्रो मैक्सिको चले गए। यहां से उन्होंने हथियारबंद विद्रोह संगठित करने का प्रयास किया। यहीं फिदेल कास्त्रो की अर्जेंटीना के अर्नेस्टो चे ग्वेरा से मुलाकात हुई। 25 नवंबर 1956 के दिन फिदेल, चे ग्वेरा, राउल कास्त्रो सहित 79 अन्य क्रांतिकारियों ने मैक्सिको के जुक्सपान बंदरगाह से ‘ ग्रैनमा ’ जहाज पर चढ़कर क्यूबा के लिए अभियान का आरंभ किया। उनका मकसद सिएरा माएस्त्रा की पहाड़ियों से सशस्त्र संग्राम छेड़ना था। फिदेल के नेतृत्व में चले मुश्किल भरे अभियान के परिणामस्वरूप बातिस्ता की तानाशाही का अंत हुआ। पश्चिमीगोलार्द्ध में संभव हुई यह पहली समाजवादी क्रांति थी। तब फिदेल कास्त्रो की उम्र महज 33 वर्ष थी।

क्रांति के पहले क्यूबा 

क्रांति के पहले क्यूबा में माफिया का राज था। क्यूबा की पहचान जुआ और वेश्वावृत्ति के अड्डे तथा अमेरिकी ऐशगाह के रूप में थी। अमेरिका के अमीर मनोरंजन के लिए क्यूबा आते थे। क्यूबा गुलाम लोगों और गन्ने के बागानो वाले देश के रूप में जाना जाता था। अमेरिकी राजदूत का रुतबा यह था कि क्यूबा के राष्ट्रपति बनने वाले हर शख्स को राजदूत से अनुमति लेनी पड़ती थी। 

प्रसिद्ध अमेरिकी फ़िल्म ' गॉडफादर' के एक दृश्य से क्यूबा की स्थिति को समझा जा सकता है। उस दृश्य में अमेरिका के माफिया, बैंकर, जुआघरों के मालिक आदि बैठकर एक केक काट रहे हैं। केक के टुकड़ों को बैंकर, तो एक हिस्सा शराबघरों के मालिक और बड़े उद्योगपति आपस में बांट लेते हैं। केक का आकार ठीक वैसा ही है जैसा क्यूबा का नक्शा। फ़िल्म बताती है कि क्यूबा जिस प्रकार अमेरिका के शासक वर्ग का चारागाह था लेकिन फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व में हुई क्रांति ने सब कुछ बदल कर रख दिया। 

इस क्रांति के महत्वपूर्ण कारकों में फिदेल की भूमिका की चर्चा करते हुए चे ग्वेरा ने कहा था ‘‘ पहला सबसे महत्वपूर्ण भूचाल लाने वाली ताकत का नाम है फिदेल कास्त्रो रूज। जो कुछ ही सालों में इतिहास के अध्यायों में शामिल हो गए। फिदेल का व्यक्तित्व इतना शानदार है कि जिस भी आंदोलन में शामिल होंगे उसका नेतृत्व खुद करेंगे। ऐसा उन्होंने स्कूली दिनों से लेकर हमारे देश और अमरीकी महाद्वीप की उत्पीड़ित जनता के प्रधान बनने तक जीवन भर किया। उनमें महान नेताओं के गुण हैं। ब्योरेवार बातों से नजर हटाए बिना किसी दी गयी परिस्थिति को समग्रता में समझने के लिए जानकारी व अनुभव को मिलाने की योग्यता, भविष्य में अत्यधिक विश्वास , घटनाओं का पूर्वानुमान लगाने की दृष्टि और घटना से पहले कार्रवाई करना, हमेशा अपने सहयोगियों की अपेक्षा दूर तक और साफ तौर पर देखना।’’ 

चे ग्वेरा आगे यह भी कहते हैं ‘‘ इन महान मूलभूत गुणों के साथ-साथ लोगों को जोड़ने, एकजुट करने तथा कमजोर करने वाले बॅंटवारे का विरोध करने की उनकी क्षमता ने जनता केा क्रांतिकारी रास्ते की महान छलांग के लिए तैयार किया। कुछ ऐसी परिस्थितियां भी मौजूद थीं जो क्यूबा के लिए अनोखी नहीं थीं, लेकिन फिदेल के अलावा किसी अन्य द्वारा दुबारा उसका फायदा उठाना मुश्किल होगा।’’  

साम्राज्यवाद के विरोध से समाजवाद की ओर 

क्रांति के बाद फिदेल कास्त्रो ने क्यूबा की तस्वीर बदलनी शुरू की।  फिदेल के सत्तासीन होते ही अमेरिका के कान खड़े हो गए। तत्कालीन राष्ट्रपति आइजनहावर ने क्यूबाई सिगार के आयात पर प्रतिबंध लगाकर क्यूबा के खिलाफ प्रतिबंधों के सिलसिले का प्रारंभ किया। जवाब में फिदेल कास्त्रो ने अमेरिका की तेल, चीनी, बिजली एवं टेलीफोन कंपनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। फिदेल कास्त्रो ने घोषणा की कि क्यूबा में हुई क्रांति का चरित्र समाजवादी है। फिदेल ने कहा ‘‘ यह विनम्र लोगों का,  विनम्र लोगों के लिए, विनम्र लोगों द्वारा संपन्न की गयी समाजवादी क्रांति है।"

कम्युनिस्ट पार्टी और क्यूबा 

1965 में फिदेल कास्त्रो ने अपनी पार्टी को क्यूबा की कम्युनिस्ट पार्टी के रूप में घोषित किया और इसके प्रथम सचिव चुने गए। क्यूबा में हुई क्रांति वहां पहले से ही विद्यमान कम्युनिस्ट पार्टी के बगैर हुई थी। इसके आलावा फिदेल व उनके युवा क्रान्तिकारियीं में उस कम्युनिस्ट पार्टी के बारे में कोई अच्छी राय न थी। उसकी प्रमुख वजह थी कि 1938-39 के दौर में तानाशाह बातिस्ता की सरकार को कम्युनिस्टों का समर्थन हासिल था।

दरअसल तब फासिज्म के विरुद्ध संघर्ष में बातिस्ता, डेमोक्रेटिक शक्तियों वाले 'पॉपुलर फ्रंट' का हिस्सा था। चूंकि बातिस्ता के खिलाफ संघर्ष चला करता था कम्युनिस्टों को भी उनके सहयोगी के रूप में देखा जाता था। क्यूबा में कम्युनिस्ट पार्टी के प्रारंभिक दिनों में काफी अच्छे-अच्छे क्रान्तिकारी थे। बल्कि क्यूबाई क्रांति के प्रतीक माने जाने वाले जोसे मार्त्ती के साथियों ने 1924 में कम्युनिस्ट पार्टी के गठन में भूमिका निभाई थी परंतु उसके कई बेहतरीन नेता मार डाले गए थे। बातिस्ता के साथ जाने के कारण कम्युनिस्ट पार्टी की विश्वसनीयता समाप्त हो गई थी।

फिदेल और समाजवाद

फिदेल कास्त्रो ने समाजवादी चरित्र की घोषणा हवाना में आयोजित एक विशाल रैली में की। ठीक इसी प्रकार 1976 में एक जनमतसंग्रह के बाद समाजवादी संविधान निर्मित किया। ठीक इसी प्रकार 2002 में संविधान में ये तब्दीली  शामिल की गयी कि क्यूबाई राज्य का समाजवादी चरित्र अटल और अपरिवर्तनीय है। इस कार्य के लिए लगभग 80 लाख लोगों ने याचिका दायर की थी। यह संशोधन तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश की इस धमकी की प्रतिक्रिया में था जिसमें उन्होंने क्यूबा के ‘सामाजिक-आर्थिक व राजनीतिक व्यवस्था में परिवर्तन’ करने केा कहा था। 

फिदेल कास्त्रो ने जार्ज बुश को चुनौती दी कि वे क्यूबा आएं और यहॉं की जनता को पूंजीवादी व्यवस्था के गुणों के संबंध में बताएं। यदि आम लोग पूंजीवादी व्यवस्था के गुणों से सहमत हो गए तो, फिदेल ने वादा किया कि वे व्यवस्था बदल देंगे। जॉर्ज बुश ने कभी ये चुनौती स्वीकार नहीं की।  

क्यूबा की क्रांति प्रारंभ में कोई समाजवादी नजरिए का सोचकर नहीं की गयी थी। वो मलूतः एक साम्राज्यवाद विरोधी क्रांति थी। फिदेल कास्त्रो एवं क्यूबाई क्रांति का सबक ये है कि यदि कोई सही मायनों में साम्राज्यवाद विरोधी है, तो उसे समाजवादी और कम्युनिस्ट होना स्वााभाविक है। फिदेल कास्त्रो तीसरी दुनिया में इकलौते अपवाद हैं जिन्होने साम्राज्यवादी मंसूबों को पूरा नहीं होने दिया। 

1949 की चीनी क्रांति के बाद साम्राज्यवादी शक्तियों ने ये सबक लिया कि राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष का नेतृत्व कभी भी साम्राज्यवादी विरोधियों के हाथ न जाने दो। इन लोगों के लिए साम्राज्यवाद विरोध मतलब साम्यवाद था। इन्हीं वजहों से इस दौरान जितने भी सच्चे साम्राज्यवाद विरोधी नेता थे लगभग सबों की हत्या अमेरिकी व ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों द्वारा कर दी गयी। 

फिदेल कास्त्रो ने अपने से पहले मिश्र में अब्दुल नासिर, ग्वाटेमाला में जैकब अर्बेंज एवं क्रांति के बाद ब्राजील के जोआवो गोउलार्ट का हश्र देखा था। लगभग यही हाल अफ्रीका कांगो के पैट्रिस लुमुम्बा लुम्मबा, गिनी बसाउ के अमिल्कर कबराल एवं अभी कुछ दशक पूर्व अफ्रीकन कम्युनिस्ट पार्टी के नेता और दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला के बाद सबसे प्रभावशाली व लोकप्रिय नेता क्रिस हानी का हुआ। इन सभी देशों में सैन्य तख्तापलट कराए गए या सीधे-सीधे राष्ट्रीय नेताओं की हत्या की गयी। लेकिन सी.आई.ए और अमेरिकी सत्ताव्यवस्था फिदेल को रास्ते से हटाने में सफल नहीं हो पाई ।        

फिदेल , अमेरिका एवं हत्या के प्रयास 

फिदेल कास्त्रो ने अमेरिका के 10 राष्ट्रपतियों को अपने सामने आते-जाते देखा। सबों ने क्यूबा को नेस्तनाबूद करने का ख्वाब देखा पर कोई भी इसे पूरा नहीे कर पाया। इसका प्रारंभ जॉन एफ कैनेडी से हुआ जब ‘बे ऑफ पिग्स’ की लड़ाई के समय हुई। आप्रवासी क्यूबाईयों के भरोसे सी.आई.ए ने ये अभियान चलाया। फिदेल ने इस आक्रमण का खुद मोर्चे पर रहकर मुआयना किया और अमेरिका की खासी बदनामी हुई। इससे अमेरिका और बौखला गया जिसने  द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बीसवीं सदी के सबसे बड़े नाभिकीय युद्ध के खतरे को जन्म दिया। सोवियत संघ और अमेरिका के लगभग आपस में टकराने की नौबत आ गई थी। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति कैनेडी के इस वादे के साथ कि वो क्यूबा पर हमला नहीं करेंगे वो मिसाइलें हटायी गयीं। 

फिदेल कास्त्रो से अमेरिकी सरकार को इस कदर चिढ़ थी कि खुफिया एजेंसी सी.आई.ए द्वारा उनकी हत्या की 638 कोशिशें कीं। उन्हें मारने के एक से एक अनोखे तरीके अपनाए गए। सी.आई.ए के कर्मचारी फिलिप एगी ने फिदेल को मारने संबंधी दस्तावेजों को सार्वजनिक किया है। अपने 80 वे जन्मदिन पर फिदेल कास्त्रो ने कहा ‘‘ मुझे कतई उम्मीद नहीं थी कि मैं इतने दिनों तक जीवित रहूॅंगा। विशेषकर एक ऐसे पड़ोसी के रहते जो मुझे लगभग प्रतिदिन मारने का प्रयास कर रहा हो’’ 

सोवियत संघ का पतन और क्यूबा 

फिदेल कास्त्रो और क्यूबा के लिए सबसे मुश्किल भरे दिन थे सांवियत संघ के विघटन के पश्चात  1991 से 1999 के दरम्यान। सोवियत सहायता के बंद होने की स्थिति में अमेरिका ने क्यूबा पर प्रतिबंध लगाकर आर्थिक आफत ला दी थी। 

अमेरिकी कांग्रेस ने कानून बनाकर तीसरी दुनिया के हर उस देश  को दंडित करने का प्रयास किया जिसने भी क्यूबा से व्यवहारिक संबंध कायम रखे। फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व में क्यूबा के लोगों ने इस ब्लैकमेलिंग से इंकार कर दिया। फिदेल कास्त्रों ने लोगों से समाजवादी व्यवस्था को बचाए रखने के लिए त्याग करने का आह्वान किया। इन परेशानियों के बावजूद क्यूबा में सार्वजनिक वितरण प्रणाली, मुफ्त शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं बरकरार रखीं तथा बाजार के निजी हाथों के दबाव में झुकने से इंकार कर दिया। क्यूबा इंधन के लिए पूरी तरह सोवियत संघ से प्राप्त होने वाले तेल पर आश्रित  रहता था। 

सोवियत संघ के विघटन के बाद क्यूबा के लिए तेल और रासायनिक खाद की आपूर्ति मिलना बंद हो गयी. लेकिन क्यूबा लड़खड़ाया नहीं। उन्होंने अपने नागरिकों को संदेश दिया कि अब हम साईकिल चलायेंगे। रातों रात चीन से हजारों-लाखों साईकिल आयात की गईं और 65 बरस की उम्र में फिदेल ने खुद साईकिल चालाना सीखा। पूरा मुल्क मोटरकारों को छोड़ साईकिल पर आ गया। 

 क्यूबा की लगभग 99 प्रतिशत खेती रासायनिक उर्वरकों पर आधारित थी। फिदेल ने अपने वैज्ञानिकों का आह्वान किया अब हमारे पास रासायनिक खाद संकट है और उनके वैज्ञानिकों ने पॉंच से दस सालों के अंदर क्यूबा को जैविक खेती के मामले में दुनिया में अव्वल नंबर पर पहुंचा दिया। ट्रैक्टर के बदले हल-बैल से खेती होने लगी। 

शिक्षा, स्वास्थ्य में अभूतपूर्व प्रगति एवं लोकतांत्रिक प्रक्रिया 

फिदेल कास्त्रो ने क्यूबा के इतिहास के हर महत्वपूर्ण मोड़ पर क्यूबा की जनता को हमेशा भरोसे में लिया। उन्होंने आर्थिक नीतियों में परिवर्तन करने का निर्णय लेने से पहले आम लोगों से संपर्क किया। कहा जाता है इस काम के लिए फिदेल कास्त्रो ने 1,63,000 बैठकें आयोजित कीं , जिसमें 8,913,838 (नबासी लाख तेरह हजार आठ सौ अड़तीस) लोगों ने हिस्सा लिया। समाजवादी जनतंत्र का उदाहरण होने के साथ-साथ यह फिदेल कास्त्रो का आम लोगों में अगाध भरोसे का सूचक है। इसका परिणाम है कि आज क्यूबा मानव विकास सूचकांक खासकर शिक्षा, स्वास्थ्य के मामले में विकसित देशों से भी बेहतर सुविधाएं प्रदान करने वाला देश माना जाता है। 

नीचे की तालिका से क्रांति ने क्यूबा में क्या बदलाव लाए हैं इसे समझा जा सकता है। क्यूबा में प्राथमिक से लेकर  विश्विद्यालय स्तर तक मुफ्त शिक्षा प्रदान दी जाती  है।  

अमेरिका में औसत उम्र 78 वर्ष है। लम्बी जिंदगी जीने के मामले में क्यूबा अमेरिका से भी आगे है। लेकिन यदि हम क्यूबा की तुलना उसी के समान आस-पास के अन्य मुल्कों से करें- जैसे हैती में औसत उम्र मात्र 62 साल है- तो क्यूबा में समाजवादी व्यवस्था के सर्वोच्चता और अधिक नजर आती है।

क्यूबा की स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी दुनिया में सर्वोत्तम मानी जाती है। क्यूबा अपने जी.डी.पी का 11.1 प्रतिशत सिर्फ स्वास्थ्य पर खर्च करता है। दुनिया के 158 देशों में क्यूबा ने अपने स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को भेजकर चिकित्सीय सुहायता पहुंचाई है। क्यूबा में निरक्षरता का अंत कर दिया गया है। कोरोना महामारी के दौरान क्यूबा ने न सिर्फ सफलता के साथ उसका मुकाबला किया बल्कि लैटिन अमेरिकी महादेश के साथ पूरी दुनिया को सहायता पहुंचाई, अभी चन्द दिनों पहले सम्पन्न हुए अलोम्पिक खेलों की तालिका को देखें तो तमाम प्रतिबन्धों, मुश्किलों के बावजूद उसकी जीवटता का अंदाजा हो जाता है। भारत जैसे लगभग 130 करोड़ की आबादी वाला देश मात्र एक स्वर्ण पदक जीत पाता है जबकि मात्र डेढ़ करोड़ आबादी वाला क्यूबा चार स्वर्ण पदक। स्वर्ण जीत हासिल करने वाले खिलाड़ियों ने अपने पदक को फिदेल कास्त्रो को समर्पित किया। फिदेल के न रहने के बाद अमेरिकी साम्राज्यवाद वहां की समाजवादी सरकार को अस्थिर करना चाहता है। अपनी मृत्यु के बाद भी फिदेल अमेरिका की राह के सबसे बड़े रोड़ा हैं। 

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