NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
आर्टिकल 370 के ख़ात्मे के बाद पनपी वह प्रवृत्तियां जिसका शिकार आम कश्मीरी बन रहा है!
पिछले दो साल में 5 लाख से अधिक लोगों की नौकरियां चली गई है। इस अवधि में यहां पनपी अन्य प्रवृतियां जो कश्मीर की अंतहीन पीड़ा को बद से बदतर बना रही है।
अजय कुमार
21 Oct 2021
jammu and kashmir
साभार : द प्रिंट

5 अगस्त 2019 के दावे को जहां गृह मंत्री अमित शाह संसद के सदन पर कह रहे थे कि आर्टिकल 370 को अर्थहीन बना देने के बाद कश्मीर की अंतहीन हिंसा पूरी तरह से खत्म हो जाएगी। जबकि समाज की नब्ज पकड़ने वाले लोगों का कहना था कि आर्टिकल 370 को पूरी तरह से खारिज कर देने का मतलब है जम्मू कश्मीर और भारतीय राज्य के बीच बने पुल को ढा देना है। एक बार जब पुल गिर गया तो फिर से बनने में बहुत लंबा समय लगेगा। यही हो रहा है। कश्मीर में हो रहे हिंसक वारदातें बता रही हैं कि भाजपा सरकार के फैसले ने भारत और कश्मीर के बीच बने पुल को ढा दिया है। कश्मीर में हिंसक वारदातों का अंतहीन दौर आम लोगों पर किसी कहर की तरह गिर रहा है।

भारत के मुख्यधारा की मीडिया भले कहे कि इन हमलों का शिकार कश्मीरी पंडित, सिख और प्रवासी मजदूर हो रहे हैं। जबकि हकीकत यह है कि यह हमला कश्मीर के बहुसंख्यक समुदाय मुस्लिमों पर भी हो रहा है। कश्मीर में ऐसा क्यों हो रहा है? इसके ढेर सारी कारण बताए जा सकते हैं।

लेकिन उन सभी कारणों की उपज इसमें निहित होगी कि पिछले दो साल में कश्मीरी समाज में किस तरह की प्रवृत्तियों ने जन्म लिया है? कश्मीरी समाज को बड़ी बारीक ढंग से जानने और परखने वाले पत्रकारों और जानकारों के छपे कई लेखों और इंटरव्यू से गुजरने के बाद कश्मीरी समाज की जो प्रवृतियां सामने आई हैं। तो चलिए उसे एक साथ आपके सामने रख कर बड़ी तस्वीर के सहारे कश्मीर की हालिया परेशानी की जड़ों को पहचानते हैं।

* कश्मीर में मीडिया काम कर रही है लेकिन उसमें जनता की आवाज नहीं है। जनता की आवाज जबरन गायब की जा रही है। पत्रकारिता करना अपराध बना दिया गया है। प्रशासन और पुलिस के द्वारा रिपोर्टरों का पीछा किया जाता है। उन्हें डराया-धमकाया जाता है, टॉर्चर किया जाता है। आतंकवादी बता दिए जाने की धमकी दी जाती है। साफ शब्दों में कहा जाता है कि वह उन खबरों से दूर रहें जो सरकार को सवाल के कठघरे में खड़ा करें। पिछले दो सालों से स्थानीय मीडिया के तकरीबन 40 से अधिक पत्रकार पुलिस और प्रशासन की प्रताड़ना का शिकार हुए हैं। खबरें एक खास किस्म की सरकारी मशीनरी से छन जाने के बाद ही छप रही है। यह मशीनरी बिना किसी जायज तर्क के किसी खबर को गलत बताकर खारिज कर देती है तो किसी खबर को फेक न्यूज़ बता कर छापने से मना कर देती है। एडिटर को या तो पैसे से खरीद लिया गया है या डरा-धमका कर चुप करा दिया गया है। अखबारों के पन्ने पत्रकारिता की बजाय सरकारी विज्ञापनों से पटे पड़े हैं। सरकार की उपलब्धियों की रंगीन नुमाइश होती है और जनता के दुख-दर्द को अखबार से बहुत दूर रखा जाता है। जाहिर है ऐसे में लोगों की नाराजगी तो बढ़ेगी ही।

* दो साल से अधिक का समय बीत चुका है। जम्मू-कश्मीर को अब तक राज्य का दर्जा वापस नहीं मिला है। ना ही वहां पर चुनाव हुए हैं। ना ही कोई ऐसी ठोस प्रक्रिया चल रही है कि भविष्य में सरकार बनती दिखे। इसकी जगह पर केंद्र सरकार की नौकरशाही और मिलिट्री की अकूत ताकत काम कर रही है। जिस का बेजा इस्तेमाल होने की संभावना हर वक्त बनी रही है।
सरकार ना होने का मतलब है अशांति की धारा का लगातार बढ़ते रहना। इस गुस्से को समझौते में तब्दील हो जाने का कोई रास्ता ना होना।

* इस दौरान कई तरह के ऐसे नियम और कानून भी बनाए गए हैं जिनकी वजह से आम लोगों के बीच गुस्सा पनपा है। जैसे कि जमीन से जुड़े हुए कानून जिनकी वजह से घुमंतु समुदाय के लोगों को बरसों पुरानी उन जमीनों पर अपना बसेरा छोड़ना पड़ रहा है जिस पर वह अपने मवेशियों को पालते थे। जिसके सहारे उनके मवेशियों को चारा उपलब्ध होता था।

जिन पर कभी पत्थरबाजी जैसे आरोप लगे थे उन्हें पासपोर्ट दिए जाने से मना किया जा रहा है। राज्य की सुरक्षा में खलल डालने का आरोप लगाकर कुछ सरकारी अधिकारियों को बर्खास्त किया जा रहा है। ऐसा भी नियम बना है कि जिस किसी सरकारी अधिकारी के सगे संबंधी राज्य विरोधी हरकतों में पाए जाएंगे उस सरकारी अधिकारी को बर्खास्त कर दिया जाएगा। इस तरह के कानूनों का क्या औचित्य है? डरा-धमकाकर और जबरन नियम बनाकर कैसे किसी समाज को शांति की तरफ ले जाया जा सकता है?

इसे भी देखे :कश्मीर से धोखा बंद करे मोदी सरकार, हाल खराब: यूसुफ़ तारीगामी

* भाजपा सरकार सहित मीडिया दिन रात यह प्रचार करती है कि कश्मीर से आतंकवाद खत्म हो चुका है। कहीं कोई बड़ा प्रोटेस्ट नहीं होता है। कहीं कोई बड़ी घटना नहीं होती है। यह तब्दीली नहीं तो और क्या है? ये बात प्रचार के लिहाज से जितनी कारगर है उतनी ही हकीकत के लिहाज से नुकसानदेह है।

कश्मीर का विरोध गोलबंद होकर सामने नहीं आ पाता। उसे पहले ही उसे तोड़ दिए जाने के जतन किए जाते हैं। उग्रवादियों की संख्या पहले से कम हुई है। लेकिन संख्या कम होने का मतलब यह नहीं कि वह पूरा नेटवर्क ही तोड़ दिया गया जिसके जरिए कश्मीर में चरमपंथी और कट्टरपंथी सोच और फौज तैयार होती है। आर्टिकल 370 के खात्मे के बाद यह नेटवर्क कई रूपों में बढ़ता चला गया है। ये बातें सामने आती रही हैं कि यहीं पर उग्रवादियों की जमात तैयार हो रही है। विरोध को प्रकट करने का कोई जायज तरीका नहीं है। भारत सरकार के प्रति भरोसा टूट गया है। ऐसी में नौजवान सार्थक और रचनात्मक कदम नहीं उठाते। बल्कि वही काम करते हैं जहां पर हिंसा के सहारे अपनी बात रखने को तवज्जो दिया जाता है। कश्मीर में हो रही हिंसक घटनाओं को लेकर कश्मीर के जानकारों का यह कहना है कि वह बहुत पहले से जान रहे थे कि कश्मीर के अंदर पनप रहा गुस्सा इसी तरह की अतार्किक और अमानवीय फैसलों में तब्दील होगा।

इसे भी पढ़े : कैसे कश्मीर, पाकिस्तान और धर्मनिर्पेक्षता आपस में जुड़े हुए हैं

* कश्मीरियों को साफ दिख रहा है कि भारत की सांप्रदायिक राजनीति कश्मीर को एक मोहरे की तरह इस्तेमाल कर रही है। उनका भरोसा भारत के प्रति बहुत अधिक टूट चुका है। एक धड़ा भारतीय राज्य को अपनाने से दूर रहता है। ऐसे में भारत की मुख्यधारा की मीडिया उनकी आवाज बनती तो अच्छा होता। लेकिन वह भी सांप्रदायिक राजनीति में घी डालने का काम करती है। सारा का सारा दोष पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान, तालिबान और चीन पर मढ़ने की कोशिश की जाती है। मुस्लिम सांप्रदायिकता की बात की जाती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि कश्मीरी माहौल में ऐसे तत्व भी उभर रहे हैं। लेकिन उनके उभरने का कश्मीरी समाज और भारतीय राज्य के आपसी ताने-बाने का तार-तार हो जाना है। इसी आधार पर अफगानिस्तान और पाकिस्तान में रहने वाले आतंकवादी समूह कश्मीर को अपने गलत मंसूबों के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।

* सोशल मीडिया पर कश्मीर की रंगीनियां दिखाई जा रही हैं। टूरिज्म सेक्टर की खुशहाली परोस कर केंद्र सरकार का प्रोपगेंडा फैलाया जा रहा है। जमीनी हकीकत यह है कि सड़कों के गड्ढे बढ़ते जा रहे हैं। स्ट्रीट लाइट की टूट-फूट से रात की रोशनी गायब है। कचड़ों का ढेर इकट्ठा हो रहा है। शहर और जीवन को चलाने के लिए जरूरी सामान पहुंच नहीं पा रहे हैं। खराब पानी की व्यवस्था से छुटकारा नहीं मिल रहा है। बिजली की कमी है। व्यवस्था, अव्यवस्था में तब्दील हो चुकी है। भारत में सबसे अधिक बेरोजगारी जम्मू-कश्मीर में तकरीबन 21.6 फ़ीसदी के आसपास है। पिछले दो साल में 5 लाख से अधिक लोगों की नौकरियां चली गई है। इस हताशा को हताशा बताने की बजाय खुशहाली दिखाना कितना भारी पड़ सकता है, आप सभी समझ सकते हैं।

Kashmir Violence
Jammu and Kashmir
Article 370
कश्मीरी पंडित
कश्मीरी स्टेट
military in Kashmir
human rights in Kashmir
government in Kashmir
human right violation in Kashmir
Kashmir and communalism
BJP and Kashmir
कश्मीर का दुख

Related Stories

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

कश्मीर में हिंसा का नया दौर, शासकीय नीति की विफलता

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

कश्मीर: एक और लक्षित हत्या से बढ़ा पलायन, बदतर हुई स्थिति

कश्मीरी पंडितों के लिए पीएम जॉब पैकेज में कोई सुरक्षित आवास, पदोन्नति नहीं 

यासीन मलिक को उम्रक़ैद : कश्मीरियों का अलगाव और बढ़ेगा

आतंकवाद के वित्तपोषण मामले में कश्मीर के अलगाववादी नेता यासीन मलिक को उम्रक़ैद

क्यों अराजकता की ओर बढ़ता नज़र आ रहा है कश्मीर?


बाकी खबरें

  • French President Emmanuel Macron (L) and US President Joe Biden
    एम. के. भद्रकुमार
    AUKUS पर हंगामा कोई शिक्षाप्रद नज़ारा नहीं है
    21 Sep 2021
    ऑस्ट्रेलिया, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका [AUKUS] के बीच हुए नए सुरक्षा समझौते को लेकर राजनयिक टकराव अभी शुरू होने वाला है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 26,115 नए मामले, 252 मरीज़ों की मौत
    21 Sep 2021
    देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 3 करोड़ 35 लाख 4 हज़ार 534 हो गयी है।
  • UP
    सबरंग इंडिया
    डेंगू, बारिश से हुई मौतों से बेहाल यूपी, सरकार पर तंज कसने तक सीमित विपक्ष?
    21 Sep 2021
    स्थानीय समाचारों में बताया गया है कि 100 से अधिक लोगों को डेंगू, वायरल बुखार ने काल का ग्रास बना लिया। बारिश से संबंधित घटनाओं में 24 लोगों की मौत का अनुमान है
  •  Collapses in Uttarakhand
    रश्मि सहगल
    उत्तराखंड में पुलों के ढहने के पीछे रेत माफ़िया ज़िम्मेदार
    21 Sep 2021
    जो अधिकारी ग़ैरक़ानूनी खनन के ख़िलाफ़ कार्रवाई करते हैं, उनके ख़िलाफ़ ताकतवर राजनेता मोर्चा खोल देते हैं। लेकिन स्थानीय लोग धड़ल्ले से चल रहे खनन में छुपे निजी हितों और नियमों के उल्लंघन को खुलकर सामने ला…
  • Internet Shutdowns
    इशिता चिगिल्ली पल्ली
    क्यों भारतीय राज्य इंटरनेट शटडाउन पर अपनी निर्भरता बढ़ाता जा रहा है?
    21 Sep 2021
    एक बार फिर भारतीय राज्य ने इंटरनेट शटडाउन का विकल्प अपनाया है, इस बार हरियाणा में यह प्रतिबंध लागू किए गए हैं, ताकि क़ानून-व्यवस्था पर नियंत्रण किया जा सके। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License