NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
भारत
अर्थव्यवस्था
रेगिस्तान की पूरी इकोलॉजी को बिगाड़ देगा ये कोरोना संकट!
रेगिस्तान के राज्य पशु ऊँट को रायका रैबारी लोग रेगिस्तान के मिट्टी के धोरों में खुला छोड़ने पर विवश हैं। क्योंकि उनके पास ऊँटों को खिलाने को कुछ नहीं है। भेड़-बकरी पालक हताश हैं। जब उनके पास खाने को कुछ नही हैं तो वे रेवड़ को क्या खिलाएं?
अश्वनी कबीर
03 Apr 2020
रेगिस्तान की पूरी इकोलॉजी

भारत में कोरोना वायरस के कारण आम इंसान तकलीफ़ में है। इस तकलीफ़ के सबसे बड़े शिकार बेजुबान बन रहे हैं जो चर्चा से बाहर हैं। इस महामारी का सबसे अधिक बुरा परिणाम राजस्थान और गुजरात के पशुपालक जातियों को उठाना पड़ रहा है।

राजस्थान के मारवाड़ तथा गुजरात के कच्छ क्षेत्र में ऊँटों ओर भेड़- बकरी का पालन बड़े स्तर पर किया जाता है। जहां अकेले मारवाड़ क्षेत्र में 2 लाख ऊंट, 90 लाख से ज्यादा भेड़-बकरियां तथा 60 हज़ार से ज्यादा गधे हैं। ऐसे ही गुजरात के कच्छ क्षेत्र के तैरने वाले ऊंट प्रसिद्ध हैं।

ऊंट, गधे ओर भेड़-बकरियों के बिना रेगिस्तान में जीवन की कल्पना करना भी सम्भव नहीं हैं। ये न केवल इन समाजों के पोषण की जरूरतों को पूरा करती हैं। बल्कि सदियों की मेहनत से इन पशुओं ने अपने आप को रेगिस्तान के अनुरूप ढाला है।

इस परम्परागत पशुपालन के व्यवसाय में रायका, रैबारी बागरी ओर बावरिया समाज जुड़े हुए हैं। ये समाज सदियों से पशुपालन का काम करते हुए आ रहे हैं। हमें ये ध्यान रखना चाहिये कि भारत मे ऊंट पालने का काम सभी जातियाँ करती हैं किन्तु ऊँटों की ब्रीडिंग रायका- रैबारी लोग ही करवाते हैं।

IMG-20190723-WA0006.jpg

कभी राजे रजवाड़ों की शान रहे, युद्ध मैदान के अहम हिस्सा रहे। रेगिस्तान के राज्य पशु ऊँट को रायका रैबारी लोग रेगिस्तान के मिट्टी के धोरों में खुला छोड़ने पर विवश हैं। क्योंकि उनके पास ऊँटों को खिलाने को कुछ नहीं है। भेड़-बकरी पालक हताश हैं। जब उनके पास खाने को कुछ नही हैं तो वे रेवड़ को क्या खिलाएं?

कोरोना वायरस का संक्रमण न फैलने पाए इसके लिए सरकार ने पूरे देश मे लॉक- डाउन की घोषणा की हुई है। प्रदेश के साथ- साथ विभिन्न जिलों की भी सीमाएं बन्द कर दी हैं। गांवों में स्वयं घोषित राष्ट्र भगतों ने किसी भी व्यक्ति के गांवों में आने-जाने पर रोक लगा दी है।

प्रतिकूल परिस्थितियों में अनुकूलन कैसे करते हैं ? 

मार्च महीने के सुरुवात में बाड़मेर में लगने वाले चैत्री मेले के बाद सभी पशुपालक अपने-अपने पशुओं के काफिले को लेकर जिसमे रायका- रैबारी ऊँटों के काफिले, बागरी ओर बावरिया अपने भेड़-बकरियों के रेवड़ को लेकर चारागाह ओर पानी की तलाश में निकल पड़ते हैं। ठीक ऐसे ही गुजरात के कच्छ से भी रायका- रैबारी लोग अपने कारवां के साथ निकल पड़ते हैं।

क्योंकि इस दौरान रेगिस्तान का क्षेत्र पूरी तरह से सूख जाता है। वहां चारा ओर पानी तो दूर इंसान के रहने की भी परिस्थितियाँ भी प्रतिकूल बन जाती हैं। ऐसी स्थिति में पशुपालकों के कुछ काफिले हरियाणा, पंजाब की ओर तो कुछ काफिले मध्य- प्रेदेश की ओर निकलते हैं। अगस्त के अंत मे जब रेगिस्तान में बारिश होती है तब ये लोग अपने टोलों को लेकर वापस लौटते हैं।

IMG-20191206-WA0014.jpg

पशुओं के क्षेत्रीय स्थानांतरण की ये परम्परा सदियों से चली आ रही है। किन्तु इस वर्ष चैत्री मेले को ही सरकार ने बीच मे बन्द कर दिया जिससे पशुपालकों को अपने पशुओं को वापस लाना पड़ा। कुछ लोगों ने तो अपने ऊँटों को वहीं मेले में ही खुला छोड़ दिया। क्योंकि उनके पास ऊँटों को खिलाने के लिए कुछ नही हैं।

जैसलमेर के सम में रहने वाले ऊंट पालक साजन भी चैत्री मेले में गया था। उसको उम्मीद थी कि इस बार उसके ऊंट बिक जायेंगे जिससे वो अपने राशन के दुकान का पैसा चुका सकेगा और बचे हुए पैसे से अपने छोटे भाई-बहन को पढ़ा सकेगा किन्तु उसकी सब उमीदों पर पानी फिर गया।

साजन ने बताया कि जब सरकार ने अचानक से बीमारी फैलने का नाम लेकर मेले को बीच में बन्द करवा दिया तो हमारी अंतिम उम्मीद भी समाप्त हो गई । इन ऊँटों को वापस कहाँ लेकर जाएँ? घर पर भी ये ऊंट भूख से मरेंगे तो इससे अच्छा हैं इनको 500- 1000 रुपये में कोई ले ले नहीं तो इनको यहीं खुला छोड़ना पड़ेगा। साजन ने बताया कि वहां 500 रुपये में भी कोई ऊंट लेने वाला नहीं था तो ऊंट को छोड़कर आ गया।

एक ऊंट एक दिन में 20 किलो चारा खाता है। जिसे 10 किलो सुबह और 10 किलो शाम में देना होता है। सूखे चारे की कीमत 10 रु प्रति किलो है इस हिसाब से एक दिन का ख़र्चा हुआ 200/ रुपये। एक महीने का एक ऊंट का खर्च होगा 6000/ रुपये। सामान्यतः हर व्यक्ति के पास 8-10 ऊंट हैं। वे इनको खिलाने के लिए इतना पैसा कहां से लेकर आएं?

IMG_20200402_014213.png

मिट्टी का प्रबंधन बिगड़ेगा

पशुओं के इस स्थानांतरण से किसानों को खेतों के अंदर जैविक खाद मिल जाती हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और पानी भी जहरीला नहीं होता। बदले में पशुपालकों को अपने पशुओं हेतु खेतों से फसल निकालने के बाद अनावश्यक बचे फूल-पत्ते, फलियां ओर भूसा मिल जाता है। ये काफी पौष्टिक होता है जिसे पशु बड़े चाव से खाते हैं। ये जुगलबंदी तो टूटेगी ही साथ मे मिट्टी के प्राकृतिक तरीके से होने वाला प्रबन्धन भी बिगड़ेगा।

बकरी को गरीब की गाय कहा जाता है। बकरी को थोड़ा सा चराकर कभी भी ओर कितनी बार भी दूध निकाला जा सकता है। इसका दूध गाय और भैंस के दूध के मुकाबले ज्यादा उपयोगी होता है। गरीब व्यक्ति के पोषण का आधार ये बकरी ही हैं। जो उसके जीवन और अस्तित्व से जुड़ी हैं।

अकेले मारवाड़ में 95 लाख से ज्यादा भेड़-बकरी हैं। कितनी बकरियों को चारा उपलब्ध करवाया जाएगा। और क्या ये किसी भी सरकार के लिए सम्भव है? और ये चार माह अर्थात अगस्त माह तक उपलब्ध करवाना है। और इसमे भी सबसे बड़ी बात है मवेशियों के लिए पानी का प्रबंधन करना। 

जहां इंसानों को पानी नहीं है वहां इतने बड़े स्तर पर 5 महीने तक पानी कहाँ से आयेगा? यही हालत जैसलमेर के हरियाँ बागरी की है। हरियाँ की उम्र करीब 65-70 वर्ष है। उसके पास 150 भेड़ें, 23 बकरी ओर 9 गधे हैं। हरियाँ ने बताया कि हम आज 10 किलो आटा उधार लेकर आये हैं। जब हमारे पास खाने को कुछ नही तो इस रेवड़ को क्या खिलायेंगे?

Screenshot_2020-04-02-09-42-12-975_com.android.chrome.png

हरियाँ ने आगे बताया कि वे अपने रेवड़ को लेकर जोधपुर की सीमा तक चला गया था किंतु वहां से पुलिस ने हमें वापस भेज दिया। हम यहां इन भेड़ बकरियों को क्या खिलायें? यहां इतना पानी भी नहीं है और ये स्थिति निरन्तर ओर ज्यादा खराब होती जाएगी। जैसे जैसे गर्मी बढ़ेगी रेगिस्तान में सब सूख जाएगा।

हरियाँ सरकार के नित नए नियमों से दुखी हैं। वे बताते हैं। कि सरकार ने हमे आज तक क्या दिया जो जंगल थे उनमें पशु चराने पर रोक लगा दी। जो चारागाह थे उन पर लोगों ने कब्जा कर लिया। और अब ये नई आफ़त 

अरावल ओर थार के मध्य सम्बन्ध भी बिगड़ेंगे

जहां एक तरफ गुजरात से लेकर दिल्ली तक विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत श्रंखला 'अरावली' स्थित हैं। जिसके एक ओर भारत का महान मरुस्थल है और दूसरी ओर दक्कन का पठार। अरावली जहां एक ओर रेगिस्तान के फैलाव को रोकती, मानसून की स्थिति को निर्धारित करती है। वहीं दूसरी ओर ये जल विभाजक की भूमिका निभाती है।

इसकी अपनी खास पारिस्थितिकी उसे महत्वपूर्ण स्थान प्रदान करती है। इसे अलग और खास बनाने में इन्ही घुमन्तू चारवाहों की भूमिका है। जो वहां की जैव विविधता को फैलाने में मदद करते हैं। इससे वहां मौजूद पेड़- पौधे ओर झाड़ियों की हर वर्ष कटाई-छंटाई होती रहती है। अरावली को इन जानवरों से खाद मिलती हैं। वहां से प्राप्त होने वाली असंख्य जड़ी- बूटियों को ये चरवाहे अपने साथ अन्य राज्यों तक ले जाते हैं।

यदि चरवाहे नहीं गए तो ये चक्र रुक जाएगा। अरावली को खाद कहाँ से मिलेगी? वहां मौजूद सूखी झाड़ियों को कौन हटायेगा। हमें ये देखना है कि अरावली में आग लगने की घटनाएं क्यों नहीं होती? अरावली केवल राजस्थान से दिल्ली के बीच ही कटा फटा है किंतु इससे पहले गुजरात से लेकर राजस्थान के अलवर तक तो ये निरन्तर फैला है। क्योंकि वहां मौजूद सूखी घास ओर झाड़ियां यहीं पशुपालक हर वर्ष हटाते हैं।

FB_IMG_1562655893780.jpg

ऐसा नहीं है कि अरावली ओर थार के मध्य सम्बन्ध कोई एक-दो साल से बना है। ये सम्बन्ध तो कई हज़ार सदियों में निर्मित हुआ है। अरावली की जैव विविधता को फैलाने में यही पशुपालक ओर घुमन्तू समाज रहे हैं। 'जंगल' को इंसान नही उगाते, उन्हें उगने में सैकड़ों वर्ष लगते हैं। उसमें इन भेड़-बकरियों, ऊँटों, गधों ओर बंदरों की अहम भूमिका होती है। क्या सरकार इस सम्बंध को भी देखेगी ?

दोषी कौन ? 

सवाल ये है कि क्या इस कोरोना महामारी को हिंदुस्तान में लाने का कारण ये लोग रहे हैं? क्या इस महामारी को पूरे देश मे फैलाने में इनका कोई योगदान है? यदि ये लोग इस महामारी में दोषी नहीं है तो फिर क्या इस महामारी की सज़ा इन लोगों को दी जानी चाहिए? क्या इस महामारी में इन पशुओं की कोई भूमिका है?

हमारी सरकार को ये समझना चाहिए कि इन लोगों का किसी शहर में जाना तो बहुत दूर की बात है ये लोग गांव के अंदर भी प्रवेश नहीं करते। पशुपालक गांवों की बाहरी सीमाओं से होकर निकलते हैं। किसी भी गांव की सीमा में एक दिन से ज्यादा नहीं ठहरते। फिर भी यदि रोकथाम की बात है तो ये हिदायत दी जा सकती है कि वे शहर में न जायें। उनके रूट को चिह्नित किया जा सकता है।

यदि समय रहते इस स्थिति पर ध्यान नहीं दिया गया तो कोरोना महामारी के पीछे एक ओर बड़ी महामारी फैलने के सारे आसार बनते जा रहे हैं। ये महामारी कोरोना से भी व्यापक साबित हो सकती है। जिसके शिकार केवल इंसान ओर पशु ही नहीं होंगे बल्कि रेगिस्तान की सम्पूर्ण परिस्थितिकी यानी इकोलॉजी (Ecology) होगी। जीवन के वे तरीक़े होंगे जिनको सीखने में न जाने हमारी कितनी पीढियां गुजर गई।

(लेखक एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Coronavirus
COVID-19
Corona Crisis
Rajasthan
Ecology of the desert
Animal husbandry business
Corona virus epidemic

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में 2,745 नए मामले, 6 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,685 नए मामले दर्ज

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,710 नए मामले, 14 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में फिर से बढ़ रहा कोरोना का ख़तरा


बाकी खबरें

  • Khusi Dubey's parents
    सौरभ शर्मा
    यूपी चुनाव: ख़ुशी दुबे और ब्राह्मण, ओबीसी मतों को भुनाने की कोशिश
    25 Jan 2022
    2020 में हुए गैंगस्टर विकास दुबे के एनकाउंटर ने यूपी में योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में ब्राह्मणों की स्थिति को लेकर एक बहस छेड़ दी थी। जैसा कि विधानसभा चुनाव नजदीक हैं उस खूनी घटना से छलकाव की गूंज आज…
  • russia
    एम. के. भद्रकुमार
    रूस यूक्रेन में हस्तक्षेप करेगा
    25 Jan 2022
    रूस के नज़रिये से इस संकट से बाहर निकलने का एकमात्र तरीका यह है कि यूक्रेन अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता फिर से हासिल करे और वाशिंगटन का मुंह ताकना बंद कर अपने भाग्य का फैसला खुद करे।
  •  RPN Singh
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    यूपी चुनाव:  कांग्रेस को लगा बड़ा झटका, बीजेपी में शामिल हुए आरपीएन सिंह
    25 Jan 2022
    यूपी कांग्रेस के स्टार प्रचारक की लिस्ट में शामिल आरपीएन सिंह बीजेपी में शामिल हो गए हैं, आरपीएन सिंह कांग्रेस के बड़े नेता माने जाते थे।
  • Uttarakhand congress women wing
    वर्षा सिंह
    उत्तराखंड चुनाव: ‘बेटी पढ़ाओ’ और ‘लड़की हूं लड़ सकती हूं’ के नारों को खोखला बताती उम्मीदवारों की लिस्ट
    25 Jan 2022
    कुल 70 में से 59 सीटों पर भाजपा प्रत्याशियों की घोषणा कर चुकी है, लेकिन मात्र 5 महिलाओं को टिकट मिला है, वहीं कांग्रेस की 64 उम्मीदवारों की सूची में मात्र 6 महिलाएं हैं।
  • Pradhan mantri awas yojna
    सरोजिनी बिष्ट
    “2022 तक सबको मिलेगा पक्का घर” वायदे की पड़ताल: ठगा हुआ महसूस कर रहे गरीब परिवार
    25 Jan 2022
    उत्तर प्रदेश और केंद्र, दोनों सरकारों ने अपने पांच साल के कार्यकाल के भीतर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री आवास योजना के तहत सभी शहरी और ग्रामीण गरीबों को पक्का घर देने का वादा किया था। सरकार दावे कुछ भी…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License