NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
हिमाचल में एप्पल स्कैब महामारी का ख़तरा, सरकार को विज्ञान पर ध्यान केंद्रित करने और शून्य बजट खेती से तौबा करने की ज़रूरत
सरकार को यह सुनिश्चित करने के लिए युद्ध स्तर पर काम को शुरू करना होगा कि सरकारी हस्तक्षेप जल्द सेजल्द हो, वैज्ञानिकों के साथ विचार-विमर्श नियमित तौर पर हो और छद्म-वैज्ञानिक अवधारणा पर आधारित उस शून्य बजट खेती से तौबा किया जाये, जिसका राग अब भी अलापा जा रहा है। अगर ऐसा नहीं किया गया, तो एप्पल स्कैब महामारी, कोविड-19 महामारी के मुक़ाबले राज्य की आजीविका को कहीं ज़्यादा प्रभावित कर सकती है।
टिकेंदर सिंह पंवार
30 Jul 2020
हिमाचल में एप्पल स्कैब महामारी का ख़तरा

हिमाचल प्रदेश राज्य को परेशान करने के लिए ऐप्पल स्कैब का प्रकोप एक बार फिर वापस आ गया है। हालांकि, सवाल बना हुआ है कि इस रोग को महामारी के स्तर के बनाने के पीछे की वजह प्राकृतिक है या कोई अन्य संभावित कारण हैं ?

इस बीमारी को पहली बार सेब की फ़सल को नुकसान पहुंचाने के बाद 1982 में देखा गया था, और शिमला स्थित मशोबरा रोग पूर्वानुमान केंद्र के मुताबिक़ यह रोग जल्द ही बड़े पैमाने पर फैल सकता है। उल्लेखनीय है कि इस केन्द्र के पास एप्पल स्कैब के बारे में सटीक पता लगाने का जो स्तर हासिल है,वह 98.64% है।  इस पूर्वानुमान केंद्र का अनुमान है, "इस वर्ष (2019-2020) मौसम की स्थिति फफूद के अनुकूल हो सकती है, हालांकि इस तरह के सिलसिलेवार बदलाव अगले कुछ वर्षों में महामारी में बदल सकते हैं।"

leaf.png

इस साल मार्च और मई के महीनों के बीच अपेक्षाकृत नम वसंत था और गर्मी थी। सर्दियों में  गिरी बर्फ़ ने इस फफूद को 2019 में ख़राब हो गयी पत्तियों में ठंढी के मौसम में सुरक्षित रह जाने के दौरान परिपक्व होने में मदद की। वैज्ञानिकों का मानना है कि सर्दियों और वसंत की इसी तरह के संयोजन वाली स्थिति 1982-83 में भी बनी थी, जब इस महामारी ने पहली बार हिमाचल को अपनी चपेट में ले लिया था, वही ऐप्पल स्कैब राज्य में फिर वापस आ गयी है।

ऐप्पल स्कैब क्या है ?

ऐप्पल स्कैब फंफूद से होने वाला एक ऐसा रोग है, जो वेंचुरिया इनसेक्लेसिस नामक एक फफूंद के कारण होता है, जो ख़ास तौर पर सर्दियों में फलों के बगीचे के नीचे गिरी पत्तियों पर पलता है। वसंत के दौरान, यह फफूद बीजाणु पैदा करता है, जिसे एस्कोस्पोरस कहा जाता है। पत्तियों या फलों की सतह पर इन बीजाणुओं के जमाव के बाद, एस्कोस्पोर्स झिल्ली की नमी में अंकुरित हो जाते हैं। इस संक्रमण के लिए ज़रूरी न्यूनतम नम अवधि 17 डिग्री सेंटीग्रेड पर नौ घंटे तक की है। एक बार संक्रमण हो जाने के बाद, यह फफूद कॉनिडियोस्पोर्स और कॉनिडिया पैदा करता है। तापमान, पत्ती की नमी और सापेक्षिक आर्द्रता पर निर्भर इस संक्रमण के बाद लगभग नौ से सत्रह दिनों के बीच कोशिका के भीतर एक बीजाणु का निर्माण करने वाले जीवाणु नुकसान पहुंचाता हुए दिखायी देते हैं। ज़रूरी न्यूनतम आर्द्रता 60% से 70% के बीच होती है। स्पोर्यूलेशन यानी बीजाणुजनन होने पर कॉनिडिया पत्तियों और फलों पर हवा और बारिश  की छींटे और अन्य यांत्रिक तरीक़ों से फैलता है। स्कैब के ये लक्षण पत्तियों, डंठल, फलों और टहनियों पर दिखायी देते हैं। यह पपड़ी के ज़रिये पत्तियों और फलों को नष्ट कर देता है। फल मृतप्राय होने लगता है और उन पर दरारें दिखायी देती हैं, जिस कारण फल बेकार हो जाते हैं और इससे किसानों को बड़ा नुकसान पहुंचता है।

हिमाचल प्रदेश में सेब की अर्थव्यवस्था लगभग 5,000 करोड़ रुपये की है, और यह किसानों के एक बड़े हिस्से की आजीविका का प्रमुख स्रोत है। हिमाचल प्रदेश विधानसभा में पारित 2019-20  के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक़, “सेब हिमाचल प्रदेश की सबसे महत्वपूर्ण फल फसल है, जो फलों की फ़सलों के तहत आने वाले कुल क्षेत्रफल का लगभग 49% और कुल फल उत्पादन का लगभग 74% है। सेब का रक़बा 1950-51 में 400 हेक्टेयर से बढ़कर 2018-19 में 113,145 हेक्टेयर हो गया है।” सेब की फ़सलों को नुकसान का मतलब लोगों के एक बड़े हिस्से को होने वाला नुकसान है। राज्य के पांच ज़िलों में सेब की व्यापक रूप से खेती की जाती है।

इस प्रकोप के प्रमुख कारण

जैसा कि इस आलेख में पहले ही उल्लेख किया जा चुका है कि सेब में लगने वाली इस महामारी के सबसे महत्वपूर्ण कारणों में से एक कारण प्राकृतिक है, और यह कारण राज्य में वसंत और ग्रीष्म के दौरान लम्बे समय तक होने वाली बारिश से जुड़ा हुआ है। हालांकि, इसी तरह के दूसरे महत्वपूर्ण कारण भी हैं। पूर्व वनस्पति वैज्ञानिक, डॉ.ओंकार शाद, जो अब एक किसान है और राज्य की किसान सभा के नेता भी है,उनके अनुसार,ऐप्पल स्कैब ने राज्य के लगभग 60% बाग़ों को प्रभावित किया है।

हिमाचल प्रदेश के नौनी स्थित डॉ.यशवंत सिंह परमार बाग़वानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति, प्रोफ़ेसर विजय सिंह ठाकुर बताते हैं कि 1980 के दशक की शुरुआत में किसानों की एक नयी पीढ़ी इस महामारी से अनजान थी। जब उनके बाग़ों में यह बीमारी फैलने लगी, तो इस पीढ़ी को यह बीमारी समझ में नहीं आयी कि यह शुरुआत में क्या थी और इसलिए उन्होंने स्प्रे के उचित प्रोटोकॉल का सहारा नहीं लिया, जिससे कि उनके नुकसान को कम करने में मदद मिल सके। पपड़ी पर फफूंदनाशक का छिड़काव करने में देरी होने या समय पर नहीं चेतने पर यह बीमारी फ़सल के लिए हानिकारक साबित होती है। रोगजनक सिर्फ़ संक्रमित बाग़ में ही नहीं रहते हैं, बल्कि एक महामारी की शक्ल अख़्तियार करते हुए चारों तरफ़ फैल जाते हैं।

इस समय जो संकट मौजूद है,उसके प्रमुख कारणों में से एक कारण सरकार का सुस्त रवैया भी है। राज्य के बाग़वानी मंत्री ने नौनी स्थित इस विश्वविद्यालय में अपने एक संबोधन में कहा था कि उनका विभाग महज़ उस एक फसल यानी सेब तक ही सीमित नहीं है, जो फल राज्य (कुल विधानसभा क्षेत्र 68) के सिर्फ़ सात निर्वाचन क्षेत्रों की राजनीति पर हावी है, इसे (राज्य सरकार) उन दूसरे क्षेत्रों का भी ध्यान रखना है,.जो सेब नहीं उगाते हैं। यह तथ्यात्मक रूप से ग़लत है। आर्थिक सर्वेक्षण में भी बताया गया है कि सेब राज्य का प्रमुख फ़सल है। यह राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। लब्बोलुआब यही है कि यह कथन सेब उत्पादकों के सामने आने वाली समस्याओं को लेकर सरकार के रवैये को दिखाता है।

सरकार की तरफ़ से मुहैया करायी जाने वाली सस्ते फफूदनाशक इस वर्ष उपलब्ध नहीं था, मगर मुश्किल यह थी कि ग़रीब और सीमांत किसान ख़ुले बाज़ार से दवाइयां नहीं ख़रीद सकते थे। बाग़वानी विभाग और बाज़ार से ख़रीदे जाने वाले फफूंदनाशकों की क़ीमतों में भारी अंतर है। बाज़ार से ख़रीदी जाने वाली दवायें बाग़वानी विभाग से ख़रीदे जाने के मुक़ाबले तक़रीबन 60% महंगी हैं। मिसाल के तौर पर, सेब के बाग़ों में छिड़के जाने वाला एक फफूदनाशक  Z-78 है; खुले बाज़ार में आधा किलोग्राम इस फफूंदनाशक की क़ीमत क़रीब 330 रुपये है, जबकि बाग़वानी विभाग की तरफ़ से यह तक़रीबन 150 रुपये में मुहैया करायी जाती थी। जिस मात्रा का यहां ज़िक़्र किया गया है,वह 20 से ज़्यादा पेड़ों के लिए काफ़ी होगी। हालांकि, बाग़वानी विभाग में इन दवाओं की अनुपलब्धता ने किसानों को या तो इन दवाओं के छिड़काव को छोड़ देने के लिए मजबूर कर दिया है, या इसे अत्यधिक दरों पर ख़रीदने के लिए बाध्य किया है।

किसानों की नयी पीढ़ी में बाज़ार की ताक़तों का शिकार बनने की प्रवृत्ति है। पारंपरिक जानकारियों का इस्तेमाल करने और बाग़वानी विभाग के प्रोटोकॉल का पालन करने के बजाय, वे बाज़ार के सिद्धांतों और दिशानिर्देशों पर ज़्यादा भरोसा करते हैं। सेब क्षेत्र बहुराष्ट्रीय निगमों के उन एजेंटों से अटे-पड़े हैं,जो दवायें और अन्य कृषि साज़-ओ-सामान बेचते हैं। मगर इन एजेंटों के पास ऐप्पल स्कैब को लेकर कोई भनक तक नहीं थी, और इस प्रकार वे दुनिया के अन्य हिस्सों में स्थित अपने उन कॉर्पोरेट प्रमुखों द्वारा डिज़ाइन किये गये सिद्धांतों का पालन कर रहे थे, जिनका काम यह सुनिश्चित करना है कि उनकी दवायें और खेती से जुड़े दूसरे साज़-ओ-सामान ख़रीदे जायें।

पूर्व राज्यपाल,आचार्य देवव्रत द्वारा प्रतिपादित शून्य बजट खेती ने सेब किसानों के संकट को बढ़ा दिया है। जिसे वैज्ञानिकों ने छद्म-विज्ञान कहा है,सेब किसानों को उसी के निशाने पर हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल द्वारा डाल दिया गया और उन्हें शून्य बजट खेती को बढ़ावा देने के लिए मजबूर किया गया। इस प्रक्रिया में उर्वरकों के रूप में गोमूत्र और गुड़ चना का इस्तेमाल शामिल था; विडंबना है कि इन वैज्ञानिकों को बाद में खुद राज्यपाल द्वारा कई मंचों से निशाना बनाया गया।

वैज्ञानिकों ने खेती की इस विधि को धोखाधड़ी कहा और बताया कि उर्वरकों के रूप में गुड़ और चना का इस्तेमाल करने से खेतों में रोगजनकों में वृद्धि होगी। सबसे तीखा हमला प्रोफ़ेसर विजय ठाकुर की ओर से हुआ, जिन्होंने पूछा कि अब शून्य-बजट खेती कहां गयी। उन्होंने कहा कि यह "न किसी विज्ञान या न तर्क" से निकला है, बल्कि उन्होंने तो इस बात का बक़ायदा ज़िक़्र किया कि यह सरकारी विभागों के ज़रिये आयोजकों द्वारा चलाया गया सदस्यता अभियान था। उन्होंने दावा किया कि राज्य गोबर और गौ मूत्र पर 25 करोड़ रुपये ख़र्च करता है, उन्होंने आगे कहा कि पूर्व राज्यपाल के “हुल्लड़पन” ने राज्य को इसके लिए बजट देने के लिए मजबूर कर दिया। प्रोफ़ेसर विजय ठाकुर ने कहा, “यह हैरत की बात है कि 29 जून से 3 जुलाई, 2019 के बीच गोबर और गऊ मुत्र पर आयोजित पांच दिवसीय व्याख्यान पर नौनी विश्वविद्यालय की तरफ़ से 1 करोड़ रुपये ख़र्च किये गये हैं”।

जैसा कि पहले भी ज़िक़्र किया गया है कि पूर्व राज्यपाल आचार्य देवव्रत के सख़्त आदेश के कारण हिमाचल प्रदेश राज्य द्वारा ‘शून्य बजट खेती’पर 25 करोड़ रुपये से ज़्यादा ख़र्च किये गये थे। सच्चाई तो यह है कि शून्य बजट खेती की आड़ में सरकार खेती के संचालन की विभिन्न स्तरों में हस्तक्षेप की अपनी भूमिका से पीछे हट गयी है।

ऐप्पल स्कैब के प्रसार को नियंत्रित करने के लिए स्प्रे शेड्यूल की बेहद अहमियत है। यह स्प्रे शेड्यूल बाग़वानी विभाग की वेबसाइट पर सूचीबद्ध है, लेकिन इस बीमारी की पहचान नहीं होने के साथ-साथ इसकी कमी के कारण एक बाज़ार संचालित छिड़काव के स्वरूप और सरकार द्वारा निर्मित शून्य बजट के माहौल से  किसान बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं।

हिमाचल प्रदेश राज्य में ऐप्पल स्कैब की यह महामारी बड़ी तेजी से फ़ैल रही है। सरकार को यह सुनिश्चित करने के लिए युद्ध स्तर पर काम शुरू करना होगा कि सरकार का हस्तक्षेप जल्द से जल्द हो, वैज्ञानिकों के साथ विचार-विमर्श नियमित रूप से हो और इस छद्म-वैज्ञानिक शून्य बजट वाली कृषि अवधारणा से तौबा किया जाय, जिसका राग अभी भी अलापा जा रहा है। अगर ऐसा नहीं किया जाता है, तो ऐप्पल स्कैब महामारी कोविड-19 महामारी के मुक़ाबले राज्य की आजीविका को कहीं ज़्यादा प्रभावित कर सकती है।

लेखक शिमला के पूर्व डिप्टी मेयर हैं। इनके विचार व्यक्तिगत हैं।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

With the Threat of an Apple Scab Epidemic, the HP Govt. Needs to Focus on Science and Dump Zero Budget Farming

Himachal Pradesh
Apple Farming
Apples Himachal Pradesh
Apple Scab
Apple Disease
COVID-19

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,685 नए मामले दर्ज

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,710 नए मामले, 14 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में फिर से बढ़ रहा कोरोना का ख़तरा

कोरोना अपडेट: देश में आज फिर कोरोना के मामलों में क़रीब 27 फीसदी की बढ़ोतरी


बाकी खबरें

  • AUKUS May put NATO’s Future into Question
    जेम्स डब्ल्यू कार्डेन
    नाटो के भविष्य को संकट में डाल सकता है एयूकेयूएस 
    25 Sep 2021
    इस डील के परिणामस्वरूप दो ऐतिहासिक साझीदारों, अमेरिका एवं फ्रांस के संबंधों में गंभीर दरार आ गई है। इससे नाटो को भी आनुषांगिक रूप से घाटा हो सकता है।
  • Tamil Nadu
    नीलाबंरन ए
    तमिलनाडु के मछुआरे समुद्री मत्स्य उद्योग विधेयक के ख़िलाफ़ अपना विरोध तेज़ करेंगे
    25 Sep 2021
    मछुआरे समुदाय का आरोप है कि विधेयक और ब्ल्यू इकॉनमी मसौदा नीति कॉर्पोरेट संस्थाओं के हितों का पक्षपोषण करती है।
  • Afghanistan
    एम. के. भद्रकुमार
    क्या शांति की ओर बढ़ रहा है अफ़ग़ानिस्तान?
    25 Sep 2021
    अफ़गान अर्थव्यवस्था को उबारने में चीन की तत्परता एक बिल्कुल नया कारक है। अब बाइडेन प्रशासन अफ़गानिस्तान और मध्य एशिया में और अधिक उलझावों में शामिल नहीं होना चाहता है, इन हालत में अफ़गानिस्तान के पड़ोसी…
  • Kannur University
    सुचिंतन दास
    नहीं पढ़ने का अधिकार
    25 Sep 2021
    नफ़रत और कट्टरता से भरी बातों को पढ़ने से इनकार कर के कन्नूर विश्वविद्यालय के छात्रों ने इस सिलेबस की समीक्षा करने और इसके ज़रिये शासन की विस्तारात्मक नीति का  विरोध कर अहम राजनीतिक कार्य को अंजाम…
  • Harshil farmers
    वर्षा सिंह
    हर्षिल के सेब किसानों की समस्याओं का हल क्यों नहीं ढूंढ पायी उत्तराखंड सरकार
    25 Sep 2021
    हर्षिल के काश्तकारों ने इस महोत्सव का सीधे तौर पर बायकॉट कर दिया। महोत्सव शुरू होने के चार रोज़ पहले से ही हर्षिल में धरना-प्रदर्शन शुरू हो गया था। महोत्सव के दिन हर्षिल में किसानों ने ढोल-दमाऊं जैसे…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License