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भारत
राजनीति
नवउदारवाद के तीन ऐसे रास्ते जिन्होंने नए भारत में राजनीति को बदल दिया है
आज के नेता विचारधारा की परवाह नहीं करते हैं और एक पार्टी से दूसरी पार्टी में आते-जाते रहते हैं, और फिर भी वे जनता के हितों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हैं। आख़िर ऐसा क्यों है?
अजय गुदावर्ती
28 Jul 2021
Translated by महेश कुमार
neoliberalism

2014 के बाद के "न्यू इंडिया" में जिस तरह से राजनीतिक में बदलाव आया है और जिस तरह से इसे चलाया जा रहा है, उसमें सूक्ष्म लेकिन लंबी अवधि तक का बदलाव नज़र आता है। इनमें से सबसे उल्लेखनीय बदलाव यह है कि धर्मनिरपेक्ष-बनाम-सांप्रदायिक की पुरानी बाइनरी आसानी से राजनीतिक पार्टियों को उनके सामाजिक मुद्दे के जरिए पहचान करने में मदद नहीं करती है। धर्मनिरपेक्ष दल आज भाजपा के नेताओं को अपने भीतर खींच रहे हैं और उन्हें पार्टी का चेहरा बनाने में जरा भी हिचकिचाहट नहीं दिखाई देती है। इसका नवीनतम उदहारण नवजोत सिंह सिद्धू हैं, जो पहले भाजपा के साथ थे, लेकिन अब पंजाब के प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रमुख बन गए हैं। महाराष्ट्र, तेलंगाना और मध्य प्रदेश में उनके जैसे कई और मामले हैं।

इसका उल्ट भी होता है, और कांग्रेस का एक प्रवक्ता शिवसेना का प्रवक्ता बन जाता है। इसके अलावा, अब, कांग्रेस पार्टी और शिवसेना स्वयं महाराष्ट्र में सहयोगी पार्टियां हैं। हालांकि, कांग्रेस पार्टी ने इस बात को स्पष्ट किया हुआ है कि यह गठबंधन केवल रणनीतिक है और इन दलों के साथ उनके वैचारिक मतभेद जारी हैं, फिर भी, इसमें वैचारिक मतभेदों का धुंधलापन भी नज़र आता है। उदाहरण के लिए, ऐसा तब हुआ, जब कांग्रेस कार्यकर्ता अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए धन जुटाने के अभियान में शामिल हुए थे।

अब, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) भाजपा के मुक़ाबले मंदिर जल्दी बनवाने का वादा कर रही है। इसके अलावा, स्वतंत्र दलित-बहुजन स्कोलर्स ने मांग की है कि एक दलित को राम मंदिर का मुख्य पुजारी बनाया जाए, जो इस मुद्दे को और हवा देने का कम करता है। चूंकि अयोध्या में राम मंदिर की सत्यता पर कोई बहस अब संभव नहीं है, इसलिए राजनीतिक पार्टियों ने, इस पर बहस के बजाय, धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का पुनर्मूल्यांकन कर लिया है। इससे भाजपा के लिए अब कांग्रेस और अन्य दलों पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगाना संभव हो गया है।

आज जिस तरह की राजनीति की कल्पना की जा रही है, उसके कारण धर्मनिरपेक्ष-सांप्रदायिक विभाजन के साथ-साथ सत्ताधारी दल और विपक्षी दलों के बीच अलगाव भी धुंधला हो गया है। आज सत्ता-पक्ष और उसके नेता ऐसे बोलते हैं जैसे कि वे ही विपक्षी खेमे में हों। वे लगातार पिछली सरकारों को चलाने वाली प्रतिद्वंद्वी पार्टियों द्वारा अतीत में की गई गलतियों के मामले में जवाबदेही की मांग करते रहते हैं। वे सुनहरे भविष्य की बात करते हैं लेकिन वर्तमान में जवाबदेह बनने से इनकार करते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद कोविड-19 महामारी के प्रबंधन पर सलाह-मशविरा देते रहते हैं, लेकिन जब शिकायत इस बात की होती है कि महामारी के संकट का प्रबंधन उनकी ही सरकार द्वारा ठीक से नहीं किया जा रहा है, तो वे ऐसे प्रदर्शनकारियों या असंतुष्टों को "आंदोलन जीवी" के रूप में संदर्भित करते हैं।

हमारे पास एक ऐसे प्रधान मंत्री है जो "सिस्टम" को दोष देते है और बेबसी जताते है लेकिन वही प्रधानमंत्री कोविड-19 के प्रबंधन की ठोस नीति बनाने से इनकार करता है, और इससे भी शर्मनाक कि उनकी सरकार इस बात से भी इनकार करती है कि दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन की कमी के कारण लोगों की मृत्यु हुई है। भाजपा के सहयोगी दल भी विपक्ष की तरह ही मांग उठाते रहते हैं। जनता दल (यूनाइटेड) के नेताओं ने हाल ही में इस बात पर नाराज़गी जताई कि केंद्र सरकार द्वारा जाति जनगणना की रपट जारी नहीं की जा रही है। जदयू बिहार सरकार में भाजपा की सहयोगी है और उसने कहा है कि इस मुद्दे पर केंद्र ढिलाई या टालमटोल दुर्भाग्यपूर्ण है।

लेकिन जब सत्ताधारी पार्टी या गठबंधन पर दबाव बनाने की बात आती है तो जदयू कुछ भी नहीं करता है। समर्थन वापस लेने की कोई प्रतीकात्मक धमकी भी नहीं दी जाती है, जैसा कि आमतौर पर गठबंधन के दौर में भारतीय राजनीति में देखा जाता था। यह लगभग वैसा ही है जैसे कि हमारे पास विभिन्न राजनीतिक दल हैं, लेकिन सभी विपक्ष में हैं और "सिस्टम" के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं और कोई भी उस शासन की ज़िम्मेदारी नहीं लेता जो आज की घटनाओं के लिए जिम्मेदार है।

इसके अलावा, आज " दुश्मन से हाथ मिलाने" की एक नई घटना भी नज़र आती है, जहां पार्टियां एक ऐसे आधार को अपील करती हैं जो सामाजिक रूप से उनका विरोधी रहा है, उनके साथ राजनीतिक रूप से सहयोग की अपील की जाती है। इसलिए हम सुन रहे हैं कि बसपा ब्राह्मणों से उनके वोट के लिए अपील करती है जबकि भाजपा चुनाव जीतने के लिए ओबीसी के समर्थन पर भरोसा करती है। सामाजिक आधार के इस लचीलेपन ने मतदाताओं का ध्रुवीकरण करना संभव बना दिया है जब राजनीतिक दल एक-दूसरे से दूरी बनाते हैं, एक-दूसरे को गाली देते हैं, और फिर भी अपने मतदाताओं के साथ "एक साथ आते हैं" तब जब चुनावी गणित इसके पक्ष में है। 

असदुद्दीन ओवैसी और उनकी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन का मामला, दुश्मन से हाथ मिलाने साफ मामला है। उनकी रणनीति की सफलता और विफलता आंशिक रूप से बिहार और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के परिणामों में अंतर को स्पष्ट करती है। अब, बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि उत्तर प्रदेश में आने वाले चुनावों में पासा किस तरफ गिरता है। लेकिन यह चलन किसी भी तरह से एआईएमआईएम तक सीमित नहीं है। बिहार में लोक जनशक्ति पार्टी के संस्थापक रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान और तेलंगाना राष्ट्रीय समिति (TRS) का मसला भी कुछ ऐसा ही है। इस रणनीति की सफलता विभिन्न किस्म के दबाव पर भी निर्भर करती है, जिसमें ऐसा लगता है, जांच एजेंसियों का इस्तेमाल भी शामिल है। इसने शब्दकोष में दो शब्द जुड़ गए हैं: "टीम बी" और "टीम सी" आज के नियमित शब्द हैं जिनका इस्तेमाल प्रॉक्सी आवाजों को समझाने के लिए किया जाता हैं जो एक कहानी  बनाते हैं और चुनावी गणित को स्विंग करने के लिए आवश्यक संख्याओं को बढ़ाने में मदद करते हैं।

इन बदलाव क्या समझाते हैं? अगर इसका पहला कारण बताया जाए तो वह विकास का  नवउदारवादी मॉडल है जिसने राजनीतिक दलों की आर्थिक नीतियों के बीच बड़े पैमाने पर मतभेदों को दूर कर दिया है। वे सब के सब एक समान भाषा बोलते हैं और वाम दलों सहित समान समाधान पेश करते हैं। वाम दलों की गिरावट ने राजनीति को सेवा प्रदान करने को और सरकार चलाने को केन्द्रीय बना दिया है।

आम आदमी पार्टी का उदय राजनीति के सेवा-वितरण मॉडल की केंद्रीयता का प्रतीक है। तृणमूल कांग्रेस, टीआरएस और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम जैसे क्षेत्रीय दल व्यापक पैमाने पर कल्याणकारी उपायों की राजनीति करते हैं। एकमात्र मिसाल नवउदारवाद है, जिसे कल्याणवाद की एक झलक के साथ पेश किया गया और जिसे पहले "मानवीय करुणा के साथ विकास" के रूप में पेश किया गया था। राजनीतिक दलों के बीच नवउदारवाद को लेकर मौलिक और लगभग पूर्ण समझौता है और जो पार्टियों के बीच अदला-बदली को कम कठिन और जाहिरा तौर पर अधिक स्वीकार्य बना देता है। नवउदारवादी कार्यक्रम, वित्तीय पूंजी को सट्टा बाज़ार में लगाने, विनिर्माण क्षेत्र के विपरीत, सट्टा बाज़ार को बढ़ावा देकर इस खेल को "पोस्ट-ट्रुथ" का हिस्सा बना देता है।

राजनीतिक दलों के बीच मतभेदों की अपारदर्शी प्रकृति ने अतिरिक्त राजनीतिक ताकतों और रणनीतियों को एक बड़ा और अधिक निश्चित स्थान प्रदान किया है। अपने "सांस्कृतिक एजेंडे" को आगे बढ़ाने में आरएसएस की बढ़ती भूमिका इसका एक हिस्सा है। दूसरे छोर पर प्रशांत किशोर जोकि "राजनीतिक सहयोगी" या चुनावी रणनीतिकार के रूप में भूमिका है। वे करीब-करीब सभी पार्टियों के लिए काम करते है और मानते है कि चुनाव जीतने या हारने के लिए, प्रतिक्रिया के आधार पर रणनीति विकसित की जा सकती है। इसने बड़े डेटा की भूमिका को बढ़ा दिया है, चाहे वह निर्वाचन क्षेत्र स्तर का डेटा हो या यहां तक ​​कि घरेलू या पारिवारिक डेटा हो, जो निर्वाचन क्षेत्र-वार गणना और निगरानी का एक जटिल मैट्रिक्स है। इसने अटकलों और अनुत्पादक बहस को जन्म दिया कि क्या बंगाल में हालिया चुनावी प्रतियोगिता केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की "चतुरता" बनाम प्रशांत किशोर की "तीक्ष्णता" के बीच की प्रतियोगिता थी। विपक्षी दल अब सबको साथ लाने और एक कहानी सुझाने के लिए किशोर पर निर्भर हैं। राजनीतिक दलों के बीच मतभेदों की अपारदर्शी प्रकृति ने अतिरिक्त राजनीतिक ताकतों और रणनीतियों को एक बड़ा और अधिक निश्चित स्थान दिया है। अपने "सांस्कृतिक एजेंडे" को आगे बढ़ाने में आरएसएस की बढ़ती भूमिका इस स्पेक्ट्रम दूसरे छोर पर है। विपक्षी दल अब उन्हें एक साथ लाने और एक कथा सुझाने के लिए किशोर पर निर्भर हैं। कांग्रेस पार्टी के मामले में, किशोर को यह भी परिभाषित करना पड़ सकता है कि कॉंग्रेस को कैसे फिर से लॉंच किया जाए। 

भारत को एक नई कल्पना की जरूरत है। ऐसी जो नवउदारवादी प्रवृत्तियों या झुकाव और प्रतिभूतिकरण की मिसाल से परे हो। पुरानी बायनरी को नए तौर-तरीकों से खोजना होगा जो बदलती संवेदनाओं के मामले में अपील करती हैं। जब तक विपक्षी दल ऐसा करने को तैयार नहीं हैं, तब तक राजनीति अतिरिक्त-राजनीतिक और दिखावटी रहेगी।

लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली में सेंटर फ़ॉर पोलिटिकल स्टडीज़ में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।

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