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भारत
राजनीति
पंजाब सरकार के तीन साल: वादों को पूरा करने में असफल रहे अमरिंदर सिंह
पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सरकार भले ही तमाम दावे करे लेकिन किसानी संकट, कर्ज़ा माफी, सेहत, शिक्षा, बेरोजगारी, वित्तीय संकट, नशा जैसे मुद्दे उसी तरह मुंह बाये खड़े हैं जैसे तीन साल पहले उनकी सरकार बनने के समय थे।  
शिव इंदर सिंह
30 Mar 2020
पंजाब सरकार के तीन साल
Image Courtesy: Hindustan Times

16 मार्च को कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार के तीन साल पूरे हो गए हैं। तीन साल पहले पंजाब में जब कैप्टन अमरिंदर की अगुवाई में भारी बहुमत लेकर कांग्रेस सत्ता में आई थी तो कई राजनीतिक विश्लेषक यह कह रहे थे कि यदि नई सरकार बढ़िया सरकार साबित होती है तो यह मॉडल बनकर कांग्रेस के लिए अन्य राज्यों के रास्ते खोल सकती है।

कैप्टन अपनी सरकार के तीन साल पूरे होने पर धूमधाम से प्रचार कर रहे हैं कि उन्होंने लोगों से किए सभी वायदे पूरे कर दिए हैं। पर वास्तविक तस्वीर कुछ और हकीकत बयान कर रही है। पंजाब में किसानी संकट, कर्ज़ा माफी, सेहत, शिक्षा, बेरोजगारी, वित्तीय संकट, नशा जैसे मुद्दे उसी तरह मुंह बाये खड़े हैं।

तीन साल पहले सरकार के बड़े वायदों में पंजाब के किसानों का सारा कर्ज़ा माफ करना, सरकार द्वारा बैंकों का कर्ज़ा, कॉर्पोरेटिव सोसाइटीज़ और आढ़तियों का कर्ज़ा भरा जाना जैसे वायदे शामिल थे। अमरिंदर सिंह ने तो यहां तक भी कहा था कि उनकी सरकार में कोई किसान आत्महत्या नहीं करेगा व किसी भी किसान की ज़मीन नीलाम नहीं होगी। लेकिन पंजाब के किसानों के चेहरे पर अभी भी उदासी है।

किसानों की आर्थिक खुशहाली, बैंकों की कर्जे वाली फाइलें और साहूकारों की लाल बहीखातों में कैद होकर रह गई है। पंजाब से खुदकुशी के कारण हर दिन औसतन दो किसानों की उठ रही अर्थियां अन्नदाता की आर्थिक तबाही की गवाही दे रही हैं।

यदि हुक्मरानों ने वादे वफा किए होते तो तीन सालों में किसानों के हालात ज़रूर सुधरने थे पर न तो किसानों के कर्जें माफ हुए, न किसान-मजदूरों की आत्महत्याओं में कोई कमी आई, जमीनों की नीलामी भी नहीं रूकी।

किसान संगठनों का मानना है कि कर्जा माफ होने की उम्मीद में बडे़ स्तर पर किसान बैंकों के डिफाल्टर हो गए हैं। कर्जे के बोझ के चलते किसान और गहरे आर्थिक संकट में घिर गए हैं और बैंकों द्वारा किए गए कोर्ट केसों के चक्रव्यूह में फंसकर रह गए हैं। पंजाब सरकार अपने तीन सालों की उपलब्धियों को गिनाते हुए यह दावा कर रही है कि उसने छोटे व सीमांत किसानों का 4,625 करोड़ रुपये का कर्ज़ा माफ किया है पर सवाल यह उठता है कि क्या इतनी कम रकम की कर्ज़ा माफी पंजाब के किसानों के दुखों की दवा बनेगी?

पंजाब के 22 जिलों में से अकेले संगरूर जिला के किसानों के सिर पर चढे़ कर्जे पर नज़र दौड़ाई जाए तो 31 दिसम्बर 2019 तक यह रकम 5,451 करोड़ रुपये बनती है। संगरूर जिला में अब तक ढाई एकड़ तक की मलकियत वाले किसानों को 156 करोड़ 71 लाख रुपये व ढाई से पांच एकड़ तक के किसानों को 88 करोड़ रुपये की कर्ज़ा माफी मिली है। यह सिर्फ सरकारी कर्ज़े का आंकड़ा है जबकि निजी संस्थानों से लिया कर्जा अलग है।

भारतीय किसान यूनियन एकता (उगराहां) का दावा है कि कांग्रेस सरकार के तीन सालों में पंजाब के 1,454 किसान-मजदूरों ने खुदकुशी की है। मौजूदा साल 2020 के पहले दो महीनों के दौरान ही 47 किसान-मजदूर ख़ुदकुशी कर चुके हैं।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार अकेले जिला संगरूर में पिछले तीन सालों के दौरान 471 किसान-मज़दूरों ने ख़ुदकुशी की है। यदि ख़ुदकुशी मुआवज़ा पर नज़र मारी जाए तो किसान ख़ुदकुशी के 316 केसों में से 179 केस रद्द कर दिए गए हैं जबकि सिर्फ 123 केस मुआवज़े के लिए मंजूर हुए हैं, 14 केस बीच में लटके हुए हैं।

सबसे ज्यादा ख़ुदकुशी के मामलों वाले जिला संगरूर में 155 केसों में से सिर्फ 10 केस ही मुआवजे़ के लिए मंजूर हो पाए हैं, 143 केस रद्द कर दिए गए हैं और दो केस अभी अधर में हैं।

कर्ज़े के अलावा पराली, आवारा पशुओं की समस्या, पानी के घटते जलस्तर व फसली विभिन्नता के मुद्दे मुख्य चुनौती बने हुए हैं। पंजाब के ऐसे हालातों के कारण बड़ी तादाद में नौजवान ज़मीन व घर-बार छोड़कर विदेशों में जा रहे हैं।

भारतीय किसान यूनियन एकता (उगराहां) के प्रधान जोगिन्दर सिंह उगराहां का कहना है कि सियासी पार्टियां लोगों के साथ झूठे वादे करती हैं और वोटों के बाद मुंह फेर लेती हैं। किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल का कहना है कि मोडर्न राजाओं ने लोकतंत्र को पैरों तले रौंद दिया है, जब तक चुनावी घोषणापत्र कानूनी दस्तावेज़ नहीं बनता तब तक राजनैतिक पार्टियां लोगों को गुमराह करती रहेंगी।

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह द्वारा राज्य के लोगों को बढ़िया स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया करवाने के बड़े-बड़े दावे किये जा रहे हैं पर स्वास्थ्य विभाग के हालात सुधारने की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा।

राज्य में 4400 विशेषज्ञ डॉक्टर्स के पदों में से 1200 पद खाली पड़े हैं। विश्व स्तर पर फैले कोरोना वायरस ने जैसे ही भारत में अपने पांव पसारे पंजाब में भी एक व्यक्ति की मौत और रिपोर्ट लिखे जाने तक 31 कोरोना पॉजिटिव मरीज सामने आ चुके हैं।

पंजाब में बेशक सरकार द्वारा कर्फ्यू लगा दिया गया है लेकिन स्वास्थ्य विभाग के पास कोरोना वायरस से निपटने के लिए कोई ख़ास प्रबंध मौजूद नहीं हैं। अस्पतालों में तो डॉक्टर्स किटों की भी कमी है। राज्य के विभिन्न अस्पतालों में 2200 बैड तैयार किए गए हैं इसके अलावा प्राईवेट अस्पतालों में 250 वैंटिलेटर, अमृतसर व पटियाला के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 20-20 वैंटिलेटर तैयार किए गए हैं।

इस वायरस के बारे में सरकार लोगों को पूरी तरह जागरूक नहीं कर पा रही। राज्य में हर साल बड़ी गिनती में लोग डेंगू, स्वाइन फ्लू, मलेरिया व अन्य बीमरियों से ग्रस्त होते हैं। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार साल 2019 में स्वाईन फ्लू के 541 मरीज सामने आए जिनमें से 31 की मौत हो गई थी। इसी तरह डेंगू के मरीजों की गिनती भी हर साल बढ़ती जा रही है।

राज्य को नशा मुक्त बनाने के लिए सरकार ने 32 नशामुक्ति केन्द्र चलाए हैं, वर्तमान समय में इनमें मरीजों की गिनती बहुत कम है। सरकार की तरफ से पटियाला के राजिन्द्रा हस्पताल में बनाए गए 500 के करीब बेडों के एमएचसी का भी सही ढंग से इस्तेमाल नहीं किया जा रहा।

राज्य सरकार द्वारा साल 2019 के बजट में 259 करोड़ ‘सरबत सेहत बीमा योजना’ के लिए आवंटित किए गए थे। इसके द्वारा राज्य के 70 फीसदी परिवारों का 5 लाख रुपये का बीमा किया गया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार राज्य में काला पीलिया के मरीजों की गिनती साल 2016 में 436 थी जोकि 16 मार्च 2019 तक यह संख्या 59,781 हो गई।

2020 के आंकड़ों के अनुसार यह संख्या 76,000 के करीब पहुंच चुकी है। इन मरीजों के इलाज पर सरकार के द्वारा आठ सालों के बीच 57,000 मरीजों के लिए 800 करोड़ रुपये दिए गए। पंजाब में तहसील स्तर पर 63 अस्पताल व डिस्पैंसरी, 427 प्राइमरी हेल्थ सेंटर, 90 नेशनल हेल्थ मिशन के तहत जांच केन्द्र, 151 कम्युनिटी हेल्थ सेंटर, 200 शहरी डिस्पैंसरी, 2900 हेल्थ सब-सेंटर (आठ गांवों पर एक), 1200 ग्रामीण डिस्पैंसरी (नौ गांवों पर एक) होने के बावजूद स्वास्थ्य विभाग विशेषज्ञ डॉक्टर्स के सैंकड़ों पदों के रिक्त होने के कारण लोगों को अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं देने में नाकाम साबित हुआ है।

पंजाब सरकार राज्य की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में असफल रही है। गत 27 फरवरी को पंजाब विधानसभा में कैग की रिपोर्ट पेश की गई। इस रिपोर्ट अनुसार 2017-18 के दौरान पंजाब का कर्जा बढ़कर 1,95,152 करोड़ रुपये हो गया जोकि 2013-14 दौरान 102234 करोड़ रुपये था। इसी तरह 2017-18 के दौरान पंजाब के हर बाशिंदे  पर 70,000 रुपये का कर्ज़ा था।

वित्त मंत्री मनप्रीत बादल ने 2020-21 का बजट पेश करते हुए पंजाब सरकार पर जो कर्ज़े का जो अनुमान दिया है उसके अनुसार यह रकट 2,48,236 करोड़ रुपये है, जिस कारण पंजाब का हर नागरिक 89,000 रुपये के कर्जे में दबा है।

पंजाब सरकार के नए कर्ज़ों का 70 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा पुराने कर्ज़ो के भुगतान में ही जा रहा है। अलग-अलग समय पर पंजाब के आर्थिक व राजनैतिक विशेषज्ञ पंजाब के लिए विशेष आर्थिक पैकेज की मांग करते रहे हैं। पंजाब सरकार के लिए अपने कर्मचारियों को वेतन देना मुश्किल हो रहा है। पंजाब सरकार आमदनी बढ़ाने में सफल साबित नहीं हुई।

विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस पार्टी द्वारा जारी किए गए चुनावी घोषणापत्र में शिक्षा को दिए गए विशेष स्थान से यह महसूस किया गया था कि शायद सरकार शिक्षा क्षेत्र में सुधार के लिए कोई बढ़िया फैसले लेगी लेकिन किए गए वादे पूरे नहीं हुए।

वरिष्ठ पत्रकार हमीर सिंह का विचार है कि देश की आजादी के बाद शिक्षा को सही दिशा में लाने के लिए कोठारी कमीशन की यह टिप्पणी गौर करने वाली है कि यदि बच्चों को एक जैसा स्कूल नहीं दिया जाता तो बराबरी के सारे दावे खोखले हैं।

पिछले समय से शिक्षा के क्षेत्र के व्यापारीकरण व निजीकरण द्वारा सरकार शिक्षा क्षेत्र से अपना हाथ खींच रहीं हैं। कैप्टन सरकार ने चुनावी घोषणापत्र में लिखा था कि सरकार 18 अगस्त 2015 की इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले की भावना मुताबिक पड़ोसी स्कूलों की निशानदेही करेगी ताकि निकट क्षेत्रों के बच्चे एक ही स्कूल में पढ़ सकें।

इस फैसले अनुसार सरकारी खजाने से वेतन लेने वाले हर व्यक्ति के बच्चे निकट सरकारी स्कूल में पढ़ने चाहिए। जो अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ाना चाहता तो वह अपने बच्चे के प्राइवेट स्कूल में खर्च के बराबर का पैसा सरकारी खजाने में जमा करवाएगा। लेकिन सरकार ने इस फैसले की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। कोठारी कमीशन की सिफारिश रही है कि शिक्षा के क्षेत्र को बेहतर चलाने के लिए शिक्षा पर कुल घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत हिस्सा खर्चना चाहिए। लेकिन मौजूदा पंजाब सरकार यह हिस्सा सिर्फ 3 प्रतिशत के करीब रख रही है।

कैप्टन अमरिंदर सरकार ने 2019 के बजट सत्र में विधानसभा में यह कहा था कि लड़कियों को पीएचडी तक की शिक्षा मुफ्त दी जाएगी लेकिन इस साल के बजट में यह निर्णय बदलकर 10+2 तक रह गया है। सरकार ने अपने वादे मुताबिक निजी शिक्षा संस्थाओं को नियमित करने के लिए भी कोई ऑथोरिटी नहीं बनाई। चुनावी घोषणापत्र में यह भी कहा गया था कि सरकारी कॉलेजों में गरीब, मेरिटोरियस, अनुसुचित जाति व ओबीसी के विद्यार्थियों के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित होंगी व मुफ्त शिक्षा दी जाएगी पर सरकार ने इस स्कीम के लिए बजट में एक भी पैसा नहीं रखा।

अनुसुचित जाति के विद्यार्थियों के लिए केन्द्र सरकार की 2011-12 में शुरू की गई पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप स्कीम ने भी विद्यार्थियों को पांच सालों के बाद पैसा देना बंद कर दिया है। विद्यार्थियों को पंजाब में अपना भविष्य धुंधला नजर आ रहा है। इसी कारण पंजाब के मध्यम वर्ग के परिवारों के बच्चे 10+2 के बाद विदेशों का रुख कर रहे हैं। पंजाब के 48 सरकारी कॉलेज हैं। इनमें से 25 प्रतिशत स्टाफ रेगुलर नहीं है। ज्यादातर कॉलेजों में गेस्ट फैकल्टी पढ़ा रहे हैं।

कैप्टन सरकार का दावा है कि सत्ता संभालने के बाद उसने अमन-कानून के क्षेत्र में सबसे बड़ी प्राप्ति की है, पर ज़मीनी हकीकत कुछ और है। हर साल 50 लाख नौकरियां देने का वादा करके सत्ता में आई सरकार के राज में नौजवान नौकरियों के लिए आये दिन सड़कों पर निकल रहे हैं और पुलिस से लाठियां खा रहे हैं। 28 दिनों में नशा खत्म करने का वादा भी बोगस ही निकला। नशे की ओवरडोज़  के कारण अभी भी नौजवान मर रहे हैं।

साल 2017 से 2020 तक दर्ज किए केस व नशे की बरामदगी का ब्यौरा कुछ इस तरह हैः

नशा तस्करी संबंधी दर्ज केस         35,500
गिरफ्तार किए गए अपराधी           44,500
नशा तस्कर                        11,000
हेरोइन केस में बरामदगी              1100 किलोग्राम
स्मैक केस में बरामदगी               380 किलोग्राम
अफीम केस में बरामदगी              1500 किलोग्राम
भुक्की (पॉपी हस्क) केस में बरामदगी     1,30,000 किलोग्राम

राज्य में बैंक डकैती, कत्ल भी हो रहे हैं और प्रतिदिन सड़क हादसों में जानें जा रही हैं। गैंग घटनाएं उसी तरह जारी हैं। इसके अलावा लोगों के भावनात्मक मुद्दे गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी करने वालों को सजा दिलवाने, प्राइवेट ट्रांसपोर्टरस की गुंडागर्दी रोकने जैसे वादे भी पूरे नहीं किए गए।

जहां तक स्वच्छता और सड़कों की मरम्मत करने का मामला है तीन साल पहले सरकार ने लुधियाना को मॉडल शहर बनाने का वादा किया था जोकि अभी तक अधूरा है। शहर की ज्यादातर सड़कों पर बड़े बड़े गढ्ढे हैं और न ही सीवरेज़ का सही इंतेजाम है। हल्की बारिश होने पर ही सड़कें पानी में डूब जाती हैं।

लुधियाना के बुढ़ा नाले की हालत बद से बदतर हो चुकी है। पंजाब सरकार ने बुढ़ा नाला की हालत सुधारने के लिए 650 करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट का ऐलान किया लेकिन इसके विकास का ड्राफ्ट भी तैयार नहीं किया गया। ये वो तल्ख हकीकतें हैं जो कैप्टन सरकार के वादों की हवा निकाल कर रख देती हैं।

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