NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कानून
भारत
राजनीति
भारतीय न्यायपालिका में लैंगिक समानता बनाने का वक़्त आ गया है
सुप्रीम कोर्ट में दिसंबर, 2020 में जमा किए दस्तावेज़ों में अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने कहा था कि लैंगिक प्रतिनिधित्व, ख़ासकर लैंगिक अपराधों को संबोधित करने के लिए, कोर्टरूम को संतुलित किए जाने की ज़रूरत है। 
नीरज मिश्रा
18 Mar 2021
भारतीय न्यायपालिका में लैंगिक समानता बनाने का वक़्त आ गया है

जस्टिस इंदु मल्होत्रा के रिटायर होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में लैंगिक समानता पर बहस लगभग ख़त्म हो चुकी में जा चुकी है। दुर्भाग्य से ऐसा हो रहा है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में अब केवल एक ही महिला न्यायाधीश बची हैं, दूसरी तरफ तमाम हाईकोर्ट में मिलाकर महिला जजों की संख्या भी महज़ 81 तक ही पहुंचती है। नीरज मिश्रा पूछते हैं कि क्या इस स्थिति को बदला जाएगा। 

आज देश के सभी हाईकोर्ट में मिलाकर 81 महिला न्यायाधीश हैं, दूसरी तरफ पुरुष न्यायाधीशों की संख्या 1,078 है। जस्टिस इंदु मल्होत्रा के रिटायरमेंट के बाद सुप्रीम कोर्ट में तो हालत और भी ज़्यादा खराब हो गई है। वहां अब 29 पुरुषों के बीच केवल इंदिरा बनर्जी ही महिला न्यायाधीश हैं। अमेरिका से तुलना करने पर यह आंकड़े बेहद कमज़ोर नज़र आते हैं, जहां न्यायाधीशों के पदों पर महिलाओं की हिस्सेदारी 27 से 34 फ़ीसदी होती है। 

भारत के सुप्रीम कोर्ट में कोई महिला पहली बार 1989 में ही न्यायाधीश बन पाई। दूसरी तरफ अपने 75 साल के इतिहास में सुप्रीम कोर्ट में आज तक एक भी महिला मुख्य न्यायाधीश नहीं बन पाई है। 

जब सार्वभौमिक मताधिकार की बात आती है, तो भारत अमेरिका को पीछे छोड़ देता है। महिलाओं को भारत की स्वतंत्रता के साथ ही मतदान का अधिकार मिल गया था और कभी निचली जातियों को मतदान के अधिकार से वंचित करने की कोशिशें नहीं हुईं। वहीं अमेरिका में अश्वेत लोगों को 1965 के मताधिकार कानून से ही मतदान का अधिकार मिला। आज अश्वेत महिलाओं के लिए चीजें इतनी आगे बढ़ चुकी हैं कि न्यायपालिका में उनकी 7 फ़ीसदी की पर्याप्त भागीदारी है। दूसरी तरफ भारत में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का न्यायपालिका में शून्य प्रतिनिधित्व है, क्योंकि यहां सकारात्मक कार्रवाईयों की कमी है।

बदतर हालत

ऊपर से किसी दलित महिला का सुप्रीम कोर्ट में जज बनकर पहुंचने के उतने ही आसार हैं, जितने बस्तर के गंगूराम के ब्रिटेन की महारानी के साथ बकिंघम पैलेस में चाय पीने के हैं। 1989 में जस्टिस फातिमा बीवी से लेकर जस्टिस बनर्जी तक, सुप्रीम कोर्ट में अब तक सिर्फ 8 महिला जजों की ही तैनाती हुई है। इनमें से कोई भी देश के वंचित तबकों से नहीं आतीं।

इसी तरह सुप्रीम कोर्ट में पूर्वोत्तर से भी बहुत कम प्रतिनिधित्व रहा है। कभी कोई महिला तो रही ही नहीं। केवल गुवाहाटी से आने वाले जस्टिस ह्रषिकेश रॉय ही गुवाहाटी हाईकोर्ट से आते हैं, वहीं दिल्ली और मुंबई से आने वाले जजों का सुप्रीम कोर्ट में प्रभुत्व है।

हाल में कुछ ऐसी बातें हो रही हैं, जिनमें सुप्रीम कोर्ट में 5 महिला जजों की नियुक्ति की बात कही जा रही हैं, इसमें भविष्य में मुख्य न्यायाधीश के पद तक नियुक्ति भी शामिल है। बता दें इस साल जस्टिस एस ए बोबडे रिटायर हो रहे हैं। कर्नाटक हाईकोर्ट की जस्टिस बी वी नागरत्ना जैसी कुछ महिला न्यायाधीशों के नाम पर सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम में चर्चा हुई है।

अलग-अलग बाधाएं

जस्टिस नागरत्ना को 2 फरवरी, 2008 को कर्नाटक हाईकोर्ट का जज बनाया गया था। अगर उन्हें सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति दी जाती है, तो वे फरवरी 2027 में जस्टिस सूर्यकांत के बाद मुख्य न्यायाधीश बन सकती हैं। इसके बाद वे 29 अक्टूबर, 2027 तक इस पद पर रहेंगी। लेकिन उन्हें सुप्रीम कोर्ट में पहुंचाने में कुछ बाधाएं हैं। उनके पिता जस्टिस ई एस वेकंटरमैया 1989 में कुछ वक़्त के लिए मुख्य न्यायाधीश रहे हैं। यहां न्यायपालिका पर वंशवाद और एक छोटी कुलीन परिधि में बंद रहने के आरोप लग सकते हैं। दूसरी बाधा यह है कि सुप्रीम कोर्ट में पहले ही कर्नाटक हाईकोर्ट से 3 जज हैं। इनमें से कोई भी 2023 के पहले रिटायर नहीं होना वाला।

यहां जस्टिस बेला त्रिवेदी के नाम पर भी चर्चा हो रही है। लेकिन यहां उनके पीछे उनका 'गुजरात संबंध' मौजूद रहेगा। गुजरात हाईकोर्ट में फिलहाल तीसरे नंबर की वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस बेला त्रिवेदी की नियुक्ति फरवरी, 2011 में हुई थी। इससे पहले वे एक दशक तक अलग-अलग जिला न्यायालयों में जज रही हैं। उन्हें नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली तत्कालीन गुजरात सरकार में कानून सचिव के तौर पर भी नियुक्ति दी गई थी। तत्कालीन सरकार के साथ उनके करीबी संबंधों के चलते 27 जून 2011 को उन्हें राजस्थान हाईकोर्ट स्थानांतरित कर दिया गया था। लेकिन फरवरी, 2016 में उन्हें वापस गुजरात हाईकोर्ट में नियुक्ति मिल गई। 

तेलंगाना हाईकोर्ट की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश जस्टिस हिमा कोहली का भी मजबूत दिल्ली संबंध है। उन्हें 2006 में वहां एडीशनल जज बनाया गया था। लेकिन वे इस साल सितंबर में रिटायर हो जाएंगी, तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति दिए जाने की संभावना कम ही है। यहां अब उत्तरपूर्व की महिला न्यायाधीशों के प्रतिनिधित्व पर भी बात करनी जरूरी है।

पूर्वोत्तर का प्रतिनिधित्व

पूर्वोत्तर के तीन हाईकोर्ट में कुलमिलाकर सिर्फ़ दो महिला जज; गुवाहाटी हाईकोर्ट की जस्टिस रूमी कुमारी फूकन और सिक्किम हाईकोर्ट की जस्टिस मीनाक्षी मदन राय। जस्टिस फूकन को 2011 में हाईकोर्ट का जज बनाया गया था, उनका एक साल से कुछ ऊपर का ही कार्यकाल शेष रह गया है। वहीं जस्टिस राय को 2015 में नियुक्ति दी गई थी, वे 2026 में रिटायर होंगी। अगर उन्हें सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति दी जाती है, तो वे 2029 तक जज बनी रह सकती हैं। दोनों ही महिलाएं निचली अदालतों और उच्च न्यायपालिका का अनुभव रखती हैं। जस्टिस भानुमति के रिटायर होने के बाद, ऐसे अनुभव के साथ सुप्रीम कोर्ट में कोई महिला जज नहीं रही है। 

जस्टिस राय दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ी हैं। उन्होंने न्यायिक सेवा में आने के पहले कैलाश वासदेव और अरूण जेटली के साथ 1980 के दशक के आखिर में काम किया है। न्यायिक नियुक्तियों में सकारात्मक कार्रवाईयों और महिला अधिकारों चल रही बातों को संबोधित करने के लिए जस्टिस राय इस सरकार का सबसे बेहतर विकल्प हो सकती हैं। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति देने के लिए वरिष्ठता का कोई पैमाना नहीं है। जस्टिस राय दलित और पूर्वोत्तर के प्रतिनिधित्व के पैमाने में सही बैठती हैं। उनके परिवार में किसी का न्यायपालिका से संबंध भी नहीं रहा है। 

सुप्रीम कोर्ट में दिसंबर, 2020 में जमा किए दस्तावेज़ों में अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने कहा था कि लैंगिक प्रतिनिधित्व, खासकर लैंगिक अपराधों को संबोधित करने के लिए, कोर्टरूम को संतुलित किए जाने की जरूरत है। इसकी शुरुआत शीर्ष से ही करनी होगी। बीजेपी पूर्वोत्तर में दलबदलू नेताओं के साथ मिलकर तेजी से कई राज्यों में सरकार बना चुकी है। लेकिन पार्टी ने उस क्षेत्र के लोगों को आगे बढ़ाने के लिए कोई कोशिशें नहीं कीं। यह एक मौका है जब पार्टी इस धारणा को बदल सकती है। 

यह लेख पहले द लीफ़लेट में प्रकाशित हुआ था।

नीरज मिश्रा रायपुर आधारित वरिष्ठ पत्रकार, किसान और वकील हैं। यह उनके निजी विचार हैं।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Time to Bring in Gender Parity in India’s Courts

gender rights
Judiciary
women's rights

Related Stories

क्यों मोदी का कार्यकाल सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में सबसे शर्मनाक दौर है

भारतीय अंग्रेज़ी, क़ानूनी अंग्रेज़ी और क़ानूनी भारतीय अंग्रेज़ी

"लव जिहाद" क़ानून : भारत लड़ रहा है संविधान को बचाने की लड़ाई

राज्य कैसे भेदभाव के ख़िलाफ़ संघर्ष का नेतृत्व कर सकते हैं

जेंडर आधारित भेदभाव और हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम

सुप्रीम कोर्ट की क्षेत्रीय बेंचों की ज़रूरत पर एक नज़रिया

विरोध प्रदर्शन को आतंकवाद ठहराने की प्रवृति पर दिल्ली उच्च न्यायालय का सख्त ज़मानती आदेश

न्यायाधीश आनंद वेंकटेश को बहुत-बहुत धन्यवाद 

भीमा कोरेगांव : पहली गिरफ़्तारी के तीन साल पूरे हुए

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) अधिनियम, 2021 की संवैधानिकता क्या है?


बाकी खबरें

  • Colombia
    पीपल्स डिस्पैच
    कोलंबिया में साल 2021 का 91वां नरसंहार दर्ज
    16 Dec 2021
    इंस्टीट्यूट ऑफ़ डेवलपमेंट एंड पीस स्टडीज (INDEPAZ) ने आगाह किया है कि 2021 में हुए नरसंहारों की संख्या 2020 में हुए नरसंहारों की कुल संख्या को पार कर सकती है। फ़िलहाल, दोनों ही आंकड़े बराबर हैं। 
  • bank strike
    अब्दुल अलीम जाफ़री
    यूपी : निजीकरण के ख़िलाफ़ 900 बैंकों के 10,000 से ज़्यादा कर्मचारी 16 दिसम्बर से दो दिन की हड़ताल पर
    16 Dec 2021
    बैंक कर्मचारियों की यूनियन का दावा है कि कॉरपोरेट घरानों की नज़र जनता द्वारा बड़ी मेहनत से कमाए गए 157 लाख करोड़ रुपयों पर है, जो सरकारी बैंकों में जमा है।
  • Advocate Manavi of ALF, YJ Rajendra of PUCL and Pastor Lucas present the report.
    निखिल करिअप्पा
    नई रिपोर्ट ने कर्नाटक में ईसाई प्रार्थना सभाओं के ख़िलाफ़ हिंसा को दर्ज किया
    16 Dec 2021
    पीयूसीएल की रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि ज़्यादातर मामलों में पुलिस पीड़ितों को सुरक्षा प्रदान करने में विफल रही है, यहां तक कि उन मामलों में भी पुलिस सुरक्षा नहीं दे पाई जहां उन्हें खुफ़िया…
  • modi
    सबरंग इंडिया
    काशी-विश्वनाथ कॉरिडोर का उद्घाटन: मंदिर और राज्य के विकास में अंतर क्यों नहीं?
    16 Dec 2021
    क्या पीएम को औरंगजेब का जिक्र ऐसे चुनावी राज्य में लाना था जहां अयोध्या फैसले के बाद से मंदिर की राजनीति गर्म हो रही है?
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 7,974 नए मामले, 343 मरीज़ों की मौत
    16 Dec 2021
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 87 हज़ार 245 हो गयी है।वही कोरोना के नए वैरिएंट ओमिक्रॉन के मामलों की संख्या बढ़कर 73 हो गई है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License