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कोरोना काल: मज़दूरों की तपस्या और त्याग
तिरछी नज़र : अरे भाई, यहां हम मिडिल क्लास को तो कोरोना की चिंता के कारण मुलायम गद्दों पर भी नींद नहीं आ रही है और तुम हो निश्चिंत हो सो रहे हो रेल की पटरी पर। कटोगे नहीं तो और क्या होगा!
डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
17 May 2020
मज़दूरों की तपस्या और त्याग
Image Courtesy: The Hindu

कोरोना में अगर असलियत में मुश्किल में हैं तो हम मिडिल क्लास के लोग हैं। लेकिन सारे के सारे लोग मज़दूरों की मुसीबतों का रोना रो रहे हैं। अरे, उनको  मुसीबत है ही क्या, जो सारे राजनेता और मीडिया उनकी मुसीबतें सुन और सुना रहे हैं। मोदी जी तो 12 मई के बाद मज़दूरों के असली रहनुमा बन कर उभरे हैं। क्या क्या नहीं कर रहे हैं, मज़दूरों के लिए।

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इन मज़दूरों को ऐसी क्या दिक्कत आन पड़ी है कि अपने गांव जाने की ज़िद पकड़े हुए हैं। अरे भई! हम भी प्रवासी हैं। अपना घर गांव, देस छोड़ पहले पढ़ाई के लिए निकले और फिर अब यहां नौकरी मिलने के बाद बीवी बच्चों के साथ सोसायटी के फ्लैट में बंद पड़े हैं। न कहीं आने के और न कहीं जाने के। करीब दो महीने हो गए फ्लैट में बंद। न बाहर किसी मॉल में गये और न ही किसी रेस्तरां में। हॉल में फिल्म देखे भी जैसे ज़माना बीत गया। वर्क फ्रॉम होम करते करते बोर हो गए। पर लॉकडाउन का जरा सा भी उल्लंघन नहीं किया। कभी मन किया तो दूध लेने के बहाने से निकले तो थोड़ा आगे तक हो आये, बस। पर इन्हें तो अपने गांव जाने की पड़ी है, जैसे लॉकडाउन का कोई मतलब ही नहीं है।

एक हम हैं। कम्पनी कह रही है, ऑफिस नहीं आ रहे हो, घर से ही काम कर रहे हो, तो वाहन भत्ता नहीं देंगे। वेतन भी काट कर कम देंगे। उस पर भी घर का किराया वेतन में से ही कट जाता है। फिर बिजली का बिल, पानी का बिल, इंटरनेट कनैक्शन का बिल, सभी देना है। और तो और कार की, पचास इंच वाले टीवी सैट की, होम थिएटर सिस्टम की, सबकी ईएमआई देनी है। सरकार ने बैंकों से सहूलियत दिलवा दी कि थोड़ा लेट दे दें, पर देनी तो पड़ेगी ही न। वो भी ब्याज के साथ। बच्चों की फीस भी जमा करनी है, नहीं तो स्कूल से नाम कट जायेगा। फिर भी हम हैं, कहीं जाने की बात नहीं कर रहे हैं।

और एक तुम हो, सरकारी जमीन घेर कर झुग्गी डाल ली। न उसका किराया। न बिजली का बिल। पानी भी म्यूनिसिपलटी के नल से भरते हो तो उसका भी बिल नहीं। न कोई ईएमआई, न ही इंटरनेट का बिल। न बच्चों की फीस की चिंता। फिर भी एक ही ज़िद। ज़िद है कि घर जाना है, गांव जाना है। अपने देस जाना है। अगर बस या रेल नहीं मिलेगी तो पैदल ही निकल पड़ना है। उस पर भी सरकारें समझा रही हैं कि भइया, खाना, राशन, सब मुफ्त देंगे। बस रुक जाओ। पर तुम हो कि मान ही नहीं रहे हो।

लेकिन यह जो मोदी जी की सरकार है न, बहुत ही होशियार है। उसे पता था, तुम जाये बिना मानोगे नहीं। सो, पुलिस को हुक्म दे दिया, जो भी सड़़कों पर पैदल दिखाई दे, पीट डालो। रास्ते में जो भी ढाबे थे, बंद करा दिये। रास्ते में पीने का पानी तक नहीं। जाओ, कैसे जाओगे। सैकड़ों-हजारों किलोमीटर, वो भी पैदल। पर तुम भी ठहरे हठ के पक्के। चल पड़े, साईकिल से, रिक्शा से, ठेले पर, इंतजाम हो गया तो किसी भी ट्रक या कंटेनर से। जो मिला उसी से। नहीं तो पैदल ही। भूखे प्यासे चल दिये।

ये जो मज़दूर वर्ग है न, बिल्कुल ही नादान है। अपनी चिंता तो है ही नहीं, अपने बीवी बच्चों की चिंता भी नहीं है। पैदल चल पड़े, बीवी बच्चों के साथ। और तो और, कुछ तो अपनी गर्भवती पत्नी को भी लेकर चल दिये। होना क्या था। रास्ते में बच्चा पैदा हो गया। जब जरा सी भी समझ नहीं होगी तो ऐसा ही होगा। अब नवजात शिशु को लेकर चलोगे और कोई अनहोनी हुई तो सरकार को जिम्मेदार ठहरा दोगे। तुम्हारा कोई भी ठिकाना नहीं है।

अब सरकार ने सड़कों पर पुलिस लगा दी तो मज़दूर लोग इतने बेशर्म निकले कि रेल की पटरी के रास्ते ही अपने गांव देहात के लिए निकल पड़े। कोई इन बेवकूफों से पूछे कि भाई, कि रेल की पटरी क्या पैदल चलने के लिए बनाई गई है। इतने सारे पत्थर पड़े होते हैं रेल पटरी पर। पर तुम हो कि खुद तो रेल पटरी पर चलोगे ही, पत्नी और बच्चों को भी चलवाओगे। पटरी पर चलोगे और उस पर सो भी जाओगे। अरे भाई, यहां हम मिडिल क्लास को तो कोरोना की चिंता के कारण मुलायम गद्दों पर भी नींद नहीं आ रही है और तुम हो निश्चिंत हो सो रहे हो रेल की पटरी पर। कटोगे नहीं तो और क्या होगा।

एक तुम हो और एक मोदी जी हैं। तुम्हारे लिए, तुम्हारे लिए ही, मोदी जी ने अभी, हाल ही में, बीस लाख करोड़ रुपये, जी हां! पूरे बीस लाख करोड़ रुपये आपके लिए ही घोषित किये हैं। पता है बीस लाख करोड़ रुपये में बीस के बाद कितने शून्य होते हैं। ठहरो, तुम्हें क्या पता होगा, मुझे भी हिसाब लगाना पड़ रहा है। तो बीस लाख करोड़ में बीस के बाद बारह शून्य होंगे। तो इतना सारा रुपया मोदी जी ने आपके लिए, आप मज़दूरों के लिए ही, दिया है। पर आप हैं कि घर को भागे जा रहे हैं। अब तुम तो भाग गए गांव, तो तुम्हारे लिए दिया गया पैसा सेठ लोगों के पास रुका रह जायेगा। फिर मोदी पर तोहमत कि मोदी तो पैसे वालों का, सेठ लोगों का यार है। गलती आपकी कि घर भाग गए और बुराई करोगे मोदी जी की।

जब मोदी जी ने आपको बीस लाख करोड़ रुपये देने का ऐलान किया, उसी भाषण में मोदी जी ने आपकी तपस्या और त्याग की प्रशंसा भी की। मोदी जी आपकी तपस्या से बहुत ही प्रसन्न हैं। ये जो मोदी जी ने रास्ते बंद किये, आप लोगों पर पुलिस से लाठी चार्ज करवाया, रास्ते भर खाने पीने के ठिकाने बंद करवा दिये, आपके तप की परीक्षा लेने के लिए ही किया।  जिस प्रकार भगवान अपने भक्तों की परीक्षा लेते हैं, ठीक उसी तरह मोदी जी ने आप मज़दूरों की परीक्षा ली। आप बुरा मत मानना, अब पता चल गया है कि भगवान आपसे प्रसन्न हैं। अब श्रमिक ट्रेन चला दी गई हैं।

चुपके से: मोदी जी, सर, मेरा छोटा भाई एच-1बी1 वीसा पर अमेरिका में नौकरी कर रहा था। ये कोरोना के चक्कर में उसकी नौकरी छूट गई है। अब उसे अमेरिका से आना है। आप तो लाने के लिए तैयार हैं। पर दिक्कत यह है कि सर, आप हवाई जहाज भेज भी रहे हैं और मेरे भाई और भाभी को ले भी आयेंगे। पर उनकी एक दूध पीती बच्ची है। वह वहीं पैदा हुई थी। वहीं पैदा हुई थी तो वहीं की नागरिक है। सर, अमरीका भारत नहीं है न और न ही वहां एनआरसी लागू हुआ है, तो इसलिए अभी तक अमेरिका में, जो भी वहां पैदा होता है, वहीं का नागरिक हो जाता है। तो सर जी, भारतीय अधिकारी उस बच्चे को भारत लाने की इजाजत नहीं दे रहे हैं। कह रहे हैं, कोविड 19 के कारण किसी भी विदेशी को भारत आने की इजाजत नहीं है। सर, आप मानवता के नाते ही कुछ कीजिए। वह तो वहां से पैदल भी नहीं आ सकता। सर जी, प्लीज। सर जी, उसने ट्वीट भी किया है।

(इस व्यंग्य स्तंभ के लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)

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