NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
साहित्य-संस्कृति
भारत
राजनीति
तिरछी नज़र: शौक़ बड़ों की चीज़ है
प्रधान सेवक का बड़ा मन है, बड़ी इच्छा है, बड़ा सपना है, उन्हें बड़ा शौक़ है...। उनका शौक़ बड़ा है, इसलिये उनके मकान का काम चल रहा है, आम आदमी का शौक़ छोटा है इसलिये आम आदमी के मकान का काम बंद है।
डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
06 Jun 2021
तिरछी नज़र: शौक़ बड़ों की चीज़ है
कार्टून साभार: Sajith Kuma

शौक़ बड़ी चीज़ है, जी भर के कीजिये। वास्तव में शौक़ होना ही, शौक़ छोटा हो या बड़ा, बड़ी चीज़ है। शौक़ बड़ी चीज़ ही नहीं बल्कि बड़ों की चीज़ भी बन गई है। बड़ों की चीज़ इसलिए क्योंकि छोटों को, आम जनता को खाने-पीने का इंतजाम करने से, मरने से इतनी फुरसत ही कहाँ है कि वह शौक़ रखे और अपने शौक़ पूरे करने की इच्छा करे। आज कल शौक़ करना तो अमीरों का काम है, फुरसत का काम है। जनता शौक़ कहाँ से करे और कैसे करे। जो थोड़े बहुत शौक़ थे भी, वे महामारी की भेंट चढ़ गए।

आम लोग, आम जनता भी इच्छा रखती थी, शौक़ फरमाती थी। पर वह पुराने ज़माने की बात थी। कोई खाने-पीने का शौक़ रखता था तो कोई पहनने-ओढ़ने का। किसी को गाड़ी की इच्छा थी तो किसी को अपने मकान की। हर आदमी कोई न कोई शौक़ रखता था, इच्छा पाले बैठा था। वो भी क्या दिन थे! जाने कहाँ गये वो दिन।


लेकिन 'जनता के सेवकों' को तो अपने शौक़ पूरा करने में बीमारी का, महामारी का कोई फर्क नहीं पड़ता। आज भी कोई बड़ा सेवक नई जगह कार्यभार संभालने पर अपने आफिस की साज-सज्जा बदल सकता है। नया फर्नीचर और परदे खरीद सकता है भले ही पुराने अफसर ने दो दिन पहले ही ये चीजें बदली हों। बड़े बाबुओं को तो अपने घर के फर्नीचर के भी पैसे मिलते हैं। ये बाबू अपनी नई सरकारी गाड़ी भी उसी जनता के टैक्स के पैसे से खरीद सकते हैं जिस जनता को अपने टैक्स के पैसे से मुफ्त शिक्षा प्रदान किये जाने में दिक्कत होती है। आप सरकारी खर्च पर अपने काफी सारे शौक़ और इच्छाएँ पूरी कर सकते हो बस मिज़ाज शौक़ीन होना चाहिये।

यह बात तो 'सेवकों' और 'जनसेवकों' के बारे में है। पर अगर सेवक 'प्रधान सेवक' हो तो !  फिर वहाँ तो कोई लिमिट ही नहीं है, शौक़ और इच्छाओं की। अगर आप चाहें तो आप दिन में चार बार कपड़े बदल सकते हैं। दस लाख का सूट पहन सकते हैं। और कोई आपको दस लाख का सूट 'गिफ्ट' दे सकता है। वैसे भी सेवकों को भेंट मिलती ही रहती हैं, और प्रधान सेवक जी को तो और भी ज्यादा मिलेंगी। वे तो अधिक 'काम' की चीज़ हैं। सिर्फ एक ही तो शौक़ है प्रधान सेवक जी को, अच्छा पहनने का। आपको, प्रधान सेवक जी को,जैसा कि सुनते हैं, विदेशी मशरूम खाने का भी शौक़ है। सुना है, अस्सी हजार रुपये किलो मिलता है वह मशरूम। प्रधान सेवक जी को सिर्फ यह दूसरा ही तो शौक़ है, खाने-पीने का। देश के लिए, जनता के लिए अट्ठारह-अट्ठारह घंटे काम करने वाला व्यक्ति, सिर्फ तीन घंटे सोने वाला व्यक्ति क्या एक टाइम भी ढंग से, मनपसंद खाना खाने का शौक़ नहीं फरमा सकता है !

वाहन का शौक़ कौन नहीं रखता है? किसे इच्छा नहीं होती है कि उसका अपना वाहन हो। उसके पास कार हो। कार नहीं तो स्कूटर-मोटरसाइकिल ही हो। पर आम आदमी इस कोरोना काल में एक साइकिल भी नहीं खरीद पा रहा है। पहले तो पैसे ही नहीं हैं। और अगर पैसे हैं भी तो शो रूम बंद हैं, उत्पादन बंद है। गाड़ी मिल भी रही हो तो घर के लोग तूफ़ान उठाये रहते हैं कि यहाँ तो खाने के लाले पड़े हैं और तुम्हे गाड़ी की पड़ी है। कोई गाड़ी नहीं आएगी.पर ' प्रधान सेवक' उनकी गाड़ी (हवाई जहाज) तो आ भी गई। इस आपदा काल में भी आ गई। खाने के लाले पड़े हैं फिर भी साढ़े आठ हज़ार करोड़ में आ गई है। उनका बड़ा शौक़, उनकी बड़ी इच्छा पूरी हो गई है।

मकान, यह तो लोगों का सपना होता है। मकान बनाने का लोगों को बहुत शौक़ होता है। शौक़ बड़ा तो है, लेकिन सभी पालते हैं। सभी की बहुत इच्छा होती है कि अपना एक मकान हो। लोग जीवन भर की गाढ़ी कमाई लगा देते हैं एक मकान का सपना पूरा करने के लिये। पर इस महामारी के काल में यह शौक़, इच्छा, सपना अधूरा ही है। कोई मकान बनवा भी रहा होता है तो, बारम्बार लगते और बढ़ते लॉकडाउन में उसका यह सपना, सपना ही बन कर रह गया है। कभी मज़दूर गाँव चले जाते हैं तो कभी मज़दूर हैं तो रेत, सीमेंट और बदरपुर नहीं है। और सब कुछ है तो लॉकडाउन लग जाता है। काम बंद है, पर प्रधान सेवक जी का मकान तो बन रहा है। लगातार बन रहा है। महामारी में भी बन रहा है, लॉकडाउन में भी बन रहा है। हजारों करोड़ में बन रहा है। प्रधान सेवक का बड़ा मन है, बड़ी इच्छा है, बड़ा सपना है, उन्हें बड़ा शौक़ है कि वे अगले चुनाव से पहले ही इस मकान में शिफ्ट हो जाएँ। उसके बाद न जाने उसमें कौन रहे । उनका शौक़ बड़ा है, इसलिये उनके मकान का काम चल रहा है, आम आदमी का शौक़ छोटा है इसलिये आम आदमी के मकान का काम बंद है।

आम आदमी शौक़ नहीं पाल सकता है, वह तो इच्छा ही कर सकता है। उसे पता है कि कोरोना की तीसरी लहर भी आएगी। और तीसरी ही क्यों, सरकार ऐसे ही चलती रही तो चौथी, पाँचवी भी आएगी। वह तो बस यही इच्छा कर सकता है कि बीमारी में मरे तो बीमारी से ही मरे। समुचित इलाज के बाद मरे, न कि डॉक्टरों और अस्पतालों की कमी से मरे। बिस्तरों और ऑक्सीजन की कमी से न मरे। दवाइयों की कमी से न मरे। मरे तो श्मशान, कब्रिस्तान मिल जाएँ, और अगर गंगा-गोदावरी के किनारे दफ़ना भी दिया जाए तो उसके शव की इज़्ज़त की जाए। उस पर ओढ़ाई गई रामनामी चादर हटाई न जाए। उसके शव को नंगा न किया जाए। बस यही एक छोटी सी चिंता है, छोटी सी इच्छा है। और आप कहें तो छोटा सा शौक़ है। बस ज़िन्दा रहने का शौक़ है या फिर सम्मान से मरने का शौक़ है। अगर पूरा हो सके तो ।

आमीन...!    

(इस व्यंग्य स्तंभ के लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)

tirchi nazar
Satire
Political satire
Narendra modi
Modi government
BJP

Related Stories

ज्ञानवापी मस्जिद विवाद : सुप्रीम कोर्ट ने कथित शिवलिंग के क्षेत्र को सुरक्षित रखने को कहा, नई याचिकाओं से गहराया विवाद

हिजाब बनाम परचम: मजाज़ साहब के नाम खुली चिट्ठी

उर्दू पत्रकारिता : 200 सालों का सफ़र और चुनौतियां

तिरछी नज़र: सरकार-जी, बम केवल साइकिल में ही नहीं लगता

विज्ञापन की महिमा: अगर विज्ञापन न होते तो हमें विकास दिखाई ही न देता

तिरछी नज़र: बजट इस साल का; बात पच्चीस साल की

…सब कुछ ठीक-ठाक है

तिरछी नज़र: ‘ज़िंदा लौट आए’ मतलब लौट के...

राय-शुमारी: आरएसएस के निशाने पर भारत की समूची गैर-वैदिक विरासत!, बौद्ध और सिख समुदाय पर भी हमला

बना रहे रस: वे बनारस से उसकी आत्मा छीनना चाहते हैं


बाकी खबरें

  • Muzaffarpur
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    लापरवाही : छह महीने बाद भी बच्चों को नहीं मिली किताबें, अभिभावकों को चिंता
    05 Oct 2021
    विभाग की ओर से पहली से आठवीं कक्षा के लिए 8.95 लाख सेट किताब की डिमांड राज्य मुख्यालय को भेजी गयी थी, जिसमें केवल पांच हज़ार छात्र-छात्राओं को ही किताब मिल सकी हैं।
  • Molnupiravir
    संदीपन तालुकदार
    क्या है मोल्नुपिरवीर? जिसे कोविड-19 के ख़िलाफ़ लड़ाई में माना जा रहा है ‘गेमचेंजर‘
    05 Oct 2021
    दवा निर्माता मर्क एंड कंपनी ने COVID-19 के ख़िलाफ़ एक नई एंटीवायरल दवा 'मोल्नुपिरवीर' को लेकर एक अध्ययन के परिणाम को प्रकाशित किया है। इसके परिणाम बताते हैं कि ये दवा अस्पताल में भर्ती होने की…
  • TMC
    रबींद्र नाथ सिन्हा
    ममता बनर्जी के कांग्रेस विरोधी सुर और भवानीपुर में बड़ी जीत के मायने क्या हैं? 
    05 Oct 2021
    टीएमसी अन्य राज्यों में अपने पदचिन्हों को विस्तार देने के क्रम में लगी हुई है, लेकिन कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि सीएम के भतीजे के खिलाफ ईडी का मामला उनकी इस आक्रामकता को कुछ हद तक सीमित…
  • VC is running BJP RSS agenda in university
    न्यूज़क्लिक टीम
    "विश्वविद्यालय में भाजपा आरएसएस का एजेंडा चला रहे है वीसी"
    05 Oct 2021
    चंडीगढ़ पुलिस ने 1 अक्टूबर को पंजाब यूनिवर्सिटी उप-कुलपति से मारपीट के आरोप में चार छात्रों पर मामला दर्ज किया| यह मामला एक महीने पहले का है जब यूनिवर्सिटी उप-कुलपति राज कुमार 1 सितम्बर को हो रहे…
  • N. V. Ramana
    सोनिया यादव
    मौजूदा समय में पुलिस-प्रशासन की कार्रवाई को लेकर मुख्य न्यायाधीश की नाराज़गी गंभीर है!
    05 Oct 2021
    बीते कुछ समय में देश के समक्ष ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जो शासन-प्रशासन की साठ-गांठ के साथ पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हैं। साल 2020 का दिल्ली दंगा हो या हैदराबाद की महिला डॉक्टर के साथ बलात्कार…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License