NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
व्यंग्य
भारत
राजनीति
तिरछी नज़र: 2047 की बात है
अब सुनते हैं कि जीएसटी काउंसिल ने सरकार जी के बढ़ते हुए खर्चों को देखते हुए सांस लेने पर भी जीएसटी लगाने का सुझाव दिया है।
डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
22 May 2022
india
प्रतीकात्मक तस्वीर

मैं बाजार से सब्जियां खरीद कर पैदल ही घर लौट रहा था। पेट्रोल इतना महंगा हो गया था कि स्कूटी घर में शो पीस की तरह खड़ी थी। हफ्ते में एक बार उस पर चढ़ा कवर उतार कर, धो पोंछ कर कवर चढ़ा देता था। पहले हफ्ते में एक बार थोड़ा सा चला भी लेता था कि इंजन चालू हालत में रहे पर अब उतना भी साहस नहीं होता था।

हां तो मैं बाजार से सब्जियां खरीद कर पैदल ही घर लौट रहा था। थैला दोनों हाथों से दबोच कर पकड़ा हुआ था। अरे नहीं, भारी नहीं था। सब्जियों का थैला और भारी हो, ऐसे भाग्य कहां। दोनों हाथों से तो इसलिये दबोच रखा था क्योंकि डर था कि कहीं कोई चोर उचक्का थैला छीन कर न भाग जाए। रामराज में भी ऐसा घोर कलयुग आ गया था कि चोर भी सोने की चेन या मोबाइल छीनने की बजाय सब्जियां और राशन खरीद कर लौट रहे लोगों को अधिक लूटने लगे थे। करते भी क्या, सरकार जी की कृपा से खाने पीने की चीजें ही सबसे महंगी हो गईं थीं। चोर भी सोना और हीरे-जवाहरात लूटने की बजाय खाने पीने की चीजें लूटने में ही लगे थे। और सरकार जी भी लोगों को यह बताना नहीं भूलते थे कि अब कानून व्यवस्था इतनी अच्छी है कि उनके राज में बहु बेटियां रात में भी सोने चांदी के आभूषण पहन सड़क पर निकल सकती हैं।

तो मैं यह बता रहा था कि मैं सब्जियों का थैला दोनों हाथों में जोर से भींच कर पैदल ही घर जा रहा था। सब्जियां खरीदने में बहुत ही दिक्कत का सामना करना पड़ता था। जब से सरकार जी ने सब्जियों को जीएसटी के दायरे में रखा था, सब्जियां बहुत ही महंगी हो गईं थीं। धीरे धीरे सब्जियां ठेलों पर और छोटे दुकानदारों के यहां मिलनी बंद भी हो गईं थीं और सिर्फ ऑनलाइन मिलती थीं या फिर रिलायंस, अडानी, अलीबाबा और वालमार्ट के स्टोरों पर। ये छोटे मोटे रेहड़ी ठेली वाले और छोटे दुकानदार सब्जी बेचते या जीएसटी का रिटर्न भरने के लिए सीए रखते। जीएसटी रिटर्न भरना तो शुरू से ही इतना कॉम्प्लिकेटेड था कि कुछ ही सीए ही समझ पाते थे। इसलिए कुछ सब्जी वाले शहर की संकरी बंद गलियों में चोरी छुपे सब्जी बेचते थे। पर वहां पर भी टैक्स इंस्पेक्टरों का डर लगा रहता था। तो मैंने थैला दोनों हाथों में छिपा कर इसलिए भी पकड़ा हुआ था क्योंकि मैं ऐसे ही किसी छोटे से ठेले वाले से सब्जी खरीद कर ला रहा था।

पहले राशन, फल और सब्जियों पर जीएसटी नहीं था। पर जैसे जैसे सरकार जी के खर्चे बढ़ते जा रहे थे, सभी चीजें जीएसटी के दायरे में आती जा रहीं थीं। दिन में चार छः बार नई नवेली जैकेट, नया हवाई जहाज, करोड़ों की कार, लाखों के जूते, लाखों का ही चश्मा, पेन। ये सब जनता द्वारा भरे जीएसटी से ही तो आ रहे थे। सब चीजों पर जीएसटी लागू हो चुका था सिवाय सांसों के। अब सुनते हैं कि जीएसटी काउंसिल ने सरकार जी के बढ़ते हुए खर्चों को देखते हुए सांस लेने पर भी जीएसटी लगाने का सुझाव दिया है। हर व्यक्ति को अट्ठारह वर्ष की आयु के बाद हर महीने अपनी सांसों का जीएसटी देना पड़ेगा। हर व्यक्ति की नाक में सांस नापने का यंत्र लगा दिया जाएगा और उसकी रीडिंग के हिसाब से हर एक व्यक्ति को हर महीने जीएसटी देना पड़ेगा।

बात तो मैं थैले में सब्जियां ले कर आने की कर रहा था पर जीएसटी की करने लगा। तो थैला मैंने ऐसे पकड़ा हुआ था जैसे कि कोई चोरी का सामान ले जा रहा हूं। कस कर और छुपा कर। कस कर इसलिए कि कोई चोर लूट कर न ले जाए और छुपा कर इसलिए भी कि कोई जीएसटी इंस्पेक्टर या फिर इनकम टैक्स वाला न देख ले। मैंने बहुत सी ऐसी घटनाएं सुनी-पढ़ी थीं कि सब्जियां या राशन लेकर आते लोगों को जीएसटी वालों ने रोक लिया और बिल और वजन चेक करने लगे। या फिर इनकम टैक्स वाले उन्हें रोक कर उनका पैन कार्ड देखने लगे। जो व्यक्ति पेट्रोल पंप पर टंकी फुल करवाता था उसका पैन नंबर तो इनकम टैक्स डिपार्टमेंट को भेज ही दिया जाता था।

तो पेट्रोल डीजल, रसोई गैस, दाल और चावल, गेहूं, खाना पकाने का तेल और सब्जियां, सभी कुछ इतना महंगा हो गया है कि पांच सौ और दो हजार के नोट होते तो थैले में भर कर ले जाने पड़ते। वह तो भला हो सरकार जी का कि उन्होंने दूसरी नोटबंदी में ये छोटे छोटे नोट बंद कर सीधे पांच हजार और दस हजार रूपए के नोट निकाल दिए थे। नोटबंदी के दिनों में तो बड़ी दिक्कत हुई थी पर आज बड़ी सहूलियत है। सब्जियां और राशन पानी खरीदने लायक पैसे बटुए में ही आ जाते हैं। सरकार जी यह दूसरी नोटबंदी नहीं करते तो बुजुर्गो की कही बात सही हो जाती। कि हमारे जमाने में में जेब में रख कर पैसे ले जाते थे और थैला भर सब्जी लाते थे पर तुम्हारे जमाने में थैला भर पैसे ले जाते हैं और जेब में सब्जियां लाते हैं।

तो थैला दोनों हाथों में छिपा कर मैं तेज कदमों से सड़क पर चला जा रहा था। रास्ते में गुप्ता जी का घर पड़ा। बाजार से घर जाते हुए गुप्ता जी का घर पड़ता ही है। अगर आप चाहें कि गुप्ता जी का घर न पड़े तो बहुत लम्बा रास्ता लेना पड़ता है। गुप्ता जी के घर के सामने से तेजी से गुजर ही रहा था कि गुप्ता जी ने, जो अपने घर के बाहर ही खड़े थे, पकड़ लिया। बोले, 'इतनी तेजी से कहां जा रहे हो। घर ही तो जा रहे हो ना। आओ, तुम्हें एक चीज दिखाता हूं'। वे अपने घर के सामने ही खोदे गए एक गड्ढे के पास ले गए। गड्ढे में पड़े एक लम्बे से अंडाकार पत्थर को दिखा कर बोले, 'देखो, शिवलिंग! मैंने यह गड्ढा खोदा है। यहां पर जरूर ही पहले भगवान शिव का मंदिर रहा होगा'। फिर खींचते हुए दूसरे गड्ढे तक ले गए, "और यहां देखो, यहां त्रिशूल'! वे दूसरे गड्ढे में झांकने लगे। क्या तीन, क्या तीन हजार, पिछले पच्चीस वर्ष में सभी मस्जिदें खोद दी गईं थीं। हर मस्जिद के खुदने पर खुश होने वाले गुप्ता जी अब अपने घर के आस-पास गड्ढे खोद कर शिवलिंग, त्रिशूल और कमल का फूल ढूंढ रहे थे।

हम आजादी की की सौवीं वर्षगांठ मना रहे थे। और घर पर मेरा पोता मुझसे और अपने बाप से पूछ रहा था कि जब अमृत काल चल रहा था, जब यह सब कुछ हो रहा था तब मैं तो छोटा था पर आप क्या कर रहे थे। यह मैं 2047 की बात कर रहा हूं।

(यह एक व्यंग्य स्तंभ है। इसके लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)

tirchi nazar
Satire
Political satire
India vision plan
India in 2047

Related Stories

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

कटाक्ष:  …गोडसे जी का नंबर कब आएगा!

तिरछी नज़र: ये कहां आ गए हम! यूं ही सिर फिराते फिराते

कटाक्ष: महंगाई, बेकारी भुलाओ, मस्जिद से मंदिर निकलवाओ! 

ताजमहल किसे चाहिए— ऐ नफ़रत तू ज़िंदाबाद!

तिरछी नज़र: ...ओह माई गॉड!

कटाक्ष: एक निशान, अलग-अलग विधान, फिर भी नया इंडिया महान!

तिरछी नज़र: हम सहनशील तो हैं, पर इतने भी नहीं

कटाक्ष : बुलडोज़र के डंके में बज रहा है भारत का डंका


बाकी खबरें

  • कोरोना
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 6 महीने बाद कोरोना से 300 से कम मौत
    06 Sep 2021
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 38,948 नए मामले दर्ज किए गए हैं। देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 1.23 फ़ीसदी यानी 4 लाख 4 हज़ार 874 हो गयी है।
  • केरल: गड़बड़ियों को रोकने के लिए सीपीआई (एम) की एलडीएफ़ सरकार के कामकाज़ पर होगी कड़ी नज़र
    पी.रमन
    केरल: गड़बड़ियों को रोकने के लिए सीपीआई (एम) की एलडीएफ़ सरकार के कामकाज़ पर होगी कड़ी नज़र
    06 Sep 2021
    सरकार के फ़ैसलों की जांच-पड़ताल करने और पार्टी कार्यकर्ताओं पर कड़ी नज़र रखने के लिए एकेजी सेंटर में साप्ताहिक संयुक्त बैठकें आयोजित की जा रही हैं।
  • संघर्ष के रंगमंच बदल रहे हैं : विवेक काटजू
    न्यूज़क्लिक टीम
    संघर्ष के रंगमंच बदल रहे हैं : विवेक काटजू
    06 Sep 2021
    9/11 के 20 साल बाद देश दुनिया में क्या बदला है, इस पर चर्चा करने के लिए इस ख़ास शृंखला की पहली कड़ी में वरिष्ठ पत्रकार नीलांजन मुखोपाध्याय ने अफगानिस्तान में पूर्व भारतीय राजदूत रहे विवेक काटजू से…
  • मोदी-योगी जाएंगे, किसान जीतेगा देश, महापंचायत ने सेट किया एजेंडा
    न्यूज़क्लिक टीम
    मोदी-योगी जाएंगे, किसान जीतेगा देश, महापंचायत ने सेट किया एजेंडा
    05 Sep 2021
    ग्राउंड रिपोर्ट में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने मुज़फ़्फ़रनगर महापंचायत में 300 किसान संगठनों के साथ जमा हुए देश भर के लाखों किसानों की आगे की रणनीति पर बात की। तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल सहित उत्तर…
  • kisan
    न्यूज़क्लिक टीम
    मुजफ्फरनगर किसान महापंचायत: यहाँ से हक़ की लड़ाई और बुलंद होगी
    05 Sep 2021
    संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले आज 5 सितंबर को मुजफ्फरनगर में हुई किसान महापंचायत को जोरदार समर्थन मिला।लाखों की तादाद में किसान कल से ही अलग-अलग राज्यों से मुजफ्फरनगर पहुँच गये हैं। संयुक्त किसान…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License